जिद्दी वंशवाद से मुक्ति का अभियान है राजनीतिक दलों का विघटन - अरविन्द सिसोदिया


जिद्दी वंशवाद से मुक्ति का अभियान है राजनीतिक दलों का विघटन - अरविन्द सिसोदिया 

भारतीय लोकतंत्र आज बदलाव के एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। हाल के वर्षों में विभिन्न राजनीतिक दलों में हुए बड़े और अभूतपूर्व विघटन (टूट) केवल सत्ता की सामान्य लड़ाई या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के परिणाम नहीं हैं। गहराई से विश्लेषण करने पर यह साफ दिखाई देता है कि यह देश के राजनीतिक परिदृश्य को दशकों से जकड़े हुए 'जिद्दी वंशवाद' और 'व्यक्तिवादी सामंतशाही' के खिलाफ जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं का एक स्वतः स्फूर्त मुक्ति अभियान बन चुका है।
## विचारधारा बनाम पारिवारिक हित की जंग
आजादी के बाद भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा विचार-केंद्रित होने के बजाय व्यक्ति-केंद्रित और परिवार-केंद्रित होता चला गया। कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों में यह परंपरा बन गई कि पार्टी का सर्वोच्च पद, निर्णय लेने के अधिकार और यहाँ तक कि चुनावी टिकट भी केवल एक परिवार विशेष की जागीर बनकर रह गए। जमीन पर पसीना बहाने वाले, दिन-रात जनता के बीच रहने वाले समर्पित नेताओं की भूमिका केवल 'दरबारियों' जैसी सीमित कर दी गई।

दलों में हालिया टूट की क्रोनोलॉजी को देखें तो स्पष्ट होता है कि जब किसी दल का नेतृत्व अपने निजी या पारिवारिक हितों को साधने के लिए राष्ट्रहित की नीतियों से समझौता करने लगा, तब वैचारिक विभाजन अनिवार्य हो गया। आज का जनप्रतिनिधि और जागरूक कार्यकर्ता यह भली-भांति समझ चुका है कि उसकी जवाबदेही देश की जनता के प्रति है, न कि किसी एक परिवार की अगली पीढ़ी की राजनीतिक लॉन्चिंग के प्रति।

## क्षेत्रीय दलों में विद्रोह: जब योग्यता ने विशेषाधिकार को ललकारा
हाल के वर्षों में हुए प्रमुख राजनीतिक बिखराव इसी 'पारिवारिक तानाशाही' के खिलाफ जमीनी नेताओं का विद्रोह हैं:

* शिवसेना में हुआ ऐतिहासिक बिखराव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ बाल ठाकरे की विरासत को एक पारिवारिक जागीर की तरह चलाने और विचारधारा से समझौता करने के प्रयास के खिलाफ एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में जनप्रतिनिधियों ने बगावत का झंडा बुलंद किया।

* राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में शरद पवार द्वारा अपनी बेटी सुप्रिया सुले को उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाना और वर्षों से संगठन को सींचने वाले अजीत पवार की उपेक्षा करना पार्टी के दो फाड़ होने का मुख्य कारण बना।

* बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) का रामविलास पासवान के बाद बिखरना भी इसी बात का प्रमाण है कि वरिष्ठ नेताओं को केवल किसी वारिस के इशारों पर काम करना मंजूर नहीं था।

* पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर भी ममता बनर्जी द्वारा अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को नंबर दो बनाने और उत्तराधिकारी घोषित करने की नीति ने जमीनी नेताओं में भारी असंतोष पैदा किया, जिसके चलते संगठन में लगातार बिखराव देखा गया।

यह सभी उदाहरण एक ही पैटर्न की ओर इशारा करते हैं—जब तक पार्टी का संस्थापक सक्रिय रहता है, तब तक आंतरिक मतभेद दबे रहते हैं। लेकिन जैसे ही कमान योग्यता के बजाय 'वंश और विशेषाधिकार' को सौंपी जाती है, तो दल के भीतर वर्षों से मेहनत कर रहे नेताओं का धैर्य टूट जाता है।

## कांग्रेस का इतिहास: 'हाईकमान संस्कृति' और बिखराव की नींव
यदि देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस के इतिहास को देखें तो वहाँ भी विभाजनों की जड़ें इसी 'सत्ता के केंद्रीकरण' में रही हैं। 1907 का सूरत विभाजन जहाँ शुद्ध रूप से वैचारिक था, वहीं आजादी के बाद 1969 में इंदिरा गांधी बनाम सिंडिकेट की लड़ाई और 1978 में 'कांग्रेस (I)' का उदय पूरी तरह से संगठन पर एकाधिकार स्थापित करने की जंग थी। 1999 में शरद पवार द्वारा सोनिया गांधी के नेतृत्व को चुनौती देकर NCP का गठन करना हो, या फिर क्षेत्रीय स्तर पर ममता बनर्जी (TMC) और जगन मोहन रेड्डी (YSRCP) जैसे ताकतवर क्षत्रपों का अलग होना—इन सब के पीछे 'दिल्ली हाईकमान संस्कृति' द्वारा राज्यों के मजबूत और लोकप्रिय नेताओं को दरकिनार करने की जिद्दी प्रवृत्ति ही जिम्मेदार रही।

## लोकतंत्र का परिपक्व होना और सामंतशाही का अंत
यह राजनीतिक मंथन इस बात का शुभ संकेत है कि भारतीय लोकतंत्र अब परिपक्व हो रहा है। आज देश का मतदाता और जनप्रतिनिधि दोनों ही विकास, सुरक्षा और राष्ट्रीय गौरव जैसे मुद्दों पर अपनी प्राथमिकताएं तय कर रहे हैं। भावुकता या जातिगत समीकरणों के सहारे किसी एक परिवार की सत्ता को हमेशा के लिए बनाए रखना अब संभव नहीं रह गया है।

दलों का यह विघटन वास्तव में राजनीति के लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया है। राजा-महाराजाओं और राजनीतिक घरानों का प्रभाव कम होने से अब गरीब, सामान्य और मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले परिश्रमी नेताओं को नीति निर्धारण में मुख्य भूमिका मिल रही है।

## निष्कर्ष
लंबे समय तक वही राजनीतिक दल अस्तित्व में बने रह सकते हैं जो व्यक्ति-केंद्रित होने के बजाय विचार-केंद्रित और राष्ट्र-केंद्रित होंगे। राजनीतिक दलों में हो रही यह उथल-पुथल भारतीय राजनीति को 'वंश और विशेषाधिकार' के दलदल से निकालकर 'परिश्रम और परिणाम' के पथ पर अग्रसर कर रही है। यह विघटन किसी राजनीतिक अस्थिरता का संकेत नहीं, बल्कि जिद्दी वंशवाद की गुलामी से जनप्रतिनिधियों की स्वतंत्रता का एक महा-अभियान है।

यहाँ आपकी पूरी सोच, तर्कों और घटनाक्रमों को आपस में जोड़कर एक बेहद तीखा, तार्किक और प्रवाहमयी (रनिंग) लेख तैयार है, जो विषय के सभी कड़ियों को एक सूत्र में पिरोता है:
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जिद्दी वंशवाद से मुक्ति का अभियान है विपक्षी दलों का विघटन: अपरिपक्वता और अहंकार की बलि चढ़ता विपक्ष - अरविन्द सिसोदिया 

भारतीय लोकतंत्र आज बदलाव के एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। हाल के वर्षों में विपक्षी और क्षेत्रीय दलों में हुए बड़े बिखराव केवल सत्ता की सामान्य लड़ाई या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के परिणाम नहीं हैं। गहराई से विश्लेषण करने पर यह साफ दिखाई देता है कि यह देश के राजनीतिक परिदृश्य को दशकों से जकड़े हुए 'जिद्दी वंशवाद' और 'व्यक्तिवादी सामंतशाही' के खिलाफ जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं का एक स्वतः स्फूर्त मुक्ति अभियान बन चुका है।

## विचारधारा बनाम पारिवारिक हित की जंग
आजादी के बाद भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा विचार-केंद्रित होने के बजाय व्यक्ति-केंद्रित और परिवार-केंद्रित होता चला गया। कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों में यह परंपरा बन गई कि पार्टी का सर्वोच्च पद, निर्णय लेने के अधिकार और यहाँ तक कि चुनावी टिकट भी केवल एक परिवार विशेष की जागीर बनकर रह गए। जमीन पर पसीना बहाने वाले, दिन-रात जनता के बीच रहने वाले समर्पित नेताओं की भूमिका केवल 'दरबारी' जैसी सीमित कर दी गई।

दलों में हालिया टूट की क्रोनोलॉजी को देखें तो स्पष्ट होता है कि जब किसी दल का नेतृत्व अपने निजी या पारिवारिक हितों को साधने के लिए राष्ट्रहित की नीतियों से समझौता करने लगा, तब वैकालिक विभाजन अनिवार्य हो गया। आज का जनप्रतिनिधि और जागरूक कार्यकर्ता यह भली-भांति समझ चुका है कि उसकी जवाबदेही देश की जनता के प्रति है, न कि किसी एक परिवार की अगली पीढ़ी की राजनीतिक लॉन्चिंग के प्रति।

## 'हाईकमान' की अपरिपक्वता और जिद्दी रवैया: बिखराव की असली जड़
कांग्रेस और समूचे विपक्ष में इस बिखराव की शुरुआत तब से और तेज हो गई, जब से परोक्ष और अपरोक्ष रूप से राहुल गांधी को सर्वेसर्वा बना दिया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी की कार्यशैली और तौर-तरीके अक्सर एक 'जिद्दी बच्चे' और राजनीतिक नौसिखिए जैसे रहे हैं। इसका सबसे बड़ा और शर्मनाक उदाहरण साल 2013 में दिखा, जब उन्होंने प्रेस क्लब में अपनी ही सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लाए गए दागी नेताओं से जुड़े अध्यादेश को सार्वजनिक रूप से 'बकवास' कहकर फाड़ दिया था। इस एक घटना ने न केवल प्रधानमंत्री पद की गरिमा को तार-तार किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि पार्टी में संस्थागत व्यवस्था और वरिष्ठता से ऊपर एक व्यक्ति विशेष की ज़िद और अहंकार है।

जब शीर्ष नेतृत्व का व्यवहार ऐसा हो, तो जनता द्वारा चुने गए स्वाभिमानी जनप्रतिनिधियों में अलगाव होना निश्चित है। राष्ट्रीय राजनीति में बने रहने की मजबूरी के कारण कई नेताओं को राहुल गांधी के अपरिपक्व बयानों और एजेंडे (जैसे कुछ विशेष उद्योगपतियों पर लगातार निराधार हमले) की नकल करनी पड़ती है, जिससे जमीन पर उनके अपने कार्यकर्ता और मतदाता नाराज हो जाते हैं। इसी अहंकार और उपेक्षा के कारण हिमंत बिस्वा सरमा, ज्योतिरादित्य सिंधिया और गुलाम नबी आजाद जैसे जमीन से जुड़े कद्दावर नेताओं ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया।
## गठबंधन का विरोधाभास और विश्वसनीयता का संकट
इस अपरिपक्व नेतृत्व के कारण ही विपक्ष के किसी भी गठबंधन के प्रति जनता में कोई विश्वसनीयता नहीं बन पाई। इस तथाकथित विपक्षी एकजुटता की नींव रखने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सबसे पहले इस गठबंधन को छोड़कर अलग हो गए, क्योंकि वे राहुल गांधी के तौर-तरीकों को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

इसके अलावा, इस गठबंधन का विरोधाभास जनता के सामने एक 'मजाक' बनकर उभरा। राष्ट्रीय स्तर पर जो दल मंच साझा करते हैं, वे राज्यों में एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की TMC, दिल्ली और पंजाब में अरविंद केजरीवाल की AAP, और केरल में वामपंथी दल (Left) कांग्रेस के साथ आमने-सामने की हिंसक लड़ाई लड़ते हैं। मतदाता यह अच्छी तरह समझता है कि जो दल चुनाव से पहले ही सीटों और विचारधारा पर एक नहीं हो पा रहे हैं, वे देश को एक स्थिर और सुरक्षित सरकार कैसे दे सकते हैं।

## क्षेत्रीय दलों में विद्रोह: जब योग्यता ने विशेषाधिकार को ललकारा
यही 'पारिवारिक तानाशाही' और उत्तराधिकार सौंपने की ज़िद आज तमाम क्षेत्रीय दलों के पतन का कारण बन रही है:

* शिवसेना में हुआ ऐतिहासिक बिखराव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ बाल ठाकरे की विरासत को एक पारिवारिक जागीर की तरह चलाने और विचारधारा से समझौता करने के प्रयास के खिलाफ एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में जनप्रतिनिधियों ने बगावत का झंडा बुलंद किया।
* राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में शरद पवार द्वारा अपनी बेटी सुप्रिया सुले को उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाना और वर्षों से संगठन को सींचने वाले अजीत पवार की उपेक्षा करना पार्टी के दो फाड़ होने का मुख्य कारण बना।
* बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) का रामविलास पासवान के बाद बिखरना भी इसी बात का प्रमाण है कि वरिष्ठ नेताओं को केवल किसी वारिस के इशारों पर काम करना मंजूर नहीं था।
* पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर भी ममता बनर्जी द्वारा अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को नंबर दो बनाने और उत्तराधिकारी घोषित करने की नीति ने जमीनी नेताओं में भारी असंतोष पैदा किया, जिसके चलते संगठन में लगातार बिखराव देखा गया।

यह सभी उदाहरण एक ही पैटर्न की ओर इशारा करते हैं—जब तक पार्टी का संस्थापक सक्रिय रहता है, तब तक आंतरिक मतभेद दबे रहते हैं। लेकिन जैसे ही कमान योग्यता के बजाय 'वंश और विशेषाधिकार' को सौंपी जाती है, तो दल के भीतर वर्षों से मेहनत कर रहे नेताओं का धैर्य टूट जाता है।
## निष्कर्ष: सामंतशाही का अंत और परिपक्व लोकतंत्र का उदय
यह राजनीतिक मंथन इस बात का शुभ संकेत है कि भारतीय लोकतंत्र अब परिपक्व हो रहा है। आज देश का मतदाता और जनप्रतिनिधि दोनों ही विकास, सुरक्षा और राष्ट्रीय गौरव जैसे वास्तविक मुद्दों पर अपनी प्राथमिकताएं तय कर रहे हैं। भावुकता या जातिगत समीकरणों के सहारे किसी एक परिवार या 'नौसिखिए' नेतृत्व की सत्ता को हमेशा के लिए बनाए रखना अब संभव नहीं रह गया है।
दलों का यह विघटन वास्तव में राजनीति के लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया है। राजा-महाराजाओं और राजनीतिक घरानों का प्रभाव कम होने से अब गरीब, सामान्य और मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले परिश्रमी नेताओं को नीति निर्धारण में मुख्य भूमिका मिल रही है। राजनीतिक दलों में हो रही यह उथल-पुथल भारतीय राजनीति को 'वंश और विशेषाधिकार' के दलदल से निकालकर 'परिश्रम और परिणाम' के पथ पर अग्रसर कर रही है। यह विघटन किसी राजनीतिक अस्थिरता का संकेत नहीं, बल्कि जिद्दी वंशवाद की गुलामी से जनप्रतिनिधियों की स्वतंत्रता का एक महा-अभियान है।




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