स्वतंत्रता से पूर्व से ही विभाजन, तुष्टीकरण और हिंदू हितों की उपेक्षा कांग्रेस की नीति
स्वतंत्रता से पूर्व से ही विभाजन, तुष्टीकरण और हिंदू हितों की उपेक्षा कांग्रेस की निर्बल नीति के कारण हुआ जो अभी तक चला आ रहा है
- अरविन्द सिसोदिया
भारतीय राजनीति के इतिहास और वर्तमान का यदि निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो एक यक्ष प्रश्न लगातार सामने आता है—क्या भारत का विभाजन, सांस्कृतिक अवरोध और सांप्रदायिक तुष्टीकरण केवल तत्कालीन परिस्थितियों की मजबूरी थी, या फिर यह कांग्रेस की वैचारिक निर्बलता और अदूरदर्शी नीतियों का परिणाम था? इतिहास के पन्नों को पलटने पर स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश हुकूमत की 'फूट डालो और राज करो' की कुटिल नीति को परास्त करने में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व न केवल विफल रहा, बल्कि उसने अनजाने में या राजनीतिक लाभ के लिए उन विभाजनों और समझौतों को स्वीकार किया, जिनकी गूंज आज भी आधुनिक भारत में सुनाई देती है।
ब्रिटिश षड्यंत्र और कांग्रेस का आत्मसमर्पण
यह ऐतिहासिक रूप से सिद्ध है कि अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन (1905) जो 1947 में देश का विभाजन बना और अलीगढ़ आंदोलन के उत्तरार्ध का राजनीतिकरण करके भारत को धार्मिक आधार पर बांटने का जाल बिछाया था। लॉर्ड कर्जन से लेकर मिंटो तक, ब्रिटिश अधिकारियों ने मुस्लिम लीग की स्थापना (1906) को हवा दी और पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग को उकसाया।
त्रासदी यह रही कि तब राष्ट्रीय चेतना का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस ने इस षड्यंत्र को समझने के बावजूद इसके आगे घुटने टेक दिए। वर्ष 1916 का 'लखनऊ समझौता' इसका पहला बड़ा प्रमाण था, जहां बाल गंगाधर तिलक और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने मुस्लिम लीग के 'पृथक निर्वाचक मंडल' के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया। इस आत्मसमर्पण ने देश में अलगाववादी राजनीति को कानूनी और सामाजिक मान्यता दे दी, जिसने आगे चलकर पाकिस्तान की नींव को मजबूत किया।
स्वतंत्रता से पूर्व तुष्टीकरण के ऐतिहासिक उदाहरण
स्वतंत्रता से पहले कांग्रेस द्वारा हिंदू हितों की उपेक्षा और तुष्टीकरण के कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जिन्हें पार्टी की 'निर्बल नीति' का परिचायक माना जाता है:
1. खिलाफत आंदोलन (1919-1922): महात्मा गांधी द्वारा भारत की स्वतंत्रता से असंबंधित एक विदेशी धार्मिक मुद्दे को देश के मुख्य आंदोलन से जोड़ना एक रणनीतिक भूल थी। इसके कारण धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा मिला, जिसका वीभत्स रूप 1921 के मालाबार (मोपला) दंगों में दिखा, जहां हजारों हिंदुओं को अपनी जान और धर्म गंवाना पड़ा।
2. वंदे मातरम का अंग-भंग (1937): मुस्लिम लीग की आपत्तियों के आगे झुकते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो छंदों को गाने की अनुमति दी, क्योंकि मूल गीत में देवी दुर्गा का संदर्भ था। यह बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक भावनाओं के साथ पहला बड़ा समझौता था।
3. नीतियों में ढुलमुल रवैया: गो-हत्या पर प्रतिबंध लगाने की मदन मोहन मालवीय जैसे नेताओं की मांग पर मौन रहना और 1932 के 'सांप्रदायिक पंचाट' (Communal Award) पर "न स्वीकृति, न अस्वीकृति" की तटस्थ नीति अपनाना यह दर्शाता था कि कांग्रेस अल्पसंख्यक वोटों के खिसकने के डर से पीड़ित थी।
इस निर्बल नीति पर उस दौर के महान विचारकों ने गंभीर चेतावनियां दी थीं। वीर सावरकर ने स्पष्ट कहा था कि कांग्रेस "प्रादेशिक राष्ट्रवाद" के भ्रम में हिंदुओं के अधिकारों की बलि देकर मुस्लिम तुष्टीकरण कर रही है। वहीं, डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपनी पुस्तक '[थॉट्स ऑन पाकिस्तान](' (1940) में कांग्रेस की नीति को 'अपीजमेंट' (तुष्टीकरण) करार दिया था। अंततः, सरदार पटेल और नेहरू जैसे नेताओं ने गृहयुद्ध टालने की 'व्यावहारिक लाचारी' का हवाला देकर भारत माता के विभाजन (1947) को स्वीकार कर लिया।
## स्वतंत्रता के पश्चात्: सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर औपनिवेशिक मानसिकता का पहरा
यह आशा थी कि 15 अगस्त 1947 को केवल राजनैतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं होगा, बल्कि सदियों के विदेशी आक्रांताओं और ब्रिटिश गुलामी के कारण लहूलुहान हुई भारतीय संस्कृति का पुनरोदय भी होगा। किंतु, आजादी के बाद सत्तासीन हुई कांग्रेस सरकार की वैचारिक निर्बलता ने इस सांस्कृतिक पुनरुत्थान के मार्ग में सबसे बड़े रोड़े अटकाए। ऐतिहासिक भूलों को सुधारने और संस्कृति को पहुंचाई गई क्षति की भरपाई करने के बजाय, 'धर्मनिरपेक्षता' की एक ऐसी विकृत परिभाषा गढ़ी गई जिसने बहुसंख्यक समाज की आस्था को दोयम दर्जे पर ला खड़ा किया।
1. सोमनाथ से राम मंदिर तक: पुनरुत्थान का विरोध
आजादी के तुरंत बाद जब सरदार वल्लभभाई पटेल और के.एम. मुंशी के प्रयासों से विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी द्वारा ध्वस्त किए गए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया गया, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसका तीव्र विरोध किया था। नेहरू ने इसे "हिंदू पुनरुत्थानवाद" (Hindu Revivalism) कहकर खारिज करने का प्रयास किया और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को मंदिर के उद्घाटन समारोह में न जाने की सलाह तक दे डाली।
सोमनाथ से शुरू हुआ यह सांस्कृतिक अवरोध अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि के मुद्दे पर पराकाष्ठा पर पहुंच गया। कांग्रेस सरकारों ने दशकों तक राम मंदिर के अस्तित्व, राम सेतु की ऐतिहासिकता और राम के वजूद पर ही प्रश्नचिह्न खड़े किए। न्यायालयों में रामलला के मुकदमे को लटकाने और हिंदुओं की आस्था को 'काल्पनिक' बताने का जो प्रयास हुआ, वह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि कांग्रेस अपनी पुरानी निर्बल नीति के तहत बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक भरपाई को रोकने पर आमादा थी।
2. मैकाले की शिक्षा नीति का विस्तार और वामपंथी इतिहास लेखन
भारतीय संस्कृति को सबसे गहरा नुकसान भारत की शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से पहुंचाया गया। आजादी के बाद दशकों तक देश के शिक्षा मंत्रालय पर एक विशेष विचारधारा (वामपंथी और छद्म-धर्मनिरपेक्ष) के विचारकों का कब्जा रहा। उन्होंने लॉर्ड मैकाले की उस औपनिवेशिक शिक्षा नीति को ही आगे बढ़ाया, जिसका मूल उद्देश्य भारतीयों को अपनी संस्कृति के प्रति हीन भावना से भरना था। हमारे पाठ्यक्रमों से वेदों, उपनिषदों, चाणक्य, चंद्रगुप्त, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज और गुरु गोविंद सिंह जैसे सांस्कृतिक और राष्ट्रीय नायकों के गौरवशाली इतिहास को या तो हटा दिया गया या उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया। इसके विपरीत, जिन मुगल आक्रांताओं ने हिंदू संस्कृति, गुरुकुलों और मंदिरों को नेस्तनाबूद किया था, उन्हें 'महान' और 'उदार' बताकर महिमामंडित किया गया।
3. हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का दोहरा मापदंड
भारतीय संस्कृति और अर्थव्यवस्था का केंद्र हमेशा से हमारे मंदिर रहे हैं। कांग्रेस सरकार द्वारा बनाए गए 'हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती कानून' (Hindu Religious Charitable Endowments Act) के तहत देश के बड़े और समृद्ध हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। विडंबना यह है कि यह कानून केवल हिंदू मंदिरों पर लागू किया गया, जबकि मस्जिदों और चर्चों को स्वायत्तता दी गई। हिंदू मंदिरों के चढ़ावे और संपत्ति का उपयोग सरकारें गैर-सांस्कृतिक कार्यों के लिए करती रहीं, जिससे हिंदू समाज अपनी ही धार्मिक संपदा का उपयोग संस्कृत पाठशालाओं, गुरुकुलों और सांस्कृतिक चेतना के प्रसार के लिए करने से वंचित हो गया।
4. तुष्टीकरण की राजनीति की पराकाष्ठा
शाह बानो मामले (1985) में सर्वोच्च न्यायालय के प्रगतिशील फैसले को संसद में कानून बदलकर पलटना, देश के संसाधनों पर पहला हक एक विशेष अल्पसंख्यक समुदाय का बताना और देश में "भगवा आतंकवाद" या "हिंदू आतंकवाद" जैसे झूठे नैरेटिव गढ़ना, कांग्रेस की उसी निर्बल नीति का हिस्सा था जो विभाजन काल से चली आ रही थी। वोट बैंक की इस लिप्सा ने देश के बहुसंख्यक समाज को अपनी ही भूमि पर सांस्कृतिक रूप से लाचार महसूस कराया।
निष्कर्ष:
इतिहास साक्षी है कि स्वतंत्रता से पूर्व जो निर्बलता कांग्रेस ने 'सांप्रदायिक पंचाट' और 'लखनऊ समझौते' में दिखाई थी, वही निर्बलता आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के विरोध, हिंदू मंदिरों पर नियंत्रण और वामपंथी इतिहास लेखन को बढ़ावा देने में दिखाई गई। विभाजन और तुष्टीकरण का जो सिलसिला 1947 से पहले शुरू हुआ था, उसने आजादी के बाद भी दशकों तक भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान को बेड़ियों में जकड़े रखा।
किंतु, आज का भारत करवट ले रहा है। सांस्कृतिक नवजागरण के इस वर्तमान दौर में जब अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण होता है, काशी विश्वनाथ और महाकाल कॉरिडोर का पुनरुद्धार होता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सदियों से दबाई गई सांस्कृतिक चेतना को अब और अधिक समय तक बंधक नहीं रखा जा सकता। राष्ट्र का वास्तविक विकास तब तक अधूरा है, जब तक वह अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों को गर्व से स्वीकार नहीं करता। अतीत की इन ऐतिहासिक भूलों से सीख लेकर ही हम एक सशक्त, स्वाभिमानी और 'सांस्कृतिक रूप से समृद्ध' भारत का निर्माण कर सकते हैं।
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## स्वतंत्रता से पूर्व से ही विभाजन, तुष्टीकरण और हिंदू हितों की उपेक्षा कांग्रेस की निर्बल नीति के कारण हुआ जो अभी तक चला आ रहा है
- (लेखक का नाम/विशेष योगदानकर्ता)
क्या भारत का विभाजन और सांप्रदायिक तुष्टीकरण केवल तत्कालीन परिस्थितियां थीं, या यह कांग्रेस की वैचारिक निर्बलता का परिणाम था? इतिहास गवाह है कि ब्रिटिश हुकूमत की 'फूट डालो और राज करो' की नीति को नाकाम करने में कांग्रेस विफल रही और अनजाने या राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे समझौते किए, जिनकी गूंज आज भी सुनाई देती है।
## स्वतंत्रता से पूर्व: ब्रिटिश षड्यंत्र और कांग्रेस की नीतियां
अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन (1905) और अलीगढ़ आंदोलन के जरिए देश को धार्मिक आधार पर बांटने का जाल बुझाया था। राष्ट्रीय चेतना का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस ने इस षड्यंत्र के आगे घुटने टेक दिए। वर्ष 1916 का 'लखनऊ समझौता' इसका प्रमाण था, जहां कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के 'पृथक निर्वाचक मंडल' के सिद्धांत को स्वीकार कर देश में अलगाववादी राजनीति को कानूनी मान्यता दे दी।
इस कालखंड में हिंदू हितों की उपेक्षा के कई उदाहरण मिलते हैं:
1. खिलाफत आंदोलन (1919-22): गांधी जी द्वारा एक विदेशी धार्मिक मुद्दे को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने के कारण कट्टरता बढ़ी, जिसका वीभत्स रूप 1921 के मालाबार (मोपला) दंगों में दिखा, जहां हजारों हिंदुओं को निशाना बनाया गया।
2. वंदे मातरम का अंग-भंग (1937): मुस्लिम लीग के दबाव में नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो छंदों को मंजूरी दी, क्योंकि मूल गीत में देवी दुर्गा का संदर्भ था।
3. ढुलमुल रवैया: गो-हत्या पर प्रतिबंध की मदन मोहन मालवीय की मांग पर मौन रहना और 1932 के 'सांप्रदायिक पंचाट' (Communal Award) पर "न स्वीकृति, न अस्वीकृति" की तटस्थ नीति अपनाना यह दर्शाता था कि कांग्रेस वोट बैंक के डर से पीड़ित थी।
इस निर्बल नीति पर वीर सावरकर ने चेताया था कि कांग्रेस "प्रादेशिक राष्ट्रवाद" के भ्रम में हिंदुओं के अधिकारों की बलि दे रही है। वहीं डॉ. अंबेडकर ने अपनी पुस्तक '[थॉट्स ऑन पाकिस्तान] में इसे तुष्टीकरण (Appeasement) करार दिया। अंततः, नेहरू और पटेल ने गृहयुद्ध टालने की लाचारी का हवाला देकर देश का विभाजन स्वीकार कर लिया।
## स्वतंत्रता के पश्चात्: बाधित सांस्कृतिक पुनरुत्थान
यह उम्मीद थी कि 1947 के बाद लहूलुहान हुई भारतीय संस्कृति का पुनरोदय होगा, लेकिन सत्तासीन कांग्रेस ने 'धर्मनिरपेक्षता' की ऐसी विकृत परिभाषा गढ़ी जिसने बहुसंख्यक समाज की आस्था को दोयम दर्जे पर ला खड़ा किया:
1. सोमनाथ से राम मंदिर तक विरोध: सरदार पटेल के प्रयासों से जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया गया, तो तत्कालीन पीएम नेहरू ने इसे "हिंदू पुनरुत्थानवाद" कहकर विरोध किया और राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को वहां न जाने की सलाह दी। यही अवरोध अयोध्या में राम मंदिर, राम सेतु की ऐतिहासिकता और राम के वजूद पर प्रश्नचिह्न खड़े करने के रूप में दशकों तक जारी रहा।
2. वामपंथी इतिहास लेखन: आजादी के बाद शिक्षा मंत्रालय पर एक विशेष विचारधारा का कब्जा रहा। उन्होंने लॉर्ड मैकाले की औपनिवेशिक शिक्षा नीति को बढ़ावा दिया। पाठ्यक्रमों से वेदों, चाणक्य, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज और गुरु गोविंद सिंह जैसे नायकों को हाशिए पर डालकर, हिंदू संस्कृति को नष्ट करने वाले आक्रांताओं को महान बताया गया।
3. मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण: 'हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती कानून' के तहत केवल समृद्ध हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लिया गया, जबकि मस्जिदों और चर्चों को स्वायत्तता दी गई। मंदिरों के चढ़ावे का उपयोग गैर-सांस्कृतिक कार्यों के लिए हुआ, जिससे समाज गुरुकुल और संस्कृत पाठशालाएं चलाने से वंचित हो गया।
4. तुष्टीकरण की पराकाष्ठा: शाह बानो मामले (1985) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद में कानून बदलकर पलटना, देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का बताना और "हिंदू आतंकवाद" जैसे झूठे नैरेटिव गढ़ना, कांग्रेस की उसी पुरानी निर्बल नीति का विस्तार था।
## निष्कर्ष:
इतिहास साक्षी है कि जो निर्बलता कांग्रेस ने स्वतंत्रता से पहले 'सांप्रदायिक पंचाट' में दिखाई थी, वही आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के विरोध और वामपंथी इतिहास लेखन में जारी रही। विभाजन और तुष्टीकरण का जो सिलसिला 1947 से पहले शुरू हुआ था, उसने आजादी के बाद भी दशकों तक भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान को बेड़ियों में जकड़े रखा।
आज का भारत करवट ले रहा है। अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण और काशी-महाकाल कॉरिडोर का पुनरुद्धार यह साबित करता है कि दबी हुई सांस्कृतिक चेतना को अब बंधक नहीं रखा जा सकता। राष्ट्र का वास्तविक विकास तब तक अधूरा है, जब तक वह अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों को गर्व से स्वीकार नहीं करता।
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