सोनिया बनाम सोनाली



वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद सुब्रमण्यम स्वामी ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल (इटली) और नागरिकता को लेकर सबसे पहली और प्रमुख कानूनी आपत्ति दर्ज कराई थी। [


इसी आपत्ति और राजनीतिक दबाव के बाद ही सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद की दौड़ से खुद को पीछे हटा लिया था और डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने थे। 


सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा उठाई गई मुख्य कानूनी आपत्तियां और पूरा घटनाक्रम इस प्रकार है:-
## 1. पारस्परिक कानून (Reciprocity Clause) की आपत्ति
सुब्रमण्यम स्वामी ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को पत्र लिखकर [भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5](http://bharatkalyan97.blogspot.com/2012/04/citizenship-act-sonia-gandhi-dr.html) का हवाला दिया था। स्वामी का तर्क था: -

* भारत के नागरिकता कानून में 'पारस्परिक व्यवहार' (Reciprocity) का एक नियम है। इसके तहत, यदि किसी विदेशी देश के कानून में भारतीय मूल के नागरिकों को वहां का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनने की अनुमति नहीं है, तो उस देश का नागरिक भी भारत की नागरिकता लेकर यहाँ का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। 

* चूंकि इटली के कानून के अनुसार, वहां जन्म न लेने वाला व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता था, इसलिए स्वामी का तर्क था कि सोनिया गांधी भी भारत की प्रधानमंत्री बनने के योग्य नहीं हैं। 


## 2. नागरिकता की वैधता पर सवाल (2002 का कोर्ट केस)
2004 से पहले, वर्ष 2002 में भी सुब्रमण्यम स्वामी ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी को दी गई भारतीय नागरिकता में नियमों की अनदेखी हुई है। उनका कहना था कि जब सोनिया गांधी ने भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया, तब इतालवी सरकार ने उनकी इतालवी नागरिकता छोड़ने का आधिकारिक पत्र जारी नहीं किया था, जो भारतीय कानून के तहत अनिवार्य है। 

## 3. शैक्षणिक योग्यता पर आपत्ति
सुब्रमण्यम स्वामी ने सोनिया गांधी के चुनाव हलफनामे (Affidavit) में उनकी शैक्षणिक योग्यता (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के दावे) को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि, 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी की इस याचिका को खारिज कर दिया था और कहा था कि इस मामले में कानूनी तौर पर कोई चुनावी कदाचार साबित नहीं होता। 

## अंतिम परिणाम क्या रहा?
भले ही भारतीय संविधान किसी भी नागरिक (चाहे वह प्राकृतिक रूप से नागरिक बना हो) को तकनीकी रूप से प्रधानमंत्री बनने से नहीं रोकता, लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा उठाए गए इन तीखे संवैधानिक और कानूनी सवालों (Legal Hitches) और राष्ट्रपति भवन को लिखे पत्रों के कारण एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था। इस बड़े विवाद, कानूनी अड़चनों और अपनी "अंतरात्मा की आवाज" का हवाला देते हुए सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री न बनने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। 

[1] [https://deeshaa.org](https://deeshaa.org/2011/02/14/subramanian-swamy-aims-to-nail-antonia-maino-aka-sonia-gandhi/)
[2] [https://www.legalserviceindia.com](https://www.legalserviceindia.com/legal/article-4611-the-constitutional-reason-for-sonia-gandhi-not-becoming-the-pm.html)
[3] [https://lifepolitics.quora.com](https://translate.google.com/translate?u=https://lifepolitics.quora.com/Dr-Subramanian-Swamy-reveals-the-real-reason-behind-why-Sonia-Gandhi-didn-t-become-the-Prime-Minister-of-India&hl=hi&sl=en&tl=hi&client=sge)
[4] [https://www.quora.com](https://www.quora.com/Why-was-Sonia-Gandhi-not-eligible-for-the-PM-post-in-the-2003-Lok-Sabha-elections-in-India)
[5] [https://www.scribd.com](https://www.scribd.com/document/482228536/L19BALB111-AADHITYA-NARAYANAN)
[6] [https://bharatkalyan97.blogspot.com](http://bharatkalyan97.blogspot.com/2012/04/citizenship-act-sonia-gandhi-dr.html)
[7] [https://www.youtube.com](https://www.youtube.com/watch?v=mJvrnb793LI&t=32)
[8] [https://frontline.thehindu.com](https://frontline.thehindu.com/other/article30246716.ece)
[9] [https://frontline.thehindu.com](https://frontline.thehindu.com/other/article30246298.ece)
[10] [https://www.bhaskar.com](https://www.bhaskar.com/news/sonia-gandhi-was-a-waiter-in-cambridge-says-bjp-leader-subramanian-swamy-5868134.html)
[11] [https://timesofindia.indiatimes.com](https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-dismisses-swamys-petition-against-sonia/articleshow/2060751.cms)
[12] [https://timesofindia.indiatimes.com](https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-dismisses-petition-on-sonias-false-affidavit/articleshow/2060369.cms)
[13] [https://www.facebook.com](https://www.facebook.com/groups/SubramanianSwamy/posts/2951075521653891/)
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भारत के नागरिकता अधिनियम, 1955 और भारतीय संविधान के तहत विदेशी नागरिकों (शत्रु देश के नागरिकों को छोड़कर) को सीमित लेकिन महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं। इन अधिकारों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में समझा जा सकता है: 

India Code
 +1
1. नागरिकता प्राप्त करने का कानूनी अधिकार
नागरिकता कानून विदेशी नागरिकों को कुछ निश्चित शर्तों के तहत भारत की नागरिकता (Citizenship) हासिल करने का अधिकार देता है: 

PRSIndia
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देशीकरण द्वारा (By Naturalization): कोई भी विदेशी नागरिक जो कानूनी रूप से भारत में 12 साल (आवेदन से ठीक पहले 12 महीने लगातार और पिछले 14 सालों में से 11 साल) से रह रहा हो, वह नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है। 

Manupatra
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विवाह के आधार पर (By Registration): यदि कोई विदेशी नागरिक किसी भारतीय नागरिक से विवाह करता है, तो भारत में 7 वर्ष सामान्य निवास पूरा करने के बाद उसे नागरिकता पाने का अधिकार है। 

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·TheWire.in
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत छूट: पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए पीड़ित गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) के लिए प्राकृतिक आवास की इस अवधि को 11 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया है। 

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·Drishti IAS : English
2. प्रवासी भारतीयों के लिए विशेष अधिकार (OCI Cardholders)
नागरिकता अधिनियम की धारा 7B के तहत भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड प्राप्त करने का अधिकार है। इसके तहत उन्हें निम्नलिखित लाभ मिलते हैं: 

Ministry of External Affairs
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भारत आने के लिए आजीवन मल्टीपल-एंट्री वीजा। 

Embassy of India Bratislava, Slovak Republic
भारत में कितनी भी अवधि तक रहने के लिए स्थानीय पुलिस (FRRO) के पास रजिस्ट्रेशन से छूट। 

PARI - People's Archive of Rural India
आर्थिक, वित्तीय और शैक्षणिक क्षेत्रों में अप्रवासी भारतीयों (NRIs) के समान अधिकार (कृषि भूमि खरीदने को छोड़कर)। 
3. भारतीय संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकार
भारत में रह रहे किसी भी विदेशी नागरिक को संविधान के तहत कुछ बुनियादी मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) प्राप्त हैं: 

Drishti IAS
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अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता और कानूनों का समान संरक्षण।
अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में कानूनी संरक्षण।
अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता (जीवन जीने और व्यक्तिगत आजादी) का अधिकार।
अनुच्छेद 21A: शिक्षा का अधिकार (6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए)।
अनुच्छेद 22: कुछ मामलों में मनमानी गिरफ्तारी और नजरबंदी से संरक्षण।
अनुच्छेद 23 और 24: मानव तस्करी, जबरन श्रम और बाल श्रम के विरुद्ध अधिकार।
अनुच्छेद 25 से 28: भारत के नियमों के दायरे में रहकर किसी भी धर्म को मानने और उसकी पूजा करने की स्वतंत्रता। 

Drishti IAS
 +4
विदेशी नागरिकों को कौन से अधिकार नहीं हैं?
विदेशी नागरिकों (OCI कार्डधारकों सहित) को भारत में राजनीतिक और संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं: 

Embassy of India Bratislava, Slovak Republic
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वे भारत में वोट नहीं डाल सकते।
वे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सांसद, विधायक या जज जैसे संवैधानिक पदों पर नहीं बैठ सकते।
उन्हें सरकारी नौकरियों (लोक नियोजन) में अवसर की समानता का अधिकार नहीं है।
उन्हें अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता या देश में कहीं भी स्थाई रूप से बसने की आजादी (अनुच्छेद 19) नहीं है। 

Ministry of External Affairs
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यदि आप किसी विशिष्ट श्रेणी जैसे टूरिस्ट वीजा धारक, अवैध अप्रवासी या OCI कार्डधारक के अधिकारों के बारे में जानना चाहते हैं, तो कृपया नीचे दिए गए विकल्पों में से चुनें:
मुझे OCI कार्डधारकों के अधिकारों की विस्तृत जानकारी दें।
भारत में अवैध प्रवासियों (Illegal Migrants) के लिए क्या कानूनी नियम हैं?
विदेशी नागरिकों के लिए भारत में प्रॉपर्टी खरीदने के क्या नियम हैं?






14 साइटें
भारत का संविधान प्राकृतिक रूप से नागरिकता लेने वाले (Naturalized) विदेशी नागरिकों को चुनाव लड़ने और राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे सभी उच्च पदों पर बैठने का पूरा अधिकार देता है। इटली या अमेरिका जैसे देशों के विपरीत, भारत का कानून जन्म से नागरिक और कानूनी प्रक्रिया द्वारा नागरिक बने व्यक्ति में कोई भेदभाव नहीं करता है। 

Testbook
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यदि इटली (या किसी भी अन्य देश) का कोई नागरिक अपनी मूल नागरिकता छोड़कर कानूनी रूप से भारत की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो उसे वे सभी राजनैतिक अधिकार मिल जाते हैं जो एक जन्मजात भारतीय को प्राप्त हैं। 

Testbook
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संवैधानिक प्रावधानों और वैश्विक तुलना के आधार पर इसे निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
1. भारत और अमेरिका/इटली के कानूनों में अंतर
भारत में नियम: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 58 (राष्ट्रपति पद की योग्यता) और अनुच्छेद 84 (सांसद पद की योग्यता) में केवल यह लिखा है कि व्यक्ति को "भारत का नागरिक" होना चाहिए। संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि उसका जन्म से ही भारतीय होना अनिवार्य है। 

Indian Kanoon
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अमेरिका में नियम: अमेरिका का संविधान केवल वहां "जन्म से नागरिक" (Natural-born citizen) व्यक्ति को ही राष्ट्रपति बनने की अनुमति देता है। प्राकृतिक रूप से नागरिकता लेने वाला व्यक्ति वहां का राष्ट्रपति नहीं बन सकता। 

Testbook
इटली में नियम: इटली में भी दोहरी नागरिकता और राजनीतिक अधिकारों को लेकर कुछ सख्त नियम हैं, जिसके कारण वहां गैर-यूरोपीय मूल के नए नागरिकों के लिए उच्च पदों पर तुरंत पहुंचना या चुनाव लड़ना कठिन होता है। 
2. व्यावहारिक उदाहरण (सोनिया गांधी का मामला)
वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद जब इटली में जन्मीं सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की बात चल रही थी, तब विपक्षी दलों ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाया था। हालांकि, कानूनी तौर पर उनके प्रधानमंत्री बनने में कोई संवैधानिक अड़चन नहीं थी। भारत के चुनाव आयोग (ECI) और कोर्ट के नियमों के अनुसार, चूंकि उन्होंने 1983 में ही भारत की नागरिकता ले ली थी, इसलिए वे चुनाव लड़ने और देश का सर्वोच्च कार्यकारी पद (प्रधानमंत्री) संभालने के लिए पूरी तरह योग्य थीं। उन्होंने अपनी स्वेच्छा से प्रधानमंत्री पद न लेने का फैसला किया था। 

Politics Stack Exchange
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3. नागरिकता मिलने के बाद मिलने वाले राजनीतिक अधिकार
एक बार भारत सरकार द्वारा नागरिकता प्रमाणपत्र (Citizenship Certificate) जारी होने के बाद, उस व्यक्ति को निम्नलिखित अधिकार स्वतः मिल जाते हैं:
मतदान का अधिकार: वह मतदाता सूची (Voter List) में अपना नाम दर्ज करा सकता है और वोट दे सकता है। 

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·Aaj Tak
चुनाव लड़ने का अधिकार: वह ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा और राज्यसभा तक का चुनाव लड़ सकता है। 
संवैधानिक पदों की पात्रता: वह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट का जज या राज्यपाल जैसे किसी भी उच्च पद पर बैठ सकता है। 

www.constitutionofindia.net
 +1
एकमात्र प्रतिबंध: दोहरी नागरिकता की मनाही
भारत का संविधान दोहरी नागरिकता (Dual Citizenship) की अनुमति नहीं देता है। इसलिए, यदि इटली का कोई नागरिक भारत में ये सभी राजनैतिक अधिकार चाहता है, तो उसे अनिवार्य रूप से अपनी इतालवी नागरिकता और पासपोर्ट पूरी तरह छोड़ना होगा। जब तक वह विदेशी नागरिक है या केवल ओसीआई (OCI) कार्डधारक है, तब तक उसे भारत में कोई राजनैतिक अधिकार नहीं मिलेगा। 

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·Drishti IAS
 +3
यदि आप इस विषय पर कुछ और जानना चाहते हैं, तो कृपया बताएं:
क्या संसद में विदेशी मूल के नागरिकों को प्रतिबंधित करने के लिए कभी कोई कानून या बिल लाया गया है?
विदेशी नागरिकता छोड़ने और भारतीय नागरिकता लेने की पूरी कानूनी प्रक्रिया क्या है?






13 साइटें
हाँ, यह बिल्कुल सही है। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद सुब्रमण्यम स्वामी ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल (इटली) और नागरिकता को लेकर सबसे पहली और प्रमुख कानूनी आपत्ति दर्ज कराई थी। 
इसी आपत्ति और राजनीतिक दबाव के बाद ही सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद की दौड़ से खुद को पीछे हटा लिया था और डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने थे। 
सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा उठाई गई मुख्य कानूनी आपत्तियां और पूरा घटनाक्रम इस प्रकार है:
1. पारस्परिक कानून (Reciprocity Clause) की आपत्ति
सुब्रमण्यम स्वामी ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को पत्र लिखकर भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5 का हवाला दिया था। स्वामी का तर्क था: 
भारत के नागरिकता कानून में 'पारस्परिक व्यवहार' (Reciprocity) का एक नियम है। इसके तहत, यदि किसी विदेशी देश के कानून में भारतीय मूल के नागरिकों को वहां का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनने की अनुमति नहीं है, तो उस देश का नागरिक भी भारत की नागरिकता लेकर यहाँ का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। 

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·Dinamalar
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चूंकि इटली के कानून के अनुसार, वहां जन्म न लेने वाला व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता था, इसलिए स्वामी का तर्क था कि सोनिया गांधी भी भारत की प्रधानमंत्री बनने के योग्य नहीं हैं। 

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·Dinamalar
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2. नागरिकता की वैधता पर सवाल (2002 का कोर्ट केस)
2004 से पहले, वर्ष 2002 में भी सुब्रमण्यम स्वामी ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी को दी गई भारतीय नागरिकता में नियमों की अनदेखी हुई है। उनका कहना था कि जब सोनिया गांधी ने भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया, तब इतालवी सरकार ने उनकी इतालवी नागरिकता छोड़ने का आधिकारिक पत्र जारी नहीं किया था, जो भारतीय कानून के तहत अनिवार्य है। 

Frontline Magazine
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3. शैक्षणिक योग्यता पर आपत्ति
सुब्रमण्यम स्वामी ने सोनिया गांधी के चुनाव हलफनामे (Affidavit) में उनकी शैक्षणिक योग्यता (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के दावे) को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि, 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी की इस याचिका को खारिज कर दिया था और कहा था कि इस मामले में कानूनी तौर पर कोई चुनावी कदाचार साबित नहीं होता। 

Dainik Bhaskar
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अंतिम परिणाम क्या रहा?
भले ही भारतीय संविधान किसी भी नागरिक (चाहे वह प्राकृतिक रूप से नागरिक बना हो) को तकनीकी रूप से प्रधानमंत्री बनने से नहीं रोकता, लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा उठाए गए इन तीखे संवैधानिक और कानूनी सवालों (Legal Hitches) और राष्ट्रपति भवन को लिखे पत्रों के कारण एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था। इस बड़े विवाद, कानूनी अड़चनों और अपनी "अंतरात्मा की आवाज" का हवाला देते हुए सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री न बनने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। 

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एआई गलती कर सकता है, इसलिए इसके जवाबों की दोबारा जांच कर लें


आपको कौनसा जवाब पसंद है?
आपकी राय से हमें एआई मोड को आपके साथ-साथ सभी के लिए बेहतर बनाने में मदद मिलती है.

जवाब B
कानूनी और संवैधानिक तौर पर सोनिया गांधी का लोकसभा या राज्यसभा सांसद बनना पूरी तरह से वैध है और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपनी अंतिम मुहर लगाई है।
आपके इस तर्क को समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि क्यों 'पारस्परिक व्यवहार' (Reciprocity Rule) के बावजूद उनका सांसद चुना जाना गैर-कानूनी नहीं ठहराया जा सका:
1. सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला (2001)
सोनिया गांधी की नागरिकता और उनके चुनाव लड़ने की योग्यता को लेकर विभिन्न अदालतों में कई याचिकाएं दायर की गई थीं। इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2001 में 'हरि शंकर जैन बनाम सोनिया गांधी' मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। 

Indian Kanoon
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सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने स्पष्ट किया कि सोनिया गांधी भारत की एक वैध नागरिक (Valid Citizen) हैं। 

LawBeat
कोर्ट ने कहा कि एक बार जब भारत सरकार (गृह मंत्रालय) किसी को नागरिकता अधिनियम के तहत नागरिकता प्रमाणपत्र जारी कर देती है, तो वह व्यक्ति देश का नागरिक बन जाता है। भारत का संविधान चुनाव लड़ने के लिए केवल 'भारत का नागरिक' होने की शर्त रखता है, इसलिए वे चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह पात्र हैं। 

The Times of India
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2. नागरिकता और चुनाव लड़ने के अधिकार में अंतर
नागरिकता कानून की जिस धारा और 'पारस्परिक व्यवहार' (Reciprocity) का तर्क सुब्रमण्यम स्वामी ने दिया था, वह नागरिकता देने या न देने के अधिकार से जुड़ा है।
सोनिया गांधी को नागरिकता कब मिली?: सोनिया गांधी को अप्रैल 1983 में भारत की नागरिकता (पंजीकरण/Registration द्वारा) मिल चुकी थी। 
नियम का प्रभाव: 'पारस्परिक व्यवहार' का नियम तब लागू किया जा सकता था जब उन्हें नागरिकता दी जा रही थी (1983 में)। एक बार जब केंद्र सरकार ने उन्हें कानूनन भारत की पूर्ण नागरिकता दे दी, तो उनके नागरिकता प्रमाण पत्र को तब तक अमान्य नहीं ठहराया जा सकता जब तक सरकार उसे खुद रद्द न करे। और चूंकि वे भारत की वैध नागरिक हैं, इसलिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 के तहत उन्हें सांसद का चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता था। 

Indian Kanoon
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3. 'पारस्परिक व्यवहार' का नियम और प्रधानमंत्री पद का विवाद (2004)
2004 में जो कानूनी बहस खड़ी हुई थी, वह सांसद बनने को लेकर नहीं, बल्कि 'प्रधानमंत्री' बनने को लेकर थी।
सुब्रमण्यम स्वामी का मुख्य कानूनी तर्क यह था कि भले ही वे एक सांसद के रूप में चुनाव जीत गई हैं, लेकिन 'पारस्परिक व्यवहार' के सिद्धांत के तहत उन्हें देश का प्रधान कार्यकारी (Executive Head / PM) नहीं बनाया जाना चाहिए।
यह एक ऐसी कानूनी उलझन (Legal Gray Area) थी जिस पर भारतीय न्यायपालिका ने कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया था, क्योंकि सोनिया गांधी ने खुद ही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी छोड़ दी थी। 

LawBeat
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निष्कर्ष:
तकनीकी रूप से, नागरिकता कानून में कमियां या अड़चनें बताकर किसी की नागरिकता को चुनौती दी जा सकती है, लेकिन जब तक देश की शीर्ष अदालत या सरकार नागरिकता को रद्द नहीं करती, तब तक उस व्यक्ति से चुनाव लड़ने या सांसद बनने का अधिकार नहीं छीना जा सकता। यही कारण है कि सोनिया गांधी का सांसद बनना कभी भी गैर-कानूनी नहीं माना गया। 

Indian Kanoon
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यदि आप इस केस से जुड़े किसी अन्य पहलू को समझना चाहते हैं, तो पूछ सकते हैं:
सुप्रीम कोर्ट ने हरि शंकर जैन केस (2001) में नागरिकता को लेकर और क्या टिप्पणियां की थीं?
क्या भारत सरकार किसी विदेशी मूल के व्यक्ति की नागरिकता वापस ले सकती है?
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आपकी यह सोच और तर्क बिल्कुल स्वाभाविक है। जनता के मन में यह सवाल उठना पूरी तरह जायज है, क्योंकि भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ गलत जाति प्रमाण पत्र (Fake Caste Certificate) या गलत जानकारी देने पर कोर्ट ने सालों बाद भी सांसदों और विधायकों का निर्वाचन रद्द किया है।
इस पूरे मामले में आपका यह सोचना कि "एक बार हुई चूक हमेशा के लिए सही नहीं हो सकती" कानूनी रूप से सही है, लेकिन सोनिया गांधी के मामले में कोर्ट द्वारा उनके निर्वाचन को रद्द न करने के पीछे कुछ बेहद ठोस तकनीकी और कानूनी कारण थे, जिन्हें समझना जरूरी है:
## 1. गलत जानकारी और 'कानूनी व्याख्या' में अंतर
जाति प्रमाण पत्र वाले मामलों में व्यक्ति फर्जी दस्तावेज जमा करता है या धोखाधड़ी (Fraud) करता है। जब धोखाधड़ी साबित होती है, तो कोर्ट चुनाव रद्द कर देता है।

* सोनिया गांधी के मामले में उन्होंने अपनी नागरिकता के आवेदन में कोई तथ्य या दस्तावेज छिपाया नहीं था। सब जानते थे कि वह इटली की नागरिक हैं, उन्होंने भारतीय नागरिक से विवाह किया है और वह भारत में रह रही हैं। [1] 
* यहाँ विवाद किसी धोखाधड़ी का नहीं था, बल्कि नागरिकता कानून की एक धारा की 'व्याख्या' (Interpretation of Law) का था। सुब्रमण्यम स्वामी का कहना था कि कानून की इस धारा का मतलब 'पारस्परिक प्रतिबंध' होना चाहिए, जबकि सरकार और अदालत का मानना था कि कानून के तहत उन्हें नागरिकता दी जा सकती है। कानून की व्याख्या के इस अंतर को 'धोखाधड़ी' नहीं माना गया।

## 2. नागरिकता और चुनाव को चुनौती देने की समय-सीमा (Limitation Period)
भारत के कानून में किसी भी फैसले को चुनौती देने की एक समय-सीमा तय होती है:

* सोनिया गांधी को भारत की नागरिकता 1983 में मिली थी। [2] 
* कानूनन, अगर उनकी नागरिकता देने की प्रक्रिया में कोई चूक या 'रसूख' (रोब-रुतबा) का इस्तेमाल हुआ था, तो उसे उसी समय या उसके कुछ समय बाद अदालत में चुनौती दी जानी चाहिए थी।
* जब 1999 और 2004 के चुनावों में उनके खिलाफ याचिकाएं दायर की गईं, तब तक उनकी नागरिकता को मिले हुए लगभग 16 से 20 साल हो चुके थे। कोर्ट ने माना कि इतने लंबे समय तक वैध नागरिक रहने के बाद, केवल चुनाव के समय उनकी नागरिकता के पुराने रिकॉर्ड्स को इस आधार पर अमान्य नहीं किया जा सकता।

## 3. चुनाव अदालत (Election Tribunal) का सीमित अधिकार
जब कोई व्यक्ति किसी सांसद के चुनाव को कोर्ट में चुनौती देता है (Election Petition), तो कोर्ट केवल दो चीजें देखता है:

   1. क्या वह व्यक्ति चुनाव के दिन भारत का नागरिक था?
   2. क्या गृह मंत्रालय द्वारा जारी उसका नागरिकता प्रमाण पत्र उस समय प्रभावी (Valid) था?

चूंकि चुनाव के दिन सोनिया गांधी के पास भारत सरकार द्वारा जारी वैध नागरिकता प्रमाण पत्र मौजूद था और सरकार ने उसे रद्द नहीं किया था, इसलिए चुनाव अदालत (Election Court) को यह अधिकार नहीं था कि वह चुनाव याचिका की सुनवाई करते हुए 20 साल पहले सरकार द्वारा नागरिकता देने के फैसले की फाइल दोबारा खोले।
## 4. नागरिकता रद्द करने का अधिकार केवल सरकार के पास है
भारतीय नागरिकता अधिनियम की धारा 10 के तहत, किसी भी व्यक्ति की नागरिकता को रद्द करने या वापस लेने का अधिकार केवल भारत सरकार (केंद्रीय गृह मंत्रालय) के पास है, कोर्ट के पास सीधे तौर पर नहीं।

* यदि किसी सरकार को लगता है कि सोनिया गांधी को नागरिकता देते समय नियमों की अनदेखी हुई थी, तो सरकार कानूनन उनकी नागरिकता की समीक्षा कर सकती थी।
* लेकिन 1983 के बाद से देश में कई गैर-कांग्रेसी सरकारें (जैसे वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारें) आईं। इनमें से किसी भी सरकार ने आधिकारिक तौर पर सोनिया गांधी की नागरिकता को रद्द करने की कोई कानूनी प्रक्रिया शुरू नहीं की।

निष्कर्ष:
आपका यह सोचना कि "रोब-रुतबे के कारण चूक हुई हो सकती है", राजनीतिक रूप से एक बड़ा तर्क हो सकता है और इसी वजह से यह देश में हमेशा एक बड़ी बहस का मुद्दा रहा। लेकिन देश के कानूनी ढांचे में, जब तक देश की सरकार नागरिकता प्रमाण पत्र को रद्द नहीं करती और देश का सुप्रीम कोर्ट उसे वैध मानता है, तब तक किसी भी नागरिक को चुनाव लड़ने से रोकना देश के संविधान के खिलाफ माना जाता है। यही कारण है कि अदालत ने उनका निर्वाचन कभी रद्द नहीं किया।
यदि आप इस कानून के किसी अन्य पहलू को समझना चाहते हैं, तो आप बता सकते हैं:
क्या कोई भी सरकार किसी नागरिक की नागरिकता को खुद से रद्द (Revoke) कर सकती है?भारतीय नागरिकता कानून में 'धोखाधड़ी से नागरिकता' लेने पर सजा के क्या प्रावधान हैं?

[1] [https://www.facebook.com](https://www.facebook.com/100063458749378/videos/in-2004-we-proved-in-the-court-that-sonia-gandhi-is-not-a-citizen-of-india-she-i/1054664142793379/)
[2] [https://www.facebook.com](https://www.facebook.com/BJP4India/videos/%E0%A4%B5%E0%A5%8B%E0%A4%9F-%E0%A4%9A%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B8-%E0%A4%A8%E0%A5%87-1980-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%B8-%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%B9-%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%97/1132952095468824/)

.सोनाली दासगुप्ता (Sonali Dasgupta) का मामला 1950 के दशक का एक बेहद चर्चित अंतरराष्ट्रीय स्कैंडल था, जिसने भारत की राजनीति, सिनेमा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को हिलाकर रख दिया था। यह विवाद मुख्य रूप से प्रेम, विवाह और सामाजिक रूढ़ियों से जुड़ा था, लेकिन बाद में इटली में उनके राजनीतिक प्रयास (चुनाव लड़ने) के दौरान इसमें एक नया कानूनी मोड़ आया। [1, 2, 3] 
पूरा प्रकरण और उसके पीछे की वास्तविक कहानी इस प्रकार है:
## 1. भारत में शुरू हुआ विवाद (1957)

* मुलाकात: वर्ष 1957 में, विश्व प्रसिद्ध इतालवी फिल्म निर्देशक रॉबर्टो रॉसेलनी (Roberto Rossellini) एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म ('इंडिया: मातृ भूमि') बनाने भारत आए थे। भारत में उनकी मुलाकात शांतिनिकेतन से पढ़ी-लिखीं बेहद खूबसूरत बंगाली महिला सोनाली दासगुप्ता (सेनरॉय) से हुई, जो उस समय भारतीय वृत्तचित्र निर्माता हरि साधन दासगुप्ता की पत्नी थीं। [1, 2, 3, 4] 
* अंतरराष्ट्रीय स्कैंडल: रॉबर्टो (उम्र 52 वर्ष) और सोनाली (उम्र 27 वर्ष) के बीच गहरा प्रेम हो गया। उस दौर के रूढ़िवादी भारतीय समाज में यह बात आग की तरह फैली। मुंबई और कोलकाता में इसके खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन हुए। मीडिया (विशेषकर 'ब्लिट्ज़' पत्रिका) ने इसे बहुत बड़ा मुद्दा बनाया। [1, 2, 3, 5, 6] 
* नेहरू जी का हस्तक्षेप: रॉबर्टो रॉसेलनी का वीजा रद्द कर उन्हें भारत छोड़ने को कहा गया। सोनाली के परिवार ने उनका पासपोर्ट रोकने की कोशिश की, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया और सोनाली को भारत से पेरिस और फिर इटली जाने के लिए गुप्त रूप से पासपोर्ट जारी करवाया। सोनाली अपने 11 महीने के छोटे बेटे (अर्जुन) को साथ लेकर इटली चली गईं। [2, 3, 6] 

## 2. इटली में जीवन और नागरिकता
इटली पहुंचने के बाद रॉबर्टो रॉसेलनी ने सोनाली के बेटे को गोद ले लिया (जिसका नाम बदलकर गिल रॉसेलनी रखा गया)। दोनों से एक बेटी भी हुई। सोनाली ने रोम में अपना एक सफल बुटीक खोला और इटली के उच्च समाज में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने भारतीय नागरिकता छोड़कर वैध रूप से इटली की नागरिकता (Italian Citizenship) ग्रहण कर ली। [1, 5, 7, 8, 9] 
## 3. चुनाव लड़ने और पर्चा रद्द होने का वास्तविक सच
वरिष्ठ भारतीय राजनयिकों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के अनुसार, बाद में सोनाली दासगुप्ता ने इटली में सक्रिय राजनीति में उतरने का फैसला किया। उन्होंने रोम में एक स्थानीय नगर निकाय (Civic Election) का चुनाव लड़ने के लिए नामांकन पत्र दाखिल किया था। [9] 
पर्चा रद्द होने का वास्तविक कारण:
हालांकि सोनाली ने इटली की नागरिकता ले ली थी, लेकिन इतालवी प्रशासन ने उन्हें चुनाव लड़ने का 'टिकट' देने या उनका नामांकन स्वीकार करने से मना कर दिया। [9] 

* प्रशासन का तर्क था कि वह "जन्म से इतालवी नागरिक (Not an Italian by birth)" नहीं थीं। [9] 
* उस दौर के इतालवी स्थानीय प्रशासनिक नियमों और राजनीतिक दलों की आंतरिक नीतियों के तहत, गैर-इतालवी मूल (विदेशी मूल) के नए नागरिकों को सीधे स्थानीय चुनावों में उम्मीदवार बनने की अनुमति देने में तकनीकी और कानूनी अड़चनें थीं। इसी आधार पर उनके राजनीतिक कदम को रोक दिया गया। [9, 10] 

## निष्कर्ष
सोनाली दासगुप्ता का मामला केवल एक प्रेम कहानी नहीं था, बल्कि यह उस दौर के अंतरराष्ट्रीय कानून, पासपोर्ट नियमों और एक विदेशी महिला द्वारा पश्चिमी देश की राजनीति में प्रवेश करने की कोशिश का एक अनोखा उदाहरण था। रॉबर्टो से अलग होने के बाद भी वह जीवनभर रोम में ही रहीं और 2014 में वहीं उनका निधन हुआ। [1, 5, 7, 8] 
यदि आप चाहें, तो मैं आपको इस बारे में और विस्तार से बता सकता हूँ:
सोनाली दासगुप्ता के बेटे गिल रॉसेलनी (Gil Rossellini) का सिनेमाई सफर क्या था?क्या आधुनिक समय में इटली के नागरिकता और चुनाव कानूनों में विदेशी मूल के लोगों के लिए बदलाव हुए हैं?

[1] [https://www.imdb.com](https://translate.google.com/translate?u=https://www.imdb.com/name/nm0784452/trivia/&hl=hi&sl=en&tl=hi&client=sge)
[2] [https://grokipedia.com](https://translate.google.com/translate?u=https://grokipedia.com/page/Sonali_Senroy_DasGupta&hl=hi&sl=en&tl=hi&client=sge)
[3] [https://frontline.thehindu.com](https://frontline.thehindu.com/other/obituary/an-affair-to-remember/article23589270.ece)
[4] [https://www.facebook.com](https://www.facebook.com/thedailyeyemedia/videos/the-scandal-that-shook-cinema-roberto-rossellini-sonali-dasgupta/1888351672092192/)
[5] [https://www.facebook.com](https://translate.google.com/translate?u=https://www.facebook.com/groups/1626959317631302/posts/2085918591735370/&hl=hi&sl=en&tl=hi&client=sge)
[6] [https://www.facebook.com](https://www.facebook.com/groups/1626959317631302/posts/2085918591735370/)
[7] [https://frontline.thehindu.com](https://translate.google.com/translate?u=https://frontline.thehindu.com/other/obituary/an-affair-to-remember/article23589270.ece&hl=hi&sl=en&tl=hi&client=sge)
[8] [https://m.rediff.com](https://translate.google.com/translate?u=https://m.rediff.com/news/report/remembering-sonali-dasgupta-rossellini/20140612.htm&hl=hi&sl=en&tl=hi&client=sge)
[9] [https://groups.google.com](https://groups.google.com/g/soc.culture.indian.marathi/c/DXbedMdFLcs)
[10] [https://www.npr.org](https://www.npr.org/2025/06/09/g-s1-71526/italy-referendum-citizenship-meloni)

कानूनी रूप से भारत और इटली के नागरिकता और चुनाव कानूनों में एक बड़ा बुनियादी अंतर है, जिसके कारण दोनों मामलों की तुलना नहीं की जा सकती। [1] 
सोनिया गांधी के भारत में चुनाव लड़ने और सोनाली दासगुप्ता (या उनके जैसी किसी अन्य महिला) के इटली में चुनाव न लड़ पाने के पीछे के सटीक कानूनी और संवैधानिक कारण निम्नलिखित हैं:
## 1. भारतीय संविधान में कोई भेदभाव नहीं (No Discrimination under Indian Constitution)

* संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान का [अनुच्छेद 84 (Article 84)](https://elegalix.allahabadhighcourt.in/elegalix/WebDownloadOriginalHCJudgmentDocument.do?translatedJudgmentID=45876) संसद (लोकसभा/राज्यसभा) का चुनाव लड़ने की योग्यता तय करता है. इसके अनुसार, उम्मीदवार को केवल "भारत का नागरिक" होना चाहिए। [2, 3] 
* समान अधिकार: भारत का कानून 'जन्म से नागरिक' (Citizen by Birth) और नागरिकता कानून के तहत 'पंजीकरण द्वारा नागरिकता' (Citizen by Registration/Naturalization) प्राप्त करने वाले व्यक्तियों में कोई अंतर नहीं करता है। दोनों को चुनाव लड़ने के बराबर राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं। [3, 4] 
* सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: वर्ष 2001 में हरि शंकर जैन बनाम सोनिया गांधी मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने स्पष्ट फैसला सुनाया था कि चूंकि सोनिया गांधी ने 30 अप्रैल 1983 को [नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5(1)(c)](https://indiankanoon.org/doc/1645801/) के तहत कानूनी रूप से भारत की नागरिकता प्राप्त कर ली थी, इसलिए वे भारत में चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह योग्य हैं। [5, 6] 

## 2. इटली के तत्कालीन स्थानीय नियम और राजनीतिक दलों की नीतियां

* परस्पर विरोध का सिद्धांत: सोनाली दासगुप्ता के समय इटली के कई स्थानीय निकायों (Municipalities) और राजनीतिक दलों के आंतरिक नियमों में यह प्रावधान था कि केवल जन्मजात इतालवी नागरिक ही सीधे जनप्रतिनिधि के पदों पर खड़े हो सकते हैं।
* पारस्परिकता का नियम (Principle of Reciprocity): कई देशों में नागरिकता और राजनीतिक अधिकार इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि उम्मीदवार के मूल देश (जैसे भारत) में उनके नागरिकों को क्या अधिकार मिलते हैं। चूंकि भारत विदेशियों को दोहरी नागरिकता या बिना पूर्ण नागरिक बने चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देता, इसलिए कुछ मामलों में तकनीकी आपत्तियां उठाई जाती थीं। [1] 

## 3. कानूनी दर्जे का अंतर (Status of Citizenship)

* सोनिया गांधी: उन्होंने राजीव गांधी से विवाह के बाद (1968) एक लंबी अवधि तक भारत में निवास किया और 1983 में अपनी इतालवी नागरिकता और पासपोर्ट को [आधिकारिक तौर पर सरेंडर](https://frontline.thehindu.com/other/article30252028.ece) कर पूर्ण रूप से भारतीय नागरिकता ग्रहण की। चुनाव लड़ने के समय वे केवल और केवल भारत की ही नागरिक थीं। [1, 7, 8] 
* सोनाली दासगुप्ता: उनके मामले में पर्चा खारिज होने का मुख्य कारण नामांकन की तारीख तक इटली की पूर्ण नागरिकता की कानूनी प्रक्रिया (Electoral Roll रजिस्ट्रेशन सहित) का पूरी तरह संपन्न न होना था। विवाह का प्रमाणपत्र होना स्वतः ही चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं दे देता।

राजनीतिक विवाद का इतिहास:
यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि वर्ष 1999 में भारत में जब सोनिया गांधी के 'विदेशी मूल' का मुद्दा उठा था, तब कांग्रेस के ही कुछ बागी नेताओं (जैसे शरद पवार) ने सार्वजनिक भाषणों में सोनाली दासगुप्ता का उदाहरण देते हुए तर्क दिया था कि जब एक भारतीय महिला इटली में चुनाव नहीं लड़ सकी, तो इटली मूल की महिला को भारत में यह अधिकार क्यों मिलना चाहिए। हालांकि, यह एक राजनीतिक तर्क था। कानूनी और संवैधानिक धरातल पर भारत की अदालतों ने इसे खारिज कर दिया और भारतीय कानून के तहत सोनिया गांधी के चुनाव लड़ने को वैध माना। [6, 9, 10, 11] 
संक्षेप में कहें तो, राजनीतिक नैतिकता पर बहस हो सकती है, लेकिन भारत का संविधान और कानून किसी भी वैध नागरिक को (चाहे उसका जन्म कहीं भी हुआ हो) चुनाव लड़ने की पूरी अनुमति देता है। [9] 

[1] [https://indiankanoon.org](https://indiankanoon.org/doc/79003577/)
[2] [https://elegalix.allahabadhighcourt.in](https://elegalix.allahabadhighcourt.in/elegalix/WebDownloadOriginalHCJudgmentDocument.do?translatedJudgmentID=45876)
[3] [https://elegalix.allahabadhighcourt.in](https://elegalix.allahabadhighcourt.in/elegalix/WebDownloadOriginalHCJudgmentDocument.do?translatedJudgmentID=45876)
[4] [https://www.scconline.com](https://www.scconline.com/blog/post/2016/07/13/election-petition-against-sonia-gandhi-dismissed-continues-to-remain-an-indian-citizen/)
[5] [https://indiankanoon.org](https://indiankanoon.org/doc/1645801/)
[6] [https://timesofindia.indiatimes.com](https://timesofindia.indiatimes.com/india/sonia-citizenship-was-upheld-by-sc-in-2001/articleshow/684107.cms)
[7] [https://frontline.thehindu.com](https://frontline.thehindu.com/other/article30252028.ece)
[8] [https://lawbeat.in](https://lawbeat.in/news-updates/sonia-gandhi-electoral-roll-case-citizenship-issues-lie-solely-with-central-government-says-delhi-court-1518304)
[9] [https://www.scconline.com](https://www.scconline.com/blog/post/2016/07/13/election-petition-against-sonia-gandhi-dismissed-continues-to-remain-an-indian-citizen/)
[10] [https://m.rediff.com](https://m.rediff.com/news/1999/may/20pawar.htm)
[11] [https://www.instagram.com](https://www.instagram.com/p/DST8yE_Aacj/)




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