नकाब नया, चेहरे वही, आराजकता वही, मकसद संसद को बाधित करना - अरविन्द सिसोदिया
बच्चों का भविष्य दांव पर लगाकर सत्ता प्राप्ति का षड्यंत्र स्वीकार्य नहीं, जनमत पूरी तरह सजग है – अरविन्द सिसोदिया
नकाब नया, चेहरे वही, आराजकता वही, मकसद संसद को बाधित करना - अरविन्द सिसोदिया
कोटा, 22 जुलाई। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया ने देश में विद्यार्थियों के नाम पर चलाए जा रहे आंदोलन और विपक्षी राजनीति पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि " भारत में विपक्ष का मतलब आराजकतावाद और आंदोलन का मतलब सिर्फ देशको क्षति पहुंचना रह गया है।" उन्होंने कहा कि " जनता द्वारा लगातार नकारे जा चुके कुछ राजनीतिक दल लोकतांत्रिक जनादेश को स्वीकार करने के बजाय चोर रास्ते से, सत्ता प्राप्ति के लिए, हर प्रकार के हथकंडे अपनाने में जुटे हुये हैं। जिस तरह किसान आंदोलन मूलरूप से किसान विरोधी था, उसी तरह यह आंदोलन भी युवा विरोधी ही है, इन्हें युवाओं से कोई लेना देना नहीं है। ये देश के विद्यार्थियों और युवाओं के भविष्य को दांव पर लगाकर खुद की राजनीतिक रोटियां सेकने में लगे हैं। जो कि अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है।"
उन्होंने कहा कि "डीप स्टेट पर विदेशी सोशल मीडिया नेटवर्कों से दुष्प्रेरणा तथा विदेशी फंडिंग के बल पर देश की सभी हिंदू विरोधी ताकतें इसमें नया नकाब पहन कर जुटी हुई हैं। यह हुल्लड तंत्र भारत के हो रहे नवनिर्माण को रोकने का षड्यंत्रमात्र है ।जिस तरह बाहरी प्रभावों और वैचारिक एजेंडों को माध्यम बनाया गया है वह शिक्षा, समाज और राष्ट्रतीनों के लिए चिंता का विषय है।"
सिसोदिया ने आरोप लगाया कि ऐसे आंदोलनों में हिंदू विरोधी, अति-वामपंथी और अराजकतावादी विचारधारा से जुड़े तत्वों की ही मूल भागेदारी व सक्रियता दिखाई देती है, जिससे इनकी आराजक मंशा दिख रही हैं। " उन्होंने कहा कि " शिक्षा संस्थानों को राजनीतिक प्रयोगशाला बनाना और युवाओं को भ्रमित कर सड़कों पर उतारनें की मूल कोशिश फैल हो चुकी है, जमीनीस्तर पर विफल होनें पर विपक्षीदल इसे धार देनें कूद पड़े हैं। जो लोकतंत्र नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है।"
उन्होंने कहा, "ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोग भारत में भी बांग्लादेश और नेपाल जैसे राजनीतिक उथल-पुथल के मॉडल की कल्पना कर रहे हैं। लेकिन वे भूल रहे हैं कि भारत का लोकतंत्र कहीं अधिक परिपक्व, व्यापक और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित है। यहां सत्ता परिवर्तन केवल जनता के मत से होता है, भीड़, हिंसा, अराजकता या विदेशी प्रभाव से नहीं।"
सिसोदिया ने कहा कि "भारत के 140 करोड़ नागरिक संविधान, लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं में अटूट विश्वास रखते हैं। यहां हुल्लड़बाजी, अराजकता, हिंसक दबाव की राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था को अस्थिर करने के प्रयासों के लिए कोई स्थान नहीं है। जनता ऐसे सभी प्रयासों को पहचानती है और समय आने पर लोकतांत्रिक तरीके से उनका उत्तर भी देती है।"
उन्होंने कहा कि "जो दल जनता के विश्वास से सत्ता प्राप्त नहीं कर सकते, वे यदि छात्रों और युवाओं को राजनीतिक मोहरा बनाकर चोर दरवाजे से सत्ता पाने का सपना देख रहे हैं, तो यह कभी सफल नहीं होगा। भारत की युवा शक्ति राष्ट्र निर्माण की शक्ति है, किसी राजनीतिक षड्यंत्र का औजार नहीं। जनमत पूरी तरह सजग है और राष्ट्रहित के विरुद्ध किसी भी अराजक प्रयास को कभी स्वीकार नहीं करेगा।"
भवदीय
अरविन्द सिसोदिया
9414180151
------------------------------
## 1. प्रमुख सामाजिक और नीति-आधारित आंदोलनों के चेहरे
*
* सोनम वांगचुक (लद्दाख आंदोलन एवं शिक्षा सुधार): लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने और पर्यावरण की रक्षा के लिए इन्होंने लंबे समय तक भूख हड़ताल की। वर्तमान में भी ये देश के बड़े छात्र आंदोलनों और [शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग](https://www.livemint.com/news/india/not-just-cjp-these-are-other-major-protests-happening-across-india-right-now-11784621399932.html) को लेकर अनशन और विरोध का मुख्य चेहरा बने हुए हैं। [2, 3]
* राकेश टिकैत (किसान आंदोलन, 2020-21): तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन के सबसे बड़े जमीनी नेता बनकर उभरे। गाजीपुर बॉर्डर पर उनके आंसुओं और भाषणों ने पूरे आंदोलन की दिशा बदल दी थी।
* योगेंद्र यादव (किसान आंदोलन एवं नागरिक मंच): संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के रणनीतिकार के रूप में इन्होंने किसान आंदोलन को बौद्धिक और नीतिगत दिशा दी। ये लगभग हर बड़े नागरिक और सामाजिक विरोध प्रदर्शन के मंचों पर दिखाई देते हैं।
* अभिजीत दिपके (CJP छात्र आंदोलन, 2026): वर्तमान में पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे युवा और छात्र आंदोलन ([कॉकरोच जनता पार्टी - CJP](https://www.livehindustan.com/videos/national/cjp-protest-parliament-delhi-police-201784567197643.html)) के संस्थापक और प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे हैं, जिसका केंद्र दिल्ली है। [4, 5]
* बिलकिस बानो / 'शाहीन बाग की दादियां' (CAA विरोधी आंदोलन, 2019-20): नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग में हुए प्रदर्शन का मुख्य चेहरा बुजुर्ग महिलाएं थीं, जिन्हें वैश्विक मीडिया (जैसे टाइम मैगजीन) में भी जगह मिली।
*
------------------------------
## 2. छात्र आंदोलनों से निकले प्रमुख चेहरे (कैंपस से राजनीति तक)
*
* कन्हैया कुमार (JNU आंदोलन, 2016): जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुए विवाद और देशद्रोह के आरोपों के बाद कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हुए। आज वह कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं।
* उमर खालिद और शेहला राशिद (JNU / CAA प्रदर्शन): JNU छात्र आंदोलन और बाद में CAA-NRC विरोधी प्रदर्शनों में ये चेहरे काफी चर्चा में रहे। उमर खालिद लंबे समय से कानूनी मुकदमों का सामना कर रहे हैं।
* चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' (दलित और युवा आंदोलन): भीम आर्मी के प्रमुख और वर्तमान सांसद चंद्रशेखर आज़ाद हाथरस कांड, सीएए विरोध से लेकर वर्तमान में [छात्रों पर पुलिस लाठीचार्ज के खिलाफ संसद परिसर में धरने](https://www.dailymotion.com/video/xaqwpiq) तक, हर बड़े प्रदर्शन में सड़क पर उतरने वाले प्रमुख चेहरा हैं। [6]
*
------------------------------
## 3. मुख्यधारा की राजनीति और संसद में विरोध के प्रमुख चेहरे
संसद के भीतर सरकार को घेरने और सड़कों पर राजनीतिक आंदोलन खड़े करने में इन नेताओं की भूमिका सबसे आगे रही है:
*
* राहुल गांधी (विपक्ष का मुख्य चेहरा): भूमि अधिग्रहण बिल (2015) के विरोध से लेकर, हाथरस दौरा, किसान आंदोलन का समर्थन और हालिया 'भारत जोड़ो यात्रा' के जरिए इन्होंने सड़क पर सबसे बड़े राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व किया। संसद के भीतर भी वे सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और तीखे भाषणों का मुख्य चेहरा रहे हैं।
* अरविंद केजरीवाल (सड़क से सत्ता तक): हालांकि इनका उदय अन्ना आंदोलन (2011) से हुआ था, लेकिन पिछले 12 सालों में दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते हुए भी एलजी दफ्तर में धरना देने, नोटबंदी का विरोध करने और केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरने के कारण वे चर्चा में रहे।
* महुआ मोइत्रा और डेरेक ओ'ब्रायन (TMC - संसद में आक्रामक विरोध): संसद के भीतर अपनी तीखी भाषण शैली, महुआ मोइत्रा के निष्कासन विवाद और डेरेक ओ'ब्रायन द्वारा संसद में नियम पुस्तिकाओं को लेकर किए गए विरोध के कारण ये दोनों चेहरे हमेशा चर्चा में रहे।
* संजय सिंह और राघव चड्ढा (AAP - संसद में तख्तियां और नारेबाजी): संसद के मानसून और शीतकालीन सत्रों के दौरान गांधी मूर्ति के सामने रातभर धरने पर बैठने और विपक्षी सांसदों के निलंबन के समय विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने में ये चेहरे सबसे आगे रहे हैं।
* असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM - विधायी विरोध): संसद के भीतर तीन तलाक बिल, सीएए (CAA) कानून की प्रतियां फाड़ने और कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के विरोध में इनका चेहरा सबसे मुखर रहा।
*
## निष्कर्ष
पिछले 12 वर्षों का इतिहास बताता है कि भारत में विरोध प्रदर्शनों का स्वरूप बदला है। जहाँ राकेश टिकैत और सोनम वांगचुक जैसे चेहरे नीतिगत बदलावों के लिए जाने जाते हैं, वहीं राहुल गांधी और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नेता संसद और सड़क दोनों जगह विपक्ष की आवाज़ बनकर उभरे हैं।
======1======
भारत में मुख्य रूप से तीन प्रमुख साम्यवादी (कम्युनिस्ट/वामपंथी) छात्र संगठन सक्रिय हैं, जो विभिन्न वामपंथी राजनीतिक दलों की छात्र शाखाओं के रूप में काम करते हैं। पिछले 12 वर्षों के लगभग सभी बड़े छात्र आंदोलनों (JNU, AMU, जाधवपुर यूनिवर्सिटी, और हैदराबाद यूनिवर्सिटी) में इन तीनों संगठनों की केंद्रीय भूमिका रही है:
## 1. SFI (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया)
* राजनीतिक संबंध: यह भारत की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी CPI(M) यानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का छात्र संगठन है।
* स्थापना व प्रभाव: इसकी स्थापना 1970 में हुई थी। केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, दिल्ली (JNU), और राजस्थान के कई विश्वविद्यालयों में इसका सबसे मजबूत आधार है।
* मुख्य मुद्दे: शिक्षा का निजीकरण रोकना, कैंपस में लोकतांत्रिक अधिकार, और दक्षिणपंथी राजनीति का विरोध।
## 2. AISF (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन)
* राजनीतिक संबंध: यह भारत की सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी CPI यानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की छात्र शाखा है।
* स्थापना व प्रभाव: इसकी स्थापना आजादी से पहले 1936 में हुई थी। जेएनयू (JNU) के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार इसी संगठन से जुड़े थे, जिसके बाद यह संगठन देशव्यापी चर्चा में आया।
* मुख्य मुद्दे: "अध्ययन और संघर्ष" के नारे के साथ यह संगठन वैज्ञानिक शिक्षा और सभी के लिए समान अवसरों की वकालत करता है। [3, 4]
## 3. AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन)
* राजनीतिक संबंध: यह CPI(ML) Liberation यानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन की छात्र शाखा है, जिसे अक्सर 'उदार वामपंथ' के मुकाबले अधिक आक्रामक या क्रांतिकारी वामपंथी माना जाता है।
* स्थापना व प्रभाव: इसकी स्थापना 1990 में हुई थी। दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), जेएनयू (JNU), इलाहाबाद विश्वविद्यालय, और बिहार के कॉलेजों में इसका बहुत आक्रामक प्रभाव है।
* मुख्य मुद्दे: छात्र अधिकारों के साथ-साथ यह संगठन दलित, आदिवासी, मानवाधिकार और राज्य के दमन (जैसे यूएपीए, राजद्रोह कानूनों) के खिलाफ सबसे मुखर रहता है।
------------------------------
## इन संगठनों की कार्यप्रणाली और आलोचना
* सकारात्मक पक्ष: ये संगठन फीस वृद्धि के खिलाफ, हॉस्टल सुविधाओं के लिए, और छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लगातार जमीन पर आंदोलन करते हैं।
* आलोचनात्मक पक्ष: विरोधी राजनीतिक दल (जैसे ABVP या NSUI) इन पर कैंपस की पढ़ाई का माहौल खराब करने, 'राष्ट्र-विरोधी' नैरेटिव को बढ़ावा देने, और हर शैक्षणिक मुद्दे को जबरन वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी राजनीति में बदलने का आरोप लगाते हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें