कविता - बनाओ अखंड भारती .
karun kahani vibhajan ki, hey veeron tumhe pukarti
banao akhand bharti .....!
— arvind sisodia 9414180151
बनाओ अखंड भारती .....!
— अरविन्द सीसोदिया
करुण कहानी विभाजन की, हे वीरों तुम्हें पुकारती,
जाग उठो अब - जाग उठो अब, बनाओ अखंड भारती,
चीख रही थी तब मानवता, पर चिंघाड़ रही थी दानवी,
खून से लथपथ वे मंजर, कंपकंपी आज भी छुड़ाते हैं,
स्वतंत्रता की वेदी पर, तब नरमुंडों से हुई थी आरती!!
----- 1 -----
पंजाब बटा, बंगाल बटा, सिंध गया, बलूच गया,
भारत माँ को काट दिया, बेदर्दी से हत्यारों ने,
रावी की शपथ मौन थी, अखंडता का वचन गौण था,
सोच-समझ का समय नहीं, भागो-भागो मची देश में,
----- 2 -----
गैर रहे न बचें, इस शैतानी में, पाक में नापाक हैवानियत थी,
घरों पर हमले हुए, जिंदा जलाए, कत्ल हुए,
भूखे-प्यासे राहों में भटके, खूब थके और खूब मरे,
व्यवस्थित कोई बात न थी, अदला-बदली की सौगात न थी,
न राह दिखानेवाला, न कोई बचानेवाला,
गुंडों की गुंडागर्दी ही तब राज बनी थी, ताज बनी थी,
----- 3 -----
माता-बहिनों की मत पूछो, क्या-क्या उन पर जुल्म हुए,
लाज गई, बेलाज हुईं, तार-तार शर्मसार हुईं,
कितनी थीं वे जो आ पाईं, कितनी थीं वे जो नहीं आ पाईं,
किसी ने भी नहीं उनकी सुध ली, एकतरफा व्यभिचार के मद में,
हर साँस और सिसकी को, उस समय चक्र ने घेरा था,
बेबस चीखें, आज भी गूँजती हैं, नीरव श्मशानों में,
----- 4 -----
दर्द था पर राहत नहीं थी, घाव था पर पट्टी नहीं थी,
राह थी पर अंत नहीं था, पथ पर चलते जाना था...
कब भारत माँ का आँचल मिले, हर साँस इसी में विकल थी,
कुछ आए, कुछ राह में रह गए, कुछ को चलने दिया नहीं,
वे दृश्य, वे मंजर, वे चीत्कारें, फिर से दुनिया में न आएँ,
बार-बार मानवता यह पुकारती,
----- 5-----
यह भीषण कथानक है, जो सुनाने में नहीं आता है,
गाँव-गाँव खत्म हुए थे, शहर-शहर वीरान हुए थे,
सोना, चाँदी, रुपया, पैसा, जमीन और जायदादें....
लूट सकता था, वह सब लूट लिया शैतानों ने,
खून से लिखी इबारतें वे, छलकी आँखें पढ़ नहीं पाती हैं,
----- 6 -----
कहीं दया का दरिया नहीं था, ममता कहीं मिलती नहीं थी,
सबको अपना माने..., वह आँचल, वह गिरेवान नहीं थे,
एक भारत भूमि जिसने, सबको सदियों से अपना माना,
अपना दामन दिया सभी को, अपनी गोदी दी सबको,
सबको अपनापन दिया, सबको सुख-शांति दी,
पर उसके बेटों को दुत्कार क्यों, फटकार क्यों...?
हर मुल्क बने भारत जैसा, यही विश्व भारती पुकारती।
----- 7-----
न फूल चढ़े और न दीप जले, न उनकी कोई कहानी है,
हे अनाम शहीदों, तुमने खूब लड़ी लड़ाई और दी कुर्बानी है,
नतमस्तक है माँ भारती, गर्व करती माँ भारती,
नाज तुम पर सदा रहेगा, तुम हो नव युग की आरती,
माफ करो हे वीरों, खंडित है माँ भारती..!!
देश आजाद हुआ है लेकिन, अखंडता लानी है बाकी....।
----- 8 -----
फिर कोई राणा प्रताप बनो, या बनो वीर शिवाजी,
सुभाष, भगत सिंह, चंद्रशेखर, माता तुम्हें बुलाती,
षड्यंत्रों ने हमको मारा, कमजोरी से देश है हारा,
आपसी फूट मिटाना होगा, दिल में जुनून जगाना होगा,
बंद मुट्ठी करके लें दृढ़ संकल्प, राह बनाएँगे, चाह बनाएँगे,
विभाजन को खत्म करेंगे, अखंड भारत फिर बनाएँगे..!
----- समाप्त -----
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