हिंदुत्व ही सबसे ज्यादा महिला सम्मान देता है - अरविन्द सिसोदिया

कृपया लेख अंत तक पढें। 
आजकल महाराज मनु को लेकर निम्न कोटि की राजनीति करने वाले फूटपरस्त,पाकिस्तान परस्त राजनीतिज्ञ बहुत सी अनर्गल व अप्रामाणिक बातें करते रहते हैं व हिन्दू धर्म पर कीचड़ उछालते रहते हैं।

वेद - पुराणों के अनुसार महाराज मनु भूमंडल के प्रथम राजा थे। वे एक महामना उदार प्रजापालक क्षत्रिय राजा थे। उनके वंशज सूर्यवंशी राजा कहलाये।जिनमें अत्यंत उदार, सत्यवादी, प्रजापालक व गौभक्त चक्रवर्तीराजा हरिश्चन्द्र, दिलीप, दशरथ जी आदि भी हैं जिनकी कीर्ति के आज भी गुणगान होते हैं।

सम्पूर्ण हिन्दू समाज को ऐसे महान सम्राट महाराज मनु पर गर्व होना चाहिए, व उनकी निंदा करने वालों का विरोध करना चाहिये।
पुराणों में वर्णन आता है कि मनु महाराज की द्रविड़ प्रदेश यानी कि आज के दक्षिण भारत में राजधानी थी।

मनु महाराज के वंशजों में इक्ष्वाकु महाराज प्रथम व भगवान राम 68 वें राजा थे।

सुचारू शासन व्यवस्था हेतु विश्व के प्रथम संविधान की रचना महाराज मनु ने की थी, जिसे मनु स्मृति के नाम से जाना जाता है। महाराज मनु ने लोक कल्याण के लिए व एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए लोगों के गुण -कर्म के आधार पर , समाज के चार विभाग किए- शिक्षा, रक्षा, वाणिज्य व श्रम विभाग। आज भी दुनिया के प्रत्येक देश की सरकार में यह ही सबसे महत्वपूर्ण विभाग माने जाते हैं।इन विभागों को ही कालांतर में क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ग कहा गया। महाराज मनु के अनुसार इनमें कोई ऊंचा या नीचा नहीं था, सभी को अधिकार था कि अपनी रुचि व योग्यता के अनुसार वे अपना वर्ग बदल लें।

मूल रामायण के रचनाकार महर्षि वाल्मीकि, महाभारत के रचयिता ऋषि व्यास, शिवपुराण के रचियता ऋषि सूत जन्म से शूद्र ही थे। प्रकांड विद्वान कालिदास जी भी जन्म से शूद्र ही थे।सनातन संस्कृति में पूज्यनीय शूद्र संतों के ऐसे सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं।

मनुस्मृति ग्रंथ का मूल पाठ , जिसमें लगभग 2600 श्लोकों का उल्लेख मिलता है, आज उपलब्ध नहीं है। परन्तु समय समय पर विभिन्न लोगों द्वारा इस में इतने अधिक संशोधन किए गए कि अठारवीं शताब्दी के अंत में लगभग पचास 'मनु स्मृतियां' खोजी गई जो सभी आपस में विरोधी व स्वयं में भी विरोधाभाषी थी।

मनु स्मृति की मूल पांडुलिपि नालंदा विश्वविद्यालय के अग्निकांड में हजारों अन्य ग्रंथो के साथ आक्रांता खिलजी द्वारा भस्म कर दी गयी।

स्वामी दयानंद ने संस्कृत भाषा भेद व व्याकरण भेद के आधार पर यह सिद्ध किया कि जो ग्रंथ मनुस्मृति के नाम से जाने जाते है उनमें मूल श्लोक लगभग 40 प्रतिशत ही बचे हैं। संत विनोबा भावे ने लगभग 35 प्रतिशत श्लोकों को ही मूलपाठ से सम्बद्ध माना।

दुर्भाग्यवश हमारे पूज्यनीय राजऋषि सम्राट मनु महाराज को गालियां दे दे कर विवेकहीन, लोलुप हिन्दू विरोधी राजनीतिज्ञ , स्वार्थवश , अपनी वोट बैंक की राजनीति चमकाते रहते हैं।

प्रस्तुत हैं महान पूज्यनीय राजर्षि मनु महाराज द्वारा रचित मनु स्मृति के कुछ अंश:-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रियाः।।(३/३६)

अर्थ- जिस कुल में नारियों का आदर सत्कार होता है वहां देवता निवास करते हैं, अर्थात उस कुल में दिव्य भोग, दिव्य गुण और उत्तम संतान होते हैं, और जिस कुल में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता वहां
उनके सब कार्य निष्फल होते हैं।)

पितृभिभ्रार्तृभिश्चैताः पतिभिर्देवरैस्तथा ।
पूज्या भूषयितव्याश्च भूकल्याणमीप्सुभि: ।।

अर्थ- पिता, भ्राता, पति और देवर को उचित है कि वह अपनी कन्या, बहिन, स्त्री और भोजाई आदि स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखें और योग्य मधुरभाषा, भोजन,वस्त्र और आभूषण आदि से प्रसन्न रखें। जिनको कल्याण की इच्छा हो वे स्त्रियों को क्लेश कभी न दें ३/३५

स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम्।
तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते।।
(३/४२)
अर्थ- जहां स्त्रियां प्रसन्न रहती हैं उस कुल में सर्वत्र आनंद दीखता है, और जहां वे प्रसन्न नहीं रहती तो वह सब परिवार प्रसन्न नहीं रह पाता है। 

सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवंम्।।(३/४०)
अर्थ- जिस कुल में पत्नी से पति और पति से पत्नी सदा प्रसन्न रहते हैं उस कुल में निश्चय ही कल्याण होता है। 

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यात्याशु ततकुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।।
३/३७
अर्थ- जिस परिवार में स्त्रियां अपने पुरुषों के दोषों (नशा, कुसंगति, क्रोध आदि)से शोकातुर रहती है वह कुल विनाश की ओर जाता है और जिस कुल में स्त्रियां पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं वह कुल सदा बढ़ता है।

कन्या का पिता उसके विवाह में किंचित भी धन न लेवे। क्योंकि लोभवश धन का ग्रहण करने वाला मनुष्य संतान को बेचने वाला पापी होता है।
अपितु कुमारियों को वर पक्ष से मिला उपहार स्वरूप धन पर उन का अधिकार (स्त्रीधन) है। (३/३२,३४)

स्त्रीधनानि तु ये मोहादुपजीवन्ति बान्धवाः।
नारी यानानि वस्त्रं वा ते पापा यान्त्यधोगतिम् ।।(३/३२)
अर्थ- जो पितृ कुल या पतिकुल के बंधुजन मोहवश स्त्री के धन, वस्त्र, आभूषण, यान आदि का उपभोग करते हैं, वे पापी जन नीच गति को प्राप्त होते हैं।

तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः
भूतिकामैंर्नरैर्नित्यं सत्कारेषुत्सवेषु च ।।(३/३९)
अर्थ- इस कारण ऐश्वर्य की इच्छा वाले पुरुषों को इन स्त्रियों को सत्कार के अवसरों और उत्सवों में आभूषण, वस्त्र, खान-पान आदि से सदा प्रसन्न रखना चाहिए।

स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्म: शौचं सुभाषितम् ।
विविधानि च शिल्पानी समादेयानी सर्वतः।।(२/१६०)
अर्थ- उत्तम स्त्री, नाना प्रकार के रत्न, विद्या, धर्म, पवित्रता, श्रेष्ठ विचार, नाना प्रकार की शिल्प विद्या सब देश तथा सब मनुष्यों को ग्रहण करना चाहिए।

प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हाः गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रीयश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन।।-(मनु० १/२६)

अर्थात्- सन्तान उत्पत्ति के लिए घर का भाग्योदय करने वाली, आदर-सम्मान के योग्य, गृहज्योति होती हैं स्त्रियां।शोभा-लक्ष्मी और स्त्री में कोई अन्तर नहीं है, वे घर की प्रत्यक्ष शोभा हैं।

जो सम्मान मनुस्मृति में स्त्रियों को दिया गया है वह सम्मान ईसाई और इस्लाम के धर्म ग्रंथों में नहीं दिया गया है। 

फिर भी एक ईसाई माता के कुपुत्र को मनुस्मृति को लेकर हिन्दुओं की ही आलोचना करनी है क्योंकि हिन्दू स्वयं दिग्भ्रमित हैं।
हिन्दू समाज को राहुल पनौती से पूछना चाहिए कि एक पिता बाल्यकाल में अपनी पुत्री का सरंक्षण नहीं करेगा तो क्या पडोसी करेगा?
दूसरी बात पति अपनी पत्नी के लिए पजेसिव नही होगा उसकी केयर नहीँ करेगा तो क्या पडोसी करेगा?

मां का ख्याल बेटा नहीं रखेगा तो क्या मां को उसके बुढापे में लवारिस छोड़ दें ?
यही चाहता है वो पागल पगलैट एल ओ पी ?
और जो हिन्दू लडकियां आजादी आजादी करते हुए नाच रही है, हिम्मत है तो छोड़ दो अपने पिता के पैसे का इस्तेमाल करना। छोड़ दो पति के ऊपर हक जताना। हद करके रखी है। मुर्खता पर तालियां पीटी जा रही हैं।

इसलिए ही कांग्रेस और पप्पू पनौती से नफरत होती जा रही है। ये सब बकवास करने से पहले राहुल गंदी को अपनी बहन को राबर्ट वढेरा से आजाद करना चाहिए और अपनी माता को भी सरंक्षण देने की भूल नहीं करनी चाहिए।

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