देशहित सबसे पहले, हर षड्यंत्र की परतें खोलें, देश का जनमत आपके साथ है — अरविन्द सिसोदिया
प्रेस विज्ञप्ति
देशहित सबसे पहले, हर षड्यंत्र की परतें खोलें, देश का जनमत आपके साथ है - अरविन्द सिसोदिया
देशहित सबसे बड़ा, हर षड्यंत्र की परत खोलें
कोटा, 28 जुलाई। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया ने हाल के कथित काकरोच आंदोलन की पृष्ठभूमि में देश की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि "यदि किसी छात्र आंदोलन की आड़ में विदेशी हस्तक्षेप, हिंसा, अराजकता अथवा राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के संकेत मिल रहे हैं, तो उसकी व्यापक और समयबद्ध जांच केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है।" उन्होंने कहा कि " भारत में यदि कोई नेपाल और बंगलादेश जैसी आराजकता उत्पन्न करना चाहता है तो उसे पूरी तरह से कुचलदेना पुलिस और सुरक्षाबलों का कर्तव्य है। इसमें कोई किन्तु परन्तु स्वीकार नहीं है। न ही किसी को इसमें अवरोध उत्पन्न करना चाहिए। "
उन्होंने कहा कि "राष्ट्र सर्वोपरि है। देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा से बड़ा कोई मुद्दा नहीं हो सकता। भारत की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस, सुरक्षा एजेंसियों और प्रत्येक राष्ट्रनिष्ठ नागरिक का सर्वोच्च कर्तव्य है।"
अरविन्द सिसोदिया ने कहा कि "यदि किसी आंदोलन की आड़ में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अस्थिर करने, समाज में वैमनस्य फैलाने अथवा देश की प्रगति को बाधित करने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है, तो उसके पीछे छिपे हर षड्यंत्र, हर नेटवर्क और हर चेहरे को बेनकाब किया जाना चाहिए।"
सिसोदिया नें कहा कि " मेटा के द्वारा फेसबुक से भारत के प्रधानमंत्री जी का इस संदर्भ से जुड़ा वीडियो संदेश हटा देना और आपत्ति के बाद पुनः अपलोड करना षड्यंत्र की और स्पष्ट इशारा कर रहा है। वहीं केबिनेट मंत्री नितिन गडकरी के विरुद्ध मानहानिकारक और झूठी सामग्री को अपने सोसल मीडिया प्लेटफार्म्स से नहीं हटाने के विरुद्ध मेटा प्लेटफॉर्म्स, गूगल, एक्स कॉर्प और अन्य के खिलाफ से बॉम्बे हाईकोर्ट जाना पड़ा है। जो भारत में आंतरिक अशांति और भ्रम फैलाने की साजिश प्रतीत होती है। देश का जनमत सत्य जानना चाहता है और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर पूरा राष्ट्र सुरक्षा एजेंसियों के साथ मजबूती से खड़ा है।"
उन्होंने कहा कि "लोकतंत्र विरोध का अधिकार देता है, लेकिन हिंसा, पत्थरबाजी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, पुलिस पर हमला करने, व्यवस्था के खिलाफ षड्यंत्र रचने और कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं देता। अराजकता को नियंत्रित करना पुलिस का संवैधानिक दायित्व है और ऐसे प्रत्येक कृत्य पर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। राष्ट्र कानून से चलता है, भीड़तंत्र से नहीं।"
उन्होंने कहा कि "जांच एजेंसियों को इस कथित आंदोलन से जुड़े प्रत्येक वित्तीय स्रोत, डिजिटल नेटवर्क और संभावित विदेशी संपर्क की गहराई से जांच करनी चाहिए। इसमें जो विदेशी धन, विदेशी डिजिटल नेटवर्क अथवा समन्वित विदेशी प्रचार अभियानों की भूमिका सामने आती है, तो उसे बिना किसी संकोच के देश के सामने रखा जाना चाहिए। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध रचे जाने वाले किसी भी विदेशी षड्यंत्र को उजागर किया जाना चाहिए।"
सिसोदिया ने छात्र आंदोलन के दौरान प्रयुक्त भाषा और व्यवहार पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि "लोकतंत्र में असहमति का सम्मान है, लेकिन अपराध का संरक्षण नहीं। अश्लील भाषा, व्यक्तिगत अपमान, हिंसा के लिए उकसाना और सार्वजनिक मर्यादा को तार-तार करना किसी भी आंदोलन को वैधता नहीं देता, बल्कि ऐसे कृत्य कानून के तहत कार्रवाई की मांग करते हैं।"
उन्होंने कहा कि "विद्यार्थी राष्ट्र की अमूल्य शक्ति और भारत के भविष्य के निर्माता हैं। उन्हें राजनीतिक स्वार्थों की ढाल बनाना, उन्हें भड़काकर अराजकता की ओर धकेलना और उनके भविष्य से खिलवाड़ करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। छात्र शक्ति का उपयोग राष्ट्र निर्माण के लिए होना चाहिए, राष्ट्रविरोधी वातावरण बनाने के लिए नहीं।"
उन्होंने कहा कि "देश यह जानना चाहता है कि इस आंदोलन में विदेशी संसाधनों की क्या क्या भूमिका रही। चाहे सोशल मीडिया पर पाकिस्तान सहित अन्य विदेशी स्रोतों से संचालित अकाउंट अथवा हैंडल हों, जो इस आंदोलन के पक्ष में समन्वित प्रचार कर रहे थे, अथवा कोई अन्य विदेशी तंत्र—यदि ऐसे तथ्य और प्रमाण उपलब्ध हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी भी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों अथवा भारत-विरोधी विचारधारा से जुड़े संगठनों की सक्रिय भागीदारी के प्रमाण मिलते हैं, तो उनके विरुद्ध भी कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।"
उन्होंने कहा कि "लोकतांत्रिक आंदोलनों में विभिन्न राजनीतिक और वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ता प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सक्रिय होते हैं। यदि कोई संगठन आंदोलन की आड़ में अराजकता फैलाने, समाज को बांटने अथवा राष्ट्रहित के विरुद्ध वातावरण बनाने का प्रयास करता है, तो उसके विरुद्ध निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। कानून सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए।"
अरविन्द सिसोदिया ने कहा कि "भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान प्रदत्त अधिकार है, किंतु यह स्वतंत्रता राष्ट्रहित, सामाजिक समरसता और सार्वजनिक व्यवस्था की मर्यादाओं के भीतर ही सुरक्षित रह सकती है। लोकतंत्र की रक्षा संविधान, कानून और अनुशासन से होती है, अराजकता और हिंसा से नहीं।"
उन्होंने देशवासियों से आह्वान किया कि "वे अफवाहों, दुष्प्रचार और विदेशी प्रभाव वाले भ्रामक सोशल मीडिया अभियानों से सावधान रहें तथा केवल सत्यापित तथ्यों पर विश्वास करें। भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता की रक्षा प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रीय दायित्व है।"
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि "देश की सुरक्षा एजेंसियां, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाएं निष्पक्षता एवं दृढ़ता के साथ कार्य करते हुए यदि कोई षड्यंत्र है तो उसकी प्रत्येक परत को उजागर करेंगी तथा कानून के अनुसार दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करेंगी। राष्ट्रहित से कोई समझौता न कभी हुआ है और न कभी होगा।"
भवदीय,
अरविन्द सिसोदिया
मो.: 9414180151
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