"राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक"


सेवा में,

1. महामहिम राष्ट्रपति महोदया, भारत गणराज्य
2. माननीय प्रधानमंत्री जी, भारत सरकार
3. माननीय अध्यक्ष जी, लोकसभा
4. माननीय सभापति जी, राज्यसभा
5. माननीय नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा एवं राज्यसभा

विषय: "राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक" – संसद के अनिवार्य, निर्बाध और सुचारू संचालन हेतु ऐतिहासिक विधायी सुधार प्रस्ताव।

आदरणीय,

भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर—हमारी संसद—देश की 140 करोड़ से अधिक जनता की आकांक्षाओं, उनके अधिकारों और देश के भविष्य का निर्धारण करने वाला मंच है। अत्यंत खेद और चिंता का विषय है कि दलीय राजनीति, राजनीतिक गतिरोध और सुनियोजित व्यवधानों के कारण दोनों सदनों का बहुमूल्य समय और देश के संसाधनों का भारी नुकसान हो रहा है।

भारत के मूल संविधान में राजनैतिक दल शब्द तक नहीं है, उसकी मूल अवधारणा जनता के प्रतिनिधि के रूप में है। किन्तु धीरे धीरे राजनैतिक दलों ने दलगत हितों को अत्यंत मज़बूत कर लिया है। जिसका बड़ा नुकसान दल गत हठ धर्मिता के कारण, सदन स्थगन के रुपमें निरंतर देखने को मिल रही है।

जनता सांसदों को चुनकर देश के विकास और कानून बनाने के लिए भेजती है, न कि विधायी कार्यों को ठप करने के लिए। 

     अतः देश और जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए "राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक" के तहत निम्नलिखित अनिवार्य वैधानिक व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से लागू करने की मांग की जाती है:—

1. राइट टू नेशन: देश के प्रति विधायी उत्तरदायित्व

* न्यूनतम 120 कार्यदिवस की अनिवार्यता: संविधान में संशोधन कर लोकसभा और राज्यसभा के लिए वर्ष में न्यूनतम 120 दिन की बैठक अनिवार्य की जाए।
* समय की भरपाई (Compensatory Hours): यदि किसी भी कारणवश सदन का एक भी घंटा बर्बाद होता है, तो पीठासीन अधिकारी उसी दिन देर रात तक या सप्ताहांत (शनिवार-रविवार) को सदन चलाकर उस समय की शत-प्रतिशत भरपाई करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हों।
* विधेयकों पर अनिवार्य समीक्षा: किसी भी विधेयक को बिना विस्तृत बहस या संसदीय समितियों की समीक्षा के, हंगामे के बीच पारित नहीं किया जाएगा।

2. राइट टू पब्लिक: जनता के धन और समय की सुरक्षा

* 'काम नहीं तो वेतन नहीं' (No Work, No Pay): यदि सदन में व्यवधान के कारण कार्यवाही रुकती है, तो बाधा उत्पन्न करने वाले सभी सांसदों का उस दिन का वेतन, दैनिक भत्ता और यात्रा भत्ता स्वतः निरस्त कर दिया जाए।
* दलीय वित्तीय दंड (Party Penalty): संसद के संचालन की प्रति-मिनट लागत के आधार पर, व्यवधान पैदा करने वाले राजनीतिक दलों के संसदीय कोष या उनके दल के खाते से हर्जाना वसूलने का कानूनी प्रावधान हो।

3. अनुशासन हेतु 'स्वचालित लाल रेखा' (Automatic Enforcement)

* स्वतः निलंबन का नियम: पीठासीन अधिकारी के विवेक पर निर्भर रहने के बजाय, नियमों का स्वचालित क्रियान्वयन हो। यदि कोई भी सदस्य सदन के मध्य (Well of the House) में प्रवेश करता है, तख्तियां लहराता है या माइक/दस्तावेजों के साथ तोड़फोड़ करता है, तो वह तत्काल प्रभाव से अगले 5 कार्यदिवसों के लिए स्वतः निलंबित माना जाए।
* सुरक्षा बलों का अनिवार्य हस्तक्षेप: स्वतः निलंबित सदस्य को संसद के मार्शल बिना किसी राजनीतिक दबाव के तत्काल एवं सम्मानपूर्वक सदन से बाहर करें।

4. विपक्ष को रचनात्मक मंच (Guaranteed Opposition Space)

* विपक्ष का विशेष दिन: ब्रिटिश संसद की तर्ज पर प्रत्येक सप्ताह का एक पूरा दिन केवल विपक्ष द्वारा उठाए गए राष्ट्रीय मुद्दों, कार्यस्थगन प्रस्तावों और बहसों के लिए सुरक्षित हो, जिसे सरकार बहुमत के बल पर टाल न सके।
* सवालों के अनिवार्य जवाब: जनता के मुद्दों पर विपक्ष द्वारा पूछे गए प्रत्येक जायज सवाल का तथ्यात्मक जवाब देने के लिए सरकार कानूनी रूप से बाध्य हो।

5. तकनीकी और मीडिया नियंत्रण

* माइक का स्वचालित प्रबंधन: अपनी आवंटित सीट छोड़कर चिल्लाने या नियमों का उल्लंघन करने वाले सदस्य का माइक सिस्टम स्वतः बंद हो जाए।
* संसद टीवी प्रसारण नीति: हंगामे या तख्तियां दिखाने वाले दृश्यों को टीवी पर प्रसारित नहीं किया जाए। कैमरा केवल आसन और नियमों के तहत बोल रहे सदस्य पर केंद्रित रहे, ताकि प्रचार के लिए हंगामा करने की प्रवृत्ति खत्म हो।

6. राइट टू सिटिजन: नागरिक प्रतिक्रिया एवं जन-भागीदारी (Public Feedback & Grievance Mechanism)

संसद केवल चुने हुए प्रतिनिधियों की नहीं, बल्कि देश के अंतिम नागरिक की भी है। अतः इस अनिवार्य व्यवस्था के तहत नागरिकों को अपने प्रतिनिधियों के आचरण पर सीधे प्रतिक्रिया देने और संसद की कार्यप्रणाली में भागीदार बनने के लिए निम्नलिखित अधिकार दिए जाएं:

(क) डिजिटल नागरिक डैशबोर्ड (Live Citizen Scorecard)

* संसद की आधिकारिक वेबसाइट पर एक पारदर्शी 'सिटिजन डैशबोर्ड' बनाया जाए।
* इस पर प्रत्येक सांसद द्वारा सदन में बिताए गए घंटे, उनके द्वारा पूछे गए प्रश्न, बहस में उनकी भागीदारी और उनके द्वारा किए गए व्यवधान/निलंबन का लाइव डेटा दर्ज हो।
* जनता अपने सांसद के इस रिपोर्ट कार्ड को देखकर सीधे ऑनलाइन रेटिंग और प्रतिक्रिया (Feedback) दे सके, जिसे चुनाव के समय उनके प्रदर्शन का पैमाना माना जाए।

(ख) राष्ट्रीय नागरिक याचिका अधिकार (Right to Public Petition)

* यदि देश के न्यूनतम 1 लाख नागरिक डिजिटल पहचान (जैसे आधार वेरिफिकेशन) के माध्यम से किसी राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे या जन-शिकायत पर ऑनलाइन याचिका (Petition) दाखिल करते हैं, तो संसद को उस मुद्दे पर अगले 7 कार्यदिवसों के भीतर अनिवार्य बहस करानी होगी।
* जनता की आवाज को उठाने के लिए सांसदों के हंगामे या सरकार की सहमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

(ग) व्यवधान पर जनता से क्षमा मांगना (Public Apology)

* यदि कोई सांसद सदन में गंभीर कदाचार के कारण निलंबित होता है, तो उसे अपनी पार्टी के मंच के बजाय अपने संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं के नाम एक आधिकारिक स्पष्टीकरण और क्षमा-पत्र जारी करना होगा।
* इसमें उन्हें बताना होगा कि जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाले सदन को उन्होंने क्यों बाधित किया।

(घ) रिकॉल की दिशा में पहला कदम (Feedback-Driven Accountability)

* यदि किसी सांसद को उसके निर्वाचन क्षेत्र के 50% से अधिक सत्यापित मतदाताओं द्वारा 'डैशबोर्ड' पर लगातार नकारात्मक रेटिंग या व्यवधान पैदा करने का दोषी माना जाता है, तो संसद की आचार समिति (Ethics Committee) को उस सांसद के खिलाफ जांच शुरू करने और उसकी सदस्यता की समीक्षा करने के लिए बाध्य किया जाए।

"मैं भारत का एक करदाता और सजग नागरिक होने के नाते 'राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक' प्रस्ताव का पूर्ण समर्थन करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि संसद में देश के विकास पर चर्चा हो, न कि हंगामा। मेरे द्वारा चुने गए प्रतिनिधि का आचरण देश के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।"

निष्कर्ष और प्रार्थना

यह प्रस्ताव किसी एक राजनीतिक दल के विरोध में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की गरिमा को पुनर्जीवित करने के लिए है। "राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक" के तहत इस अनिवार्य व्यवस्था को कानून का रूप देकर देश की संसद को दलीय बंधनों और गतिरोधों से मुक्त कराया जाए। देश की जनता अपने जनप्रतिनिधियों से सार्थक बहस और परिणाम चाहती है, व्यवधान नहीं।

भवदीय,

भारत के सजग एवं राष्ट्रभक्त नागरिक

अरविन्द सिसोदिया
कवि, लेखक, विश्लेषक एवं स्वतंत्र पत्रकार


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## सेवा में,

   1. महामहिम राष्ट्रपति महोदया, भारत गणराज्य
   2. माननीय प्रधानमंत्री जी, भारत सरकार
   3. माननीय अध्यक्ष जी, लोकसभा
   4. माननीय सभापति जी, राज्यसभा
   5. माननीय नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा एवं राज्यसभा

विषय: "राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक" – संसद के अनिवार्य, निर्बाध और सुचारू संचालन हेतु ऐतिहासिक विधायी सुधार प्रस्ताव।

आदरणीय,

भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर—हमारी संसद—देश की 140 करोड़ से अधिक जनता की आकांक्षाओं, उनके अधिकारों और देश के भविष्य का निर्धारण करने वाला मंच है। अत्यंत खेद और चिंता का विषय है कि दलीय राजनीति, राजनीतिक गतिरोध और सुनियोजित व्यवधानों के कारण दोनों सदनों का बहुमूल्य समय और देश के संसाधनों का भारी नुकसान हो रहा है।

जनता सांसदों को चुनकर देश के विकास और कानून बनाने के लिए भेजती है, न कि विधायी कार्यों को ठप करने के लिए। अतः, देश और जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए "राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक" के तहत निम्नलिखित अनिवार्य वैधानिक व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से लागू करने की मांग की जाती है: -

## 1. राइट टू नेशन: देश के प्रति विधायी उत्तरदायित्व

* न्यूनतम 120 कार्यदिवस की अनिवार्यता: संविधान में संशोधन कर लोकसभा और राज्यसभा के लिए वर्ष में न्यूनतम 120 दिन की बैठक अनिवार्य की जाए।
* समय की भरपाई (Compensatory Hours): यदि किसी भी कारणवश सदन का एक भी घंटा बर्बाद होता है, तो पीठासीन अधिकारी उसी दिन देर रात तक या सप्ताहांत (शनिवार-रविवार) को सदन चलाकर उस समय की शत-प्रतिशत भरपाई करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होंगे।
* विधेयकों पर अनिवार्य समीक्षा: किसी भी विधेयक को बिना विस्तृत बहस या संसदीय समितियों की समीक्षा के, हंगामे के बीच पारित नहीं किया जाएगा।

## 2. राइट टू पब्लिक: जनता के धन और समय की सुरक्षा

* 'काम नहीं तो वेतन नहीं' (No Work, No Pay): यदि सदन में व्यवधान के कारण कार्यवाही रुकती है, तो बाधा उत्पन्न करने वाले सभी सांसदों का उस दिन का वेतन, दैनिक भत्ता और यात्रा भत्ता स्वतः निरस्त कर दिया जाएगा।
* दलीय वित्तीय दंड (Party Penalty): संसद के संचालन की प्रति-मिनट लागत के आधार पर, व्यवधान पैदा करने वाले राजनीतिक दलों के संसदीय कोष या उनके दल के खाते से हर्जाना वसूलने का कानूनी प्रावधान हो।

## 3. अनुशासन हेतु 'स्वचालित लाल रेखा' (Automatic Enforcement)

* स्वतः निलंबन का नियम: पीठासीन अधिकारी के विवेक पर निर्भर रहने के बजाय, नियमों का स्वचालित क्रियान्वयन हो। यदि कोई भी सदस्य सदन के मध्य (Well of the House) में प्रवेश करता है, तख्तियां लहराता है या माइक/दस्तावेजों के साथ तोड़फोड़ करता है, तो वह तत्काल प्रभाव से अगले 5 कार्यदिवसों के लिए स्वतः निलंबित माना जाएगा।
* सुरक्षा बलों का अनिवार्य हस्तक्षेप: स्वतः निलंबित सदस्य को संसद के मार्शल बिना किसी राजनीतिक दबाव के तत्काल सम्मानपूर्वक सदन से बाहर करेंगे।

## 4. विपक्ष को रचनात्मक मंच (Guaranteed Opposition Space)

* विपक्ष का विशेष दिन: ब्रिटिश संसद की तर्ज पर प्रत्येक सप्ताह का एक पूरा दिन केवल विपक्ष द्वारा उठाए गए राष्ट्रीय मुद्दों, कार्यस्थगन प्रस्तावों और बहसों के लिए सुरक्षित होगा, जिसे सरकार बहुमत के बल पर टाल नहीं सकेगी।
* सवालों के अनिवार्य जवाब: जनता के मुद्दों पर विपक्ष द्वारा पूछे गए प्रत्येक जायज सवाल का तथ्यात्मक जवाब देने के लिए सरकार कानूनी रूप से बाध्य होगी।

## 5. तकनीकी और मीडिया नियंत्रण

* माइक का स्वचालित प्रबंधन: अपनी आवंटित सीट छोड़कर चिल्लाने या नियमों का उल्लंघन करने वाले सदस्य का माइक सिस्टम स्वतः बंद हो जाएगा।
* संसद टीवी प्रसारण नीति: हंगामे या तख्तियां दिखाने वाले दृश्यों को टीवी पर प्रसारित नहीं किया जाएगा। कैमरा केवल आसन और नियमों के तहत बोल रहे सदस्य पर केंद्रित रहेगा, ताकि प्रचार के लिए हंगामा करने की प्रवृत्ति खत्म हो।

## 6. राइट टू सिटिजन: नागरिक प्रतिक्रिया एवं जन-भागीदारी (Public Feedback & Grievance Mechanism)
संसद केवल चुने हुए प्रतिनिधियों की नहीं, बल्कि देश के अंतिम नागरिक की भी है। अतः इस अनिवार्य व्यवस्था के तहत नागरिकों को अपने प्रतिनिधियों के आचरण पर सीधे प्रतिक्रिया देने और संसद की कार्यप्रणाली में भागीदार बनने के लिए निम्नलिखित अधिकार दिए जाएं:
## (क) डिजिटल नागरिक डैशबोर्ड (Live Citizen Scorecard)

* संसद की आधिकारिक वेबसाइट पर एक पारदर्शी 'सिटिजन डैशबोर्ड' बनाया जाए।
* इस पर प्रत्येक सांसद द्वारा सदन में बिताए गए घंटे, उनके द्वारा पूछे गए प्रश्न, बहस में उनकी भागीदारी और उनके द्वारा किए गए व्यवधान/निलंबन का लाइव डेटा दर्ज हो।
* जनता अपने सांसद के इस रिपोर्ट कार्ड को देखकर सीधे ऑनलाइन रेटिंग और प्रतिक्रिया (Feedback) दे सके, जिसे चुनाव के समय उनके प्रदर्शन का पैमाना माना जाए।

## (ख) राष्ट्रीय नागरिक याचिका अधिकार (Right to Public Petition)

* यदि देश के न्यूनतम 1 लाख नागरिक डिजिटल पहचान (जैसे आधार वेरिफिकेशन) के माध्यम से किसी राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे या जन-शिकायत पर ऑनलाइन याचिका (Petition) दाखिल करते हैं, तो संसद को उस मुद्दे पर अगले 7 कार्यदिवसों के भीतर अनिवार्य बहस करानी होगी।
* जनता की आवाज को उठाने के लिए सांसदों के हंगामे या सरकार की सहमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

## (ग) व्यवधान पर जनता से क्षमा मांगना (Public Apology)

* यदि कोई सांसद सदन में गंभीर कदाचार के कारण निलंबित होता है, तो उसे अपनी पार्टी के मंच के बजाय अपने संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं के नाम एक आधिकारिक स्पष्टीकरण और क्षमा पत्र जारी करना होगा।
* इसमें उन्हें बताना होगा कि जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाले सदन को उन्होंने क्यों बाधित किया।

## (घ) रिकॉल की दिशा में पहला कदम (Feedback-Driven Accountability)

* यदि किसी सांसद को उसके निर्वाचन क्षेत्र के 50% से अधिक सत्यापित मतदाताओं द्वारा 'डैशबोर्ड' पर लगातार नकारात्मक रेटिंग या व्यवधान पैदा करने का दोषी माना जाता है, तो संसद की आचार समिति (Ethics Committee) को उस सांसद के खिलाफ जांच शुरू करने और उसकी सदस्यता की समीक्षा करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

"मैं भारत का एक करदाता और सजग नागरिक होने के नाते 'राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक' प्रस्ताव का पूर्ण समर्थन करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि संसद में देश के विकास पर चर्चा हो, न कि हंगामा। मेरे द्वारा चुने गए प्रतिनिधि का आचरण देश के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।"

## निष्कर्ष और प्रार्थना:
यह प्रस्ताव किसी एक राजनीतिक दल के विरोध में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की गरिमा को पुनर्जीवित करने के लिए है। "राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक" के तहत इस अनिवार्य व्यवस्था को कानून का रूप देकर देश की संसद को दलीय बंधनों और गतिरोधों से मुक्त कराया जाए। देश की जनता अपने जनप्रतिनिधियों से सार्थक बहस और परिणाम चाहती है, व्यवधान नहीं।

भवदीय,
भारत के सजग एवं राष्ट्रभक्त नागरिक

अरविन्द सिसोदिया 
कवि, लेखक, विश्लेषक एवं स्वतंत्र पत्रकार 

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