हिंदू वोट में तोड़ की खातिर,चंदा-चंदा चिल्लाते हो...
हिंदू वोट में तोड़ की खातिर,
चंदा-चंदा चिल्लाते हो...
कभी वक्फ़ पर बोले क्या,
कभी गिरजा खोले क्या,
डरपोक तुम अपनी ही खिल्ली उड़ाते हो,
हिंदू वोट में तोड़ की खातिर,
चंदा-चंदा चिल्लाते हो।
सत्ता की सीढ़ी चढ़ने को,
रोज़ नए नारे गढ़ते हो,
जनता के असली मुद्दों से,
हर दिन नज़रें हटाते हो।
रोज़गार की बात दबाकर,
महँगाई पर चुप रहते हो,
जाति-धर्म की आँधी लाकर,
अपना मतलब साधते हो।
जन-जन की उम्मीदों को,
भाषण में ही टालते हो,
जब सवाल जवाब माँगते हैं,
विषय नया उछालते हो।
देश तभी मज़बूत बनेगा,
जब सच का साथ निभाओगे,
वोट नहीं, विश्वास कमाओ,
तब जनमन में बस पाओगे।
===(1)====
चंदा-चंदा चिल्लाते हो
हिंदू वोट में तोड़ की खातिर,
चंदा-चंदा चिल्लाते हो...
कभी वक्फ़ पर बोले क्या,
कभी गिरजा खोले क्या,
मौका देख के सुर बदलो,
फिर खुद को ही सराहते हो।
हिंदू वोट में तोड़ की खातिर,
चंदा-चंदा चिल्लाते हो।
कल तक जिनको कोस रहे थे,
आज उन्हीं के द्वार खड़े,
कुर्सी जैसे ही दूर दिखे,
बदल गए सब बोल बड़े।
वादों की गठरी भारी-भारी,
सच का थैला खाली है,
हर मौसम में रंग बदलना,
अब तो नई दलाली है।
जनता पूछे रोज़ सवाल,
उत्तर कहीं दिखाई दे?
रोटी, रोज़ी, शिक्षा, पानी,
इन पर भी सुनवाई दे।
मंदिर, मस्जिद, मंच, माइक सब,
चुनावी मौसम के साथी हैं,
मतदाता की याद सभी को,
बस मतदान तक रहती है।
लोकतंत्र की यही कसौटी—
बात नहीं, व्यवहार कहे;
जो कल बोले, आज भी बोले,
वही भरोसे के योग्य रहे।
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चुनाव आते ही मौसम बदला,
सिद्धांतों का मोल घटा।
कल जो कहते "दूर रहेंगे",
आज वही हर द्वार खड़ा।
कल तक जिनसे दूरी थी,
आज उन्हें ही गले लगाते।
कुर्सी की आहट क्या सुन ली,
रास्ते सारे बदलते जाते।
बातों में आदर्श बहुत हैं,
कर्मों में हिसाब अलग।
जनता सब कुछ देख रही है,
चेहरा और नकाब अलग।
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