कविता : तुष्टिकरण का अंत



कविता : तुष्टिकरण का अंत
सिंहासन की तुच्छ नीति का, आज कुहासा छँट गया,
तुष्टिकरण का काल-अँधेरा, महाकाल से कट गया।
कोटि-कोटि कंठों से गूँजा, वंदे मातरम का नारा,
जाग उठा है सिंह सनातन, डोल उठा अंबर सारा।
बाँट रहे थे जो भारत को, जाति-पाति के खानों में,
थपकी देकर सुला रहे थे, राष्ट्रवाद को थानों में।
उस कायरता की छाती पर, शौर्य-शंख अब बाजा है,
सिंहासन पर बैठा देखो, न्याय-नीति का राजा है।
झुकती थीं जो सत्ताएँ, केवल इक खास इशारे पर,
छोड़ दिया था राष्ट्र-भाग्य को, राजनीति के धारे पर।
उन बेड़ियों को काट फेंककर, भारत आज खड़ा हुआ,
विश्व-मंच पर महाशक्ति बन, सबसे वीर बड़ा हुआ।
कोटि-कोटि धन्यवाद उस नायक को, जिसने ठाना है,
तुष्टिकरण की कब्र खोदकर, नया विहान लाना है।
अब न झुकेगा, अब न रुकेगा, यह संकल्प हमारा है,
मुक्त हुआ है देश भ्रम से, यह स्वतंत्र जयकारा है।
वंदे मातरम! वंदे मातरम!
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