कविता - नवयुग निर्माण करें
कविता - नवयुग निर्माण करें
नवयुग निर्माण करें।
भारतमाता का मस्तक ऊँचा रहे सदा,
यह अभियान निरंतर आगे रखें॥
हर आँगन में दीप जलाएँ, हर मन में विश्वास जगे,
सोई हुई राष्ट्र-चेतना फिर से प्रखर प्रकाश भरे ।
स्वार्थ नहीं, परमार्थ हमारा,यही जीवन का व्रत होगा,
भारत के वैभव का सूरज फिर नभ में उदित होगा।
आओ मिलकर हाथ बढ़ाएँ, नव इतिहास सृजन करें,
संकल्प हमारा, संघर्ष हमारा—नवयुग निर्माण करें॥
जाति, पंथ, भाषा के बंधन अब न हमें विभाजित करें,
प्रेम, समरसता और सद्भाव जीवन का श्रृंगार बनें।
सेवा, श्रम और त्याग तपस्या—यही हमारी पहचान रहे,
भारत की पावन संस्कृति का जग में ऊँचा मान रहे।
जन-जन में जागे राष्ट्रभक्ति, ऐसा नव संचार करेंगे—
संकल्प हमारा, संघर्ष हमारा—नवयुग निर्माण करें॥
युवा चले तो पर्वत झुकें, साहस से सागर लाँघ चले,
अंधकार की हर दीवारें सत्याग्नि में भस्म हों।
ज्ञान-विज्ञान और पुरुषार्थ से स्वर्णिम युग का द्वार खुले,
विश्वगुरु भारत का सपना जन-जन के संकल्प फले।
धरती से अंबर तक अपने कर्मों का विस्तार करेंगे—
संकल्प हमारा, संघर्ष हमारा—नवयुग निर्माण करें॥
जब तक गंगा की धारा है, जब तक हिमगिरि अटल खड़ा,
जब तक इस धरती पर गूँजे "वंदे मातरम्" का जयघोष बड़ा।
तन भी अर्पित, मन भी अर्पित, जीवन का प्रत्येक क्षण,
राष्ट्रधर्म की पावन वेदी पर होगा समर्पित यह जीवन।
भारत के गौरव की रक्षा में अपना सर्वस्व अर्पण करें
संकल्प हमारा, संघर्ष हमारा—नवयुग निर्माण करें।
भारतमाता का मस्तक ऊँचा रहे सदा,
यह अभियान हम सदा आगे रखें॥
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