‘वंदे मातरम्’, भारतीय संस्कृति,राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता का प्रबल उदघोष है - अरविंद सिसोदिया
सादर प्रकाशनार्थ
‘वंदे मातरम्’, भारतीय संस्कृति,राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता का प्रबल उदघोष है - अरविंद सिसोदिया
राष्ट्रीय विरासत और प्रतीकों के सम्मान से किसी प्रकार का तुष्टिकरणवादी समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता - अरविन्द सिसोदिया
कोटा 21 अगस्त । राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, जयपुर के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविंद सिसोदिया ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत या कुछ शब्दों का समूह नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता की चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय स्वाभिमान का शक्तिशाली महामंत्र है। इसमें राष्ट्रीय, सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकता की गजब की महाशक्ति है। उन्होंने कहा कि भारत किसी एक कालखंड में अस्तित्व में आया नया राष्ट्र नहीं, बल्कि लाखों वर्षों से चली आ रही जीवंत, चैतन्य और सनातन सांस्कृतिक परंपरा वाला राष्ट्र है।
सिसोदिया ने कहा कि किसी भी संप्रभु राष्ट्र का अस्तित्व उसके स्वाभिमान और राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा से जुड़ा होता है। भारत के संदर्भ में ‘वंदे मातरम्’ ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनमानस में राष्ट्रीय चेतना और स्वाधीनता की भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरणों में इसकी गूंज राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय स्वाभिमान की सर्वोच्चता एवं मातृभूमि की स्वतंत्रता की आकांक्षा की भावना से जुड़ी रही।
स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जुड़ा महामंत्र
उन्होंने कहा कि वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के विरुद्ध उठे आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय एकता का प्रभावशाली उद्घोष बना। इसने जाति, पंथ,भाषा और प्रांत के भेदों से ऊपर उठकर लोगों को एक साझा राष्ट्रीय भावना से जोड़ने का कार्य किया।
सिसोदिया ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के अनेक सेनानियों ने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया और अंग्रेजी शासन के दमन का सामना किया। ‘वंदे मातरम्’ उस दौर की राष्ट्रीय चेतना और संघर्ष की स्मृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। अंग्रेजी शासन द्वारा इसके उद्घोष पर प्रतिबंध लगाने के प्रयास भी इस बात को दर्शाते हैं कि यह महामंत्र जनता में स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना को पुरजोर उद्देलित करता था।
राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक तुष्टिकरण से मुक्त रखने की आवश्यकता
सिसोदिया ने कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को राजनीतिक तुष्टिकरण की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रभावना से जुड़े विषयों पर निर्णय वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति के आधार पर होने चाहिए?
उन्होंने कहा कि भारत का लोकतंत्र सभी नागरिकों के समान सम्मान और अधिकारों पर आधारित है। इसलिए राष्ट्र के प्रतीकों के सम्मान का दायित्व भी प्रत्येक नागरिक का समान रूप से होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राष्ट्रीय स्वाभिमान अथवा सांस्कृतिक विरासत से विमुख होना नहीं है।
‘वंदे मातरम्’ की गरिमा अक्षुण्ण रहनी चाहिए
सिसोदिया ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ भारत की नदियों, वनों, शस्य-श्यामला धरती और मातृभूमि के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण की अभिव्यक्ति है। यह स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों और भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के प्रति सम्मान किसी राजनीतिक दल अथवा विचारधारा का विषय नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय विरासत के प्रति सम्मान का विषय है। इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को राजनीतिक सुविधा के अनुसार सीमित करना उचित नहीं होगा।
‘वंदे मातरम्’ के विभाजन से लेकर देश के विभाजन तक
अरविंद सिसोदिया ने कहा कि कांग्रेस ने यदि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘वंदे मातरम्’ गीत के विभाजन और उसके मूल स्वरूप को सीमित करने की मांग को अस्वीकार कर दिया होता, तो देश के विभाजन की मानसिकता को उसी समय कड़ा जबाब मिल जाता और देश विभाजन से बच जाता।
उन्होंने कहा कि जिस समय भारत को जाति, भाषा, प्रांत और मजहब के आधार पर बांटने की राजनीति आकार ले रही थी, उस समय राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों के साथ समझौते करने के बजाय दृढ़ता से राष्ट्रभावना के पक्ष में खड़ा होना आवश्यक था। यदि तत्कालीन नेतृत्व ने तुष्टिकरण की राजनीति के स्थान पर राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी होती, तो इतिहास की दिशा अलग हो सकती थी। भारत अखण्ड स्वतंत्र होता।
सिसोदिया ने कहा कि आज आवश्यकता है कि अतीत की उन राजनीतिक भूलों से सबक लिया जाए और राष्ट्रीय प्रतीकों, सांस्कृतिक विरासत तथा राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर किसी भी प्रकार के दबाव या तुष्टिकरण को स्वीकार न किया जाए। देश का विभाजन और ‘वंदे मातरम्’ गीत का विभाजन, हमें यह संदेश देते हैं कि राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों से किया गया समझौता भविष्य में देश को गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकते है।
नया भारत अपनी विरासत के प्रति आत्मविश्वासी
अरविंद सिसोदिया ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदीजी के नेतृत्व में आज का भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक विरासत और राष्ट्रीय स्वाभिमान को लेकर न तो कोई समझौता करता है। न ही किसी तुष्टिकरणवादी दबाब को सहन करता है। अब भारत पहले से अधिक सजग और आत्मविश्वासी है। वहीं आधुनिकता, विज्ञान और विकास के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। वहीं उसने अपनी सांस्कृतिक जड़ों और राष्ट्रीय अस्मिता को गहराई से संरक्षित किया है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और स्वाभिमान सर्वोपरि हैं। ‘वंदे मातरम्’ की गरिमा को अक्षुण्ण रखना स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानियों और भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान का विषय है। इससे कतई समझौता या किन्तु परन्तु स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अरविंद सिसोदिया ने कहा कि तुष्टिकरण की राजनीति नें पहले भी देश विभाजित किया है, अब भी इस मानसिकता के आधोपतन से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता नहीं दी गई तो, नये खतरों को न्योता देना होगा। ‘वंदे मातरम्’ भारत की स्वतंत्रता चेतना, संस्कृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान की गूंज है और इसकी गरिमा का संरक्षण हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसी में देश की मजबूती है।
भवदीय
अरविंद सिसोदिया
शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी
राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, जयपुर
मोबाइल : 9414180151
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‘वंदे मातरम्’ के विभाजन से लेकर देश के विभाजन तक—इतिहास से सबक लेने की जरूरत
अरविंद सिसोदिया ने कहा कि कांग्रेस ने यदि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के विभाजन और उसके मूल स्वरूप को सीमित करने की मानसिकता को स्वीकार नहीं किया होता, तो संभवतः देश के विभाजन की त्रासदी भी टाली जा सकती थी। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ का विभाजन केवल एक गीत के स्वरूप का विभाजन नहीं था, बल्कि यह उस दौर में राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक एकता के सामने खड़ी की गई राजनीतिक चुनौतियों का प्रतीक था।
उन्होंने कहा कि जिस समय भारत को जाति, भाषा, प्रांत और मजहब के आधार पर बांटने की राजनीति आकार ले रही थी, उस समय राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों के साथ समझौते करने के बजाय दृढ़ता से राष्ट्रभावना के पक्ष में खड़ा होना आवश्यक था। यदि तत्कालीन नेतृत्व ने तुष्टिकरण की राजनीति के स्थान पर राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी होती, तो इतिहास की दिशा अलग हो सकती थी।
सिसोदिया ने कहा कि आज आवश्यकता है कि अतीत की उन राजनीतिक भूलों से सबक लिया जाए और राष्ट्रीय प्रतीकों, सांस्कृतिक विरासत तथा राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर किसी भी प्रकार के दबाव या तुष्टिकरण को स्वीकार न किया जाए। देश का विभाजन और ‘वंदे मातरम्’ के स्वरूप को लेकर हुए समझौते हमें यह संदेश देते हैं कि राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों से किया गया समझौता भविष्य में गंभीर परिणाम दे सकता है।
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भारतीय संस्कृति और स्वतंत्रता की चेतना का स्वाभिमान है वंदेमातरम्, देश किसी तुष्टिकरण के सामने सिरेंडर नहीं होगा — अरविंद सिसोदिया
भारत कोई जमीन का टुकड़ा नहीं है और न ही 1947 में पैदा हुआ कोई नया देश है। यह एक चैतन्य, सनातन और जीवंत सांस्कृतिक महाशक्ति है। जिसे किसी भी विदेशी आक्रमणकारी ताकतों के सामने झुकने कि जरूरत नहीं है।
किसी भी संप्रभु राष्ट्र का अस्तित्व उसके स्वाभिमान और उसके राष्ट्रीय प्रतीकों की अटूट गरिमा पर टिका होता है। भारत के संदर्भ में ‘वंदे मातरम्’ महज़ बंकिम बाबू के लिखे कुछ शब्द नहीं, बल्कि वह महामंत्र है जिसने सदियों से सुप्त भारतीय चेतना में स्वतंत्रता की दावानल प्रज्वलित की थी। आज देश के भीतर और बाहर बैठे विघटनकारी तत्वों को यह दो टूक संदेश देना आवश्यक है कि यह जागृत राष्ट्र अपने इस परम गौरव के सामने किसी भी प्रकार के वैचारिक, मजहबी या राजनीतिक तुष्टिकरण के आगे रत्ती भर भी आत्मसमर्पण नहीं करेगा।
लहू से सींचे गये महामंत्र वन्देमातरम का विभाजन अस्वीकार्य
इतिहास के पन्नों को पलटकर देखिए। जब 1905 में कुटिल अंग्रेजों ने बंग-भंग (बंगाल विभाजन) के जरिए भारत की एकता और अखंडता पर प्रहार करने का प्रयास किया था, तब इस देश की रगों में खौलते रक्त की तरह जो हुंकार दौड़ी थी, वह थी—‘वंदे मातरम्’।
इस एक महामंत्र ने जाति, भाषा और प्रांत के कृत्रिम मतभेदों को पीछे छोड़कर जनमानस को एक सूत्र में बांधा। यह वह पावन गीत है, जिसकी गूंज स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्षों में निरंतर सुनाई दी। लाला लाजपत राय जैसे राष्ट्रनायकों ने अंग्रेजी दमन का सामना किया और रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान तथा भगत सिंह जैसे शूरवीरों ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यह वह महामंत्र है जिसके उच्चारण मात्र से राष्ट्रीय स्वाभिमान का सूर्योदय होता है। लाखों क्रांतिकारियों नें इस महामंत्र के साथ बलिदान दिया तो लाखों राष्ट्रभक्तों नें कालेपानी की जेल सहित सेंकड़ों जेलों की कठिन यातनायें सही हैँ ।
अंग्रेजी हुकूमत इस राष्ट्रवादी चेतना की शक्ति से इतनी भयभीत थी कि उसने ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष पर पाबंदियां लगाने तक का प्रयास किया। जिस महामंत्र को हमारे पुरखों ने अपने त्याग, तपस्या और बलिदान से राष्ट्रीय स्वाभिमान का मुकुट बनाया, उसकी गरिमा को वोट बैंक की राजनीति के लिए छोटा करना उन अमर बलिदानियों की स्मृति के साथ अन्याय होगा।
एक तरफा सेक्युलरिज्म और तुष्टिकरण अस्वीकार्य
यह इस देश का बड़ा दुर्भाग्य रहा है कि जिस भारत का विभाजन ही मजहबी राजनीति और अंग्रेजों के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की त्रासदी से हुआ, वहां आजादी के बाद भी दशकों तक राष्ट्रीय प्रतीकों को कुछ वर्गों की ‘नाराजगी’ और ‘तुष्टि’ की तराजू में तौला जाता रहा। कभी धार्मिक मान्यताओं का हवाला देकर, तो कभी राजनीतिक दबाव के कारण राष्ट्रभावना से जुड़े विषयों पर संकोच और समझौते की राजनीति की गई।
अब देश यह तीखा सवाल पूछ रहा है,क्या सहिष्णुता और सेक्युलरिज्म का ठेका केवल बहुसंख्यक समाज ने ले रखा है? क्या यह व्यवस्था हमेशा एक तरफा ही चलेगी? क्या राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा भी राजनीतिक सौदेबाजी का विषय होनी चाहिए?
भारत के मूल सनातन समाज से यह अपेक्षा क्यों की जाए कि वह अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान, अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और अपनी धरती-मां की वंदना से जुड़े भाव को तुष्टिकरण की राजनीति के दबाव में छोड़े या कमजोर करे ?
राष्ट्र के प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और संवैधानिक कर्तव्यबोध का विषय है। इस देश की मिट्टी, इसकी संस्कृति और इसकी विरासत का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
हुंकार भरता नया भारत: विरासत से कोई समझौता नहीं
दबाव और संकोच की राजनीति का वह दौर अब पीछे छूट चुका है। आज का भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर आत्मविश्वासी, सजग और गौरवान्वित है। देश की राष्ट्रीय चेतना अब किसी राजनीतिक सुविधा की मोहताज नहीं है।
भारत स्पष्ट कर चुका है कि देशभक्ति अंतरात्मा का विषय अवश्य है, लेकिन राष्ट्रीय गौरव और राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा के साथ सार्वजनिक जीवन में खिलवाड़ स्वीकार्य नहीं हो सकता। राष्ट्र की एकता, अखंडता और स्वाभिमान सर्वोपरि हैं।
‘वंदे मातरम्’ भारत की नदियों, जंगलों, शस्य-श्यामला धरती और इस दिव्य भूमि की वंदना का भाव है। यह युगों-युगों से चली आ रही भारतीय सांस्कृतिक चेतना का गौरवगान है। यह हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और स्वतंत्रता-संग्राम की स्मृति से जुड़ा एक शक्तिशाली उद्घोष है।
यह देश हमारा है। इसकी संस्कृति हमारी है, इस विरासत को अकक्षुण्य रखना हमारी जिम्मेवारी है। इसकी राष्ट्रीय चेतना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। इसलिए अपने पूर्ण ‘वंदे मातरम्’ पर गर्व करना और उसकी गरिमा को अखण्ड रखना हमारा स्वाभिमान है। उसके विभाजन या भावार्थ को राजनीतिक सुविधा के अनुसार सीमित करना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
अरविंद सिसोदिया का यह दृष्टिकोण इसी राष्ट्रीय हुंकार का शंखनाद है कि भारत आधुनिकता के शिखर पर पहुंचेगा, विश्व का नेतृत्व करेगा, लेकिन अपनी सनातन विरासत, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान की कीमत पर कभी नहीं।
तुष्टिकरण की राजनीति के युग का अंत होना चाहिए। राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए। ‘वंदे मातरम्’ की गूंज भारत की स्वतंत्रता, संस्कृति और स्वाभिमान की गूंज है—और यह स्वाभिमानी भारत अपनी अस्मिता के प्रश्न पर किसी के सामने झुकने वाला नहीं है।
लेखक —
अरविन्द सिसोदिया
शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी
राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, जयपुर
9414180151
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भारतीय संस्कृति और स्वतंत्रता की चेतना का स्वाभिमान है वंदेमातरम्, देश किसी तुष्टिकरण के सामने सिरेंडर नहीं होगा — अरविंद सिसोदिया
भारत कोई जमीन का टुकड़ा नहीं या 1947 में पैदा हुआ कोई नया देश नहीं है। यह एक चैतन्य, सनातन और जीती-जागती सांस्कृतिक महाशक्ति है। किसी भी संप्रभु राष्ट्र का अस्तित्व उसके स्वाभिमान और उसके राष्ट्रीय प्रतीकों की अटूट गरिमा पर टिका होता है। भारत के संदर्भ में, 'वंदे मातरम्' महज़ बंकिम बाबू के लिखे कुछ शब्द नहीं, बल्कि साढ़े तीन अक्षरों का वह महामंत्र है जिसने सदियों से सोई हुई भारतीय चेतना में स्वतंत्रता की दावानल (आग) भड़काई थी। आज देश के भीतर और बाहर बैठे विघटनकारियों को यह दो टूक संदेश देना अनिवार्य हो गया है कि यह जागृत राष्ट्र अपने इस परम गौरव के सामने किसी भी प्रकार के वैचारिक, मजहबी या राजनीतिक तुष्टिकरण के आगे रत्ती भर भी सिरेंडर (आत्मसमर्पण) नहीं करेगा।
लहू से सींचा गया महामंत्र, समझौता नामंजूर !
इतिहास के पन्नों को पलटकर देखिए, जब 1905 में कुटिल अंग्रेजों ने बंग-भंग (बंगाल विभाजन) के जरिए भारत की छाती पर मजहब की छुरी चलाने की कोशिश की थी, तब इस देश की रगों में खौलता हुआ खून बनकर जो गूंज दौड़ी थी, वह थी— 'वंदे मातरम्'। इस एक मंत्र ने जाति, भाषा और प्रांत के सारे कृत्रिम मतभेदों को भस्म कर दिया था। यह वह पावन गीत है जिसे गाते हुए लाला लाजपत राय ने गोरों की लाठियां सहीं, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और भगत सिंह जैसे शूरवीरों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमा। अंग्रेज हुकूमत इस नारे की धमक से इस कदर थर-थर कांपती थी कि उसने इस पर पाबंदी लगा दी थी। जिस महामंत्र को हमारे पुरखों ने अपने पवित्र लहू से सींचकर राष्ट्रीय स्वाभिमान का मुकुट बनाया, उसकी गरिमा को वोट बैंक की सियासत के लिए छोटा करना उन अमर बलिदानियों के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है।
एक तरफा सेक्युलरिज्म का पाखंड और तुष्टिकरण पर प्रहार
यह इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य रहा है कि जिस भारत का विभाजन ही मजहबी कट्टरता और अंग्रेजों के 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' के आधार पर हुआ, वहाँ आजादी के बाद भी दशकों तक राष्ट्रीय प्रतीकों को कुछ विशेष वर्गों की 'नाराजगी' और 'तुष्टि' की तराजू में तौला जाता रहा। कभी धार्मिक मान्यताओं का बहाना बनाकर, तो कभी वीटो पावर का इस्तेमाल कर इस राष्ट्रगीत को काटा-छांटा गया।
अब देश यह तीखा सवाल पूछ रहा है कि क्या सहिष्णुता और सेक्युलरिज्म का ठेका सिर्फ बहुसंख्यक समाज ने ले रखा है ? क्या यह 'वन-वे ट्रैफिक' (एकतरफा रास्ता) है ? यदि कुछ वर्ग 21वीं सदी में भी अपनी मजहबी कट्टरता और जिद को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, तो भारत के मूल सनातन समाज से यह उम्मीद क्यों की जाए कि वह अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान, अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और अपनी धरती माँ की वंदना का गला घोंट दे ? राष्ट्र के प्रतीकों का सम्मान कोई ऐच्छिक विषय नहीं है; यह इस माटी का अन्न खाने वाले हर नागरिक की बुनियादी शर्त है। जो इस माटी का आदर नहीं कर सकता, उसे इसके सम्मान पर सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है।
हुंकार भरता नया भारत: 'विरासत से कोई समझौता नहीं'
दबाव और संकोच की राजनीति का वह स्याह दौर अब बीत चुका है। आज का भारत रक्षात्मक नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर आक्रामक और गौरवान्वित है। संसद द्वारा 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) कानून' को लागू करना इसी बात का जीवंत प्रमाण है। यह कानून उन ताकतों के गाल पर एक करारा तमाचा है जो मजहब की आड़ में राष्ट्रगीत का अपमान करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती थीं। यह देश साफ कर चुका है कि देशभक्ति भले ही अंतरात्मा का विषय हो, लेकिन राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों के साथ सार्वजनिक मंच पर खिलवाड़ या असहजता दिखाने वालों को अब सीधे जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा।
'वंदे मातरम्' भारत की नदियों, जंगलों, शस्य-श्यामल फसलों और इस दिव्य भूमि की साक्षात वंदना है। युगों युगों की भारतीय संस्कृति का यह गौरवगान है, यह हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का घोषणापत्र है। यह देश हमारा है हम किसी की भी किन्तु परन्तु क्यों सुनें। हमें अपने पूर्ण वन्देमातरम पर गर्व है और उसका विभाजन हम अस्वीकार है।
अरविंद सिसोदिया का यह दृष्टिकोण देश की इसी हुंकार का शंखनाद है कि भारत आधुनिकता के शिखर पर पहुंचेगा, दुनिया का नेतृत्व करेगा, लेकिन अपनी सनातन विरासत और राष्ट्रीय स्वाभिमान की कीमत पर कभी नहीं। तुष्टिकरण के घुटने टेकू युग का अंत हो चुका है। अब राष्ट्र सर्वोपरि है, और जो वंदे मातरम् की गूंज से कतराएगा, उसे इस देश की मुख्यधारा से पीछे छूटना ही होगा, क्योंकि यह स्वाभिमानी भारत अब किसी के सामने झुकने वाला नहीं है।
लेखक -
अरविन्द सिसोदिया
शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी
राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, जयपुर
9414180151
इस विचार की मूल भावना और इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
## 1. सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक
* क्रांति का मंत्र: अरविंद सिसोदिया और उनके जैसी विचारधारा के विचारकों का तर्क है कि 'वंदे मातरम्' ने उस समय देश में देशभक्ति की लहर पैदा की थी जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। इस गीत की शक्ति से घबराकर अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध तक लगा दिया था। ऐसे ऐतिहासिक गीत के साथ किसी भी प्रकार का समझौता करना देश के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने जैसा है।
* राष्ट्र प्रथम (Nation First): इस दृष्टिकोण के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतीक और राष्ट्रगीत किसी भी राजनीतिक दल, तुष्टिकरण की नीति या धार्मिक वीटो से ऊपर हैं। नया भारत अब अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर किसी भी दबाव के सामने झुकने को तैयार नहीं है।
## 2. 'तुष्टिकरण' के खिलाफ कड़ा रुख
* एकतरफा समझौता नहीं: आधुनिक विमर्श में यह बात बार-बार रेखांकित की जा रही है कि राष्ट्र के मूल प्रतीकों को सर्वमान्य होना चाहिए। यदि कोई वर्ग वोट बैंक की राजनीति या अपनी संकीर्ण मान्यताओं के कारण राष्ट्रीय गौरव के क्षणों से दूरी बनाता है, तो संप्रभु राष्ट्र को उसके सामने आत्मसमर्पण (Surrender) नहीं करना चाहिए।
* कानूनी मजबूती: संसद द्वारा राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) कानून को लागू करना इसी वैचारिक दृढ़ता का परिणाम है। यह कानून स्पष्ट संदेश देता है कि राष्ट्रगीत का सम्मान करना हर नागरिक का अनिवार्य कर्तव्य है और इसके अनादर को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। [5]
## 3. वैचारिक पुनर्जागरण का दौर
* आज का भारतीय समाज अपनी ऐतिहासिक भूलों को सुधारने और अपनी वास्तविक विरासत को गर्व से अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अरविंद सिसोदिया का यह कथन इसी जागृत जनभावना का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ विकास के साथ-साथ 'विरासत के सम्मान' को भी देश की संप्रभुता के लिए आवश्यक माना गया है।
## निष्कर्ष
'वंदे मातरम्' के प्रति यह अडिग निष्ठा इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी मूल आत्मा, संस्कृति और स्वतंत्रता के सेनानियों के बलिदानों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। राष्ट्र के स्वाभिमान के सामने किसी भी प्रकार की विभाजनकारी या तुष्टिकरण की राजनीति को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यदि आप इस वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो बताएं:
* स्वतंत्रता आंदोलन में 'वंदे मातरम्' के कारण जेल जाने वाले प्रमुख क्रांतिकारियों का इतिहास
* ब्रिटिश सरकार द्वारा इस गीत पर लगाए गए प्रतिबंध और उसके विरोध की कहानियां
* भारतीय राष्ट्रवाद के विकास पर ऋषि अरविंद (Sri Aurobindo) के विचार क्या थे
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