आरएसएस: सेवा, बलिदान और राष्ट्र निर्माण का एक शतक
राजनाथ सिंह ( भारत के रक्षा मंत्री)
आरएसएस: सेवा, बलिदान और राष्ट्र निर्माण का एक शतक
- 4 अक्टूबर, 2025
जब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 27 सितंबर, 1925 को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि आने वाले वर्षों में यह कितना लंबा और उल्लेखनीय सफर तय करेगा। आज आरएसएस निस्वार्थ सेवा का जीता-जागता उदाहरण है, जिसने भारत के सामाजिक ताने-बाने को आकार दिया है, इसकी संप्रभुता की रक्षा की है, इसके कमजोर समुदायों को सशक्त बनाया है और शाश्वत सभ्यतागत मूल्यों का पोषण किया है। आज, जब आरएसएस अपनी शताब्दी मना रहा है, तो इसके सफर पर एक नज़र डालना सार्थक होगा।
हाल ही में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में, आरएसएस सरसंघचालक श्री मोहन भगवत ने देश को संगठन के समावेशी लोकाचार की याद दिलाई। उन्होंने कहा, “धर्म व्यक्तिगत इच्छा का विषय है; इसमें किसी प्रकार का प्रलोभन या दबाव नहीं होना चाहिए।” यह विचार संघ के संस्थापक दर्शन को प्रतिध्वनित करता है: एक ऐसा समाज बनाना जो संघर्ष के बजाय सद्भाव, विभाजन के बजाय सामूहिक शक्ति और भौतिक सुख-सुविधाओं के बजाय चरित्र निर्माण पर आधारित हो।
दैनिक शाखाओं और स्वयंसेवकों द्वारा संचालित पहलों के माध्यम से, आरएसएस ने अनुशासन, लचीलापन और भारत की सांस्कृतिक विरासत पर गर्व को बढ़ावा देने की कोशिश की है, जिससे ऐसे व्यक्तियों का निर्माण हुआ है जो समाज और राष्ट्र की सेवा को अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानते हैं।
इसलिए, जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में राष्ट्र निर्माण में आरएसएस की एक शताब्दी लंबी भूमिका की सराहना की, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। इसे "विश्व का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन" बताते हुए, उन्होंने भारतीयों को याद दिलाया कि स्वतंत्र भारत में आरएसएस सबसे प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों में से एक के रूप में अपनी अलग पहचान रखता है।
विभाजन की त्रासदी के साये में आजादी मिली, जिसने जनहान्यों की भारी हानि की और लाखों लोगों को बेघर कर दिया। इस त्रासदी के बीच, आरएसएस स्वयंसेवकों ने अनुशासित और निस्वार्थ शक्ति के रूप में उभरकर अनगिनत पीड़ितों को बचाया, उनका पुनर्वास किया और उनकी रक्षा की। दूसरे सरसंघचालक श्री गुरुजी (एमएस गोलवलकर) और अन्य वरिष्ठ नेताओं के नेतृत्व में, आरएसएस ने समुदायों को संगठित किया, शरणार्थी शिविर स्थापित किए, भोजन और चिकित्सा सहायता प्रदान की, संकटग्रस्त परिवारों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया और घिरे हुए घरों की रक्षा के लिए व्यवस्था की।
आरएसएस का योगदान इतना महत्वपूर्ण था कि हालात से घबराए कांग्रेस नेताओं ने भी पंजाब में अपने परिवारों और समुदायों की सुरक्षा के लिए संघ से मदद मांगी। इसीलिए द ट्रिब्यून ने अपनी एक रिपोर्ट में आरएसएस को "पंजाब की तलवार" कहा था।
विभाजन के बाद भी यह भावना कायम रही। 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान, आरएसएस एक बार फिर रक्षक बनकर उभरा। इसने सिख समुदाय को आश्रय, संरक्षण और राहत प्रदान की। प्रख्यात लेखक खुशवंत सिंह ने सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार करते हुए कहा कि श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या से पहले और बाद में हिंदू-सिख एकता बनाए रखने में आरएसएस ने एक सराहनीय भूमिका निभाई।
इस विरासत को देखते हुए, जब कुछ लोग आरएसएस को बहुसंख्यकवादी संगठन कहते हैं तो यह निराधार और गलत है। स्वतंत्रता के दौरान, इसने भारत के अल्पसंख्यकों और उनके पूजा स्थलों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मार्च 1947 में, जब मुस्लिम लीग द्वारा उकसाए गए गिरोह स्वर्ण मंदिर की ओर बढ़े, तो तलवारों और लाठियों से लैस आरएसएस के स्वयंसेवकों ने उनका सामना किया और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। तीन दिन बाद, जब एक अन्य समन्वित हमले ने पवित्र सिख तीर्थस्थल को खतरे में डाल दिया, तो आरएसएस के स्वयंसेवकों ने मानव घेरा बनाकर घंटों तक संघर्ष किया और हमलावरों को सफलतापूर्वक खदेड़ कर गुरुद्वारे की रक्षा की ।
देश के एकीकरण में आरएसएस की भूमिका के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। कश्मीर से लेकर गोवा और दादरा-नगर हवेली तक, इसने भारत की क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाई है। जब पाकिस्तान समर्थित कबायली आक्रमणकारियों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया, तो सरदार वल्लभभाई पटेल ने महाराजा हरि सिंह को भारत में शामिल होने के लिए मनाने हेतु श्री गुरुजी से सहायता मांगी। श्री गुरुजी श्रीनगर गए और उन्हें तत्काल विलय की रणनीतिक आवश्यकता पर बल दिया। आरएसएस के स्वयंसेवकों ने 1947-48 के युद्ध के दौरान मीरपुर और मुजफ्फरबाद जैसे क्षेत्रों से भाग रहे शरणार्थियों के लिए आपूर्ति, रसद और राहत सामग्री का प्रबंधन करके सेना की सहायता भी की।
1954 में, स्वयंसेवकों ने पुर्तगालियों के नियंत्रण से दादरा और नगर हवेली को मुक्त कराने में अग्रणी भूमिका निभाई। के.आर. मलकानि की पुस्तक 'द आरएसएस स्टोरी' के अनुसार, "2 अगस्त 1954 को, नाना काजरेकर और सुधीर फड़के के नेतृत्व में लगभग 200 आरएसएस स्वयंसेवकों ने दादरा और नगर हवेली को मुक्त कराया और राइफलों, ब्रेन गन और स्टेन गन से लैस 175 पुर्तगाली सैनिकों को खदेड़ दिया।" इसी प्रकार, आरएसएस ने गोवा की मुक्ति के लिए भूमिगत स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लिया।
इस प्रकार, आरएसएस ने हमेशा भारत और उसकी भावना को मजबूत करने के लिए संघर्ष किया है। 1975 के आपातकाल के दौरान, संघ प्रतिरोध की रीढ़ बन गया और लाखों लोगों को भारत के संविधान की रक्षा के लिए एकजुट किया। जनवरी 1976 में प्रकाशित द इकोनॉमिस्ट के अनुसार, "आंदोलन के मुख्य कार्यकर्ता जनसंघ और उसके सहयोगी आरएसएस से आए थे, जिनके संयुक्त रूप से 1 करोड़ सदस्य होने का दावा किया जाता है, जिनमें से 80,000, जिनमें 6,000 पूर्णकालिक कार्यकर्ता शामिल हैं, जेल में हैं।" ऐसे समय में जब लोग और संस्थाएं केवल झुकने के लिए कहे जाने पर भी घुटने टेकने को तैयार थे, आरएसएस ने तानाशाही के खिलाफ लड़ाई लड़ी और भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में काम किया।
संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाते हुए, आरएसएस ने आदिवासियों और हाशिए पर पड़े समुदायों के उत्थान के लिए भी स्वयं को समर्पित किया है। अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम, जिसकी स्थापना 1952 में हुई थी, देश का सबसे बड़ा आदिवासी कल्याण संगठन है। आज यह देश के 323 जिलों के 52,000 गांवों में 20,000 से अधिक परियोजनाएं संचालित करता है, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कौशल विकास और सांस्कृतिक पुनरुद्धार शामिल हैं। आरएसएस का दृष्टिकोण आदिवासियों को उनकी मूल पहचान से समझौता किए बिना राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाना, उनके आदिवासी गौरव को मजबूत करना और उन्हें व्यापक भारतीय पहचान के साथ एकीकृत करना रहा है।
महात्मा गांधी के साथ आरएसएस के संबंधों को लेकर अक्सर उसकी अनुचित आलोचना की जाती है। यह सच है कि महात्मा गांधी और आरएसएस के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद थे—ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस के भीतर भी थे—लेकिन उनके रिश्ते को शत्रुता या प्रतिद्वंद्विता के रूप में चित्रित करना भ्रामक होगा। उनके मतभेदों ने कभी भी उनके आपसी सम्मान में बाधा नहीं डाली। यह 1934 में स्पष्ट हुआ, जब गांधी जी ने वर्धा में आरएसएस शिविर का दौरा किया। वे संगठन के "अनुशासन, छुआछीटी के पूर्ण अभाव और कठोर सादगी" से बहुत प्रभावित हुए। 16 सितंबर, 1947 को, विभाजन की अराजकता के बीच, गांधी जी ने दिल्ली में आरएसएस की एक सभा को संबोधित किया और उसकी सेवा और त्याग की भावना की प्रशंसा की। आरएसएस ने भी 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के तुरंत बाद, सम्मान के प्रतीक के रूप में 13 दिनों के लिए सभी शाखाओं को निलंबित कर दिया —संघ के इतिहास में यह एकमात्र ऐसा अवसर था।
सहभागिता की यह भावना—जहाँ मतभेद सम्मान या रचनात्मक कार्य में बाधा नहीं बनते—आरएसएस द्वारा अपने पारंपरिक आधार से परे क्षेत्रों और समुदायों के प्रति अपनाए जाने वाले दृष्टिकोण में भी परिलक्षित होती है। उदाहरण के लिए, पूर्वोत्तर एक ऐसा क्षेत्र था जो औपनिवेशिक छल और स्वतंत्रता के बाद की नीतिगत कमियों के कारण अलगाव और विद्रोह से ग्रस्त था। 1946 में गुवाहाटी में अपनी पहली शाखा स्थापित करने के बाद से, आरएसएस ने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने में एक परिवर्तनकारी भूमिका निभाई है। स्कूलों, स्वास्थ्य शिविरों, आपदा राहत और सामुदायिक विकास पहलों के माध्यम से, इसने विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास का निर्माण किया है और मतभेदों को पाटा है।
आरएसएस ने सौ वर्ष की सेवा पूरी कर ली है और राष्ट्र निर्माण में उसका योगदान अटूट और निरंतर बढ़ता जा रहा है। इस भावना का एक हालिया उदाहरण कोविड-19 महामारी के दौरान देखने को मिला, जब मई 2021 में लगभग 300 स्वयंसेवकों ने कोलार के लंबे समय से बंद पड़े बीजीएमएल अस्पताल को दो सप्ताह के भीतर पुनर्जीवित कर दिया और सैकड़ों मरीजों को राहत प्रदान की। ऐसे उदाहरण दर्शाते हैं कि सौ वर्ष बाद भी, आरएसएस उसी तरह चुपचाप अपनी भूमिका निभा रहा है, जैसा कि एक शताब्दी पहले इसकी परिकल्पना की गई थी।
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