3- कलेक्टर महोदय

दिनांक : 22 जुलाई 2026

सेवा में,

माननीय जिला कलेक्टर महोदय
कलेक्ट्रेट परिसर, जिला गुना (मध्य प्रदेश)

विषय :- जिला गुना मप्र में तहसील बमोरी में स्वामित्व योजना अंतर्गत प्रकरण क्रमांक 0863/अ-3/2020-21 में प्लॉट क्रमांक 32, आवासीय भूमि खसरा क्रमांक 273, ग्राम मोड़का, पटवारी हल्का 64 सूजाखेड़ी, तहसील बमोरी, जिला गुना स्थित पैतृक आवासीय संपत्ति जो किलेनुमा दो मंजिला पक्के मकानों सहित बहुमूल्य संपत्ति के, स्वामित्व अभिलेख एवं प्रॉपर्टी कार्ड में हुई गंभीर विधिक एवं तथ्यात्मक त्रुटि का सुधार कर स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के सभी प्रथम श्रेणी के वैध उत्तराधिकारियों के नाम संयुक्त सह-स्वामी के रूप में दर्ज किए जाने तथा अंतिम निर्णय तक उक्त संपत्ति के संबंध में किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री, नामांतरण, हस्तांतरण, बंधक, ऋण अथवा अन्य स्वामित्व संबंधी कार्यवाही पर रोक लगाए जाने बाबत।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैं अरविन्द सिंह सिसोदिया, पुत्र स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया, ग्राम मोड़का, तहसील बमोरी, जिला गुना (मध्य प्रदेश) का मूल निवासी हूँ। मैं स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया का ज्येष्ठ पुत्र एवं हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अंतर्गत प्रथम श्रेणी का वैध उत्तराधिकारी तथा विवादित संपत्ति का संयुक्त सह-स्वामी हूँ।

यह अभ्यावेदन आपके समक्ष इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया जा रहा है कि स्वामित्व योजना के अंतर्गत तैयार किए गए स्वामित्व अभिलेख एवं प्रॉपर्टी कार्ड में हुई गंभीर त्रुटि का निराकरण किया जाए। उक्त त्रुटि के कारण न केवल मेरे, बल्कि स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के अन्य वैध उत्तराधिकारियों के विधिक एवं संवैधानिक अधिकार भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं।

1. स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया एवं उनके उत्तराधिकारी

स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया, पुत्र श्री समंदर सिंह, का दिनांक 20 दिसंबर 2016 को निर्वसीयत (Intestate) निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अनुसार उनकी समस्त संपत्ति पर उनके सभी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों का समान एवं संयुक्त अधिकार स्थापित हो गया।

उनके प्रथम श्रेणी के कुल आठ वैध उत्तराधिकारी निम्नानुसार हैं—
1. श्रीमती कमला देवी – धर्मपत्नी
2. अरविन्द सिंह – ज्येष्ठ पुत्र
3. स्व. हेमंत सिंह – पुत्र (जिनके निधन के उपरांत उनके विधिक उत्तराधिकारी श्रीमती साधना सिंह, रणविजय सिंह एवं विजेन्द्र सिंह हैं।)
4. विश्वजीत सिंह – पुत्र
5. सत्यजीत सिंह – पुत्र
6. प्रशांत सिंह – पुत्र
7. सिद्धार्थ सिंह – पुत्र
8. वसुंधरा सिंह – पुत्री

अतः स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया की निर्वसीयत मृत्यु के पश्चात उपर्युक्त सभी उत्तराधिकारी उनकी संपत्ति के विधिक संयुक्त सह-स्वामी बन गए। यह अधिकार विधि द्वारा स्वतः प्राप्त हुआ है तथा किसी सर्वेक्षण, प्रॉपर्टी कार्ड अथवा राजस्व अभिलेख पर निर्भर नहीं है।

2. विवादित संपत्ति का विवरण

विवादित संपत्ति ग्राम मोड़का, ग्राम पंचायत सूजाखेड़ी, पटवार हल्का सूजाखेड़ी तहसील बमोरी, जिला गुना स्थित प्लॉट क्रमांक 32, रकबा 2175 वर्गमीटर, आबादी खसरा क्रमांक 273, कुल रकबा 1.076 हेक्टेयर का भाग है।

उक्त संपत्ति संयुक्त हिन्दू परिवार की पैतृक आवासीय संपत्ति है, जिसमें दो पक्के दो-मंजिला आवासीय भवन, बहुत से स्टोरेज भवन, खुला आँगन, कुआँ तथा चारों ओर किलेनुमा चारदीवारी से सुरक्षित परिसर स्थित है। इस सम्पूर्ण संपत्ति पर स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के सभी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों का समान सह-स्वामित्व, संयुक्त अधिकार एवं संयुक्त कब्जा है।

3. अन्य राजस्व एवं न्यायालयीन अभिलेखों में सभी उत्तराधिकारियों की मान्यता

स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के निधन के उपरांत उनकी कृषि भूमि का फौती नामांतरण सक्षम राजस्व अधिकारी द्वारा सभी वैध उत्तराधिकारियों के नाम किया जा चुका है।

इसी प्रकार ग्राम मोड़का स्थित कृषि भूमि का पारिवारिक बंटवारा भी सक्षम राजस्व न्यायालय द्वारा सभी उत्तराधिकारियों के पक्ष में किया जा चुका है।

इसके अतिरिक्त माननीय सिविल न्यायालय, गुना में संचालित उत्तराधिकार (Succession) संबंधी कार्यवाही में भी सभी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों को विधिक उत्तराधिकारी स्वीकार किया गया है।

        अतः जब प्रशासन एवं सक्षम न्यायालय स्वयं स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के सभी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों को उनकी संपत्ति का समान अधिकारयुक्त उत्तराधिकारी स्वीकार कर चुके हैं, तब उसी व्यक्ति की पैतृक आवासीय संपत्ति के स्वामित्व अभिलेख में केवल तीन व्यक्तियों के नाम अंकित किया जाना न केवल तथ्यात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण है, बल्कि विधिक दृष्टि से भी पूर्णतः असंगत एवं अवैध है।

इसी गंभीर त्रुटि के कारण यह अभ्यावेदन प्रस्तुत किया जा रहा है।

4. स्वामित्व योजना के अंतर्गत किए गए सर्वेक्षण एवं अभिलेखीकरण में गंभीर अनियमितताएँ

स्वामित्व योजना अंतर्गत प्रकरण क्रमांक 0863/अ-3/2020-21 के तहत ग्राम मोड़का में किए गए सर्वेक्षण के आधार पर विवादित पैतृक आवासीय संपत्ति प्लॉट क्रमांक 32 का स्वामित्व अभिलेख एवं प्रॉपर्टी कार्ड तैयार किया गया। किन्तु अत्यंत आश्चर्य एवं गंभीर चिंता का विषय है कि उक्त अभिलेख में स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के सभी वैध प्रथम श्रेणी उत्तराधिकारियों के स्थान पर केवल श्रीमती कमला देवी, सत्यजीत सिंह एवं सिद्धार्थ सिंह के नाम दर्ज कर दिए गए।

यह कार्य न केवल वास्तविक स्थिति के विपरीत है, बल्कि उपलब्ध राजस्व अभिलेखों, उत्तराधिकार संबंधी विधि तथा स्वामित्व योजना के मूल उद्देश्य के भी प्रतिकूल है।

विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सर्वेक्षण के समय अन्य वैध सह-स्वामियों को न तो कोई सूचना दी गई, न उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की गई, न ही उनकी सहमति प्राप्त की गई। इस प्रकार एकतरफा एवं अपूर्ण जानकारी के आधार पर तैयार किया गया स्वामित्व अभिलेख प्रथम दृष्टया ही त्रुटिपूर्ण एवं विधि-विरुद्ध है।

5. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन

भारतीय विधि व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि किसी भी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाला निर्णय उसके पक्ष को सुने बिना नहीं लिया जा सकता। इसे "Audi Alteram Partem" अर्थात "दूसरे पक्ष को भी सुनो" का सिद्धांत कहा जाता है।

वर्तमान प्रकरण में—

- आवेदक जो कि वैध उत्तराधिकारी है को सर्वेक्षण की पूर्व सूचना नहीं दी गई। किसी भी प्रक्रिया की जानकारी नहीं दी गई।
- सर्वेक्षण के समय सभी उत्तराधिकारीयों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं की गई।
- किसी प्रकार की आपत्ति प्रस्तुत करने का अवसर नहीं दिया गया।
- अंतिम प्रकाशन की प्रभावी सूचना भी उपलब्ध नहीं कराई गई।

फलस्वरूप, अनेक वैध सह-स्वामियों के नाम अभिलेख से वंचित रह गए। यह प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है तथा ऐसी कार्यवाही विधि विरुद्ध है।

6. स्वामित्व योजना का उद्देश्य एवं उसकी सीमाएँ

स्वामित्व योजना (SVAMITVA Scheme) का उद्देश्य ग्रामीण आबादी क्षेत्रों में स्थित संपत्तियों का सर्वेक्षण कर उनका अभिलेखीकरण करना तथा संपत्ति धारकों को अभिलेख उपलब्ध कराना है।

यह योजना किसी व्यक्ति को नया स्वामित्व प्रदान करने अथवा किसी वैध सह-स्वामी के अधिकारों को समाप्त करने का माध्यम नहीं है।

अतः यदि किसी संपत्ति पर एक से अधिक व्यक्तियों का संयुक्त अधिकार विद्यमान था, तो सर्वेक्षण एवं अभिलेखीकरण भी उसी वास्तविक एवं विधिक स्थिति के अनुरूप किया जाना चाहिए था।

स्वामित्व योजना के अंतर्गत तैयार किया गया प्रॉपर्टी कार्ड केवल उपलब्ध तथ्यों का अभिलेखीकरण है; वह स्वयं स्वामित्व का स्रोत नहीं है और न ही वह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम अथवा अन्य लागू कानूनों से प्राप्त अधिकारों को समाप्त या सीमित कर सकता है।

इस प्रकार वर्तमान प्रकरण में आठ प्रथम श्रेणी उत्तराधिकारीयों में से केवल तीन व्यक्तियों के नाम दर्ज किया जाना स्वामित्व योजना के उद्देश्य एवं उसकी वैधानिक सीमाओं के विपरीत है।

7. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अंतर्गत उत्तराधिकारियों के अधिकार

स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया की निर्वसीयत मृत्यु के पश्चात तत्काल ही हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8, धारा 9 तथा अनुसूची के अनुसार उनके सभी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी समान अधिकार से उनकी संपत्ति के संयुक्त सह-स्वामी बन गए।

यह अधिकार विधि द्वारा स्वतः प्राप्त हुआ है। इसके लिए किसी पृथक आदेश, सर्वेक्षण अथवा प्रॉपर्टी कार्ड की आवश्यकता नहीं होती।

अतः किसी प्रशासनिक त्रुटि, अपूर्ण सर्वेक्षण अथवा गलत अभिलेखीकरण के आधार पर किसी वैध उत्तराधिकारी के विधिक अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।

8. संवैधानिक एवं वैधानिक अधिकारों का हनन

वर्तमान प्रकरण में तैयार किया गया त्रुटिपूर्ण स्वामित्व अभिलेख न केवल राजस्व अभिलेखों में असंगति उत्पन्न करता है, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों को भी प्रभावित करता है।

समान परिस्थितियों में सभी वैध उत्तराधिकारियों को समान व्यवहार मिलना संविधान के अनुच्छेद 14 का मूल तत्व है। जबकि बिना किसी वैधानिक आधार के केवल तीन व्यक्तियों के नाम दर्ज कर शेष उत्तराधिकारियों को अभिलेख से वंचित करना समानता के सिद्धांत के प्रतिकूल है।

इसी प्रकार संविधान के अनुच्छेद 300A के अनुसार किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल विधि द्वारा ही वंचित किया जा सकता है। किसी त्रुटिपूर्ण प्रशासनिक अभिलेख के माध्यम से वैध सह-स्वामी के संपत्ति संबंधी अधिकारों को सीमित करना इस संवैधानिक संरक्षण की भावना के भी विपरीत है।

9. उपलब्ध अभिलेखों की उपेक्षा एवं प्रशासनिक असंगति

यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि संबंधित राजस्व अभिलेखों, फौती नामांतरण, पारिवारिक बंटवारा तथा उत्तराधिकार संबंधी न्यायालयीन अभिलेखों में सभी वैध उत्तराधिकारियों को स्वीकार किया जा चुका है।

इसके बावजूद स्वामित्व योजना के अंतर्गत तैयार किए गए अभिलेख में केवल तीन व्यक्तियों के नाम अंकित किया जाना प्रशासनिक अभिलेखों के मध्य स्पष्ट विरोधाभास (Administrative Inconsistency) को दर्शाता है।

यदि किसी अधिकारी को संयुक्त उत्तराधिकार अथवा स्वामित्व की स्थिति पर कोई संदेह था, तो उसे संबंधित सभी पक्षों को सुनकर, उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण कर तथा विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाकर ही निर्णय लेना चाहिए था।

ऐसा न किया जाना इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता को और अधिक बल प्रदान करता है।

10. त्रुटिपूर्ण स्वामित्व अभिलेख के कारण संभावित अपूरणीय क्षति

वर्तमान में स्वामित्व योजना के अंतर्गत तैयार किए गए त्रुटिपूर्ण स्वामित्व अभिलेख एवं प्रॉपर्टी कार्ड में केवल तीन व्यक्तियों के नाम अंकित होने के कारण यह वास्तविक स्थिति का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यदि इस त्रुटिपूर्ण अभिलेख के आधार पर किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री, विक्रय, उपहार, बंधक, ऋण, पट्टा, नामांतरण अथवा अन्य हस्तांतरण संबंधी कार्यवाही संपन्न होती है, तो शेष वैध सह-स्वामियों के अधिकारों को अपूरणीय क्षति पहुँचेगी तथा अनावश्यक एवं दीर्घकालीन न्यायिक विवाद उत्पन्न होंगे।

ऐसी स्थिति में न केवल वैध उत्तराधिकारियों के संपत्ति संबंधी अधिकार प्रभावित होंगे, बल्कि प्रशासनिक अभिलेखों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न उत्पन्न होगा। अतः न्यायहित, जनहित एवं भविष्य के अनावश्यक विवादों की रोकथाम के लिए तत्काल अंतरिम संरक्षण प्रदान किया जाना अत्यंत आवश्यक है।

11. निष्पक्ष जांच की आवश्यकता

प्रथम दृष्टया उपलब्ध तथ्यों से प्रतीत होता है कि स्वामित्व योजना के अंतर्गत सर्वेक्षण एवं अभिलेखीकरण की प्रक्रिया में आवश्यक सावधानी एवं विधिक प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया गया।

यदि जांच में यह तथ्य स्थापित होता है कि किसी अधिकारी, कर्मचारी अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा जानबूझकर तथ्य छिपाए गए, अपूर्ण अथवा भ्रामक जानकारी के आधार पर अभिलेख तैयार कराया गया अथवा सभी वैध उत्तराधिकारियों को विधिसम्मत अवसर प्रदान नहीं किया गया, तो यह गंभीर प्रशासनिक अनियमितता होगी।

अतः न्यायोचित होगा कि संपूर्ण प्रकरण की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारी, कर्मचारी अथवा अन्य संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध प्रचलित नियमों के अनुसार विभागीय एवं विधिक कार्यवाही की जाए।

12. न्यायहित में अंतरिम संरक्षण (Interim Protection)

चूँकि वर्तमान विवाद केवल अभिलेखीय त्रुटि तक सीमित नहीं है, बल्कि संयुक्त सह-स्वामियों के वैधानिक अधिकारों से संबंधित है, इसलिए अंतिम निर्णय होने तक यथास्थिति बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

अतः निवेदन है कि संबंधित उप-पंजीयक, तहसीलदार, ग्राम पंचायत तथा अन्य सक्षम अधिकारियों को निर्देशित किया जाए कि जांच एवं अंतिम निर्णय होने तक उक्त संपत्ति के संबंध में—

- विक्रय,
- रजिस्ट्री,
- नामांतरण,
- हस्तांतरण,
- बंधक,
- ऋण,
- विभाजन अथवा
- अन्य किसी भी प्रकार की स्वामित्व संबंधी कार्यवाही न की जाए तथा यथास्थिति बनाए रखी जाए, जिससे किसी भी पक्ष को अपूरणीय क्षति न पहुँचे।

13. प्रार्थना (Prayer)

उपरोक्त तथ्यों, उपलब्ध अभिलेखों तथा विधिक स्थिति के आधार पर आपसे सविनय प्रार्थना है कि न्यायहित में निम्नलिखित आदेश पारित करने की कृपा करें—

1. स्वामित्व योजना अंतर्गत प्रकरण क्रमांक 0863/अ-3/2020-21 की संपूर्ण एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए।

2. जांच के दौरान उपलब्ध समस्त राजस्व अभिलेख, फौती नामांतरण, पारिवारिक बंटवारा, न्यायालयीन अभिलेख तथा अन्य संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण किया जाए।

3. प्लॉट क्रमांक 32, आबादी खसरा क्रमांक 273, ग्राम मोड़का के स्वामित्व अभिलेख एवं प्रॉपर्टी कार्ड में हुई त्रुटि का सुधार कर स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के सभी प्रथम श्रेणी के वैध उत्तराधिकारियों के नाम संयुक्त सह-स्वामी के रूप में दर्ज किए जाएँ।

4. अंतिम निर्णय होने तक उक्त संपत्ति के संबंध में किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री, विक्रय, नामांतरण, हस्तांतरण, बंधक, ऋण, विभाजन अथवा अन्य स्वामित्व संबंधी कार्यवाही पर तत्काल रोक लगाने के आदेश जारी किए जाएँ तथा संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना प्रेषित की जाए।

5. यदि जांच में किसी अधिकारी, कर्मचारी अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा तथ्य छिपाने, गलत जानकारी देने अथवा विधि-विरुद्ध अभिलेख तैयार कराने का दोष पाया जाए, तो उनके विरुद्ध प्रचलित नियमों के अनुसार विभागीय एवं विधिक कार्यवाही की जाए।

6. इस प्रकरण में पारित आदेश की प्रमाणित प्रति आवेदक को उपलब्ध कराई जाए।
7. यह भी आदेशित करने की कृपा की जाए कि जांच पूर्ण होने तथा अंतिम निर्णय पारित होने तक संबंधित उप-पंजीयक, तहसीलदार, ग्राम पंचायत एवं अन्य सक्षम अधिकारियों को निर्देशित किया जाए कि विवादित संपत्ति के संबंध में किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री, नामांतरण, विभाजन, बंधक, ऋण अथवा अन्य स्वामित्व संबंधी कार्यवाही न की जाए तथा वर्तमान स्थिति (Status Quo) यथावत बनाए रखी जाए।

14. उपसंहार

महोदय, प्रस्तुत प्रकरण किसी निजी विवाद को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट प्रशासनिक एवं अभिलेखीय त्रुटि के सुधार का विनम्र निवेदन है। आवेदक का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के सभी वैध प्रथम श्रेणी उत्तराधिकारियों के विधिक एवं संवैधानिक अधिकारों का संरक्षण हो तथा सरकारी अभिलेख वास्तविक एवं विधिसम्मत स्थिति के अनुरूप संशोधित किए जाएँ।

आवेदक का उद्देश्य किसी वैध उत्तराधिकारी के अधिकारों को चुनौती देना नहीं है, बल्कि केवल यह सुनिश्चित करना है कि स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया की पैतृक संपत्ति के संबंध में शासकीय अभिलेख वास्तविक विधिक स्थिति के अनुरूप संशोधित हों तथा सभी वैध सह-स्वामियों के अधिकार समान रूप से संरक्षित रहें। न्यायहित, जनहित तथा विधि के शासन की भावना से इस अभ्यावेदन पर शीघ्र एवं निष्पक्ष निर्णय किया जाना अपेक्षित है।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपका कार्यालय निष्पक्षता, प्राकृतिक न्याय, विधि के शासन तथा सभी पक्षों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा करते हुए इस प्रकरण में न्यायोचित निर्णय प्रदान करेगा।

सधन्यवाद।

आवेदक

(अरविन्द सिंह सिसोदिया)
पुत्र स्व. श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया
मूल निवासी – ग्राम मोड़का, तहसील बमोरी, जिला गुना (म.प्र.)
वर्तमान पता – बेकरी के सामने, राधाकृष्ण मंदिर रोड, डडवाड़ा, कोटा जंक्शन, राजस्थान – 324002
मोबाइल – 9414180151

संलग्नक

1. स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया का मृत्यु प्रमाण-पत्र।
2. सभी वैध उत्तराधिकारियों का विवरण।
3. फौती नामांतरण आदेश की प्रति।
4. कृषि भूमि के पारिवारिक बंटवारा आदेश की प्रति।
5. सक्सेशन संबंधी न्यायालयीन अभिलेख/आदेश की प्रति।
6. स्वामित्व योजना का प्रॉपर्टी कार्ड एवं संबंधित अभिलेख।
7. पूर्व में प्रस्तुत आपत्तियों एवं आवेदनों की प्रतियाँ।
8. अन्य आवश्यक दस्तावेज।

प्रतिलिपि, आवश्यक कार्यवाही हेतु—

1. उपखण्ड अधिकारी, गुना।
2. तहसीलदार, बमोरी, जिला गुना।
3. संबंधित नायब तहसीलदार।
4. संबंधित राजस्व निरीक्षक।
5. संबंधित हल्का पटवारी।


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दिनांक : 15 जुलाई 2026

सेवा में,

माननीय जिला कलेक्टर महोदय
कलेक्ट्रेट परिसर, जिला गुना (मध्य प्रदेश)

विषय : स्वामित्व योजना अंतर्गत प्रकरण क्रमांक 0863/अ-3/2020-21 में ग्राम मोड़का, पटवारी हल्का क्रमांक 64 सूजाखेड़ी, तहसील बमोरी, जिला गुना ( मप्र ) स्थित प्लॉट क्रमांक 32, आबादी भूमि खसरा क्रमांक 273 की पैतृक आवासीय संपत्ति के स्वामित्व अभिलेख एवं प्रॉपर्टी कार्ड में हुई गंभीर विधिक एवं तथ्यात्मक त्रुटि का सुधार कर स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के समस्त प्रथम श्रेणी के वैध उत्तराधिकारियों के नाम संयुक्त सह-स्वामी के रूप में दर्ज किए जाने तथा अंतिम निर्णय तक उक्त संपत्ति के संबंध में किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री, नामांतरण, हस्तांतरण, बंधक, ऋण, विभाजन अथवा अन्य स्वामित्व संबंधी कार्यवाही पर रोक लगाए जाने बाबत।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैं, अरविन्द सिंह सिसोदिया, पुत्र स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया, मूल निवासी एवं कृषक, ग्राम मोड़का, तहसील बमोरी, जिला गुना (मध्य प्रदेश) । मैं स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया का ज्येष्ठ पुत्र तथा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अंतर्गत प्रथम श्रेणी का वैध उत्तराधिकारी एवं विवादित आवासीय संपत्ति का संयुक्त सह-स्वामी हूँ। यह अभ्यावेदन आपके समक्ष किसी निजी विवाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि स्वामित्व योजना के अंतर्गत तैयार किए गए शासकीय अभिलेखों में हुई गंभीर प्रशासनिक, तथ्यात्मक एवं विधिक त्रुटि के सुधार तथा सभी वैध उत्तराधिकारियों के संवैधानिक एवं वैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है।

1. स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया, पुत्र स्वर्गीय श्री समंदर सिंह सिसोदिया, ग्राम मोड़का के प्रतिष्ठित कृषक एवं निवासी थे। उनके स्वामित्व एवं कब्जे में ग्राम मोड़का, ग्राम पंचायत सूजाखेड़ी, पटवारी हल्का क्रमांक 64, तहसील बमोरी, जिला गुना स्थित आबादी भूमि के खसरा क्रमांक 273 का प्लॉट क्रमांक 32 था। यह लगभग 2175 वर्गमीटर क्षेत्रफल की अत्यंत मूल्यवान पैतृक आवासीय संपत्ति है, जिसमें दो पक्के दो-मंजिला किलेनुमा आवासीय भवन, अनेक स्टोरेज भवन, पेयजल हेतु कुआँ, विशाल खुला आँगन तथा चारों ओर ऊँची एवं मजबूत चारदीवारी से सुरक्षित आवासीय परिसर स्थित है। वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार यह करोड़ों रुपये मूल्य की पैतृक संपत्ति है, जो कई पीढ़ियों से परिवार के स्वामित्व एवं कब्जे में है।

2. उक्त संपत्ति स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया को उनकी माता श्रीमती कमर बाई उर्फ कुंवर बाई से प्राप्त हुई थी। स्व कमर बाई को यह आवासीय परिसर उनके, ग्राम मोड़का के जागीरदार पिता से प्राप्त हुई है। परिवार की अनेक पीढ़ियों का जीवन इस आवासीय परिसर से जुड़ा रहा है। स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के समस्त पुत्र-पुत्रियों का जन्म, पालन-पोषण, शिक्षा, विवाह एवं पारिवारिक सामाजिक कार्यक्रम इसी पैतृक आवास में सम्पन्न हुए। आज भी यह संपत्ति समस्त उत्तराधिकारियों की पैतृक पहचान एवं पारिवारिक विरासत का है।

3. दिनांक 20 दिसम्बर 2016 को स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया का बिना वसीयत (Intestate) के निधन हो गया। उनकी निर्वसीयत मृत्यु के साथ ही हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8, धारा 9 तथा अनुसूची के अनुसार उनकी समस्त चल-अचल संपत्तियों पर उनके सभी प्रथम श्रेणी के वैध उत्तराधिकारियों का समान एवं संयुक्त अधिकार स्वतः स्थापित हो गया। यह अधिकार विधि द्वारा प्राप्त अधिकार है, जो किसी प्रशासनिक आदेश, सर्वेक्षण, प्रॉपर्टी कार्ड अथवा राजस्व अभिलेख पर निर्भर नहीं करता। 

अतः उनकी प्रत्येक संपत्ति, चाहे वह कृषि भूमि हो अथवा आबादी क्षेत्र की आवासीय संपत्ति, सभी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों की संयुक्त सह-स्वामित्व वाली संपत्ति बन गई।

4. स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के प्रथम श्रेणी के कुल आठ वैध उत्तराधिकारी हैं— (1) श्रीमती कमला देवी (धर्मपत्नी), (2) अरविन्द सिंह सिसोदिया (ज्येष्ठ पुत्र), (3) स्वर्गीय हेमंत सिंह (पुत्र), जिनके निधन उपरांत उनके विधिक उत्तराधिकारी श्रीमती साधना सिंह, रणविजय सिंह एवं विजेन्द्र सिंह हैं, (4) विश्वजीत सिंह (पुत्र), (5) सत्यजीत सिंह (पुत्र), (6) प्रशांत सिंह (पुत्र), (7) सिद्धार्थ सिंह (पुत्र) तथा (8) वसुंधरा सिंह (पुत्री)। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उपर्युक्त सभी व्यक्तियों का उक्त पैतृक आवासीय संपत्ति पर समान, संयुक्त एवं अविभाजित अधिकार है। इनमें से मात्र तीन व्यक्तियों को सम्पूर्ण संपत्ति का स्वामी मान लेना या शेष वैध उत्तराधिकारियों को अभिलेखों से वंचित कर देना विधि की दृष्टि से पूर्णतः असंगत एवं अवैध है।

5. यह उल्लेखनीय है कि स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के निधन के पश्चात उनकी कृषि भूमि का फौती नामांतरण सक्षम राजस्व अधिकारी द्वारा सभी वैध उत्तराधिकारियों के नाम विधिवत कर दिया गया। तत्पश्चात ग्राम मोड़का स्थित कृषि भूमि का पारिवारिक बंटवारा भी सक्षम राजस्व न्यायालय द्वारा सभी वैध उत्तराधिकारियों के अधिकारों को स्वीकार करते हुए किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त उत्तराधिकार संबंधी न्यायालयीन कार्यवाहियों में भी सभी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों को विधिक उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार किया गया है। अर्थात् शासन के अन्य सभी राजस्व अभिलेखों एवं न्यायालयीन अभिलेखों में स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के सभी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों के अधिकार निर्विवाद रूप से मान्य हैं।

6. इन परिस्थितियों में यह अत्यंत आश्चर्य एवं गंभीर चिंता का विषय है कि उसी स्वर्गीय व्यक्ति की उक्त पैतृक आवासीय संपत्ति के संबंध में स्वामित्व योजना के अंतर्गत तैयार किए गए प्रॉपर्टी कार्ड एवं स्वामित्व अभिलेख में केवल तीन व्यक्तियों—श्रीमती कमला देवी, सत्यजीत सिंह एवं सिद्धार्थ सिंह—के नाम दर्ज कर दिए गए, जबकि अन्य वैध प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों के नाम पूर्णतः छोड़ दिए गए। यह न केवल उपलब्ध राजस्व अभिलेखों एवं न्यायालयीन अभिलेखों के प्रतिकूल है, बल्कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के स्पष्ट प्रावधानों तथा स्वामित्व योजना के उद्देश्य के भी विपरीत है। यह प्रशासनिक अभिलेखों के मध्य गंभीर असंगति (Administrative Inconsistency) का उदाहरण है, जिसकी निष्पक्ष जांच एवं तत्काल सुधार किया जाना न्यायहित में अत्यंत आवश्यक है।

7. भारत सरकार द्वारा प्रारंभ की गई स्वामित्व योजना का उद्देश्य ग्रामीण आबादी क्षेत्रों में स्थित संपत्तियों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर उनका अभिलेखीकरण करना तथा वास्तविक धारकों को संपत्ति संबंधी अभिलेख उपलब्ध कराना था। इस योजना का उद्देश्य किसी व्यक्ति को नया स्वामित्व प्रदान करना, किसी वैध सह-स्वामी के अधिकारों का निर्धारण करना अथवा किसी उत्तराधिकारी के विधिक अधिकारों का हनन करना कभी नहीं रहा। शासन के दिशा-निर्देशों का मूल उद्देश्य यह था कि सर्वेक्षण के समय अधिकतम तथ्य संकलित किए जाएँ, कोई भी वास्तविक धारक अथवा सह-स्वामी अभिलेख से वंचित न रहे तथा यदि किसी संपत्ति के संबंध में विवाद अथवा संयुक्त स्वामित्व की स्थिति हो तो उसका भी समुचित उल्लेख अभिलेखों में किया जाए।

8. प्रस्तुत प्रकरण में प्रतीत होता है कि स्वामित्व योजना के मूल उद्देश्य, शासन के दिशा-निर्देशों तथा विधिक प्रावधानों की उपेक्षा करते हुए वास्तविक स्थिति के विपरीत अभिलेख तैयार किए गए। परिणामस्वरूप करोड़ों रुपये मूल्य की पैतृक किलेनुमा आवासीय संपत्ति, जिस पर विधि अनुसार आठ प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों का संयुक्त सह-स्वामित्व स्थापित है, उसके अभिलेख में केवल तीन व्यक्तियों के नाम अंकित कर दिए गए। यह त्रुटि केवल एक साधारण अभिलेखीय भूल नहीं कही जा सकती, क्योंकि इससे शेष वैध उत्तराधिकारियों के संपत्ति संबंधी अधिकार प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं तथा भविष्य में गंभीर न्यायिक एवं प्रशासनिक विवाद उत्पन्न होने की संभावना भी बढ़ गई है। इसलिए इस प्रकरण की तथ्यात्मक एवं विधिक दृष्टि से स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं गहन जांच किया जाना अत्यंत आवश्यक है।

9. स्वामित्व योजना अंतर्गत ग्राम मोड़का में किए गए सर्वेक्षण एवं अभिलेखीकरण की प्रक्रिया का परीक्षण करने पर प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि आवश्यक विधिक सावधानियों तथा शासन द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया गया। उपलब्ध प्रॉपर्टी कार्ड एवं स्वामित्व अभिलेख में स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के समस्त प्रथम श्रेणी के वैध उत्तराधिकारियों के स्थान पर केवल श्रीमती कमला देवी, श्री सत्यजीत सिंह एवं श्री सिद्धार्थ सिंह के नाम अंकित किए गए हैं, जबकि अन्य वैध सह-स्वामियों के नाम पूर्णतः विलोपित कर दिए गए। यह स्थिति न केवल वास्तविक तथ्यों के प्रतिकूल है, बल्कि उपलब्ध राजस्व अभिलेखों, न्यायालयीन अभिलेखों तथा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के स्पष्ट प्रावधानों से भी असंगत है।

10. प्रस्तुत प्रकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि सर्वेक्षण के समय किसी भी स्तर पर अन्य वैध सह-स्वामियों को न तो कोई पूर्व सूचना दी गई, न उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की गई, न ही उनसे किसी प्रकार का कथन या सहमति प्राप्त की गई। उन्हें यह अवसर भी प्रदान नहीं किया गया कि यदि सर्वेक्षण अथवा अभिलेखीकरण में कोई त्रुटि हो तो वे समय रहते अपनी आपत्ति प्रस्तुत कर सकें। अंतिम प्रकाशन के संबंध में भी प्रभावी सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई। फलस्वरूप अनेक वैध उत्तराधिकारी अपने वैधानिक अधिकारों के संरक्षण हेतु निर्धारित प्रक्रिया में सहभागी ही नहीं हो सके। ऐसी स्थिति प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों के प्रतिकूल है।

11. भारतीय विधि व्यवस्था का एक स्थापित एवं सर्वमान्य सिद्धांत है कि किसी भी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाला निर्णय उसे सुने बिना नहीं लिया जा सकता। इस सिद्धांत को Audi Alteram Partem अर्थात् "दूसरे पक्ष को भी सुनो" के नाम से जाना जाता है। यद्यपि स्वामित्व योजना के अंतर्गत किया गया सर्वेक्षण न्यायिक कार्यवाही नहीं है, तथापि जब उसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति के संपत्ति संबंधी अधिकार अभिलेखों में प्रभावित होते हों, तब प्रशासनिक अधिकारियों पर यह दायित्व और अधिक बढ़ जाता है कि वे निष्पक्ष, पारदर्शी एवं न्यायसंगत प्रक्रिया अपनाएँ। प्रस्तुत प्रकरण में ऐसा नहीं किया गया, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन हुआ है। सरकार एक जिम्मेदार संस्था है इसलिए उसे सावचेत संस्था माना जाता है और उसे अन्याय रोकने हेतु सतर्क रहना चाहिए था।

12. स्वामित्व योजना का उद्देश्य केवल ग्रामीण आबादी क्षेत्रों की संपत्तियों का सर्वेक्षण, सीमांकन एवं अभिलेखीकरण करना है। इस योजना के अंतर्गत गठित किसी भी समिति, सर्वेक्षण दल अथवा स्थानीय अधिकारी को किसी व्यक्ति का स्वामित्व निर्धारित करने, वैध उत्तराधिकारी को संपत्ति से वंचित करने अथवा उत्तराधिकार संबंधी विवाद का अंतिम निर्णय करने का कोई अधिकार प्रदान नहीं किया गया है। यदि किसी संपत्ति पर एक से अधिक व्यक्तियों का संयुक्त स्वामित्व अथवा उत्तराधिकार विद्यमान हो तो सर्वेक्षण अभिलेखों में उसी वास्तविक स्थिति का उल्लेख किया जाना अपेक्षित था। अतः आठ वैध संयुक्त सह-स्वामियों की संपत्ति को मात्र तीन व्यक्तियों के नाम दर्ज करना स्वामित्व योजना की मूल भावना एवं शासन के दिशा-निर्देशों के प्रतिकूल है।

13. भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को देश के किसी भी भाग में निवास करने, रोजगार अथवा व्यवसाय करने का अधिकार प्रदान करता है। कोई व्यक्ति यदि रोजगार, शिक्षा अथवा अन्य कारणों से अपने मूल निवास स्थान से बाहर निवास करता है, तो केवल इसी आधार पर उसके पैतृक संपत्ति संबंधी अधिकार अथवा उत्तराधिकार समाप्त नहीं हो जाते। संविधान तथा प्रचलित विधि ऐसे अधिकारों का पूर्ण संरक्षण प्रदान करते हैं। अतः यदि किसी उत्तराधिकारी का निवास वर्तमान में अन्य स्थान पर है, तो यह किसी भी स्थिति में उसके सह-स्वामित्व अथवा उत्तराधिकार के अधिकारों को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता।

14. संविधान का अनुच्छेद 14 प्रत्येक नागरिक को विधि के समक्ष समानता तथा विधि के समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है। जब स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के सभी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी विधि की दृष्टि में समान अधिकार रखते हैं, तब उनमें से केवल तीन व्यक्तियों के नाम अभिलेख में अंकित कर शेष वैध उत्तराधिकारियों को वंचित करना समानता के संवैधानिक सिद्धांत के प्रतिकूल है। इसी प्रकार संविधान का अनुच्छेद 300A प्रत्येक व्यक्ति की संपत्ति को विधिक संरक्षण प्रदान करता है तथा यह व्यवस्था करता है कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल विधि द्वारा ही वंचित किया जा सकता है। किसी त्रुटिपूर्ण प्रशासनिक अभिलेख के माध्यम से वैध सह-स्वामियों के अधिकारों को सीमित करना इस संवैधानिक संरक्षण की भावना के भी विपरीत है।

15. यह भी उल्लेखनीय है कि किसी भी समिति का अध्यक्ष, सचिव अथवा सदस्य अपने समक्ष विचाराधीन विषय के संबंध में सही एवं पूर्ण जानकारी प्रस्तुत करने के लिए उत्तरदायी होता है। यदि कोई व्यक्ति तथ्य जानते हुए भी उन्हें छिपाता है अथवा गलत, अपूर्ण या भ्रामक जानकारी देकर निर्णय को प्रभावित करता है, तो उसका यह कृत्य गंभीर प्रशासनिक दायित्व उत्पन्न करता है तथा परिस्थितियों के अनुसार विधिक उत्तरदायित्व का विषय भी बन सकता है। प्रशासनिक निर्णय सदैव सत्य एवं पूर्ण तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। जिसका उपरोक्त निर्णय में स्पष्ट अभाव है।

16. प्रस्तुत प्रकरण में यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है कि श्री सत्यजीत सिंह ग्राम पंचायत सूजाखेड़ी के पूर्व सरपंच तथा वर्तमान उपसरपंच हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर गठित समिति के अध्यक्ष एवं सचिव सहित समिति के सदस्य तथा हल्का पटवारी सभी स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के परिवार एवं उनके सभी उत्तराधिकारियों से भली-भाँति परिचित हैं। सभी उत्तराधिकारी ग्राम मोड़का के कृषक हैं तथा राजस्व अभिलेखों में उनके नाम पूर्व से दर्ज हैं। ऐसी स्थिति में यह विश्वास करना कठिन है कि आठ वैध उत्तराधिकारियों के स्थान पर केवल तीन व्यक्तियों के नाम दर्ज होना मात्र साधारण मानवीय भूल का परिणाम है। प्रथम दृष्टया यह प्रकरण गंभीर लापरवाही, तथ्य छिपाने, अपूर्ण जानकारी प्रस्तुत करने अथवा अन्य प्रशासनिक अनियमितता की संभावना को इंगित करता है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

17. यदि जांच में यह स्थापित होता है कि किसी अधिकारी, कर्मचारी, जनप्रतिनिधि अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा जानबूझकर तथ्य छिपाए गए, निर्णय समिति को भ्रामक अथवा अपूर्ण जानकारी दी गई, उपलब्ध राजस्व अभिलेखों की उपेक्षा की गई या सभी वैध उत्तराधिकारियों को सुनवाई का अवसर दिए बिना अभिलेख तैयार किए गए, तो ऐसी कार्यवाही न केवल शासन के दिशा-निर्देशों के विपरीत है , बल्कि गंभीर प्रशासनिक अनियमितता भी मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध प्रचलित नियमों के अनुसार विभागीय तथा आवश्यकतानुसार विधिक कार्यवाही किया जाना न्यायोचित होगा।

18. प्रस्तुत प्रकरण केवल एक व्यक्ति के अधिकार का प्रश्न नहीं है, बल्कि सरकारी अभिलेखों की शुद्धता, प्रशासनिक पारदर्शिता तथा विधि के शासन से जुड़ा हुआ विषय है। यदि स्वामित्व योजना जैसे महत्वपूर्ण अभिलेखों में उपलब्ध राजस्व एवं न्यायालयीन अभिलेखों की उपेक्षा कर अपूर्ण अथवा त्रुटिपूर्ण अभिलेख तैयार किए जाएँ और उनका समय रहते सुधार न किया जाए, तो इससे न केवल संबंधित नागरिकों के अधिकार प्रभावित होंगे, बल्कि शासन की अभिलेखीय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अतः न्यायहित, जनहित तथा विधि के शासन की भावना से इस संपूर्ण प्रकरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं तथ्यपरक जांच कर त्रुटिपूर्ण अभिलेखों का शीघ्र सुधार किया जाना अत्यंत आवश्यक है।

19. वर्तमान प्रकरण में स्वामित्व योजना के अंतर्गत तैयार किए गए त्रुटिपूर्ण स्वामित्व अभिलेख एवं प्रॉपर्टी कार्ड के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि करोड़ों रुपये मूल्य की उक्त पैतृक आवासीय संपत्ति के संबंध में वास्तविक विधिक स्थिति शासकीय अभिलेखों में प्रतिबिंबित नहीं हो रही है। यदि इस त्रुटिपूर्ण अभिलेख के आधार पर भविष्य में किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री, विक्रय, उपहार, नामांतरण, बंधक, ऋण, विभाजन अथवा अन्य स्वामित्व संबंधी कार्यवाही संपन्न होती है, तो शेष वैध संयुक्त सह-स्वामियों के अधिकारों को अपूरणीय क्षति पहुँचेगी तथा अनावश्यक एवं दीर्घकालीन न्यायिक विवाद उत्पन्न होंगे। ऐसी स्थिति में न केवल वैध उत्तराधिकारियों के संपत्ति संबंधी अधिकार प्रभावित होंगे, बल्कि प्रशासनिक अभिलेखों की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न उत्पन्न होगा।

20. यह भी उल्लेखनीय है कि स्वामित्व योजना के अंतर्गत जारी प्रॉपर्टी कार्ड स्वयं स्वामित्व का स्रोत (Document of Title) नहीं है। इसका उद्देश्य केवल विद्यमान तथ्यात्मक एवं अभिलेखीय स्थिति का दस्तावेजीकरण करना है। यदि किसी प्रशासनिक त्रुटि, अपूर्ण जानकारी अथवा गलत अभिलेखीकरण के कारण वास्तविक सह-स्वामियों के नाम छूट गए हों, तो सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी का यह दायित्व है कि उपलब्ध अभिलेखों, लागू विधि तथा वास्तविक स्थिति के आधार पर त्रुटि का शीघ्र निराकरण करे। किसी त्रुटिपूर्ण अभिलेख को यथावत बनाए रखना न्याय, निष्पक्षता तथा सुशासन की भावना के प्रतिकूल होगा।

21. प्रस्तुत प्रकरण के तथ्यों से प्रथम दृष्टया यह भी प्रतीत होता है कि सर्वेक्षण एवं अभिलेखीकरण की प्रक्रिया के दौरान उपलब्ध राजस्व अभिलेखों, फौती नामांतरण, पारिवारिक बंटवारा, न्यायालयीन अभिलेखों तथा वास्तविक संयुक्त कब्जे की स्थिति का समुचित परीक्षण नहीं किया गया। यदि सक्षम अधिकारी इन अभिलेखों का परीक्षण करते, तो स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के सभी प्रथम श्रेणी के वैध उत्तराधिकारियों के नाम अभिलेख में अंकित किए जाने चाहिए थे। अतः उपलब्ध दस्तावेजों की उपेक्षा कर तैयार किया गया वर्तमान अभिलेख विधिक एवं तथ्यात्मक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण  है।

22. न्याय के हित में यह भी आवश्यक है कि इस प्रकरण की जांच केवल अभिलेखों तक सीमित न रहकर संपूर्ण प्रक्रिया की निष्पक्ष समीक्षा के रूप में की जाए। यह परीक्षण किया जाना चाहिए कि सर्वेक्षण के समय किस आधार पर केवल तीन व्यक्तियों के नाम दर्ज किए गए, किन अभिलेखों पर विश्वास किया गया, अन्य वैध उत्तराधिकारियों के नाम क्यों नहीं लिए गए, क्या सभी संबंधित पक्षों को सूचना एवं अवसर प्रदान किया गया था, तथा क्या किसी अधिकारी, कर्मचारी अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा जानबूझकर अपूर्ण अथवा भ्रामक जानकारी प्रस्तुत की गई थी। यदि जांच में ऐसी कोई अनियमितता स्थापित होती है तो उसके लिए उत्तरदायी व्यक्तियों के विरुद्ध प्रचलित नियमों के अनुसार विभागीय एवं विधिक कार्यवाही किया जाना भी आवश्यक होगा, जिससे भविष्य में ऐसी त्रुटियों की पुनरावृत्ति न हो।

23. चूँकि यह विवाद संयुक्त सह-स्वामित्व एवं वैध उत्तराधिकारियों के विधिक अधिकारों से संबंधित है, इसलिए अंतिम निर्णय होने तक यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखना न्यायहित में अत्यंत आवश्यक है। यदि जांच लंबित रहते हुए किसी प्रकार की रजिस्ट्री, विक्रय, नामांतरण, बंधक, ऋण, विभाजन अथवा अन्य स्वामित्व संबंधी कार्यवाही की अनुमति दी जाती है, तो इससे न केवल शेष वैध उत्तराधिकारियों के अधिकार गंभीर रूप से प्रभावित होंगे, बल्कि जांच की निष्पक्षता भी व्यर्थ हो जाएगी। अतः संबंधित उप-पंजीयक, तहसीलदार, ग्राम पंचायत, राजस्व अधिकारियों तथा अन्य सक्षम प्राधिकारियों को निर्देशित किया जाना आवश्यक है कि अंतिम निर्णय होने तक उक्त संपत्ति के संबंध में किसी भी प्रकार का स्वामित्व संबंधी लेन-देन अथवा अभिलेखीय परिवर्तन न किया जाए।

24. उपर्युक्त तथ्यों, उपलब्ध अभिलेखों, लागू विधिक प्रावधानों एवं संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर आपसे सविनय निवेदन है कि न्यायहित में निम्नलिखित आदेश पारित करने की कृपा करें—

(क) स्वामित्व योजना अंतर्गत प्रकरण क्रमांक 0863/अ-3/2020-21 की स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच सक्षम अधिकारी से कराई जाए।

(ख) जांच के दौरान उपलब्ध समस्त राजस्व अभिलेख, फौती नामांतरण आदेश, पारिवारिक बंटवारा आदेश, न्यायालयीन उत्तराधिकार अभिलेख, स्वामित्व योजना के मूल सर्वे अभिलेख, समिति की कार्यवाही तथा अन्य संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण किया जाए।

(ग) ग्राम मोड़का, खसरा क्रमांक 273, प्लॉट क्रमांक 32 के स्वामित्व अभिलेख एवं प्रॉपर्टी कार्ड में हुई त्रुटि का सुधार कर स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया के सभी प्रथम श्रेणी के वैध उत्तराधिकारियों के नाम संयुक्त सह-स्वामी के रूप में दर्ज किए जाएँ।

(घ) जांच एवं अंतिम निर्णय होने तक संबंधित उप-पंजीयक, तहसीलदार, ग्राम पंचायत, राजस्व अधिकारियों एवं अन्य सक्षम प्राधिकारियों को निर्देशित किया जाए कि उक्त संपत्ति के संबंध में किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री, विक्रय, उपहार, नामांतरण, हस्तांतरण, बंधक, ऋण, विभाजन अथवा अन्य स्वामित्व संबंधी कार्यवाही न की जाए तथा वर्तमान स्थिति (Status Quo) यथावत बनाए रखी जाए।

(ङ) यदि जांच में यह स्थापित हो कि किसी अधिकारी, कर्मचारी अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा तथ्य छिपाए गए, गलत अथवा भ्रामक जानकारी देकर अभिलेख तैयार कराए गए अथवा विधि एवं शासन के दिशा-निर्देशों की अवहेलना की गई, तो उनके विरुद्ध प्रचलित नियमों के अनुसार विभागीय एवं विधिक कार्यवाही की जाए।

(च) इस प्रकरण में पारित अंतिम आदेश की प्रमाणित प्रति आवेदक को उपलब्ध कराई जाए।

25. महोदय, प्रस्तुत प्रकरण किसी वैध उत्तराधिकारी के अधिकारों को चुनौती देने अथवा पारिवारिक विवाद को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं है। आवेदक का एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया की पैतृक आवासीय संपत्ति के संबंध में शासकीय अभिलेख वास्तविक विधिक स्थिति के अनुरूप संशोधित हों तथा सभी प्रथम श्रेणी के वैध उत्तराधिकारियों के अधिकार समान रूप से संरक्षित रहें। जब शासन के अन्य सभी अभिलेख, राजस्व न्यायालयों के आदेश तथा न्यायालयीन अभिलेख सभी उत्तराधिकारियों के अधिकारों को स्वीकार करते हैं, तब केवल स्वामित्व योजना के अभिलेख में भिन्न स्थिति का बने रहना न्याय, विधि के शासन तथा सुशासन की भावना के अनुकूल नहीं है।

26. अतः आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि न्यायहित, जनहित, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों, संवैधानिक मूल्यों तथा विधि के शासन की भावना को दृष्टिगत रखते हुए प्रस्तुत अभ्यावेदन पर सहानुभूतिपूर्वक एवं निष्पक्षतापूर्वक विचार कर आवश्यक आदेश पारित करने की कृपा करें, जिससे सरकारी अभिलेख वास्तविक एवं विधिसम्मत स्थिति के अनुरूप संशोधित हो सकें तथा भविष्य में किसी भी प्रकार के अनावश्यक विवाद एवं अपूरणीय क्षति की संभावना समाप्त हो सके।

सधन्यवाद।

भवदीय,

(अरविन्द सिंह सिसोदिया)
पुत्र स्व. श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया
मूल निवासी – ग्राम मोड़का, तहसील बमोरी, जिला गुना (म.प्र.)
वर्तमान पता – बेकरी के सामने, राधाकृष्ण मंदिर रोड, डडवाड़ा, कोटा जंक्शन, राजस्थान – 324002
मोबाइल – 9414180151

संलग्नक :

1. स्वर्गीय श्री भूपेंद्र सिंह सिसोदिया का मृत्यु प्रमाण-पत्र।
2. सभी प्रथम श्रेणी के वैध उत्तराधिकारियों का विवरण।
3. फौती नामांतरण आदेश की प्रमाणित प्रति।
4. कृषि भूमि के पारिवारिक बंटवारा आदेश की प्रति।
5. उत्तराधिकार (Succession) संबंधी न्यायालयीन अभिलेख/आदेश।
6. स्वामित्व योजना का प्रॉपर्टी कार्ड एवं संबंधित अभिलेख।
7. पूर्व में प्रस्तुत आपत्तियों एवं आवेदनों की प्रतियाँ।
8. अन्य संबंधित दस्तावेज।

प्रतिलिपि :

1. उपखण्ड अधिकारी, गुना।
2. तहसीलदार, बमोरी, जिला गुना।
3. संबंधित नायब तहसीलदार।
4. संबंधित राजस्व निरीक्षक।
5. संबंधित हल्का पटवारी।





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