मोदी मैजिक से चौंकी दुनिया, ब्रिक्स सम्मेलन की ऐतिहासिक सफलता

वैश्विक टकराव के बीच भारत का 'शांति पथ', ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की ऐतिहासिक सफलता
- अरविन्द सिसोदिया 

मोदी मैजिक नें पूरे विश्व को चोंकाया, ब्रिक्स  सम्मेलन की ऐतिहासिक सफलता - अरविन्द सिसोदिया 
मोदी मैजिक से चौंकी दुनिया, ब्रिक्स सम्मेलन की ऐतिहासिक सफलता - अरविन्द सिसोदिया 

वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल, युद्ध और गंभीर कूटनीतिक टकरावों के बीच भारत के नई दिल्ली में आयोजित18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी के नेतृत्व में इतिहास रच दिया है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग की एक साथ मौजूदगी, विश्व को कई कूटनीति संदेश देती है। जहाँ एक ओर पश्चिमी एशिया के संकट (इजरायल-इरान युद्ध) और रूस-यूक्रेन संघर्ष के चलते दुनिया गुटों में बंटी हुई नजर आ रही थी, वहीं भारत ने अपनी कूटनीतिक कुशलता के दम पर सभी विरोधी विचारधारा वाले देशों को 'नई दिल्ली घोषणापत्र'  पर एक सुर में लाकर खड़ा कर दिया। यह सम्मेलन यह साबित करता है कि गहरे मतभेदों के दौर में भी वैश्विक एकता का सेतु बनाने की पहल केवल और केवल भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक और कूटनीतिक सफलता है।

टकरावों के बीच आम सहमति

भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी परीक्षा
इस शिखर सम्मेलन की राह कतई आसान नहीं थी। कुछ ही महीने पहले मंत्रियों के स्तर पर हुई बैठक में गंभीर मतभेदों के चलते साझा बयान जारी नहीं हो सका था। पश्चिमी एशिया के संघर्ष को लेकर जहां एक ओर ईरान और दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात व सऊदी अरब जैसे देश अलग-अलग रुख अपनाए हुए थे, वहीं भारत ने अपने बैक-चैनल कूटनीतिक संपर्कों का इस्तेमाल कर सभी को एक मेज पर बिठाया। आतंकवाद के सभी रूपों की कड़ी निंदा करने और क्षेत्रीय संप्रभुता के सम्मान की ऐसी संतुलित भाषा तैयार की गई, जिसने आपसी खींचतान को दरकिनार कर सर्वसम्मति से नई दिल्ली घोषणापत्र को पारित करवा दिया।

वित्तीय आत्मनिर्भरता और 'डी-डॉलरलाइजेशन' पर व्यावहारिक दृष्टिकोण

वैश्विक प्रतिबंधों की मार झेल रहे इस दौर में व्यापारिक सुरक्षा पर भारत की पहल बेहद व्यावहारिक रही। भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स देशों ने अमेरिकी डॉलर की सर्वोच्चता को सीधे चुनौती दिए बिना, अपनी अर्थव्यवस्थाओं को प्रतिबंधों के झटकों से बचाने के लिए स्थानीय मुद्राओं (लोकल करेंसीज ) में व्यापार बढ़ाने पर अपनी मुहर लगाई। इससे 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) को एक ऐसा वित्तीय कवच मिला है, जिससे वे पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भर रहे बिना अपना सुरक्षित व्यापार चक्र चला सकते हैं।

 वित्तीय सहयोग और बुनियादी ढांचे का विकास

सम्मेलन में 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (एन डी बी) की भूमिका को और मजबूत किया गया। विशेष रूप से हरित और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं (रिन्यूअबले एनर्जी ) के लिए बैंक के वित्तीय ऋणों को पहली बार जमीन पर उतारने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए गए। भारत के इस प्रयास ने ब्रिक्स को सिर्फ एक वैचारिक मंच न रखकर, विकासशील देशों के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने वाला एक ठोस आर्थिक इंजन बना दिया है।

आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक मोर्चेबंदी

भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का दंश झेल रहा है। इस सम्मेलन में भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर बेहद सख्त रुख अपनाया। भारतीय कूटनीति की सफलता ही थी कि संयुक्त घोषणापत्र में सभी सदस्य देशों ने वित्तीय कार्रवाई कार्य बल ( एफ ए टी एफ ) के मानकों का सख्ती से पालन करने और कट्टरपंथ व सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ मिलकर मोर्चा खोलने का संकल्प लिया।

 डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर ( डीपीआई ) और सतत विकास का 'भारतीय मॉडल'

भारत ने अपनी तकनीकी और डिजिटल क्रांति (जैसे- यूपीआई ) का खाका पूरी दुनिया के सामने पेश किया। सदस्य देशों ने भारत के 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (डीपीआई) मॉडल को सराहा और इसे अन्य विकासशील देशों में लागू करने पर सहमति जताई। इसके अतिरिक्त, कृषि अनुसंधान प्लेटफॉर्म और रेलवे रिसर्च नेटवर्क की स्थापना जैसे निर्णयों ने इस संगठन को सीधे जनता की जरूरतों से जोड़ दिया।

 'वसुधैव कुटुंबकम' की नीति की वास्तविक विजय

18वां ब्रिक्स सम्मेलन केवल आर्थिक या कूटनीतिक समझौतों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि भारत दुनिया की बिखरी हुई ताकतों को एक धागे में पिरोने की क्षमता रखता है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा, रूस, ईरान और खाड़ी देशों का आपसी समन्वय, ये सब भारत के 'भारत मंडपम' (न्यू दिल्ली ) में संभव हो सका।

जब दुनिया "आप हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ" जैसी विभाजनकारी मानसिकता से गुजर रही है, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने संवाद, लचीलेपन और सह-अस्तित्व की अनूठी मिसाल पेश की है। यह शिखर सम्मेलन वैश्विक पटल पर यह घोषणा करता है कि भारत अब वैश्विक नियमों का महज पालन करने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और नीतियों को नया आकार देने वाला 'विश्वमित्र' बन चुका है।

अरविन्द सिसोदिया 
शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी 
राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक निगम 
मोबाईल 9414180151


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