वन्देमातरम vndematram

 'वंदे मातरम्' में इन सभी रूपों (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती) का वर्णन मातृभूमि यानी भारतमाता की शक्ति, समृद्धि और ज्ञान रूपी विशेषताओं को दर्शाने के लिए काव्यात्मक (Metaphorical) रूप में किया गया है।

समर्थकों और रचनाकार के दृष्टिकोण से इन विशेषताओं का अर्थ इस प्रकार है:

* मातृभूमि ही सर्वोच्च शक्ति: रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी ने देश की भौगोलिक और सांस्कृतिक भूमि को ही जननी मानकर उसकी स्तुति की है।
* दुर्गा (रक्षा और बल): मातृभूमि की रक्षा करने वाली अदम्य शक्ति और साहस को 'दशप्रहरणधारिणी दुर्गा' के रूप में दर्शाया गया है।
* कमला/लक्ष्मी (समृद्धि): देश की उपजाऊ भूमि, प्राकृतिक सौंदर्य, अन्न और धन के भंडार को 'कमलदलविहारिणी कमला' कहा गया है।
* वाणी/सरस्वती (ज्ञान और संस्कृति): भारत की प्राचीन विद्या, चेतना, कला और बौद्धिक संपदा को 'विद्यादायिनी वाणी' के रूप में नमन किया गया है।

इस विचारधारा के अनुसार, ये सभी नाम और रूप अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा के लिए नहीं, बल्कि भारतमाता के विभिन्न गुणों (शक्ति, धन और ज्ञान) का बखान करने वाले अलंकारिक प्रतीक हैं।
क्या आप 'वंदे मातरम्' के शुरुआती दो छंदों के सटीक शब्द और उनके हिंदी अर्थ को पढ़ना चाहते हैं?

यहाँ 'वंदे मातरम्' गीत के इतिहास, विवादों, और संवैधानिक स्थिति का पूरा सार प्रस्तुत है:

## 1. इतिहास और उत्पत्ति

* रचयिता: बंकिमचंद्र चटर्जी ने इसकी रचना 1870 के दशक में की थी, जिसे बाद में 1882 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया गया।
* पहला राजनीतिक गायन: वर्ष 1896 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इस गीत को राजनीतिक मंच पर गाया।
* क्रांति का नारा: वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा राष्ट्रीय नारा बन गया।

## 2. ब्रिटिश सरकार का प्रतिबंध

* वर्ष 1905-1906: बंगाल विभाजन के बाद बढ़ रहे राष्ट्रवाद को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक स्थानों और शिक्षण संस्थानों में इसके गायन पर रोक लगा दी।
* बारीसाल सम्मेलन (1906): ब्रिटिश अधिकारियों ने इसके सार्वजनिक उद्घोष पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध लगाया और नारा लगाने वालों पर लाठीचार्ज व गिरफ्तारियां कीं। साथ ही 'आनंदमठ' उपन्यास को भी बैन कर दिया गया।

## 3. कांग्रेस के भीतर और मुस्लिम लीग का विरोध

* वर्ष 1909: मुस्लिम लीग के अमृतसर अधिवेशन में पहली बार इसे सांप्रदायिक नारा कहकर इस पर आपत्ति जताई गई।
* वर्ष 1923 (काकीनाडा अधिवेशन): कांग्रेस के भीतर इसका पहला बड़ा विरोध हुआ, जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष [मौलाना मोहम्मद अली जौहर]ने पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर द्वारा इसे गाए जाने पर धार्मिक आपत्ति जताई।
* वर्ष 1937 (लखनऊ अधिवेशन): [मोहम्मद अली जिन्ना] और मुस्लिम लीग ने आधिकारिक तौर पर इसके खिलाफ कड़ा प्रस्ताव पारित किया।
* कांग्रेस का बीच का रास्ता (1937): विवाद को सुलझाने के लिए [जवाहरलाल नेहरू] [सुभाष चंद्र बोस]और [महात्मा गांधी] के नेतृत्व में कांग्रेस ने निर्णय लिया कि राष्ट्रीय सम्मेलनों में केवल इसके शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे, जिनमें कोई धार्मिक प्रतीक नहीं हैं। इस समझौते को मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनों ने ही खारिज कर दिया था।

## 4. विवाद के मुख्य कारण

* तीसरे, चौथे और पांचवें छंद पर आपत्ति: गीत के इन छंदों में मातृभूमि की तुलना सीधे हिंदू देवियों जैसे [दुर्गा] [लक्ष्मी] और [सरस्वती] से की गई है।
* धार्मिक विचारधारा: इस्लाम के एकेश्वरवाद (तौहीद) सिद्धांत के अनुसार, ईश्वर के अलावा किसी अन्य आकृति, मूर्ति या देश की देवी के रूप में वंदना करना वर्जित माना जाता है। इसी आधार पर कुछ मुस्लिम संगठनों द्वारा इस पर आपत्ति की जाती है।
* समर्थकों का दृष्टिकोण: समर्थकों का मानना है कि यह गीत किसी मजहब का नहीं बल्कि मातृभूमि की वंदना और राष्ट्रभक्ति का सर्वोच्च प्रतीक है, जिसके लिए हर वर्ग के स्वतंत्रता सेनानियों ने बलिदान दिया।

## 5. स्वतंत्रता के बाद और संवैधानिक स्थिति

* संविधान सभा का फैसला (24 जनवरी 1950): संविधान सभा के अंतिम दिन अध्यक्ष [डॉ. राजेंद्र प्रसाद] ने एक आधिकारिक वक्तव्य के जरिए घोषणा की कि 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान ही राष्ट्रीय गीत (National Song) के रूप में बराबर का दर्जा और सम्मान दिया जाएगा। इसके लिए सदन में कोई मतदान या औपचारिक प्रस्ताव नहीं लाया गया था।
* कानूनी और न्यायिक स्थिति: भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के अनुसार, संविधान का अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) किसी भी नागरिक को 'वंदे मातरम्' गाने के लिए कानूनी रूप से मजबूर करने की अनुमति नहीं देता, बशर्ते वह इस गीत का अनादर न करे।

यदि आप इस विषय से संबंधित किसी विशिष्ट कानूनी मामले या ऐतिहासिक दस्तावेज के बारे में और विस्तार से जानना चाहते हैं, तो कृपया बताएं।
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ब्रिटिश सरकार ने 'वंदे मातरम्' पर मुख्य प्रतिबंध वर्ष 1905 और 1906 के दौरान लगाया था, जब बंगाल विभाजन के विरोध में यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा हथियार बन गया था। 

इस प्रतिबंध से जुड़े महत्वपूर्ण चरण और वर्ष इस प्रकार हैं:

* वर्ष 1905 (शुरुआती क्षेत्रीय प्रतिबंध): बंगाल विभाजन (1905) के बाद जब 'वंदे मातरम्' एक मुख्य स्वतंत्रता आंदोलन का नारा बना, तब नवगठित पूर्वी बंगाल प्रांत की ब्रिटिश सरकार ने स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थानों पर इसके गायन और नारे लगाने पर रोक लगा दी थी। 

* अप्रैल 1906 (पूर्ण आधिकारिक प्रतिबंध): ब्रिटिश अधिकारियों ने बारीसाल (Barisal) में हुए बंगाल प्रांतीय सम्मेलन के दौरान 'वंदे मातरम्' के सार्वजनिक उद्घोष और नारे लगाने पर पूरी तरह से कानूनी प्रतिबंध लगा दिया। इस आदेश का उल्लंघन करने पर स्वतंत्रता सेनानियों पर क्रूर लाठीचार्ज किया गया और गिरफ्तारियां की गईं। 

* आनंदमठ उपन्यास पर प्रतिबंध: इस गीत की लोकप्रियता और क्रांतिकारी प्रभाव को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने बंकिम चंद्र चटर्जी के मूल उपन्यास 'आनंदमठ' को भी पूरी तरह प्रतिबंधित (Ban) कर दिया था। 

* वर्ष 1938 का प्रतिबंध (हैदराबाद/उस्मानिया विश्वविद्यालय): बाद के वर्षों में भी ब्रिटिश-राज के अधीन रियासतों में इस पर रोक लगती रही। 16 नवंबर 1938 को उस्मानिया विश्वविद्यालय में इसके गायन पर पूर्ण रोक लगाई गई, जिसके खिलाफ छात्रों ने बड़ा आंदोलन किया था। 

यह ब्रिटिश प्रतिबंध भारत की आजादी (15 अगस्त 1947) के बाद ही पूरी तरह समाप्त हुआ। 
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मुस्लिम लीग ने औपचारिक और बड़े स्तर पर 'वंदे मातरम्' का खुला विरोध वर्ष 1937 में किया था, हालाँकि इसके शुरुआती संकेत 1909 में अमृतसर में हुए मुस्लिम लीग के अधिवेशन में भी देखने को मिले थे, जहाँ इसे एक सांप्रदायिक नारा बताया गया था। 

मुख्य विरोध से जुड़े मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

* वर्ष 1909 (अमृतसर अधिवेशन): मुस्लिम लीग के अध्यक्ष सैयद अली Imam ने अपने भाषण में पहली बार इस गीत को लेकर सांप्रदायिक आपत्ति जताई थी। 

* वर्ष 1937 (लखनऊ अधिवेशन): 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ में हुए मुस्लिम लीग के अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने इस गीत के खिलाफ आधिकारिक रूप से कड़ा विरोध दर्ज कराया और इसके संपूर्ण गायन को अस्वीकार कर दिया। 

* मुख्य कारण: मुस्लिम लीग का तर्क था कि इस गीत की पृष्ठभूमि (आनंदमठ) और इसके बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं (जैसे दुर्गा और लक्ष्मी) का उल्लेख है, जो इस्लामिक मान्यताओं और उनकी राजनीतिक पहचान के अनुकूल नहीं है।

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कांग्रेस में वंदे मातरम का विरोध करने वाले नेता मुख्य रूप से रूढ़िवादी मुस्लिम वर्ग (Conservative Muslim Leader) और खिलाफत आंदोलन से जुड़े नेताओं के गुट के थे।
इस विरोध के पीछे के मुख्य कारण और वर्ग की विशेषताएं इस प्रकार हैं:

* धार्मिक विचारधारा: इस वर्ग के नेताओं (जैसे [मौलाना मोहम्मद अली जौहर] का मानना था कि गीत में देश को 'दुर्गा' और 'लक्ष्मी' जैसी देवियों के रूप में दिखाया गया है, जो उनके एकेश्वरवादी (एक ईश्वर को मानने वाले) धार्मिक सिद्धांतों के खिलाफ है।

* राजनीतिक पृष्ठभूमि: यह वर्ग मुख्य रूप से खिलाफत आंदोलन (1919-1924) के दौरान कांग्रेस के करीब आया था। आंदोलन समाप्त होने के बाद इस गुट के कई नेता अलग राह पर चल पड़े।

* उग्र राष्ट्रवाद का विरोध: बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास 'आनंदमठ' की पृष्ठभूमि के कारण इस वर्ग को गीत के कुछ अंशों पर राजनीतिक और ऐतिहासिक आपत्ति थी।

क्या आप कांग्रेस द्वारा इस विवाद को सुलझाने के लिए 1937 में लिए गए फैसले के बारे में जानना चाहते हैं?

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वंदे मातरम' गीत का राजनीतिक स्तर पर मुख्य और खुला विरोध सबसे पहले वर्ष 1923 में कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में हुआ था, जहाँ [मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने इसके गायन पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद औपचारिक रूप से 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में [मोहम्मद अली जिन्ना] ने इसका खुला विरोध किया था। 

अंग्रेजी शासन के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा इस गीत के गायन और इसके प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया गया था, क्योंकि यह स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य नारा बन चुका था। राजनीतिक और वैचारिक रूप से इसके कुछ हिस्सों या संपूर्ण गायन को लेकर आपत्तियां 1920 के दशक के दौरान कांग्रेस के भीतर और बाद में मुस्लिम लीग द्वारा उठाई गईं। 
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कांग्रेस के भीतर 'वंदे मातरम्' का सबसे पहला और चर्चित विरोध वर्ष 1923 में काकीनाडा अधिवेशन के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष [मौलाना मोहम्मद अली जौहर] ने किया था, जबकि इसके बाद वर्ष 1937 में पार्टी नेतृत्व और कार्यसमिति ने वैचारिक व धार्मिक आपत्तियों को देखते हुए इसके केवल प्रथम दो छंदों को ही गाने का निर्णय लिया था।

कांग्रेस के भीतर इस गीत के विरोध और उससे जुड़े प्रमुख घटनाक्रम इस प्रकार हैं:

* वर्ष 1923 (काकीनाडा अधिवेशन): इस अधिवेशन में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर द्वारा 'वंदे मातरम्' गाए जाने पर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष [मौलाना मोहम्मद अली जौहर] ने धार्मिक आधार पर आपत्ति जताई थी। हालांकि, [पंडित पलुस्कर] ने विरोध को दरकिनार करते हुए पूरा गीत गाया था। 

* वर्ष 1937 (कांग्रेस कार्यसमिति का निर्णय): संपूर्ण गीत के कुछ अंशों को लेकर उठ रहे राजनीतिक और धार्मिक विवाद को सुलझाने के लिए [भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस] ने [रवींद्रनाथ टैगोर  की सलाह ली। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और महात्मा गांधी जैसे शीर्ष नेताओं के परामर्श से यह तय किया गया कि राष्ट्रीय सम्मेलनों में वंदे मातरम् के केवल शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे ताकि सभी की भावनाओं का सम्मान हो सके। 

* क्या आप जानना चाहते हैं कि 1937 के इस दो-छंद वाले निर्णय पर अन्य दलों (जैसे मुस्लिम लीग या हिंदू महासभा) की क्या प्रतिक्रिया थी?
* क्या आप संविधान सभा में 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाने से जुड़ी बहस के बारे में पढ़ना चाहते हैं?
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1937 में जब कांग्रेस ने 'वंदे मातरम्' के केवल शुरुआती दो छंदों को गाने का फैसला किया, तो इस पर अन्य राजनीतिक दलों और संगठनों की प्रतिक्रियाएं बेहद तीखी थीं।
विभिन्न दलों की प्रतिक्रियाएं इस प्रकार थीं:

## 1. मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया

* निर्णय को पूरी तरह खारिज किया: मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के इस समझौते (दो छंद गाने के फैसले) को स्वीकार नहीं किया।
* पूर्ण प्रतिबंध की मांग: लीग का कहना था कि गीत के केवल हिस्से को हटाना काफी नहीं है, बल्कि इस गीत को पूरी तरह से हटा दिया जाना चाहिए।
* सांप्रदायिक कार्ड: जिन्ना ने इस फैसले को कांग्रेस की "हिंदू मानसिकता" का प्रतीक बताया और इसे मुसलमानों पर थोपे जाने वाले एक हिंदू राष्ट्रगान के रूप में प्रचारित किया।

## 2. हिंदू महासभा की प्रतिक्रिया

* कांग्रेस का कड़ा विरोध: [वीर सावरकर] और हिंदू महासभा के अन्य नेताओं ने कांग्रेस के इस फैसले की भारी निंदा की।
* तुष्टीकरण का आरोप: हिंदू महासभा ने कांग्रेस पर 'मुस्लिम तुष्टीकरण' (Appeasement) का आरोप लगाया। उनका मानना था कि मुस्लिम नेताओं के दबाव में आकर राष्ट्रीय गीत के टुकड़े करना देश के स्वतंत्रता संग्राम का अपमान है।
* अखंड गायन का समर्थन: महासभा ने मांग की कि पूरे देश में इस गीत को बिना किसी काट-छांट के मूल रूप में ही गाया जाना चाहिए।

## 3. क्रांतिकारी और आम जनता की प्रतिक्रिया

* असंतोष और निराशा: देश के कई क्रांतिकारी गुट और आम नागरिक कांग्रेस के इस फैसले से निराश थे, क्योंकि 1905 के बंगाल विभाजन के समय से ही यह गीत हर धर्म और वर्ग के क्रांतिकारियों के लिए फांसी के फंदे पर झूलते समय गाया जाने वाला मुख्य नारा था।

क्या आप जानना चाहते हैं कि 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा (Constituent Assembly) ने 'वंदे मातरम्' को लेकर क्या अंतिम फैसला किया और इसे क्या दर्जा दिया?
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संविधान सभा में 'वंदे मातरम्' को लेकर कोई लंबी या विवादित बहस नहीं हुई थी, बल्कि 24 जनवरी 1950 को [संविधान सभा] के अंतिम सत्र के दौरान इसके दर्जे पर पूर्ण सहमति के साथ घोषणा की गई थी. 
इस संबंध में मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
* डॉ. राजेंद्र प्रसाद की घोषणा: संविधान सभा के अध्यक्ष [डॉ. राजेंद्र प्रसाद] ने 24 जनवरी 1950 को सदन में औपचारिक बयान दिया कि 'वंदे मातरम्' ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक और गौरवशाली भूमिका निभाई है। 

* समान दर्जा: सभा ने यह निर्णय लिया कि 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान ही राष्ट्रीय गीत के रूप में बराबर का दर्जा और सम्मान दिया जाएगा। 

* पूर्ण सहमति: ऐतिहासिक दस्तावेजों और  के अनुसार, संविधान सभा में इसे राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाने को लेकर कोई असहमति या गतिरोध नहीं था, और इसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया था। 
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संविधान सभा में 'वंदे मातरम्' को लेकर कोई औपचारिक प्रस्ताव (Resolution) पेश नहीं किया गया था और न ही इस पर कोई मतदान हुआ था। इसके बजाय, 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम दिन अध्यक्ष [डॉ. राजेंद्र प्रसाद] ने स्वयं एक आधिकारिक वक्तव्य (Statement) जारी कर इसे यह दर्जा दिया था। 
इससे जुड़े मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:

* प्रस्ताव के बजाय वक्तव्य: शुरुआत में यह सोचा गया था कि राष्ट्रगान और इस गीत को लेकर सदन में एक औपचारिक प्रस्ताव लाया जाएगा और उस पर वोटिंग होगी। लेकिन बाद में यह महसूस किया गया कि औपचारिक प्रस्ताव या मतदान की बजाय अध्यक्ष के बयान से सर्वसम्मति बनाना बेहतर रहेगा। 

* डॉ. राजेंद्र प्रसाद की घोषणा: 24 जनवरी 1950 को [संविधान सभा की बैठक] में [डॉ. राजेंद्र प्रसाद] ने घोषणा की कि 'जन गण मन' भारत का राष्ट्रगान होगा, और 'वंदे मातरम्'—जिसने देश की स्वतंत्रता के संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है—उसे राष्ट्रगान के समान ही सम्मान और बराबर का दर्जा दिया जाएगा। 

* सदस्यों की सहमति: इस घोषणा के बाद सदन में सदस्यों ने मेज थपथपाकर (Applause) इसका स्वागत किया था, जिससे बिना किसी विवाद या लंबी बहस के इसे स्वीकार कर लिया गया। 
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'वंदे मातरम्' को लेकर स्वतंत्रता के बाद भी होने वाले विवादों और इसके प्रति दृष्टिकोण को किसी एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे मुख्य रूप से कानूनी, संवैधानिक और धार्मिक व्याख्याओं के अलग-अलग तर्क काम करते हैं।
इस विषय से जुड़े विभिन्न पक्षों के मुख्य तर्क इस प्रकार हैं:
## 1. विरोध या आपत्ति करने वाले पक्ष का तर्क (धार्मिक और कानूनी दृष्टिकोण)

* एकेश्वरवाद (Monotheism): कुछ मुस्लिम संगठनों और उलेमाओं का तर्क है कि इस्लाम में केवल एक ईश्वर (अल्लाह) की इबादत की अनुमति है। 'वंदे मातरम्' के कुछ हिस्सों में मातृभूमि की तुलना देवी दुर्गा और लक्ष्मी से की गई है, जिसे वे अपनी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत मानते हैं।

* संवैधानिक स्वतंत्रता: भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। इस पक्ष का मानना है कि किसी भी नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

## 2. समर्थन करने वाले पक्ष का तर्क (सांस्कृतिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण)

* स्वतंत्रता संग्राम का गौरव: समर्थकों का तर्क है कि 'वंदे मातरम्' केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य मंत्र था, जिसके लिए देश के हर वर्ग और धर्म के क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया था।

* राष्ट्रभक्ति का प्रतीक: इस पक्ष का मानना है कि मातृभूमि की वंदना करना राष्ट्रभक्ति का स्वाभाविक रूप है, और इसे किसी विशेष धर्म से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। संविधान सभा ने भी इसे राष्ट्रगान के समान ही गौरवशाली दर्जा दिया है।

## 3. कानूनी और न्यायिक स्थिति

* उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) का रुख: भारत की अदालतों और सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मामलों में स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुसार किसी भी नागरिक को 'वंदे मातरम्' गाने के लिए कानूनी रूप से मजबूर नहीं किया जा सकता, बशर्ते वह इसका अनादर न करे।

* संसद और सरकार की नीति: राष्ट्रीय सम्मान के प्रतीकों के नियमों के तहत राष्ट्रगान (जन गण मन) के लिए विशिष्ट आचार संहिता (Code of Conduct) बनी हुई है, जबकि राष्ट्रीय गीत (वंदे मातरम्) के लिए वैसी बाध्यकारी आचार संहिता लागू नहीं है, हालांकि इसके प्रति सम्मान दिखाना प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य माना जाता है।

* क्या आप जानना चाहते हैं कि हाल के वर्षों में 'वंदे मातरम्' के अनिवार्य गायन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों में क्या टिप्पणियां की हैं?

* क्या आप जानना चाहते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान किन-किन प्रमुख मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों ने 'वंदे मातरम्' का खुलकर समर्थन किया था?
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स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई प्रमुख मुलिम राष्ट्रवादी नेताओं और कांग्रेस अध्यक्षों ने विभिन्न अधिवेशनों में 'वंदे मातरम्' के संपूर्ण या पारंपरिक गायन में अपनी सहभागिता दी थी। उस समय पार्टी के मंच पर इस पर व्यापक सहमति थी। 

ऐसे प्रमुख कांग्रेसी मुस्लिम नेता निम्नलिखित हैं:

* रहमतुल्लाह मोहम्मद सयानी (Rahimtulla M. Sayani): वर्ष 1896 के कलकत्ता अधिवेशन में ये कांग्रेस अध्यक्ष थे, जिस ऐतिहासिक सत्र में [रवींद्रनाथ टैगोर] ने पहली बार राजनीतिक मंच पर 'वंदे मातरम्' गाया था। 

* नवाब सैयद मोहम्मद बहादुर (Nawab Syed Muhammad Bahadur): वर्ष 1913 के कराची अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए इनके कार्यकाल में यह गीत अधिवेशन का हिस्सा बना रहा। 

* [सैयद हसन इमाम (Syed Hasan Imam) वर्ष 1918 के मुंबई (बॉम्बे) विशेष अधिवेशन के दौरान ये कांग्रेस अध्यक्ष थे और उनके समय में भी राष्ट्रवादी गीत के रूप में इसका गायन हुआ। 

* डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी (Dr. M. A. Ansari): वर्ष 1927 के मद्रास अधिवेशन के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष रहे डॉ. अंसारी के सम्मेलनों में भी यह परंपरा बिना किसी बड़े गतिरोध के जारी रही। 

* रफी अहमद क़िदवई (Rafi Ahmed Kidwai): कांग्रेस के दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी और बाद में नेहरू मंत्रिमंडल के मंत्री रहे क़िदवई ने भी देश की आज़ादी की लड़ाई में इस गीत और राष्ट्रवाद के मूल्यों का पुरजोर समर्थन किया था। 
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