Lord Dattatreya's 24 Gurus and the Teachings Received from Them
श्रीमद्भागवत पुराण के एकादश स्कंध (11वें अध्याय) के अनुसार, भगवान दत्तात्रेय ने राजा यदु को अपने सभी 24 गुरुओं और उनसे मिली शिक्षाओं के बारे में विस्तार से बताया था।
****भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं की कथा श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार ज्ञान, अनासक्ति और आत्म-साक्षात्कार का एक अद्भुत संदेश देती है, जिसके तहत उन्होंने किसी एक व्यक्ति को नहीं बल्कि प्रकृति (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, समुद्र), जीव-जंतुओं (कबूतर,अजगर, पतंगा, मधुमक्खी, भौंरा, हाथी, हिरण,मछली,सांप, मकड़ी, भृंगी, टिटहरी और विभिन्न इंसानी रूपों पिंगला वेश्या, कुमारी कन्या, तीरगर, बालक को अपना गुरु बनाया। इन सभी से उन्होंने सीखा कि संसार में रहते हुए भी कैसे धैर्य, सहनशीलता, एकाग्रता और संतोष को अपनाया जाए, तथा इंद्रियों के झूठे आकर्षण, अत्यधिक मोह, धन-संचय और अहंकार का त्याग करके कैसे ईश्वर में मन लगाया जाए। संक्षेप में, दत्तात्रेय जी की यह शिक्षा हमें बताती है कि यदि हमारे भीतर सीखने की सच्ची जिज्ञासा हो, तो ब्रह्मांड का कण-कण हमें आत्मज्ञान और परम शांति का मार्ग दिखा सकता है।
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यहाँ भगवान दत्तात्रेय के सभी 24 गुरुओं और उनकी शिक्षाओं का पूरा विवरण दिया गया है:
## 1. पंचमहाभूत (प्रकृति के तत्व)
* पृथ्वी (Earth): पृथ्वी पर लोग आघात करते हैं, गंदगी फैलाते हैं, लेकिन वह सब सहन करके भी सबको अन्न और आश्रय देती है। इससे धैर्य, सहनशीलता और परोपकार की सीख मिलती है।
* वायु (Air): वायु अच्छी-बुरी हर जगह से गुजरती है, लेकिन किसी की गंध अपने साथ नहीं रखती। इससे सीख मिलती है कि संसार में रहते हुए भी किसी भी परिस्थिति या मोह में लिप्त नहीं होना चाहिए।
* आकाश (Sky): आकाश अनंत है और बादलों के आने-जाने से उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इससे यह शिक्षा मिलती है कि आत्मा सर्वव्यापी है और शरीर के सुख-दुख से अछूती है।
* जल (Water): जल स्वभाव से स्वच्छ, कोमल और मधुर होता है, और जो भी इसके संपर्क में आता है उसे पवित्र कर देता है। इससे मन की निर्मलता और दूसरों का कल्याण करने की सीख मिलती है।
* अग्नि (Fire): अग्नि सब कुछ भस्म करके भी खुद पवित्र रहती है और अपनी ऊर्जा से सबको प्रकाश देती है। यह सिखाती है कि ज्ञानी पुरुष को परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना चाहिए और अपने तेज को बनाए रखना चाहिए।
## 2. खगोलीय पिंड
* चन्द्रमा (Moon): चंद्रमा की कलाएं घटती-बढ़ती हैं, लेकिन चंद्रमा खुद कभी नहीं बदलता। इससे सीख मिलती है कि घटना-बढ़ना (जैसे जवानी, बुढ़ापा, बीमारी) केवल शरीर का धर्म है, आत्मा हमेशा एक समान रहती है।
* सूर्य (Sun): सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी का जल सोखता है और फिर उसे वर्षा के रूप में लौटा देता है। इससे सीख मिलती है कि गुणों या धन का संग्रह केवल दूसरों की भलाई के लिए करना चाहिए, न कि अपने अहंकार के लिए।
## 3. पशु-पक्षी और जीव-जंतु
* [कबूतर](Pigeon): एक कबूतर का जोड़ा अपने बच्चों के मोह में जाल में फंसकर नष्ट हो गया था। इससे यह सीख मिलती है कि अत्यधिक सांसारिक मोह और आसक्ति ही मनुष्य के विनाश का कारण बनती है।
* [अजगर](Python): अजगर शिकार के लिए भटकता नहीं है, जो मिल जाए उसी में संतोष कर लेता है। इससे सीख मिलती है कि जीवन यापन के लिए संतोष रखना चाहिए और ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए।
* समुद्र (Ocean): नदियां कितनी भी आएं या न आएं, समुद्र न तो उमड़ता है और न ही सूखता है। इससे सीख मिलती है कि जीवन में अनुकूल या प्रतिकूल समय आने पर भी अपनी मर्यादा और मानसिक स्थिरता नहीं खोनी चाहिए।
* पतंगा (Moth): पतंगा दीपक के बाहरी रूप-रंग के आकर्षण में आकर जल मरता है। इससे सीख मिलती है कि इंद्रियों के झूठे आकर्षण और वासनाओं से दूर रहना चाहिए।
* [मधुमक्खी (Honeybee)] : मधुमक्खी तिनका-तिनका जोड़कर शहद इकट्ठा करती है, लेकिन अंत में शिकारी उसका शहद ले जाता है। इससे सीख मिलती है कि अत्यधिक धन या वस्तुओं का संग्रह नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह अंत में दूसरों के काम आता है या नष्ट हो जाता है।
* [भौंरा] (Black Bee): भौंरा किसी एक फूल को नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि अलग-अलग फूलों से थोड़ा-थोड़ा रस लेता है। इससे संन्यासियों को यह सीख मिलती है कि गृहस्थों पर बोझ बने बिना केवल जीवित रहने मात्र की भिक्षा लेनी चाहिए।
* [हाथी] (Elephant): एक शक्तिशाली हाथी हथनी (कागज या नकली) के स्पर्श के लालच में आकर गड्ढे में गिर जाता है और बंदी बन जाता है। इससे सीख मिलती है कि कामवासना और स्पर्श का सुख बड़े से बड़े बुद्धिमान को भी नष्ट कर सकता है।
* [हिरण]) (Deer): हिरण मधुर संगीत सुनने के चक्कर में शिकारी के जाल में फंस जाता है। इससे सीख मिलती है कि कानों के सुख (झूठी तारीफ या सांसारिक शब्दों) के फेर में नहीं पड़ना चाहिए।
* [मछली] (Fish): मछली कांटे में फंसे मांस के टुकड़े के स्वाद के लालच में अपनी जान गंवा देती है। इससे सीख मिलती है कि जीभ के स्वाद (रस-लोलुपता) पर नियंत्रण रखना सबसे जरूरी है, क्योंकि यह मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है।
* [सांप] (Snake): सांप कभी खुद का बिल (घर) नहीं बनाता, वह दूसरों के बनाए बिल में रहता है और अकेला घूमता है। इससे सीख मिलती है कि संन्यासी को स्थाई घर बनाने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए और एकांतप्रिय होना चाहिए।
* [मकड़ी] (Spider): मकड़ी खुद अपने भीतर से जाला बुनती है, उसमें खेलती है और अंत में उसे खुद ही निगल लेती है। इससे सीख मिलती है कि ईश्वर ही इस सृष्टि का निर्माण करते हैं, इसे चलाते हैं और अंत में इसे अपने भीतर समेट लेते हैं।
## 4. मनुष्य और समाज के विभिन्न रूप
* पिंगला वेश्या (Pingala - The Courtesan): पिंगला एक रात ग्राहकों का इंतजार करते-करते थक गई। जब उसने सारी उम्मीदें छोड़ दीं, तो उसे गहरी शांति और ईश्वर का अहसास हुआ। इससे सीख मिलती है कि झूठी आशाओं का त्याग ही परम शांति का मार्ग है।
* कुमारी कन्या (Maiden): एक बार एक कन्या के घर मेहमान आए। जब वह धान कूटने लगी, तो उसकी चूड़ियों की आवाज होने लगी। उसने आवाज बंद करने के लिए एक-एक करके सारी चूड़ियाँ उतार दीं और केवल एक ही चूड़ी छोड़ी। इससे सीख मिलती है कि जहाँ ज्यादा लोग होंगे वहाँ कलह (विवाद) होगा, इसलिए आत्मज्ञान के लिए एकांत सबसे उत्तम है।
* बाण बनाने वाला (Arrow-maker/Fletcher): एक तीरगर (बाण बनाने वाला) अपने काम में इतना मग्न था कि पास से राजा की सवारी गुजर गई और उसे पता ही नहीं चला। इससे सीख मिलती है कि ईश्वर की साधना या अपने लक्ष्य के प्रति इतनी ही गहरी एकाग्रता होनी चाहिए।
* बालक (Child): एक छोटा बच्चा मान-अपमान, चिंता, और सुख-दुख से परे होकर हमेशा मस्त रहता है। इससे सीख मिलती है कि अहंकार को छोड़कर बालक की तरह सरल और वर्तमान में जीने वाला बनना चाहिए।
* कौआ या टिटहरी पक्षी (Kurari/Osprey): एक पक्षी के मुँह में मांस का टुकड़ा था, जिसे छीनने के लिए बड़े पक्षी उस पर हमला कर रहे थे। जैसे ही उसने वह टुकड़ा गिरा दिया, सब शांत हो गए। इससे सीख मिलती है कि सांसारिक वस्तुओं का त्याग करने पर ही सारे झगड़े खत्म होते हैं और शांति मिलती है।
## 5. अंतिम और 24वाँ गुरु
* ततैया या भृंगी कीट (Wasp/Caterpillar): भृंगी कीड़ा एक अन्य कीड़े को पकड़कर अपनी गुफा में बंद कर देता है। वह कीड़ा डर के मारे लगातार भृंगी का ही ध्यान करता रहता है और अंत में खुद भी भृंगी बन जाता है। इससे यह महान सीख मिलती है कि मनुष्य जैसा चिंतन करता है, वह वैसा ही बन जाता है। इसलिए यदि हम निरंतर ईश्वर का ध्यान करेंगे, तो ईश्वर रूप ही हो जाएंगे।
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