रामजी के कारसेवकों का खून बहाने वाले,चुनावी फायदे के लिए हिंदू विभाजन में जुटे - अरविन्द सिसोदिया
रामजी भी हँस रहे हैं, तुष्टिकरणवादियों की भयंकर झूठी नौटंकी पर - अरविन्द सिसोदिया
कोटा, 11 जुलाई। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया ने कहा कि, "रामजन्मभूमि मंदिर की भव्यता और हिंदुत्व की एकता प्रबल हिंदुत्व-विरोधियों को पच नहीं रही है। इसीलिए विराट संघर्ष से प्राप्त सफलता को तिलभर की चूक के बहाने लांछित करने के षड्यंत्र चल रहे हैं। सर्व हिंदू समाज को इस हेतु सावचेत रहते हुए इन षड्यंत्रों को पराजित करना है।"
सिसोदिया ने कहा कि, "रामजी के रथ को लेकर चले लालकृष्ण आडवाणी का रामरथ लालू प्रसाद यादव ने बिहार में रोका और उन्हें बंदी बनाया। रामजी के कारसेवकों पर समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने गोली चलवाई। रामजी के पक्ष में खड़ी राज्य सरकारों को कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने बर्खास्त किया। आज वही घोर राम-विरोधी पार्टियां चुनावी लाभ के लिए हिंदू समाज को बाँटने की राजनीति कर रहे हैं। झूठ के झंडावरदार बन रहे हैँ और रामजी भी इन नौटंकीबाजों पर हँस रहे हैं।"
सिसोदिया ने कहा कि, "शीर्ष कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष एवं राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में कांग्रेस के नेता सांसद अधीर रंजन चौधरी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, वाम दल के महासचिव सीताराम येचुरी, सीपीआई(एम) नेता वृंदा करात, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, एनसीपी नेता शरद पवार, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे तथा आप के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल आदि ने प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को ठुकराया या श्रीराम मंदिर दर्शन से दूरी बनाए रखी। अब इन्हीं दलों को रामजी की चिंता हो रही है।"
सिसोदिया ने कहा कि, "अयोध्या में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण भारत की लाखों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक चेतना, करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था तथा अनेक पीढ़ियों के संघर्ष, तप, त्याग और बलिदान का प्रतिफल है।"
उन्होंने कहा कि, "यह आंदोलन सम्पूर्ण हिंदू समाज के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आंदोलन रहा है, जिसकी अगुवाई परमपवित्र हिंदू संगठनों ने की थी। इसका प्रतिफल हिंदू समाज को आत्मगौरव के रूप में प्राप्त हुआ है।"
उन्होंने कहा कि, "इस आंदोलन में असंख्य संत-महात्माओं ने मार्गदर्शन दिया, लाखों कारसेवकों ने संघर्ष किया, सैकड़ों रामभक्तों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया तथा करोड़ों परिवारों ने अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार अपने आपको समर्पित किया। यह विश्व इतिहास का सबसे बड़ा स्वैच्छिक अभियान था, जिसने सिद्ध कर दिया कि भगवान श्रीराम भारत की राष्ट्रीय चेतना के केंद्र हैं।"
उन्होंने आरोप लगाया कि, "स्वतंत्रता के पहले और बाद में कांग्रेस ने मात्र तुष्टिकरण की राजनीति की है। उसका हिंदू उपेक्षा का इतिहास एक शताब्दी लंबा है। कांग्रेस की नीतियों और निर्णयों ने देश के असली स्वामी, हिंदू समाज, की आस्थाओं की घोर उपेक्षा की और उन्हें समुचित न्याय नहीं दिया।"
सिसोदिया ने कहा कि, "भारतीय स्वाभिमान का प्रथम उदय इस्लामिक आक्रमणकारियों द्वारा क्षतिग्रस्त सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से प्रारंभ होता है। महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा समर्थित सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण हेतु आयोजित उद्घाटन समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा भाग लेने का तत्कालीन कांग्रेस प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कड़ा विरोध किया था। यह घटना कांग्रेस के हिंदू-विरोधी चेहरे को बेनकाब करती है।"
सिसोदिया ने कहा कि, "गौरक्षा आंदोलन पर हिंसक कार्रवाई, सिखों का नरसंहार, शाहबानो प्रकरण में न्याय और संविधान का गला घोंटना, श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को कुचलने के तमाम प्रयत्न, बाबरी ढाँचा ढहने पर श्रीराम समर्थक सरकारों को बर्खास्त करना, पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम के तहत हिंदू आस्था स्थलों की स्वतंत्रता रोकना, रामसेतु विवाद में रामजी को काल्पनिक चरित्र बताना तथा कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा 'भगवा आतंकवाद' अथवा 'हिंदू आतंकवाद' जैसे शब्दों का प्रयोग, इन सबने हिंदू समाज में कांग्रेस के प्रति व्यापक असंतोष उत्पन्न किया है, जिसे आज भी नहीं भुलाया जा सकता।"
उन्होंने कहा कि, "आज यदि मंदिर के चढ़ावे अथवा प्रबंधन से जुड़ी किसी प्रकार की अनियमितता या चोरी की घटना सामने आई भी है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों को कठोर दंड मिलना चाहिए। किंतु ऐसी घटनाओं को आधार बनाकर रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, कारसेवकों के बलिदान, संतों के तप और करोड़ों हिंदुओं के समर्पण को प्रश्नांकित करना शुद्ध पाप है, अपराध है, अक्षम्य है। इस महान पुरुषार्थ को किसी भी व्यक्तिगत अनियमितता की आड़ में न लांछित किया जा सकता है और न प्रश्नचिह्नित किया जा सकता है।"
अरविन्द सिसोदिया ने कहा कि, "राष्ट्र उन कारसेवकों का सदैव ऋणी है, जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया; उन संतों का सम्मान करता है, जिन्होंने समाज को दिशा दी; तथा उन करोड़ों परिवारों का स्मरण करता है, जिन्होंने अपनी श्रद्धा से मंदिर निर्माण में योगदान दिया।" उन्होंने कहा कि, "रामजन्मभूमि आंदोलन भारत की सांस्कृतिक अस्मिता, राष्ट्रीय स्वाभिमान और सनातन परंपरा के पुनर्जागरण का स्वर्णिम
अध्याय है, जिसे किसी भी राजनीतिक
विवाद या सीमित घटना के आधार पर धूमिल नहीं किया जा सकता। यह वेग और अधिक प्रबल होकर सामाजिक एकता का सुदृढ़ स्तंभ बनेगा।"
भवदीय
अरविन्द सिसोदिया
9414180151
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कांग्रेस प्रधानमंत्रियों के कार्यकालों में हिंदू विरोधी कृत्यों और नीतियों का आरोप मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) और दक्षिणपंथी विचारकों द्वारा लगाया जाता है। इन आरोपों का मुख्य आधार तुष्टिकरण की राजनीति, सांस्कृतिक उपेक्षा और कानूनों में भेदभाव करना बताया जाता है।इन कार्यकालों के प्रमुख आक्षेपों का विवरण निम्नलिखित है:१. जवाहरलाल नेहरू का कार्यकाल (1947–1964)
धर्म के आधार पर देश का बंटवारा स्वीकार किया किन्तु भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं किया
भारत में पाकिस्तान परस्त मुसलमानों को बने रहने दिया गया
भारत आये हिंदू शरणर्थियों का व्यवस्थापन भगवान भरोसे छोड़ा गया
सोमनाथ मंदिर का विरोध: तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गाँधी और सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा समर्थित सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा मंदिर के उद्घाटन समारोह में भाग लेने का कड़ा विरोध किया था।
हिंदू कोड बिल: नेहरू सरकार द्वारा लाए गए हिंदू कोड बिल के तहत हिंदू विवाह, तलाक और उत्तराधिकार कानूनों में व्यापक सुधार किए गए, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ को इसमें शामिल नहीं किया गया। इस पर हिंदुओं की धार्मिक परंपराओं में सीधा हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया गया।
गौहत्या प्रतिबंध का विरोध: वर्ष 1955 में लोकसभा में पेश किए गए गोहत्या प्रतिबंध विधेयक का नेहरू ने कड़ा विरोध किया था।
२. इंदिरा गांधी का कार्यकाल (1966–1977, 1980–1984)
गौ भक्तों पर गोलियां: वर्ष 1966 में संसद के बाहर गौ रक्षा की मांग कर रहे साधुओं और संतों पर इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान पुलिस द्वारा गोलियां चलवाई गई थीं।
संविधान में 'सेक्युलर' शब्द: आपातकाल (1975) के दौरान संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) शब्द जोड़े गए, जिसे आलोचक हिंदू राष्ट्र की मूल अवधारणा को बदलने का प्रयास मानते हैं।
३. राजीव गांधी का कार्यकाल (1984–1989)
शाहबानो मामला: सुप्रीम कोर्ट के शाहबानो मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले (जिसमें मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण की बात थी) को पलटने के लिए राजीव गांधी सरकार ने संसद में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया। आलोचकों ने इसे वोट-बैंक की राजनीति और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण करार दिया।
हिंदू सिखों का नर संहार
हिंदू तमीलों को श्रीलंका में जाकर मारा
अयोध्या में शिलान्यास: इसी दौरान अयोध्या में विवादित ढांचे के शिलान्यास की अनुमति दी गई, जिसे हिंदू संगठनों ने चुनावी लाभ के लिए लिया गया एक विरोधाभासी कदम माना।
४. पी.वी. नरसिम्हा राव का कार्यकाल (1991–1996)
बाबरी ढांचा ढह जानें पर भाजपा शासित सरकारें बर्खास्त कीं
पूजा स्थल अधिनियम (1991): इस कानून के तहत यह प्रावधान किया गया कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्थिति में था, वह वैसा ही रहेगा। हिंदू संगठनों का आरोप है कि इस कानून ने मुगलों द्वारा तोड़े गए हजारों मंदिरों (जैसे ज्ञानवापी और कृष्ण जन्मभूमि) पर कानूनी हक मांगने का रास्ता बंद कर दिया।
५. डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल (2004–2014)राम सेतु हलफनामा: यूपीए सरकार के दौरान 2007 में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया गया, जिसमें राम सेतु (रामायण से जुड़े ऐतिहासिक प्रमाण) के अस्तित्व को नकार दिया गया था। हालांकि, विरोध के बाद इसे वापस ले लिया गया।
सांप्रदायिक हिंसा विधेयक (Communal Violence Bill): सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने एक विधेयक का मसौदा तैयार किया था। आलोचकों का आरोप था कि यदि यह कानून पारित हो जाता, तो सांप्रदायिक दंगों के दौरान केवल बहुसंख्यक (हिंदू) समुदाय को ही दोषी मानने का आधार तैयार हो जाता।
हिंदू आतंकवाद शब्द: इसी दौर में कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा 'भगवा आतंकवाद' (Saffron terror) या 'हिंदू आतंकवाद' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जिसे हिंदू धर्म को बदनाम करने की साजिश माना जाता है।
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कांग्रेस नेताओं के बयानों को लेकर अक्सर राजनीतिक और सामाजिक विवाद होते रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और दक्षिणपंथी विचारकों का आरोप है कि कांग्रेस नेताओं के कई बयान बहुसंख्यक हिंदू समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले और 'हिंदू विरोधी' रहे हैं।
इन प्रमुख बयानों और विवादों का विवरण निम्नलिखित है:
## १. 'हिंदू आतंकवाद' और 'भगवा आतंकवाद' से जुड़े बयान
* सुशील कुमार शिंदे (2013): तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने जयपुर में कांग्रेस के एक शिविर के दौरान आरोप लगाया था कि बीजेपी और आरएसएस के प्रशिक्षण शिविरों में 'हिंदू आतंकवाद' और 'भगवा आतंकवाद' को बढ़ावा दिया जा रहा है। बाद में भारी विरोध के बाद उन्होंने इस पर सफाई दी थी।
* पी. चिदंबरम (2010): तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने देश के मुख्यमंत्रियों की एक बैठक में 'भगवा आतंकवाद' (Saffron Terror) शब्द का इस्तेमाल किया था, जिसका दक्षिणपंथी संगठनों ने कड़ा विरोध किया।
* दिग्विजय सिंह: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कई मौकों पर 'हिंदू आतंकवाद' शब्द का समर्थन किया। उन्होंने वर्ष 2008 के मुंबई आतंकी हमलों (26/11) से जुड़ी एक विवादित किताब का विमोचन भी किया था, जिसमें इस हमले के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का हाथ होने का दावा करने का प्रयास किया गया था।
## २. हिंदू ग्रंथों और प्रतीकों पर बयान
* शशि थरूर (2018): कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने बेंगलुरु में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि आरएसएस के एक अज्ञात नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना "शिवलिंग पर बैठे बिच्छू" से की थी, जिसे न तो हाथ से हटाया जा सकता है और न ही चप्पल से मारा जा सकता है। इस बयान को लेकर उन पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का मुकदमा भी दर्ज हुआ था।
* सतीश जारकीहोली (2022): कर्नाटक के कांग्रेस नेता सतीश जारकीहोली ने एक जनसभा में दावा किया था कि 'हिंदू' शब्द भारत का नहीं बल्कि फारसी (Persian) है और इसका अर्थ बेहद "अश्लील" या "अपमानजनक" है। विवाद बढ़ने पर उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया था।
## ३. सनातन धर्म की तुलना और राहुल गांधी के बयान
* के. सी. वेणुगोपाल और उदयनिधि स्टालिन विवाद (2023): कांग्रेस की सहयोगी पार्टी DMK के नेता उदयनिधि स्टालिन ने जब "सनातन धर्म को मलेरिया और डेंगू की तरह खत्म करने" की बात कही, तो कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के. सी. वेणुगोपाल ने बयान दिया कि "हर राजनीतिक दल को अपने विचार रखने की स्वतंत्रता है और कांग्रेस सभी धर्मों का सम्मान करती है।" आलोचकों ने इस रुख को सनातन विरोधी बयान का परोक्ष समर्थन माना।
* राहुल गांधी (संसद बयान 2024): लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में बोलते हुए राहुल गांधी ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा था कि "जो लोग खुद को हिंदू कहते हैं, वे चौबीसों घंटे हिंसा, नफरत और असत्य की बात करते हैं।" इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने तुरंत आपत्ति जताई और कहा कि पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना गलत है। राहुल गांधी ने बाद में स्पष्ट किया कि उनका इशारा केवल बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा की तरफ था, न कि पूरे हिंदू समाज की तरफ।
## ४. मंदिर और राम मंदिर से जुड़े बयान
* सैम पित्रोदा (2023–2024): राहुल गांधी के करीबी सलाहकार सैम पित्रोदा ने अयोध्या राम मंदिर निर्माण के समय बयान दिया था कि "क्या राम मंदिर देश की असली समस्या (बेरोजगारी, महंगाई) का समाधान है?" उन्होंने यह भी कहा था कि मंदिरों से देश का विकास नहीं होता।
* कपिल सिब्बल (2017): हालांकि कपिल सिब्बल अब कांग्रेस में नहीं हैं, लेकिन जब वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे, तब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई को 2019 के आम चुनावों तक टालने की दलील दी थी, जिसे हिंदू संगठनों ने राम मंदिर निर्माण में बाधा डालने का प्रयास बताया था।
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