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जाति व्यवस्था: कौशल विकास और धार्मिक सुरक्षा कवच

जाति व्यवस्था: कौशल विकास और धार्मिक सुरक्षा कवच या विदेशी दुष्प्रचार ?  — अरविन्द सिसोदिया वर्तमान दौर में जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान को पुनः स्थापित कर रहा है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपने अतीत के सामाजिक ताने-बाने का निष्पक्ष पुनर्मूल्यांकन करें। लंबे समय से भारतीय समाज को पिछड़ेपन और कुरीतियों का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया जाता रहा है। विशेषकर भारत की पारंपरिक जाति (वर्ण) व्यवस्था को हमेशा एक शोषक तंत्र के रूप में ही रेखांकित किया गया। परंतु, यदि हम औपनिवेशिक चश्मे को उतारकर भारतीय दृष्टिकोण से देखें, तो यह व्यवस्था वास्तव में अपने समय की सबसे अनूठी कौशल विकास योजना (Skill Development Program) होने के साथ-साथ समाज का एक अभेद्य धार्मिक और सांप्रदायिक सुरक्षा कवच भी थी। जिसे बाद में विदेशी आक्रांताओं और ब्रिटिश नीतिशिल्पियों द्वारा एक सोचे-समझे षड्यंत्र के तहत दुष्प्रचारित किया गया। पारिवारिक गुरुकुल और शत-प्रतिशत रोजगार की गारंटी प्राचीन भारत में ज्ञान, शिल्प और हुनर का हस्तांतरण आज की तरह महंगे विश्वविद्यालयों या कागजी डिग्रियों पर निर्भर नहीं ...