देश विरोधी डिजिटल आतंकवाद और अराजकतावाद पर निर्णायक प्रहार हो
सादर प्रकाशनार्थ
जंतर-मंतर से उपजे सवालों को गंभीरता से लिया जाए
देश विरोधी डिजिटल आतंकवाद और अराजकतावाद पर निर्णायक प्रहार हो
— अरविन्द सिसोदिया
भारत की संसद पर पाकिस्तान-प्रेरित आतंकी हमला पहले भी हो चुका है, जिसे सुरक्षा बलों ने अपने बलिदान से विफल कर सांसदों के जीवन की रक्षा की थी। जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के नाम पर संसद मार्च के दौरान जो दृश्य बना और जो सूचनाएं सामने आ रही हैं, वे न केवल गंभीर हैं, बल्कि सरकार के लिए सावधान होने की कड़ी चेतावनी भी हैं।
आतंकवाद अब केवल सीमा पार से नहीं आता। वह सोशल मीडिया की स्क्रीन और हमारे लोकतांत्रिक मंचों तक भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से पहुंच चुका है। इसलिए जंतर-मंतर प्रकरण की गहराई से जांच, आयोजकों की और डिजिटल प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही अब राष्ट्रीय सुरक्षा के अनिवार्य विमर्श का विषय है।
जंतर-मंतर केवल दिल्ली का प्रदर्शन स्थल नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस परंपरा का प्रतीक है, जहां नागरिक अपनी बात सरकार तक पहुंचाते हैं और असहमति व्यक्त करते हैं। यदि किसी आतंकी नेटवर्क ने ऐसे स्थान को हिंसा और अराजकता फैलाने के लिए निशाना बनाया हो अथवा उसमें सम्मिलित होने का प्रयास किया हो, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने चुनौती बन जाता है।
हाल के दिनों में पंजाब और पश्चिम बंगाल से जुड़े कथित आतंकी मॉड्यूल, जंतर-मंतर की कथित रेकी, पेट्रोल बमों की बरामदगी, नकली पुलिस व नकली मिलिट्री बनाने की कोशिश तथा विदेशी संपर्कों की जांच हेतु कई गंभीर सवाल सामने आए हैं। यदि जांच में ये तथ्य प्रमाणित होते हैं, तो यह केवल कुछ व्यक्तियों की साजिश नहीं, बल्कि एक सुसंगठित, अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रविरोधी नेटवर्क की ओर संकेत करता है।
प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रदर्शन स्थल से नेपाल और बांग्लादेश की अराजकता को दोहराने जैसी बातें सोशल मीडिया पर सामने आई हैं। हजारों की संख्या में आपराधिक चरित्र के लोगों के सम्मिलित होने की बातें भी सामने आई हैं। इन सभी तथ्यों की निष्पक्ष और गहराई से जांच आवश्यक है।
असली लड़ाई हैंडलर तक पहुंचने की है
आतंकी साजिश में महत्वपूर्ण व्यक्ति केवल वह नहीं होता जो हथियार लेकर सड़क पर दिखाई देता है। उसके पीछे निर्देश देने वाला हैंडलर, धन उपलब्ध कराने वाला फंडर, डिजिटल संपर्क स्थापित करने वाला ऑपरेटर और स्थानीय स्तर पर मदद करने वाले लोग भी हो सकते हैं।
इसलिए जांच केवल गिरफ्तार आरोपियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह पता लगाना आवश्यक है कि उन्हें किसने निर्देश दिए, धन कहां से मिला, हथियार और ज्वलनशील सामग्री की व्यवस्था किसने की, दिल्ली में रेकी के निर्देश कहां से आए और उनके डिजिटल संपर्क किन लोगों अथवा संगठनों तक पहुंचते हैं।
यदि पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स अथवा प्रतिबंधित आतंकी संगठनों से संबंध प्रमाणित होते हैं, तो पूरे नेटवर्क की वित्तीय, डिजिटल और मानवीय कड़ियों को जोड़कर उसकी संरचना सामने लाई जानी चाहिए।
आतंकवाद का नया चेहरा: बंदूक के साथ मोबाइल भी
आज आतंकवाद की रणनीति बदल रही है। गोली और बम के साथ-साथ मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, डीपफेक, बॉट नेटवर्क और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी उसके हथियार बन सकते हैं।
किसी वास्तविक घटना के वीडियो में बदलाव कर पुलिस को प्रदर्शनकारियों पर हमला करते हुए दिखाया जा सकता है। फिर उसे फर्जी अकाउंट्स से साझा कर और पेड प्रमोशन के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुंचाकर कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश पैदा किया जा सकता है।
इस प्रकार जमीन पर हुई छोटी हिंसक घटना को डिजिटल माध्यम से राष्ट्रीय संकट में बदलना संभव है। यदि जंतर-मंतर प्रकरण में अथवा इससे पहले ऐसा कोई समन्वित डिजिटल अभियान प्रमाणित है, तो यह भारत के सामने मौजूद हाइब्रिड सुरक्षा खतरे की गंभीर मिसाल है । इसलिए सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक है।
सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय हो
फेसबुक, इंस्टाग्राम, मेटा, एक्स और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म करोड़ों भारतीयों तक सूचना पहुंचाने की शक्ति रखते हैं। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में उनकी जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है।
भारत सरकार को इन कंपनियों से स्पष्ट जवाब मांगना चाहिए—
- क्या विदेशी नेटवर्क से जुड़े बॉट अकाउंट्स की पहचान हुई?
- क्या डीपफेक और एआई-जनरेटेड सामग्री की समय पर पहचान हुई?
- क्या भड़काऊ सामग्री को पेड प्रमोशन से कृत्रिम रूप से बढ़ाया गया?
- क्या संदिग्ध अकाउंट्स के बीच समन्वय का तकनीकी विश्लेषण हुआ?
- जांच एजेंसियों द्वारा मांगे गए डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में कितना सहयोग किया गया?
इन प्रश्नों से बचने की अनुमति किसी भी टेक कंपनी को नहीं दी जानी चाहिए।
'टेकडाउन' से आगे जाना होगा
संदिग्ध पोस्ट हटाना आवश्यक हो सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। यदि किसी विदेशी नेटवर्क ने हिंसा भड़काने के लिए सैकड़ों या हजारों या लाखों फर्जी अकाउंट बनाए हैं, तो यह पता लगाना जरूरी है कि उन्हें किसने बनाया, कौन संचालित कर रहा था और उनके पीछे कौन-सा नेटवर्क तथा वित्तीय स्रोत था।
पेड डिजिटल प्रचार की जांच भी केवल विज्ञापन हटाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उसके भुगतान स्रोत, विज्ञापनदाता, लक्ष्य समूह और डिजिटल वितरण नेटवर्क तक पहुंचना आवश्यक है।
सोशल मीडिया को केवल कंटेंट मॉडरेशन के नजरिए से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण आयाम के रूप में देखना होगा।
सरकार को डिजिटल सुरक्षा की नई नीति बनानी होगी
भारत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ता देशों में है। करोड़ों लोग प्रतिदिन सोशल मीडिया के माध्यम से समाचार और विचार प्राप्त करते हैं। ऐसे में डिजिटल सूचना-युद्ध की क्षमता को नजरअंदाज करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिमपूर्ण होगा।
जंतर-मंतर के संकेतों को देखते हुए कुछ प्रमुख कदम आवश्यक हैं—
1. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोशल मीडिया कंपनियों के लिए प्रभावी आचार संहिता बनाने की पहल हो।
2. डिजिटल प्लेटफॉर्म, मैसेजिंग ऐप्स और संबंधित तकनीकी सेवाओं के संग्रह, संचालन और डेटा संबंधी व्यवस्था पर देशों का प्रभावी नियमन हो।
3. मोबाइल कंपनियों और मोबाइल उपकरणों में उपलब्ध तकनीकी व्यवस्थाओं के संबंध में राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से प्रभावी नियंत्रण हो।
4. दिल्ली सहित देश में धरना, प्रदर्शन और रैली के लिए उपयुक्त निर्धारित स्थान तय किए जाएं, ताकि सरकारी कामकाज और आम जनजीवन प्रभावित न हो। राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री निवास, संसद, विधानसभाओं, सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, रक्षा विभाग के कार्यालय जैसे राष्ट्रीय महत्व के प्रमुख स्थलों की पांच किलोमीटर की परिधि में धरने-प्रदर्शन के संबंध में कठोर एवं स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
सरकार को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें—
- संगठित विदेशी दुष्प्रचार नेटवर्क की शीघ्र पहचान हो;
- डीपफेक और एआई-जनरेटेड सामग्री की तकनीकी पहचान मजबूत हो;
- संदिग्ध बॉट नेटवर्क का विश्लेषण किया जा सके;
- राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में कानून के अनुरूप डिजिटल साक्ष्य शीघ्र उपलब्ध हों;
- विदेशी फंडिंग और पेड डिजिटल अभियानों की जांच हो;
- सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही स्पष्ट रूप से तय हो।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन में अराजकतावाद की घुसपैठ रोकना जरूरी
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी आतंकी संगठन द्वारा किसी प्रदर्शन स्थल को निशाना बनाने का अर्थ वहां मौजूद प्रत्येक प्रदर्शनकारी को संदिग्ध मान लेना नहीं है।
लोकतांत्रिक विरोध भारत के संविधान की मूल भावना का हिस्सा है। आतंकवाद के खिलाफ कठोर कार्रवाई करते हुए भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
आतंकी नेटवर्क को अलग करना होगा और लोकतांत्रिक असहमति को अलग।
आतंकवाद का मुकाबला लोकतंत्र को कमजोर करके नहीं, बल्कि लोकतंत्र को और सुरक्षित बनाकर किया जाना चाहिए।
नाबालिग बच्चों के उपयोग पर गंभीरता से विचार जरूरी
नाबालिग बच्चों का उपयोग योजनापूर्वक आतंकी, अराजकतावादी, हिंसक अथवा अपमानजनक उद्देश्यों के लिए किया जाना अत्यंत गंभीर विषय है। बच्चे हमेशा ऐसी गतिविधियों की वास्तविक प्रकृति और संभावित परिणामों को समझने की स्थिति में नहीं होते।
यदि किसी संगठित नेटवर्क द्वारा नाबालिगों को जानबूझकर प्रदर्शन, हिंसा, उकसावे या किसी राष्ट्रविरोधी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो इसे केवल बाल संरक्षण या सामान्य कानून-व्यवस्था का विषय नहीं माना जाना चाहिए। ऐसे मामलों में उन लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए, जो बच्चों को योजनापूर्वक इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल करते हैं।
वर्तमान कानूनी प्रावधानों और उनकी प्रभावशीलता पर पुनर्विचार आवश्यक है। कानून का उद्देश्य बच्चों को दंडित करना नहीं, बल्कि उन्हें संगठित दुरुपयोग से बचाना और उनके पीछे मौजूद वास्तविक संचालकों तथा जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करना होना चाहिए। जेन जी के अच्छे भविष्य की ओट से जो षड्यंत्रकारी अराजक राजनैतिक दृष्टि गोचर हो रही है। उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
जंतर-मंतर प्रकरण को चेतावनी की तरह देखना होगा
यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि जमीन पर हिंसा और इंटरनेट पर दुष्प्रचार को एक ही रणनीति के तहत जोड़ा गया था, तो यह सुरक्षा एजेंसियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण चेतावनी होगी।
भारत को यह मानकर चलना होगा कि भविष्य की किसी भी बड़ी आतंकी साजिश में तीन मोर्चे एक साथ सक्रिय हो सकते हैं—
पहला — जमीनी हिंसा।
दूसरा — डिजिटल दुष्प्रचार।
तीसरा — वित्तीय एवं अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क।
इन तीनों को अलग-अलग जांचने के बजाय एक समेकित ढांचे में देखना होगा।
भारत सरकार और राज्य सरकारों से स्पष्ट अपेक्षा
केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जांच केवल गिरफ्तारियों और शुरुआती बरामदगी तक सीमित न रहे।
देश के सामने यह स्पष्ट होना चाहिए कि कथित नेटवर्क की जड़ें कहां तक हैं, उसके विदेशी संपर्क कौन हैं, धन कहां से आया, डिजिटल अभियान किसने संचालित किया और क्या देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसे नेटवर्क सक्रिय हैं।
सोशल मीडिया कंपनियों को भी यह संदेश स्पष्ट होना चाहिए कि भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जवाबदेही से कोई समझौता नहीं होगा। आवश्यक होने पर कानून के अनुरूप कठोर कार्रवाई पर भी विचार किया जाना चाहिए।
भारत को टेक्नोलॉजी का विरोध नहीं करना है; बल्कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल भारत के विरुद्ध करने वालों को रोकना है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर भारत की राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़े कंटेंट के साथ भेदभाव और विरोधी विचारधारा को कृत्रिम रूप से बढ़ावा देने जैसे आरोपों की सच्चाई परखने में हर्ज क्या है? तकनीकी जांच होनी ही चाहिए।
जंतर-मंतर की कथित साजिश को केवल एक राष्ट्रविरोधी घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह उस बदलती सुरक्षा चुनौती की ओर संकेत हो सकती है, जिसमें आतंकवाद, डिजिटल दुष्प्रचार, विदेशी नेटवर्क और सोशल मीडिया की शक्ति एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं और विशेष फंडिंग के माध्यम से किसी भी देश में अराजकता उत्पन्न करने का प्रयास किया जा सकता है।
इसलिए आवश्यकता है कि भारत सरकार इस पूरे प्रकरण की गहरी, निष्पक्ष, तकनीकी और वित्तीय जांच कराए तथा भविष्य में ऐसी अनहोनी की संभावना को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा उपायों की व्यापक तैयारी करे।
कानूनी रूप से आतंकी अथवा विदेशी नेटवर्क की भूमिका प्रमाणित होते ही उसकी पूरी संरचना को कानून के दायरे में लाया जाए। साथ ही सोशल मीडिया कंपनियों की तकनीकी कमियों, कंटेंट मॉडरेशन और संदिग्ध विदेशी नेटवर्कों के संबंध में उनकी जवाबदेही तय की जाए।
खतरा तो देश के अंदर आ पहुंचा है
आज की लड़ाई केवल सीमा पर नहीं है। सीमा की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन अब देश की डिजिटल सीमा की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। हर हाथ में एंड्रॉयड मोबाइल, इंटरनेट नेटवर्क और व्यापक डिजिटल पहुंच है। इसलिए डिजिटल माध्यम से होने वाले दुष्प्रचार, उकसावे और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को रोकना राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता बनना चाहिए।
जंतर-मंतर का सबसे बड़ा सवाल: डिजिटल आतंकवाद और अराजकतावाद को रोकना है
क्या भारत आतंक के केवल दिखाई देने वाले चेहरों को पकड़ेगा, या उस अदृश्य नेटवर्क तक भी पहुंचेगा, जो देश की सड़कों से लेकर नागरिकों के मोबाइल स्क्रीन तक अपनी पहुंच बना चुका है?
यह प्रश्न सतर्क सरकार के सामने पहले से होगा और वे इसके उत्तर तथा प्रतिरोधी प्रबंधन की तैयारी भी कर रहे होंगे। ऐसा विश्वास किया जा सकता है।
लेखक — अरविन्द सिसोदिया
शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी
राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, जयपुर
निवास — राधाकृष्ण मन्दिर रोड, ड़ड़वाड़ा, कोटा जंक्शन
मोबाइल — 9414180151
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## 📑 व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा रिपोर्ट: जंतर-मंतर (दिल्ली) आतंकी व डिजिटल हाइब्रिड साजिश का पर्दाफाश
दिनांक: अगस्त 2026
दस्तावेज़ वर्गीकरण: समेकित विशेष सुरक्षा और तकनीकी विश्लेषण रिपोर्ट
जांच और तकनीकी नोड: पंजाब पुलिस, पश्चिम बंगाल STF, दिल्ली पुलिस साइबर सेल, इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY)
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## 1. मुख्य निष्कर्ष (Executive Summary)
जुलाई और अगस्त 2026 के बीच भारत की विभिन्न प्रांतीय सुरक्षा एजेंसियों ने देश की राजधानी को दहलाने की एक अत्यंत परिष्कृत 'हाइब्रिड साजिश' (Hybrid Plot) को विफल किया है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (ISI) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र व CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के बड़े विरोध-प्रदर्शनों को मुख्य टारगेट बनाया था। साजिश का दोहरा उद्देश्य था: ज़मीनी स्तर पर पेट्रोल बम से हमला कर भारी हिंसा भड़काना और इंटरनेट पर 'मेटा' (Meta/फेसबुक-इंस्टाग्राम) जैसे वैश्विक टेक प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम का दुरुपयोग करके देशव्यापी दंगे भड़काना।
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## 2. ऑन-ग्राउंड आतंकी कड़ियाँ: तीन राज्यों का नेटवर्क## क. पंजाब मॉड्यूल (ISI समर्थित स्लीपर सेल)
* कार्रवाई और गिरफ्तारियाँ: अमृतसर कमिश्नरेट पुलिस ने तत्कालीन कमिश्नर गुरप्रीत सिंह भुल्लर के नेतृत्व में सीमा-पार से संचालित दो आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ कर 9 आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिनमें 4 नाबालिग (Minors) शामिल थे। इनके पास से 3 अत्याधुनिक पिस्टल, 9 कारतूस और 4 तैयार पेट्रोल बोतल बम बरामद किए गए।
* आरोपियों का बयान और रेकी: आरोपियों ने स्वीकार किया कि ISI आकाओं ने उन्हें पैसों का लालच देकर दिल्ली के जंतर-मंतर भेजा था। उन्होंने बकायदा ट्रेन से दिल्ली जाकर जंतर-मंतर धरना स्थल की पूरी रेकी (Surveillance) की थी।
* हमला विफल होने का कारण: आरोपी पेट्रोल बम से हमला करने ही वाले थे, लेकिन दिल्ली पुलिस की अत्यधिक सख्त बैरिकेडिंग और भारी सुरक्षा घेरे को देखकर वे डर गए और बिना हमला किए वापस पंजाब लौट आए, जिसके बाद उन्हें दबोच लिया गया।
* आधिकारिक स्पष्टीकरण: [पंजाब पुलिस ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया]
कि ये आतंकी जंतर-मंतर पर हमला करके अशांति फैलाना चाहते थे, लेकिन वहाँ प्रदर्शन कर रहे आम छात्रों का इस आतंकी मॉड्यूल से कोई सीधा या संगठित संबंध नहीं था।
## ख. पश्चिम बंगाल मॉड्यूल (जैश-ए-मोहम्मद का नेटवर्क)
* कार्रवाई और गिरफ्तारियाँ: पश्चिम बंगाल की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने पूर्व बर्धमान से हामीम मंडल (Hamim Mondal) और हावड़ा से आदित्य सिंह को गिरफ्तार किया। इस मॉड्यूल की मुख्य कढ़ी अर्पिता सरकार को झारखंड के साहिबगंज से पकड़ा गया।
* पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय कड़ियाँ: हामीम मंडल पाकिस्तान के 'शाहजाद भट्टी गैंग' से जुड़े 4 प्रमुख हैंडल्स—Abir Jat333, Uzair, Rana, और Hamad के सीधे संपर्क में था, जो यूके (UK) और मेक्सिको के वीओआईपी (VOIP) नंबरों का इस्तेमाल कर रहे थे।
* साजिश का तरीका (Modus Operandi): हामीम मंडल ने कबूल किया कि उसे जंतर-मंतर के प्रदर्शन में 'दिल्ली पुलिस की वर्दी' पहनकर घुसपैठ करने का टास्क मिला था। योजना यह थी कि पुलिस की वर्दी में भीड़ पर पेट्रोल बम फेंके जाएं, जिससे जनता में यह संदेश जाए कि पुलिस प्रदर्शनकारियों पर जानलेवा हमला कर रही है, और पूरे देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो जाए। अर्पिता सरकार हनीट्रैप और इंस्टाग्राम के जरिए वीआईपी (VIPs) की सुरक्षा और मूवमेंट की खुफिया जानकारी लीक कर रही थी।
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## 3. डिजिटल प्रोपेगैंडा वॉर और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की भूमिका
ज़मीनी हमलों के समानांतर, सोशल मीडिया पर भारत विरोधी नैरेटिव और दंगे भड़काने के लिए एक अभूतपूर्व डिजिटल ऑपरेशन चलाया गया:
## क. दिल्ली पुलिस का डिजिटल क्रैकडाउन और नोटिसेज
* पाकिस्तानी बोट नेटवर्क (Bot Networks): दिल्ली पुलिस की साइबर सेल और सुरक्षा एजेंसियों ने जांच में पाया कि 20 से 23 जुलाई के बीच जंतर-मंतर प्रदर्शनों से जुड़ी भड़काऊ, फेक रील्स और एआई-जनरेटेड डीपफेक वीडियो को अचानक कृत्रिम रूप से हवा दी जा रही थी।
* अकाउंट्स ब्लॉक करना: दिल्ली पुलिस ने पाकिस्तान से संचालित हो रहे 400 से अधिक सोशल मीडिया हैंडल्स को चिन्हित कर ब्लॉक करवाया, जो सरकारी अधिकारियों के बयानों को तोड़-मरोड़ कर और फेक रील्स के जरिए भारत में दंगे भड़काने की कोशिश कर रहे थे। इसके साथ ही भड़काऊ और अपमानजनक पोस्ट करने वाले कई हैंडल धारकों को आईटी एक्ट (IT Act) के तहत नोटिस जारी किए गए।
## ख. मेटा (Meta) की आधिकारिक स्वीकारोक्ति और माफी
इस डिजिटल प्रोपेगैंडा के बीच, आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव और इलेक्ट्रॉनिकी व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अधिकारियों के साथ मेटा (फेसबुक/इंस्टाग्राम) के शीर्ष नेतृत्व की गंभीर बैठकें हुईं, जिसमें निम्नलिखित बातें सामने आईं:
* मेटा द्वारा गंभीर कमियों की स्वीकारोक्ति: मेटा के ग्लोबल पॉलिसी हेड जोएल कपलान (Joel Kaplan) ने आधिकारिक तौर पर भारत सरकार के सामने स्वीकार किया कि उनके प्लेटफॉर्म पर बॉट अकाउंट्स, डीपफेक्स और अनलेबल्ड एआई कंटेंट को नियंत्रित करने में गंभीर तकनीकी खामियां (Serious Issues) रही हैं।
* पेड प्रमोशन का दुरुपयोग: मेटा ने यह माना कि जंतर-मंतर प्रदर्शनों के दौरान 'पेड प्रमोशन्स' (Paid Content) का दुरुपयोग करके भारत-विरोधी और अशांति फैलाने वाले कंटेंट को आर्गेनिक (प्राकृतिक) दिखाने की कोशिश की गई और विशिष्ट ऑडियंस को टारगेट किया गया।
* मार्क जुकरबर्ग की तरफ से माफी: मेटा ने स्वीकार किया कि उनके ऑटोमेटेड एआई फिल्टर्स की गलती (ओपरेशनल एरर) के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक महत्वपूर्ण रील/पोस्ट पर अस्थाई रोक लग गई थी। जोएल कपलान ने इस प्रशासनिक और तकनीकी चूक के लिए मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग (Mark Zuckerberg) की ओर से भारत के आईटी मंत्री से सीधे माफी मांगी और कंटेंट को बहाल किया।
## ग. एक्स (X) और गूगल/यूट्यूब को सख्त निर्देश
* दिल्ली पुलिस ने 'द हिंदू' और 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट्स के अनुसार इंस्टाग्राम, एक्स (X) और गूगल को सैकड़ों टेकडाउन नोटिस (Takedown Notices) जारी किए। इन प्लेटफॉर्म्स को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने सर्वर लॉग्स दिल्ली पुलिस और एनआईए (NIA) से साझा करें ताकि विदेश से फंडेड इन डिजिटल ऑपरेशन्स के वित्तीय स्रोतों (Financial Trails) का पता लगाया जा सके।
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## 4. वर्तमान प्रशासनिक और सुरक्षा स्थिति
* प्रशासनिक विवाद: इस बेहद संवेदनशील आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ करने के ठीक बाद, 7 अगस्त 2026 को पंजाब सरकार ने अमृतसर के पुलिस कमिश्नर गुरप्रीत सिंह भुल्लर का अचानक तबादला कर दिया और उन्हें डीजीपी कार्यालय चंडीगढ़ रिपोर्ट करने को कहा। विपक्ष (भाजपा नेताओं) ने आरोप लगाया है कि जंतर-मंतर पर आतंकी साजिश के खुलासे से पैदा हुए राजनीतिक गतिरोध के कारण सरकार ने यह दंडात्मक कदम उठाया। हालांकि, सरकार ने इसे रूटीन प्रशासनिक फेरबदल बताया है।
* केंद्रीय एजेंसियों का टेकओवर: मामले के अंतर-राज्यीय (Inter-State) और अंतरराष्ट्रीय (International) आयामों को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के निर्देश पर राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) इस पूरे हाइब्रिड नेटवर्क की सघन जांच कर रही है।
* जंतर-मंतर पर न्यायिक रुख: इस बीच सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के बड़े खतरे को देखते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने भी केंद्र सरकार से सवाल किया है कि क्या सुरक्षा और शहर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में पूरी तरह से बंद (Shut Down) किया जा सकता है।
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