कविता — संघ उसी को कहते हैं
कविता — संघ उसी को कहते हैं
— अरविन्द सिसोदिया
9414180151
कुछ दाल-रोटी खाकर मस्त हैं,
कुछ दाल-रोटी पाने में व्यस्त हैं,
फुरसत किसे इस ज़माने में—
जो राष्ट्रहित के अस्तित्व को सोच सके,
संघ उसी को कहते हैं, जो कष्ट सहकर भी
मातृभूमि के परम वैभव के लिए प्रशस्त है।
==== 1 ====
जिसकी धड़कन में हिंदुस्तान,
जिसकी साँसों में भारत महान,
जिसके जीवन का एक ही मंत्र—
राष्ट्र प्रथम, राष्ट्र स्वाभिमान!
==== 2 ====
न सत्ता की चाह, न पद का मोह,
न यश की प्यास, न सुख का लोभ,
माटी का कर्ज़ चुकाना है,
भारत को परम वैभव तक ले जाना है।
==== 3 ====
जहाँ कदम पड़े, वहाँ सेवा हो,
जहाँ पीड़ा हो, वहाँ संवेदना हो,
जहाँ विघटन हो, वहाँ संगठन हो,
जहाँ निराशा हो, वहाँ नवचेतना हो।
तन समर्पित, मन समर्पित,
जीवन का हर क्षण अर्पित—
भारत माँ के चरणों में
अपना सर्वस्व समर्पित हो!
==== 4 ====
यह केवल शाखा नहीं,
संस्कारों की प्रखर धारा है,
जो सोई हुई चेतना को
जगाने का संकल्प प्यारा है।
यह केवल संगठन नहीं,
एक विराट राष्ट्रीय साधना है,
प्रत्येक स्वयंसेवक के भीतर
भारत के अमरत्व की भावना है।
==== 5 ====
आँधी आए—झुकना नहीं,
अंधड़ आए—रुकना नहीं,
राह कठिन हो—थकना नहीं,
राष्ट्रकार्य से हटना नहीं।
पग-पग पर संघर्ष मिले,
हँस-हँसकर उन्हें स्वीकार करें,
भारत के परम वैभव हेतु
जीवन भी प्रवाह करें।
==== 6 ====
हम दीप नहीं, जो आँधी में
क्षण भर जलकर बुझ जाएँ,
हम वह ज्वाला हैं, जो युगों तक
राष्ट्रचेतना जगमगाएँ।
हम वह संकल्प हैं, जो संकट में
और अधिक प्रखर हो जाता है,
भारत का नाम जहाँ लिया जाए,
वहीं स्वयंसेवक खड़ा हो जाता है।
==== 7 ====
जब तक हिमालय अडिग खड़ा है,
जब तक गंगा निर्मल-अविरल बहती है,
जब तक भारत की माटी में
वीरों की गाथा कहती है—
तब तक विजय-घोष की गूँज रहेगी,
भारतमाता की जय-जयकार रहेगी।
==== 8 ====
निज सुख से ऊपर राष्ट्र रहे,
निज स्वार्थों से ऊपर राष्ट्र रहे,
जीवन की अंतिम साँस तलक
भारत में उत्कर्ष और विकास रहे।
==== 9 ====
यही साधना, यही आराध्य,
यही कर्म, यही संकल्प—
भारत अविरल विश्वगुरु रहे,
वैभवशाली हो, कामधेनु रहे।
==== 10 ====
कुछ दाल-रोटी में जीवन काटें,
कुछ महलों में सुख भोगें—
पर जो राष्ट्र के लिए जिए,
जो राष्ट्र के लिए जागे,
जो राष्ट्र के लिए तपे,
जो राष्ट्र के लिए त्याग करे,
उसके जीवन का हर क्षण
मातृभूमि कृतज्ञता से निहारे।
==== 11 ====
हम स्वयंसेवक हैं—रुकेंगे नहीं, झुकेंगे नहीं,
मृत्युंजय बने हैं हम, राष्ट्रकार्य से हटेंगे नहीं।
संघ उसी को कहते हैं, जो कष्ट सहकर भी
मातृभूमि के परम वैभव के लिए प्रशस्त है।
==== समाप्त ====
- अरविन्द सिसोदिया 9414180151
कुछ दाल-रोटी खाकर मस्त हैं,
कुछ दाल-रोटी पाने में व्यस्त हैं,
फुरसत किसे इस ज़माने में—
जो राष्ट्रहित के अस्तित्व को सोच सके,
संघ उसी को कहते हैं,जो कष्ट सहकर भी
मातृभूमि के परम वैभव के लिए प्रशस्त है।
====1====
जिसकी धड़कन में हिंदुस्तान,
जिसकी साँसों में भारत महान,
जिसके जीवन का एक ही मंत्र—
राष्ट्र प्रथम, राष्ट्र स्वाभिमान !
====2====
न सत्ता की चाह, न पद का मोह,
न यश की प्यास, न सुख का लोभ,
माटी का कर्ज चुकाना है,
भारत को परम वैभव तक ले जाना है।
====3====
जहाँ कदम पड़े, वहाँ सेवा हो,
जहाँ पीड़ा हो, वहाँ संवेदना हो,
जहाँ विघटन हो, वहाँ संगठन हो,
जहाँ निराशा हो, वहाँ नवचेतना हो।
तन समर्पित, मन समर्पित,
जीवन का हर क्षण अर्पित—
भारत माँ के चरणों में
अपना सर्वस्व समर्पित हो !
====4====
यह केवल शाखा नहीं
संस्कारों की प्रखर धारा है,
जो सोई हुई चेतना को
जगाने का संकल्प प्यारा है।
यह केवल संगठन नहीं
एक विराट राष्ट्रीय साधना है,
प्रत्येक स्वयंसेवक के भीतर
भारत के अमरत्व की भावना है।
====5====
आँधी आए—झुकना नहीं,
अंधड़ आए—रुकना नहीं,
राह कठिन हो—थकना नहीं,
राष्ट्रकार्य से हटना नहीं।
पग-पग पर संघर्ष मिले
हँस हँस कर उन्हे स्वीकार करे
भारत के परम वैभव हेतु
जीवन भी प्रवाह करें।
====6====
हम दीप नहीं जो आँधी में
क्षण भर जलकर बुझ जाएँ,
हम वह ज्वाला हैं जो युगों तक
राष्ट्रचेतना जगमगाएँ।
हम वह संकल्प हैं जो संकट में
और अधिक प्रखर हो जाता है,
भारत का नाम जहाँ लिया जाए,
वहीं स्वयंसेवक खड़ा हो जाता है।
====7====
जब तक हिमालय अडिग खड़ा है,
जब तक गंगा निर्मल अविरल बहती है,
जब तक भारत की माटी में
वीरों की गाथा कहती है—
तब तक विजय घोष की गूंज रहेगी,
भारतमाता की जय-जयकार रहेगी।
====8====
निज सुख से ऊपर राष्ट्र रहे,
निज स्वार्थों से ऊपर राष्ट्र रहे,
जीवन की अंतिम साँस तलक
भारत में उत्कर्ष और विकास रहे।
====8====
यही साधना, यही आराध्य,
यही कर्म, यही संकल्प—
भारत अविरल विश्वगुरु रहे
वैभवशाली हो कामधेनु रहे.
====9====
कुछ दाल-रोटी में जीवन काटें,
कुछ महलों में सुख भोगें—
पर जो राष्ट्र के लिए जिए,
जो राष्ट्र के लिए जागे,
जो राष्ट्र के लिए तपे,
जो राष्ट्र के लिए त्याग करे
उसके जीवन का हर क्षण
मातृभूमि कृतज्ञता से निहारे।
====10====
हम स्वयंसेवक हैं,रुकेंगे नहीं, झुकेंगे नहीं,
मृत्युनंजय बने हें हम,राष्ट्रकार्य से हटेंगे नहीं।
संघ उसी को कहते हैं,जो कष्ट सहकर भी
मातृभूमि के परम वैभव के लिए प्रशस्त है।
====समाप्त====
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