भारत में मुस्लिम आबादी फल फूल रही है और पड़ोसी देश में हिंदू तेजी से समाप्त हो रहा है

 डेमोग्राफी पर बड़ा दावा

9 राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हुए।
200 जिलों की आबादी का संतुलन बदला।
मामला पहुंचा सीधे
सुप्रीम कोर्ट में — PIL दाखिल।

🔎 रिपोर्ट्स का दावा:
बॉर्डर के 116 गांवों में मुस्लिम आबादी 50% बढ़ी।
अंतरराष्ट्रीय सीमा पर 32% बढ़ोतरी।

और
पश्चिम बंगाल के 9 जिलों की डेमोग्राफी बदली — SIR रिपोर्ट।

सवाल उठता है —
ये सिर्फ आंकड़े हैं
या आने वाले समय की चेतावनी?
  
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प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने मई 2024 में एक वर्किंग पेपर जारी किया था, जिसका शीर्षक "Share of Religious Minorities: A Cross-Country Analysis (1950-2015)" है. इस रिपोर्ट में 1950 से 2015 के बीच दुनिया के 167 देशों में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक आबादी के अनुपातिक बदलावों का अध्ययन किया गया है. 

इस रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में निम्नलिखित मुख्य निष्कर्ष दिए गए हैं:
## 1. धार्मिक आबादी की हिस्सेदारी में बदलाव (1950-2015)
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बहुसंख्यक हिंदू आबादी की सापेक्षिक हिस्सेदारी (Share) में कमी आई है, जबकि कुछ अल्पसंख्यक समुदायों की हिस्सेदारी बढ़ी है: 

* हिंदू आबादी: वर्ष 1950 में कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी 84.68% थी, जो 2015 में घटकर 78.06% हो गई. यह उनकी हिस्सेदारी में 7.82% की सापेक्षिक गिरावट है. (नोट: इसका मतलब हिंदुओं की संख्या कम होना नहीं है, बल्कि कुल आबादी के अनुपात में उनकी हिस्सेदारी का प्रतिशत कम होना है). 

* मुस्लिम आबादी: वर्ष 1950 में कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 9.84% थी, जो 2015 में बढ़कर 14.09% हो गई. यह उनकी हिस्सेदारी में 43.15% की सापेक्षिक वृद्धि को दर्शाता है. [4, 6] 
* अन्य अल्पसंख्यक: ईसाई आबादी की हिस्सेदारी 2.24% से बढ़कर 2.36% हुई। सिख आबादी 1.24% से बढ़कर 1.85% और बौद्ध आबादी 0.05% से बढ़कर 0.81% हुई। इसके विपरीत, जैन (0.45% से घटकर 0.36%) और पारसी समुदाय की हिस्सेदारी में गिरावट दर्ज की गई. 

## 2. रिपोर्ट का वैश्विक और क्षेत्रीय संदर्भ

* वैश्विक प्रवृत्ति (Global Trend): EAC-PM की रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुसंख्यक आबादी की हिस्सेदारी में यह गिरावट एक वैश्विक सामाजिक बदलाव का हिस्सा है. दुनिया के 123 देशों में बहुसंख्यक आबादी की हिस्सेदारी घटी है. 

* पड़ोसी देशों से तुलना: रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि भारत के विपरीत, उसके पड़ोसी मुस्लिम-बहुसंख्यक देशों (जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश) में उनकी बहुसंख्यक आबादी की हिस्सेदारी बढ़ी है, जबकि वहां गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी में भारी कमी आई है.

* अल्पसंख्यक फल-फूल रहे हैं: परिषद ने इस डेटा के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि भारत का माहौल ऐसा है जहां अल्पसंख्यक न केवल सुरक्षित हैं, बल्कि सामाजिक-जनसांख्यिकीय रूप से फल-फूल (Thriving) रहे हैं. 

## 3. विशेषज्ञों और संस्थाओं का विश्लेषण (महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण)
इस रिपोर्ट के आने के बाद जनसंख्या विशेषज्ञों और [Population Foundation of India (PFI) जैसे स्वतंत्र थिंक टैंकों ने मीडिया रिपोर्टों पर स्पष्टीकरण जारी किया था: 

* यह 'जनसंख्या विस्फोट' नहीं है: विशेषज्ञों के अनुसार, मुस्लिम हिस्सेदारी में 43% की वृद्धि "सापेक्षिक वृद्धि" (Relative Growth) है. उदाहरण के लिए, यदि किसी की हिस्सेदारी 10% से बढ़कर 14% होती है, तो वह 4% पॉइंट की बढ़ोतरी है, जिसे गणितीय रूप से पुराना आधार मानकर 43% की वृद्धि कहा गया है. इसे कुल जनसंख्या का 43% बढ़ जाना समझना गलत है. 

* सामाजिक-आर्थिक कारक: रिपोर्ट के विश्लेषण में यह भी स्पष्ट किया गया कि जनसंख्या के इस बदलाव का मुख्य कारण धर्म नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच साक्षरता, गरीबी, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और महिला सशक्तीकरण में रहा अंतर है। जैसे-जैसे मुस्लिम समाज में शिक्षा और जागरूकता बढ़ रही है, उनकी प्रजनन दर भी सबसे तेजी से गिर रही है. 

* पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक आबादी घटने के आंकड़े

* विभिन्न धार्मिक समूहों में शिक्षा और प्रजनन दर (Fertility Rate) का सीधा संबंध

* भारत के किस राज्य में इस रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा जनसांख्यिकीय बदलाव दिखा

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[पाकिस्तान]और [बांग्लादेश] में अल्पसंख्यक आबादी (विशेष रूप से हिंदू) की हिस्सेदारी में भारी गिरावट आई है, जो कि दोनों देशों की आधिकारिक जनगणना और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की मई 2024 की रिपोर्ट से प्रमाणित होती है। 

दोनों देशों की जनसांख्यिकी (Demographics) में आए इस बड़े बदलाव के आधिकारिक आंकड़े नीचे दिए गए हैं:

## 1. बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति (सबसे बड़ी गिरावट)
विभाजन और स्वतंत्रता के बाद से बांग्लादेश (पूर्व में पूर्वी पाकिस्तान) में हिंदू आबादी के अनुपात में सबसे बड़ी और चिंताजनक गिरावट देखी गई है: 

* 1951 की जनगणना: इस समय बांग्लादेश वाले हिस्से में गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक (मुख्य रूप से हिंदू) आबादी लगभग 22% से 23% थी. 

* 2022 की जनगणना: बांग्लादेश की नवीनतम जनगणना (2022) के अनुसार, हिंदुओं की हिस्सेदारी घटकर मात्र 7.95% रह गई है। अन्य अल्पसंख्यक (बौद्ध और ईसाई) मिलकर 1% से भी कम हैं। 

* EAC-PM रिपोर्ट का निष्कर्ष: रिपोर्ट के अनुसार, 1950 से 2015 के बीच बांग्लादेश में बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी में 18.5% की वृद्धि हुई है। इसके विपरीत अल्पसंख्यक आबादी का दायरा लगातार सिकुड़ा है। 

## 2. पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति
पाकिस्तान (तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान) के संदर्भ में आंकड़ों को लेकर अक्सर भ्रम रहता है, लेकिन आधिकारिक सच इस प्रकार है:

* 1951 की जनगणना (विभाजन के ठीक बाद): 1947 में बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन (Exodus) के बाद, 1951 की जनगणना में पश्चिमी पाकिस्तान (आज का पाकिस्तान) में हिंदू आबादी घटकर केवल 1.6% रह गई थी। कुल गैर-मुस्लिम आबादी लगभग 3.4% थी। 

* 2017/2023 की जनगणना: पाकिस्तान ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के अनुसार, वर्तमान पाकिस्तान में हिंदू आबादी लगभग 2.14% है (जो मुख्य रूप से सिंध प्रांत के थारपारकर और उमरकोट जिलों में केंद्रित है)। कुल गैर-मुस्लिम (ईसाई, सिख, अहमदी सहित) लगभग 3.5% के आसपास बने हुए हैं। 

* EAC-PM रिपोर्ट का निष्कर्ष: इस रिपोर्ट के अनुसार, 1950 से 2015 के बीच पाकिस्तान में बहुसंख्यक हनफ़ी मुस्लिम संप्रदाय की हिस्सेदारी में 3.75% की वृद्धि हुई है। विभाजन के बाद वहां अल्पसंख्यकों की आबादी का प्रतिशत स्थिर तो रहा है, लेकिन वे सामाजिक और जनसांख्यिकीय रूप से आगे नहीं बढ़ पाए। 

## 3. अल्पसंख्यक आबादी घटने के मुख्य कारण
शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और मानवाधिकार संगठनों के अनुसार इन दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की संख्या (प्रतिशत) कम होने के पीछे निम्नलिखित ऐतिहासिक और सामाजिक कारण रहे हैं:

* 1971 का बांग्लादेश मुक्ति युद्ध: 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के कारण पूर्वी पाकिस्तान से लगभग 1 करोड़ लोग शरणार्थी बनकर भारत आए थे, जिनमें लगभग 80% हिंदू थे। स्वतंत्रता के बाद इनमें से बड़ी संख्या में लोग वापस नहीं लौटे। 

* लगातार पलायन (Migration): बांग्लादेश और पाकिस्तान में समय-समय पर होने वाली सांप्रदायिक हिंसा, भेदभाव, ज़मीन हड़पने (जैसे बांग्लादेश का एनिमी प्रॉपर्टी एक्ट) और जबरन धर्मांतरण के मामलों के कारण अल्पसंख्यक परिवार लगातार भारत या अन्य देशों में पलायन करते रहे हैं। 

* संवैधानिक बदलाव: दोनों देशों ने स्वतंत्रता के बाद खुद को 'इस्लामिक रिपब्लिक' घोषित कर दिया, जिससे अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी और उनके सामाजिक अधिकार सीमित हो गए। 

यदि आप चाहें, तो मैं आपको निम्नलिखित विषयों पर अधिक जानकारी दे सकता हूँ:

* पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हिंदू आबादी का ज़िला-वार विवरण
* बांग्लादेश के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम (2024-2026) का वहां के अल्पसंख्यकों पर असर
* भारत के 'नागरिक संशोधन कानून' (CAA) का इन पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों से संबंध

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भारत के विभाजन और आजादी के समय (1947 में) वर्तमान पाकिस्तान (तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान) के इलाके में हिंदू आबादी लगभग 14% से 15% के बीच थी। अविभाजित भारत की आखिरी आधिकारिक जनगणना (1941) और विभाजन के बाद की परिस्थितियों के आधार पर सांख्यिकीय आंकड़े निम्नलिखित हैं: 

## 📊 1. विभाजन के समय के वास्तविक आंकड़े

* 1941 की जनगणना (विभाजन से ठीक पहले): ब्रिटिश भारत की इस आखिरी जनगणना के अनुसार, वर्तमान पाकिस्तान (पश्चिमी पाकिस्तान) के भौगोलिक क्षेत्र में हिंदू आबादी 39.8 लाख (3,981,565) थी, जो वहां की कुल आबादी का 14.6% थी। यदि इसमें सिख आबादी (लगभग 5.5%) को भी जोड़ दिया जाए, तो गैर-मुस्लिम आबादी का कुल हिस्सा करीब 20% के आसपास था। 

* प्रमुख शहरों में स्थिति: विभाजन से ठीक पहले पाकिस्तान के कई बड़े शहरों में हिंदुओं की बड़ी हिस्सेदारी थी। उदाहरण के लिए, कराची में हिंदू आबादी लगभग 49.8% (आधे के करीब) थी, जबकि हैदराबाद, शिकारपुर और लरकाना जैसे सिंध के शहरों में हिंदू बहुसंख्यक (50% से 70% तक) थे। 

## ➡️ 2. विभाजन के तुरंत बाद (1947 का विस्थापन)
14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनने के बाद फैली सांप्रदायिक हिंसा, दंगों और असुरक्षा के माहौल के कारण आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा पलायन (Exodus) हुआ: 

* लाखों लोगों का पलायन: एक अनुमान के अनुसार, विभाजन के तुरंत बाद पश्चिमी पाकिस्तान से 47 लाख से 50 लाख हिंदू और सिख अपना घर-बार छोड़कर शरणार्थी के रूप में भारत आ गए। 

* सिंध और पंजाब से सफाए जैसी स्थिति: पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तानी पंजाब) से लगभग पूरी हिंदू और सिख आबादी विस्थापित हो गई। कराची और सिंध के अन्य शहरों से भी संपन्न हिंदू व्यापारियों और नागरिकों को पलायन करना पड़ा। 

## 📉 3. 1951 की पहली जनगणना में गिरावट
विभाजन के इस भारी विस्थापन का असर पाकिस्तान की पहली आधिकारिक जनगणना (1951) में साफ दिखाई दिया: 

* आबादी का सिमटना: विस्थापन के कारण 1951 आते-आते पश्चिमी पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी घटकर मात्र 1.6% (लगभग 5.3 लाख) रह गई थी। जो हिंदू वहां रह गए, वे मुख्य रूप से सिंध प्रांत के ग्रामीण और थार मरुस्थल (जैसे थारपारकर जिला) के अत्यंत गरीब तबके के लोग थे।

* भ्रम का कारण: इंटरनेट या भाषणों में अक्सर जो दावा किया जाता है कि "पाकिस्तान में आजादी के समय 23% या 24% हिंदू थे जो अब 2% बचे हैं", वह भ्रम अविभाजित पाकिस्तान (पूर्वी + पश्चिमी) के सामूहिक आंकड़ों के कारण होता है। असल में, वह बड़ी आबादी (22%) पूर्वी पाकिस्तान (आज के बांग्लादेश) में थी, जबकि पश्चिमी पाकिस्तान में यह आंकड़ा शुरू से ही (विस्थापन के बाद) 1.6% के आसपास आ गया था। 

यदि आप चाहें, तो मैं आपको निम्नलिखित विषयों पर अधिक जानकारी दे सकता हूँ:

* विभाजन के समय कराची और लाहौर में हिंदुओं की संपत्तियों और उनकी स्थिति का विवरण 
* 1941 की जनगणना के अनुसार सिंध और पंजाब प्रांत में धार्मिक आबादी का विस्तृत जिला-वार चार्ट 
* विभाजन के बाद पाकिस्तान में बचे हिंदुओं (अनुसूचित जाति/मेघवाल/भील) की सामाजिक-आर्थिक स्थिति

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[भारत] में हिंदू बहुसंख्यक आबादी हैं जो कुल जनसंख्या का लगभग 79.8% (2011 की जनगणना के अनुसार) हैं, जबकि मुस्लिम आबादी 14.2% के साथ सबसे बड़ा धार्मिक अल्पसंख्यक समूह है। जनसंख्या असंतुलन, मुस्लिम जनसंख्या विस्फोट और हिंदुओं के अल्पसंख्यक होने से जुड़े दावों पर सांख्यिकीय और जनसांख्यिकीय (demographic) तथ्य नीचे दिए गए हैं: 

## 1. राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक होने का सच
भारत के सभी 28 राज्यों में से 8 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हिंदू आबादी 50% से कम यानी अल्पसंख्यक है: 
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[[लक्षद्वीप] यहाँ मुस्लिम आबादी सर्वाधिक (लगभग 96%) है।]
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[[कश्मीर] यहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी है (लगभग 68.3%)।
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[[लद्दाख]यहाँ बौद्ध और मुस्लिम आबादी अधिक संख्या में है।]
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[[मेघालय]: ये पूर्वोत्तर राज्य मुख्य रूप से ईसाई बहुसंख्यक हैं।]
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[[पंजाब]यहाँ सिख धर्म के अनुयायी बहुसंख्यक (लगभग 57.7%) हैं।]
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[[अरुणाचल प्रदेश]
यहाँ विभिन्न जनजातीय धर्म (डोनी-पोलो) और ईसाई धर्म को मानने वाले अधिक हैं।]

## 2. 'मुस्लिम जनसंख्या विस्फोट' का मिथक और वास्तविकता
विशेषज्ञों और वैश्विक शोध संस्थानों (जैसे [Pew Research Center] के डेटा के अनुसार, 'जनसंख्या विस्फोट' या मुसलमानों द्वारा हिंदुओं से आगे निकल जाने का दावा सांख्यिकीय रूप से सही नहीं है: 

* घटती प्रजनन दर (Fertility Rate): भारत के सभी धार्मिक समूहों में प्रजनन दर तेजी से गिर रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, मुस्लिम महिलाओं की प्रजनन दर में सबसे तेज़ गिरावट (4.4 से घटकर 2.36) दर्ज की गई है। 

* स्थिर अंतर: हिंदुओं की प्रजनन दर वर्तमान में 1.94 है। दोनों समुदायों के बीच प्रजनन दर का अंतर अब घटकर मात्र 0.42 रह गया है, जो लगातार कम हो रहा है। 

* जनसंख्या स्थिरता: जनसांख्यिकी विशेषज्ञों के अनुसार, अगले कुछ दशकों में भारत की मुस्लिम आबादी अधिकतम 18% तक पहुंच सकती है, लेकिन हिंदू हमेशा भारी बहुसंख्यक बने रहेंगे।

## 3. जनसंख्या असंतुलन और क्षेत्रीय बदलाव (Demographic Shift)
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) और अन्य शोध रिपोर्टों में कुछ क्षेत्रीय बदलावों का जिक्र किया गया है: -
* सीमावर्ती जिले: [असम] [पश्चिम बंगाल] [बिहार]और [उत्तर प्रदेश] के कुछ अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे जिलों में मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से अधिक देखी गई है। इसके मुख्य कारणों में स्थानीय पलायन, शिक्षा-आर्थिक स्थिति और कुछ क्षेत्रों में अवैध घुसपैठ को माना जाता है।

* सापेक्षिक हिस्सेदारी: 1950 से 2015 के बीच देश की कुल आबादी में हिंदुओं की सापेक्षिक हिस्सेदारी में करीब 7.8% की मामूली कमी आई है, जबकि मुस्लिम हिस्सेदारी बढ़ी है। इसका मतलब यह नहीं है कि हिंदुओं की संख्या घटी है; बल्कि दोनों समुदायों की कुल संख्या बढ़ी है, लेकिन मुस्लिमों की वृद्धि दर थोड़ी तेज रही है। 

जनसंख्या में बदलाव का मुख्य संबंध धर्म से ज्यादा शिक्षा, गरीबी, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और भौगोलिक स्थिति से होता है। जिन राज्यों में शिक्षा का स्तर बेहतर है (जैसे [केरल], वहां सभी धर्मों की जनसंख्या वृद्धि दर बेहद कम है।

यदि आप चाहें, तो मैं आपको निम्नलिखित जानकारी दे सकता हूँ:

* NFHS-5 के अनुसार विभिन्न राज्यों के धार्मिक जनसंख्या आंकड़े

* अवैध घुसपैठ पर गृह मंत्रालय की रिपोर्ट और कार्रवाई

* जनसंख्या नियंत्रण के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम

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क्या भारतीय मुसलमानों की बढ़ती आबादी के कारण हिंदू खतरे में हैं?

राम पुनियानी
18 मई 2024
 
 
जैसे-जैसे चुनाव का मौसम आगे बढ़ रहा है, विभाजनकारी दुष्प्रचार भी चरम पर पहुंच रहा है। सत्ताधारी भाजपा के मुख्य दुष्प्रचारक स्वयं प्रधानमंत्री मोदी हैं। इन चुनावों में उनका नारा इस झूठे दावे पर आधारित है कि यदि भारत गठबंधन सत्ता में आता है, तो वे मुसलमानों को सभी सुविधाएं देंगे, वे यह सुनिश्चित करेंगे कि मुसलमानों को जीने का पहला अधिकार मिले और वे संविधान में ऐसे बदलाव करेंगे जिससे हिंदू द्वितीय श्रेणी के नागरिक बन जाएंगे। यह एक तरह से जॉर्ज ऑरवेल की रणनीति है, जिसमें वास्तविकता को पूरी तरह से उलट दिया जाता है। हिंदुओं में यह भय फैलाया जा रहा है कि मुसलमान सभी विशेषाधिकारों का लाभ उठा लेंगे।

इस दुष्प्रचार को और हवा देने के लिए अब प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया है कि 1950 और 2015 के बीच हिंदुओं की जनसंख्या का हिस्सा लगभग 8% कम हो गया, जबकि इसी अवधि में मुसलमानों की जनसंख्या में रिकॉर्ड 43% की वृद्धि हुई। इस अध्ययन के अनुसार, 1950 में हिंदुओं की जनसंख्या का हिस्सा 84% था, जो 2015 में घटकर 78% हो गया। हालांकि, इसी अवधि में मुसलमानों, ईसाइयों, बौद्धों और सिखों सहित अल्पसंख्यकों का हिस्सा बढ़ गया। जनसंख्या में जैन और पारसियों की संख्या में कमी आई।

यह पीएमईएसी क्या है? इसका गठन 2017 में हुआ था और इसे प्रधानमंत्री को आर्थिक मामलों पर सलाह देने के लिए शोध करने का काम सौंपा गया है। इसके 'शोध' का एक नमूना कुछ साल पहले सामने आया था जब इसके प्रमुख बिबेक देबरॉय ने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा था, "... लिखित संविधानों की आयु केवल 17 वर्ष होती है।" भारत के वर्तमान संविधान को औपनिवेशिक विरासत बताते हुए उन्होंने आगे लिखा, "हमारा वर्तमान संविधान काफी हद तक 1935 के भारत सरकार अधिनियम पर आधारित है। इस लिहाज से यह भी एक औपनिवेशिक विरासत है।"

और अब आम चुनावों के समय यह अजीबोगरीब अध्ययन सामने आया है। इससे मुस्लिम विरोधी बयानबाजी और दशकों से चले आ रहे "हिंदू खतरे में हैं" के डर को और बल मिलता है। इस अध्ययन को तैयार करने वाले तीनों शोधकर्ताओं ने इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए विश्लेषण के अधिकांश मानदंडों का उल्लंघन किया है। सबसे पहले तो, जनसांख्यिकीय अध्ययन जनसंख्या जनगणना पर आधारित होते हैं। यह अध्ययन एसोसिएशन ऑफ रिलीजन डेटा आर्काइव (ARDA) के लगभग 23 लाख लोगों के सर्वेक्षण पर आधारित है, जो हमारी विशाल जनसंख्या का एक छोटा सा नमूना है। जनगणना के आंकड़े अधिक विश्वसनीय और व्यापक होते हैं, जो जनसंख्या वृद्धि के विभिन्न पहलुओं को उजागर करते हैं। सत्ताधारी दल के ही ज्ञात कारणों से 2021 की जनगणना, जो होनी थी, नहीं हुई और इन शोधकर्ताओं ने अधिक विश्वसनीय जनगणना आंकड़ों के बजाय सर्वेक्षण आंकड़ों का उपयोग किया है।

फिर यह अध्ययन 1950 और 2015 की जनसंख्या के आंकड़ों की तुलना करता है, जो कि एक मनमाना तरीका है। मीडिया और सांप्रदायिक संगठन इस आंकड़े का इस्तेमाल विभाजनकारी प्रचार को तेज करने के लिए कर रहे हैं। यह इस मौजूदा सामाजिक धारणा को मजबूत करता है कि मुसलमान अधिक बच्चे पैदा करते हैं। इसकी शुरुआत हमारे प्रधानमंत्री ने तब की थी जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। मुसलमानों द्वारा शरण लिए गए शरणार्थी शिविरों को बंद करने का फैसला करते हुए उन्होंने उन्हें 'बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां' कहा था। वर्तमान परिदृश्य में वे जोर-शोर से यह प्रचार कर रहे हैं कि कांग्रेस हिंदुओं के मंगलसूत्र और भैंसें छीनकर उन्हें दे देगी जो अधिक बच्चे पैदा करते हैं।

मुसलमानों द्वारा पैदा किए गए बच्चों की संख्या की सच्चाई क्या है? इसका सबसे अच्छा मापदंड कुल प्रजनन दर (टीएफआर) है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार सर्वेक्षण के अनुसार, अधिकांश समुदायों में प्रजनन दर घट रही है। 1992-93 में यह हिंदुओं के लिए 3.3 और मुसलमानों के लिए 4.41 थी। 2019-21 में यह हिंदुओं के लिए 1.94 और मुसलमानों के लिए 2.36 थी। इस प्रकार, हिंदुओं के लिए प्रतिशत परिवर्तन -41.21% और मुसलमानों के लिए -46.49% है। प्रतिशत में गिरावट हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों में अधिक है। इससे पता चलता है कि यदि यह पैटर्न जारी रहा तो मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर और भी कम हो जाएगी और हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर के करीब पहुंच जाएगी।

यह एक दिलचस्प पैटर्न है। स्थायी प्रश्न यह है कि क्या प्रजनन दर धर्म या अन्य कारकों द्वारा निर्धारित होती है। सांप्रदायिक राष्ट्रवादियों ने इस तथ्य पर जोर दिया है कि मुसलमान जानबूझकर हिंदुओं की तुलना में अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं ताकि वे इस राष्ट्र में बहुमत हासिल कर सकें और भारत को गजवा-ए-हिंद (मुसलमानों द्वारा भारत की विजय) घोषित कर सकें!

यह कहना सांप्रदायिक राजनीति के प्रमुख झूठों में से एक है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो हिंदू अल्पसंख्यक बन जाएंगे। पहला बिंदु यह है कि परिवार में बच्चों की संख्या को प्रभावित करने वाले कारक दो प्रमुख बातों पर निर्भर करते हैं। पहला है गरीबी का स्तर और दूसरा है समग्र रूप से समुदाय और विशेष रूप से महिलाओं की साक्षरता दर। यह बात तब स्पष्ट हो जाती है जब हम केरल, कश्मीर और कर्नाटक की मुस्लिम महिलाओं की प्रजनन दर की तुलना बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश की हिंदू महिलाओं की प्रजनन दर से करते हैं। इन राज्यों में मुस्लिम महिलाओं की प्रजनन दर कम है।

सस्वता घोष द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन में यह बताया गया है कि "इस प्रकार, जनगणना 2011 और जनगणना 2001 से अनुमानित हिंदुओं और मुसलमानों के बीच राज्य-स्तरीय प्रजनन दर के अंतर की तुलना करने पर यह पता लगाया जा सकता है कि यद्यपि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच प्रजनन दर में समग्र अभिसरण हो रहा है, फिर भी अभिसरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण क्षेत्रीय भिन्नताएं बनी हुई हैं क्योंकि विभिन्न राज्य और धार्मिक समूह संक्रमण के विभिन्न चरणों में हैं।"

एस.वाई. कुरैशी के अनुसार, जिनकी इस मुद्दे पर लिखी पुस्तक 'द पॉपुलेशन मिथ: इस्लाम, फैमिली प्लानिंग एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया' इस मुद्दे का काफी व्यापक विवरण प्रस्तुत करती है, भारत के 29 राज्यों में से 24 राज्यों में कुल प्रजनन दर (टीएफआर) पहले से ही 2.179 के करीब पहुंच रही है, जो एक स्थिर जनसंख्या का सूचक है, जबकि 2.1 केवल प्रतिस्थापन स्तर है।

अनुमान है कि 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम आबादी 14.2% है, जो 2050 तक स्थिर होकर 18% हो जाएगी और मुस्लिम समुदाय में मौजूदा रुझानों के अनुसार इसी स्तर पर बनी रहेगी। मुस्लिम आबादी की दशकवार वृद्धि दर में भी उल्लेखनीय गिरावट देखी जा रही है।

बेहतरीन अध्ययन के बावजूद, सांप्रदायिक लोग विभिन्न तरीकों से मुस्लिम समुदाय का मज़ाक उड़ाते हैं। मुझे एक घटना याद है जब मुस्लिम अभिजात वर्ग के एक दल ने आरएसएस सरसंघचालक से मिलने का समय मांगा। डॉ. कुरैशी उस दल के सदस्य थे। उन्होंने भागवत को अपनी वह पुस्तक भेंट की जिसमें आरएसएस गठबंधन द्वारा फैलाई गई धारणाओं का खंडन किया गया है। और कुछ ही हफ्तों बाद सरसंघचालक ने एक बयान में कहा कि विभिन्न समुदायों में 'जनसंख्या संतुलन' होना चाहिए! राम पुनियानी की आगामी पुस्तक "रीडिंग सावरकर" 

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