जाति व्यवस्था: कौशल विकास और धार्मिक सुरक्षा कवच
जाति व्यवस्था: कौशल विकास और धार्मिक सुरक्षा कवच या विदेशी दुष्प्रचार ? — अरविन्द सिसोदिया
वर्तमान दौर में जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान को पुनः स्थापित कर रहा है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपने अतीत के सामाजिक ताने-बाने का निष्पक्ष पुनर्मूल्यांकन करें। लंबे समय से भारतीय समाज को पिछड़ेपन और कुरीतियों का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया जाता रहा है। विशेषकर भारत की पारंपरिक जाति (वर्ण) व्यवस्था को हमेशा एक शोषक तंत्र के रूप में ही रेखांकित किया गया। परंतु, यदि हम औपनिवेशिक चश्मे को उतारकर भारतीय दृष्टिकोण से देखें, तो यह व्यवस्था वास्तव में अपने समय की सबसे अनूठी कौशल विकास योजना (Skill Development Program) होने के साथ-साथ समाज का एक अभेद्य धार्मिक और सांप्रदायिक सुरक्षा कवच भी थी। जिसे बाद में विदेशी आक्रांताओं और ब्रिटिश नीतिशिल्पियों द्वारा एक सोचे-समझे षड्यंत्र के तहत दुष्प्रचारित किया गया।
पारिवारिक गुरुकुल और शत-प्रतिशत रोजगार की गारंटी
प्राचीन भारत में ज्ञान, शिल्प और हुनर का हस्तांतरण आज की तरह महंगे विश्वविद्यालयों या कागजी डिग्रियों पर निर्भर नहीं था। उस दौर में हर घर और हर व्यवसाय अपने आप में एक आत्मनिर्भर 'कौशल विकास केंद्र' था। पिता से पुत्र या पुत्री को मिलने वाला व्यावहारिक ज्ञान बिना किसी अतिरिक्त राजसी या सामाजिक खर्च के उच्चतम स्तर की व्यावसायिक निपुणता सुनिश्चित करता था।
लोहार, सुनार, बुनकर, शिल्पी, वैद्य और कृषक—सभी अपनी-अपनी विधाओं के अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ थे। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसमें रोजगार की शत-प्रतिशत गारंटी थी। किसी भी युवा को आजीविका के लिए भटकना नहीं पड़ता था, क्योंकि जन्म के साथ ही उसे एक सुरक्षित कार्यक्षेत्र और हुनर विरासत में मिल जाता था। इसी विकेंद्रीकृत कौशल विकास के बल पर भारत कपड़ा, धातु विज्ञान, वास्तुकला और जहाजरानी जैसे क्षेत्रों में सदियों तक दुनिया का सिरमौर बना रहा और वैश्विक व्यापार में हमारी हिस्सेदारी सबसे अधिक थी।
मजहबी आक्रमणों के दौर में 'सांस्कृतिक ढाल'
इस व्यवस्था का एक और सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहलू यह है कि इसने संकट के समय समाज को वैचारिक और धार्मिक रूप से बिखरने से बचाया। मध्यकाल में जब भारत पर क्रूर विदेशी और मजहबी आक्रांताओं के आक्रमण हुए, तब उनका मुख्य उद्देश्य तलवार के बल पर सामूहिक धर्मांतरण कराना और भारतीय संस्कृति को समूल नष्ट करना था।
ऐसे भीषण संकट काल में जाति व्यवस्था ने एक अभेद्य सामाजिक ढाल का काम किया। चूंकि समाज छोटी-छोटी जातियों और उपजातियों में आंतरिक रूप से बेहद सुदृढ़ता से बंधा हुआ था, इसलिए विदेशी शासकों के लिए पूरे समाज को एक साथ प्रभावित करना या उनका सामूहिक धर्मांतरण कराना असंभव हो गया। यदि किसी राजा या नेतृत्वकर्ता को झुका भी लिया गया, तो भी समाज की अंतर्निहित जातियों ने अपनी अस्मिता, अपनी परंपराओं और अपनी पूजा पद्धति को नहीं छोड़ा। जातियों की इसी आंतरिक मज़बूती और रोटी-बेटी के कड़े सामाजिक नियमों के कारण, सदियों के मजहबी दमन और लालच के बाद भी भारत का मूल ताना-बाना और सनातन धर्म सुरक्षित रहा। जबकि इसके विपरीत, दुनिया की कई महान सभ्यताएं (जैसे रोम, यूनान और मिस्र) विदेशी आक्रमणों के सामने ताश के पत्तों की तरह बिखर गईं और उनका मूल स्वरूप ही नष्ट हो गया।
औपनिवेशिक षड्यंत्र और विकृत विमर्श की शुरुआत
प्रश्न उठता है कि जो व्यवस्था आर्थिक रूप से इतनी समृद्ध और धार्मिक रूप से इतनी सुरक्षित थी, वह अचानक अभिशाप कैसे बन गई? इसका उत्तर विदेशी शक्तियों के रणनीतिक षड्यंत्र में छिपा है। भारत को मानसिक, आर्थिक और धार्मिक रूप से गुलाम बनाने के लिए अंग्रेजों ने सबसे पहले इसी पारंपरिक व्यवस्था पर प्रहार किया।
लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति का उद्देश्य भारत के इस व्यावहारिक हुनर को नष्ट कर उसे केवल 'क्लर्क' पैदा करने वाली व्यवस्था में बदलना था। रही-सही कसर ब्रिटिश जनगणना अधिकारियों (जैसे हर्बर्ट रिजली) ने पूरी कर दी। उन्होंने भारत की अत्यंत लचीली सामाजिक संरचना को—जहां कर्म और योग्यता के आधार पर वर्ण परिवर्तन संभव था—जातियों के कठोर और ऊंच-नीच के खांचे में बांट दिया। 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत इस व्यवस्था को आपस में लड़ाने का माध्यम बना दिया गया। दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता के बाद भी विदेशी वित्तपोषित विचारकों (नरेटिव सेटर्स) ने इसी औपनिवेशिक दुष्प्रचार को जीवित रखा ताकि भारतीय समाज कभी एक सूत्र में न बंध सके।
निष्कर्ष: वैचारिक स्वतंत्रता की आवश्यकता
आज सरकारें जिस 'स्किल इंडिया' के लिए अरबों रुपये का बजट आवंटित कर रही हैं, वह मूल संरचना हमारे पूर्वजों ने हजारों साल पहले सहज रूप से विकसित कर ली थी। समय के साथ व्यवस्था में कुछ विसंगतियां और कुरीतियां अवश्य आईं, जिन्हें सुधारना और पूरी तरह मिटाना अनिवार्य है। परंतु, कुरीतियों को दूर करने के नाम पर अपनी मूल वैज्ञानिक, आर्थिक और सुरक्षात्मक धरोहर को ही लांछित करना आत्मघाती है।
अखबारों और बौद्धिक मंचों के माध्यम से आज यह विमर्श खड़ा करने की आवश्यकता है कि हम अपने गौरवशाली इतिहास को विदेशी चश्मे से देखना बंद करें। जब तक हम इस औपनिवेशिक दुष्प्रचार के जाल को तोड़कर अपनी पारंपरिक सामाजिक क्षमता का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक पुनर्प्राप्ति का संकल्प अधूरा रहेगा।
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जाति व्यवस्था: समाज की कौशल विकास योजना या विदेशी दुष्प्रचार का शिकार?
— अरविन्द सिसोदिया
वर्तमान दौर में जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान को पुनः स्थापित कर रहा है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपने अतीत के सामाजिक ताने-बाने का पुनर्मूल्यांकन करें। लंबे समय से विशिष्ट षड्यंत्र के तहत,भारतीय समाज को पिछड़ेपन और कुरीतियों का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया जाता रहा है। विशेषकर भारत की पारंपरिक जाति (वर्ण) व्यवस्था को हमेशा एक शोषणकारी तंत्र के रूप में दिखाया गया। परंतु, यदि हम औपनिवेशिक चश्मे को उतारकर भारतीय दृष्टिकोण से देखें, तो यह व्यवस्था वास्तव में अपने समय की सबसे अनूठी कौशल विकास योजना (Skill Development Program) और आर्थिक सुरक्षा चक्र थी। जिसे बाद में विदेशी आक्रांताओं और ब्रिटिश नीतिशिल्पियों द्वारा एक सोचे-समझे षड्यंत्र के तहत दुष्प्रचारित किया गया।
पारिवारिक गुरुकुल और रोजगार की अचूक गारंटी
प्राचीन भारत में ज्ञान, शिल्प और हुनर का हस्तांतरण आज की तरह महंगे विश्वविद्यालयों या कागजी डिग्रियों पर निर्भर नहीं था। उस दौर में हर घर और हर व्यवसाय अपने आप में एक 'कौशल विकास केंद्र' था। पिता से पुत्र या पुत्री को मिलने वाला व्यावहारिक ज्ञान बिना किसी अतिरिक्त राजसी या सामाजिक खर्च के उच्चतम स्तर की निपुणता सुनिश्चित करता था।
लोहार, सुनार, बुनकर, शिल्पी, वैद्य और कृषक—सभी अपनी-अपनी विधाओं के विशेषज्ञ थे। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसमें रोजगार की शत-प्रतिशत गारंटी थी। किसी भी युवा को रोजगार के लिए भटकना नहीं पड़ता था, क्योंकि जन्म के साथ ही उसे एक सुरक्षित कार्यक्षेत्र और हुनर विरासत में मिल जाता था। इसी विकेंद्रीकृत (Decentralized) कौशल विकास के बल पर भारत कपड़ा, धातु विज्ञान, वास्तुकला और जहाजरानी जैसे क्षेत्रों में सदियों तक दुनिया का सिरमौर बना रहा और वैश्विक व्यापार में हमारी हिस्सेदारी सबसे अधिक थी।
विदेशी षड्यंत्र और विकृत विमर्श की शुरुआत
प्रश्न उठता है कि जो व्यवस्था इतनी समृद्ध और आत्मनिर्भर थी, वह अचानक अभिशाप कैसे बन गई? इसका उत्तर विदेशी शक्तियों के रणनीतिक षड्यंत्र में छिपा है। भारत को मानसिक और आर्थिक रूप से गुलाम बनाने के लिए अंग्रेजों ने सबसे पहले इसी पारंपरिक कौशल व्यवस्था पर प्रहार किया।
लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति का उद्देश्य भारत के इस व्यावहारिक हुनर को नष्ट कर उसे केवल 'क्लर्क' पैदा करने वाली व्यवस्था में बदलना था। रही-सही कसर ब्रिटिश जनगणना अधिकारियों (जैसे हर्बर्ट रिजली) ने पूरी कर दी। उन्होंने भारत की अत्यंत लचीली सामाजिक संरचना को—जहां कर्म और योग्यता के आधार पर वर्ण परिवर्तन संभव था—जातियों के कठोर और ऊंच-नीच के खांचे में बांट दिया। 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत इस व्यवस्था को आपस में लड़ाने का माध्यम बना दिया गया। दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता के बाद भी विदेशी वित्तपोषित विचारकों (नरेटिव सेटर्स) ने इसी औपनिवेशिक दुष्प्रचार को जीवित रखा ताकि भारतीय समाज कभी एक सूत्र में न बंध सके।
समय की मांग: वैचारिक स्वतंत्रता
आज केंद्र और राज्य सरकारें जिस 'स्किल इंडिया' या कौशल विकास मिशन के लिए अरबों रुपये का बजट आवंटित कर रही हैं, वह मूल संरचना हमारे पूर्वजों ने हजारों साल पहले सहज और सामाजिक रूप से विकसित कर ली थी। समय के साथ व्यवस्था में कुछ विसंगतियां और कुरीतियां अवश्य आईं, जिन्हें सुधारना और पूरी तरह मिटाना अनिवार्य है। परंतु, कुरीतियों को दूर करने के नाम पर अपनी मूल वैज्ञानिक और आर्थिक धरोहर को ही लांछित करना आत्मघाती है।
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