कविता - जीवन मेला
कविता -जीवन मेला
- अरविन्द सिसोदिया
तू आया अकेला, मैं आया अकेला,
आओ मिलकर बना दें जीवन मेला।
ऐसा मेला, जहाँ कोई न रहे अकेला,
हर धड़कन में मिले अपनेपन का बसेरा।
जन्म की पहली साँस अकेली होती है,
अंतिम यात्रा भी तन्हाई ही होती है।
बीच का यह जो अनमोल सफ़र मिला है,
उसे प्रेम से सजाना ही जीवन की साधना है।
चलो किसी की राह का दीप बन जाएँ,
किसी की थकी पलकों का स्वप्न बन जाएँ।
जो टूट गए हैं समय की आँधियों में,
उनके विश्वास को फिर से जगाएँ।
चलो किसी की पीड़ा का मरहम बनें,
किसी सूनी साँझ का सरगम बनें।
अपने सुख से पहले जो जग को हँसा दे,
ऐसे जीवन का हम प्रतिरूप बनें।
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
न अपना-पराया, न कोई अजनबी।
बस एक ही परिचय हो सबका—
हम सब एक ही सृष्टि की संतान हैं।
धर्म यदि जोड़ता है तो धर्म महान है,
प्रेम यदि बाँटता है तो वही पहचान है।
जिस हृदय में सबके लिए स्थान बना रहे,
वही ईश्वर का सच्चा धाम है।
दौलत से नहीं, रिश्तों से घर बसते हैं,
प्रेम से ही सूने आँगन हँसते हैं।
जो बाँट सके अपने हिस्से की धूप को,
वही जीवन का सच्चा धनवान है।
यदि किसी की आँख का आँसू पोंछ सके,
यदि किसी के अधरों पर मुस्कान ला सके,
तो समझना कि जीवन व्यर्थ नहीं गया,
मनुष्य होकर मानवता का ऋण चुका सके।
नदियाँ अपना जल नहीं पीतीं,
वृक्ष स्वयं अपने फल नहीं खाते।
प्रकृति का यही सनातन संदेश है—
जीवन वही, जो औरों के काम आता है।
आओ ऐसा संसार बसाएँ,
जहाँ प्रेम के दीप सदा जगमगाएँ।
हर आँगन में विश्वास खिले,
हर मन में करुणा मुस्काए।
तू आया अकेला, मैं आया अकेला,
चलो ऐसा रचें अपनेपन का मेला।
जहाँ हर हृदय को मिले अपना सहारा,
और इस धरती पर न रहे कोई अकेला।
क्योंकि अंत में साथ न धन जाएगा,
न यश, न वैभव, न कोई काफ़िला।
यदि कुछ अमर रहेगा इस संसार में,
तो केवल प्रेम से सजाया हुआ यह मेला।
जब भी इस जीवन का हिसाब होगा,
न पद पूछा जाएगा, न सम्मान होगा।
बस इतना ही प्रश्न समय हमसे करेगा—
कितनों के जीवन में तुमने प्रेम का उजियारा किया होगा।
यही है जीवन, यही उसका सार,
प्रेम ही पूजा, प्रेम ही संसार।
आओ मिलकर ऐसा युग रचें,
जहाँ हर हृदय बने मानवता का द्वार।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें