तीसरी सहस्त्रावदी का ईसाई विस्तारवाद का आक्रमण हो चुका है
यह कथन नवंबर 1999 में तत्कालीन कैथोलिक धर्मगुरु पोप जॉन पॉल द्वितीय (Pope John Paul II) की भारत यात्रा और उनके द्वारा जारी किए गए एक आधिकारिक दस्तावेज से जुड़ा है। हालांकि, उनके मूल वक्तव्य के शब्दों और उसके बाद भारत में हुए राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषणों में थोड़ा अंतर है।
इस घटनाक्रम का वास्तविक और ऐतिहासिक विवरण इस प्रकार है:
## 1. पोप का वास्तविक बयान (Official Statement)
6 नवंबर 1999 को नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने 'एक्लेसिया इन एशिया' (Ecclesia in Asia - एशिया में चर्च) नामक एक नीतिगत दस्तावेज जारी किया था। इस दौरान उन्होंने अपने संबोधन में कहा था:
"जिस प्रकार पहली सहस्राब्दी (First Millennium) में यूरोप की धरती पर क्रॉस स्थापित हुआ, और दूसरी सहस्राब्दी में अमेरिका व अफ्रीका में; उसी प्रकार प्रार्थना करें कि तीसरी ईसाई सहस्राब्दी में एशिया के इस विशाल और महत्वपूर्ण महाद्वीप में विश्वास की एक बड़ी फसल काटी जाएगी।"
## 2. "भारत चाबी है" का संदर्भ
पोप ने अपने आधिकारिक भाषण में सीधे तौर पर यह शब्द नहीं कहे थे कि "भारत इसकी चाबी है"। हालांकि, रणनीतिक और भौगोलिक रूप से इस बयान का विश्लेषण करते हुए भारतीय विचारकों, इतिहासकारों और दक्षिणपंथी संगठनों (जैसे RSS और विश्व हिंदू परिषद) ने यह निष्कर्ष निकाला।
चूंकि पोप ने पूरे एशिया महाद्वीप में ईसाई धर्म के प्रचार (Evangelization) का रोडमैप जारी करने के लिए भारत की भूमि (नई दिल्ली) को चुना था, इसलिए विश्लेषकों द्वारा यह व्याख्या की गई कि वैटिकन एशिया में प्रवेश करने और अपने इस अभियान को सफल बनाने के लिए भारत को मुख्य केंद्र (या चाबी) मान रहा है।
## 3. भारत में तीव्र विरोध और प्रतिक्रिया
पोप के इस बयान का उस समय भारत में भारी विरोध हुआ था:
* धर्मांतरण पर विवाद: विभिन्न हिंदू संगठनों ने इस बयान को 'आर्थिक रूप से पिछड़े और जनजातीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराने के वैटिकन के एजेंडे' के रूप में देखा।
* धार्मिक स्वतंत्रता की बहस: तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय हुई इस यात्रा के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता और विदेशी मिशनरियों के हस्तक्षेप को लेकर संसद से लेकर सड़क तक लंबी बहस छिड़ गई थी।
संक्षेप में: पोप ने तीसरी सहस्राब्दी में "एशिया में आस्था की बड़ी फसल काटने" (ईसाई धर्म के विस्तार) की बात कही थी, जिसे भारतीय संदर्भों में "एशिया को ईसाई बनाने का अभियान और भारत को उसका मुख्य द्वार/चाबी" माना गया।
यदि आप इस घटना से जुड़े विदेशी मिशनरियों के इतिहास, तत्कालीन वाजपेयी सरकार के रुख या इस विषय पर 'एक्लेसिया इन एशिया' दस्तावेज के अन्य बिंदुओं के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो अवश्य बताएं।
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6 से 8 नवंबर 1999 को हुई [पोप जॉन पॉल द्वितीय की भारत यात्रा आधुनिक भारतीय राजनीति, धार्मिक स्वतंत्रता की बहस और विदेशी मिशनरियों के इतिहास में एक अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक मोड़ थी। इस घटना से जुड़े महत्वपूर्ण आयामों और तत्कालीन वाजपेयी सरकार के रुख का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
## 1. 'एक्लेसिया इन एशिया' (Ecclesia in Asia) दस्तावेज क्या था?
यह वैटिकन द्वारा तैयार किया गया एक 'मिशन ब्लूप्रिंट' (मिशनरी रूपरेखा) था, जिसे 1998 में रोम में आयोजित 'सिनेड ऑफ एशियन बिशप्स' (एशियाई पादरियों की सभा) के निष्कर्षों के आधार पर तैयार किया गया था।
* लक्ष्य: इसका मुख्य उद्देश्य तीसरी सहस्राब्दी (21वीं सदी) में एशिया के भीतर कैथोलिक धर्म का प्रचार-प्रसार करना था, क्योंकि अफ्रीका और अमेरिका की तुलना में एशिया में ईसाई आबादी बेहद कम थी।
* एशिया का 'एशियाई' रूप: इस दस्तावेज में ईसा मसीह के जीवन को 'एशियाई संदर्भ' (गरीबी में जन्म, शरणार्थी जीवन, माता-पिता की आज्ञाकारिता) से जोड़कर प्रस्तुत करने की रणनीति बनाई गई थी, ताकि एशियाई संस्कृतियों के साथ तालमेल बिठाकर धर्म का प्रचार आसान हो सके।
## 2. विदेशी मिशनरियों का इतिहास और भारतीय संदर्भ
भारत में विदेशी ईसाई मिशनरियों का इतिहास सदियों पुराना है (सेंट थॉमस के आगमन और बाद में पुर्तगाली व ब्रिटिश काल से), लेकिन 1990 के दशक के उत्तरार्ध में इस विषय पर विवाद चरम पर था।
* धर्मांतरण और सामाजिक तनाव: आलोचकों और हिंदू संगठनों का आरोप था कि विदेशी मिशनरियां भारत के अत्यंत पिछड़े, जनजातीय (Tribal) और ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक सहायता की आड़ में बड़े पैमाने पर प्रलोभन आधारित धर्मांतरण करा रही हैं।
* पुर्तगाली अत्याचारों पर माफी की मांग: पोप की यात्रा से पहले, भारत के कई संगठनों ने मांग की थी कि पोप 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन के दौरान गोवा में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों (Goa Inquisition) के लिए भारत की भूमि पर आकर माफी मांगें।
## 3. तत्कालीन वाजपेयी सरकार का रुख और चुनौतियां
1999 में जब पोप भारत आए, तब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। वाजपेयी सरकार के सामने इस यात्रा को लेकर एक बड़ी दोहरी चुनौती थी:
* कूटनीतिक संतुलन (Diplomatic Protocol): वाजपेयी सरकार वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को एक उदार, सहिष्णु और लोकतांत्रिक देश के रूप में पेश करना चाहती थी ताकि विदेशी निवेश और रणनीतिक संबंधों (विशेषकर अमेरिका के साथ) को मजबूती मिले। इसलिए सरकार ने पोप को 'राज्य अतिथि' (State Guest) का दर्जा दिया और राष्ट्रपति भवन में उनका औपचारिक स्वागत किया गया। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने स्वयं पोप का स्वागत किया और दीपावली के त्योहार के समय भारत आने के लिए उनका आभार व्यक्त किया।
* आंतरिक और वैचारिक दबाव: सरकार में शामिल और बाहर के दक्षिणपंथी सहयोगी संगठन (जैसे RSS, विहिप और बजरंग दल) पोप की इस यात्रा का सड़क पर उग्र विरोध कर रहे थे। वे पोप से धर्मांतरण रोकने की गारंटी और माफी की मांग कर रहे थे।
* कड़ी सुरक्षा व्यवस्था: सरकार ने किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए दिल्ली में अभूतपूर्व सुरक्षा घेरा तैयार किया था। विरोध प्रदर्शनों को मुख्य आयोजन स्थलों (जैसे जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम) से दूर रखा गया ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की किरकिरी न हो।
## 4. घटना का दीर्घकालिक राजनीतिक प्रभाव
पोप की इस यात्रा और 'एक्लेसिया इन एशिया' दस्तावेज के जारी होने के बाद, भारत में धर्मांतरण के मुद्दे ने एक स्थाई राजनीतिक विमर्श का रूप ले लिया:
* धर्मांतरण विरोधी कानून: इस घटना के बाद के वर्षों में, भारत के कई राज्यों (जैसे ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, और बाद में उत्तर प्रदेश व गुजरात) में 'धर्मांतरण विरोधी कानूनों' (Freedom of Religion Acts) को और अधिक कड़ा किया गया।
* विदेशी फंडिंग पर नजर: विदेशी मिशनरियों और NGO को मिलने वाले विदेशी चंदे (FCRA नियमों के तहत) की निगरानी और समीक्षा की प्रक्रिया को कड़ा करने की नींव भी इसी दौर के विवादों के बाद मजबूत हुई।
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एशिया में चर्च (एक्लेशिया इन एशिया) पोप जॉन पॉल द्वितीय द्वारा जारी किया गयाएक प्रेरितिक उपदेश है, जो एशिया में रोमन कैथोलिक धर्म के विस्तार के लिए एक खाका के रूप में कार्य करता है। इसमें 18 अप्रैल से 14 मई, 1998 तक रोम में आयोजित विशेष एशियाई धर्मसभा के विचारों और निष्कर्षों का सारांश दिया गया है। इसे आधिकारिक तौर पर जॉन पॉल द्वितीय द्वारा6 नवंबर, 1999 को नई दिल्ली, भारत में जारी किया गया था।
एशिया में चर्च (लैटिन भाषा में ' एशिया में चर्च ') पोप जॉन पॉल द्वितीय का प्रेरितिक उपदेश।
पोप जॉन पॉल द्वितीय का प्रतीक चिन्ह
हस्ताक्षर तिथि
6 नवंबर 1999
संख्या
पोप पद के 15 में से 12
मूलपाठ
अंग्रेजी में
← अमेरिका में चर्च ओशेनिया में चर्च →
दस्तावेज़ में कहा गया है कि "जिस प्रकार पहली सहस्राब्दी में यूरोप की धरती पर और दूसरी सहस्राब्दी में अमेरिका और अफ्रीका की धरती पर क्रूस स्थापित किया गया था, हम प्रार्थना कर सकते हैं कि तीसरी ईसाई सहस्राब्दी में एशिया के इस विशाल और जीवंत महाद्वीप में विश्वास की एक बड़ी फसल काटी जाएगी" (ईए 1) (जेपी II 1999:359)।
यह उपदेश सात भागों से बना है जो निम्नलिखित विषयों से संबंधित हैं: एशियाई संदर्भ, यीशु उद्धारकर्ता के रूप में, पवित्र आत्मा प्रभु और जीवनदाता के रूप में, एशिया में यीशु का प्रचार (संस्कृति में आत्मसात करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए), मिशन के लिए सहभागिता और संवाद (एकतावादी और अंतरधार्मिक संवाद पर ध्यान केंद्रित करते हुए), मानव उत्थान की सेवा, और सुसमाचार के साक्षी के रूप में ईसाई ।
इस लंबे दस्तावेज़ का समापन इस प्रकार होता है: “एशिया के लोगों को यीशु मसीह और उनके सुसमाचार की आवश्यकता है । एशिया उस जीवनदायी जल के लिए प्यासा है जो केवल यीशु ही दे सकते हैं (देखें यूहन्ना 4:10-15)। इसलिए एशिया में मसीह के शिष्यों को प्रभु से प्राप्त मिशन को पूरा करने के लिए अथक प्रयास करना चाहिए, जिन्होंने युग के अंत तक उनके साथ रहने का वादा किया है (देखें मत्ती 28:20)। प्रभु पर भरोसा रखते हुए, जो अपने बुलाए हुए लोगों को निराश नहीं करेंगे, एशिया में चर्च आनंदपूर्वक तीसरी सहस्राब्दी में अपनी तीर्थयात्रा पर आगे बढ़ रहा है ।”
संदर्भ
संपादन करना
"एशिया में धर्मांतरण के लिए पोप का अभियान हिंदुओं को नाराज करता है" । द इंडिपेंडेंट । 8 नवंबर, 1999। 7 अक्टूबर, 2020 को पुनः प्राप्त किया गया ।
क्रोगर, जेम्स एच. (2002). एशियाई चर्चों का भविष्य: एशिया में एशियाई धर्मसभा और कलीसिया । क्लेरेटियन पब्लिकेशन्स। ISBN 978-971-501-936-1.
बीबीसी न्यूज़ | दक्षिण एशिया | पोप ने दिल्ली में सामूहिक प्रार्थना सभा आयोजित की। news.bbc.co.uk। 7 अक्टूबर, 2020 को प्राप्त किया गया ।
"कवर स्टोरी: वैटिकन III के लिए ब्लूप्रिंट" । www.natcath.org । 7 अक्टूबर, 2020 को प्राप्त किया गया ।
"आस्था की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार: पोप ने बिशपों से ईसाई धर्म का प्रसार करने का आग्रह किया" । www.tribuneindia.com । 7 नवंबर, 1999। 7 अक्टूबर, 2020 को पुनः प्राप्त किया गया ।
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