सामाजिक जीवन में गिरते मूल्य और बढ़ते अपराध : केवल कानून नहीं, समग्र प्रशासनिक व्यवस्था पर चिंतन आवश्यक— अरविन्द सिसोदिया
सामाजिक जीवन में गिरते मूल्य और बढ़ते अपराध : केवल कानून नहीं, समग्र प्रशासनिक व्यवस्था पर चिंतन आवश्यक
— अरविन्द सिसोदिया
कोटा, 1 जुलाई। देश में पारिवारिक और सामाजिक अपराधों की बढ़ती घटनाएँ केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं हैं, बल्कि यह समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और मानसिक स्वास्थ्य में आई गिरावट का संकेत भी हैं। संपत्ति विवादों में पिता की हत्या, दादा की हत्या, पति द्वारा पत्नी और बच्चों की हत्या, महिलाओं एवं बुजुर्गों पर अत्याचार जैसी घटनाएँ यह बताती हैं कि समाज के भीतर संवाद, संयम, सहिष्णुता और संतोष जैसे जीवन-मूल्य कमजोर पड़ रहे हैं।
भारत का संविधान लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था स्थापित करता है। लोकतंत्र और चुनी हुई सरकारों का दायित्व केवल शासन चलाना, कर वसूलना, सड़कें बनाना और कानून लागू करना भर नहीं है। उनका व्यापक दायित्व ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना भी है, जिसमें नागरिक सुरक्षित हों, अनुशासित हों, समन्वय की भावना हो, परस्पर विश्वास बना रहे, परिवार मजबूत हों, समाज संतुष्ट रहे और प्रत्येक व्यक्ति सम्मानपूर्वक, सुखपूर्वक तथा शांति से जीवन जी सके। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के संतोष, सामाजिक विश्वास और नैतिक जीवन से मापी जाती है।
भारतीय परंपरा में समाज को संतुलित बनाए रखने की एक सशक्त व्यवस्था थी। गाँव-गाँव होने वाली भगवान की कथाएँ, संत-महात्माओं का सतत प्रवास, धार्मिक प्रवचन, सत्संग, लोक परंपराएँ, सामुदायिक पर्व और पारिवारिक संस्कार—ये सब समाज की सामूहिक काउंसलिंग का कार्य करते थे। लोग अपने क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और तनाव पर नियंत्रण रखना सीखते थे तथा कर्तव्य, त्याग, मर्यादा और संतोष का संदेश प्राप्त करते थे। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में यह व्यवस्था कमजोर हुई है, जिसका प्रभाव सामाजिक व्यवहार पर भी दिखाई दे रहा है।
आज आवश्यकता है कि सरकारें सामाजिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को भी सार्वजनिक नीति का महत्वपूर्ण विषय मानें। अपराध होने के बाद दंड देना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है अपराध की परिस्थितियों को जन्म लेने से रोकना।
इस दिशा में निम्नलिखित बहुआयामी कदम विचारणीय हैं—
1. राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक एवं नैतिक जागरण अभियान चलाया जाए, जिसमें परिवार, समाज, विद्यालय, धार्मिक संस्थाएँ और मीडिया सभी सहभागी हों।
2. प्रत्येक पुलिस थाने में सामाजिक प्रहरी के नाम से कम से कम 5/ 10 सादा वर्दी के पुलिस कांस्टेबल होने चाहिए, इनका काम समझ में चल रहे, अंतर विरोधों की जानकारी रखना और पुलिस थाने को सजक करते रहना होगा, इनकी पहचान कभी भी स्वरूप में नहीं होनी चाहिए कि यह पुलिस के लिए काम करते हैं । इस तरह की एक मुखवीर व्यवस्था भी कहते हैं। यह जवाब देही पूर्ण तरीके से होना चाहिए।
3. प्रत्येक तीसरे महीने में, थाने का मुख्य अधिकारी और उसके सहयोगी , क्षेत्र के प्रत्येक घर में पहुंचेंगे और उनके बारे में विवादों के बारे में महिलाओं की सुरक्षा के बारे में बातचीत करेंगे। यह प्रत्येक घर तक पहुंचाने और प्रत्येक 3 महीने से 6 महीने के बीच में होना आवश्यक होगा। जिससे नागरिकों के बीच में पुलिस के प्रति भय खत्म हो और विश्वास बड़े, वहीं उन्हें कानून की जानकारी मिले और वह कानून से डरे अनुशासित रहे और अपराध से दूरी बनाएं। यह व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण है इसे सबसे अधिकतम जिम्मेवारी से करना है।
4. विद्यालयों और महाविद्यालयों में जीवन-मूल्य, चरित्र निर्माण, पारिवारिक उत्तरदायित्व, संवैधानिक कर्तव्य, जीवन-कौशल और भावनात्मक संतुलन को व्यवहारिक शिक्षा का अनिवार्य भाग बनाया जाए।
5. प्रत्येक जिले में पारिवारिक परामर्श एवं मध्यस्थता केंद्र स्थापित किए जाएँ, जहाँ संपत्ति विवाद, वैवाहिक तनाव और पारिवारिक मतभेद हिंसा का रूप लेने से पहले ही सुलझाए जा सकें।
6. मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और काउंसलिंग को प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था का अनिवार्य अंग बनाया जाए, ताकि तनाव, अवसाद, क्रोध और नशे जैसी समस्याओं का समय रहते समाधान हो सके।
7. सामुदायिक पुलिसिंग को सुदृढ़ किया जाए, जिससे पुलिस केवल अपराध होने पर नहीं, बल्कि समाज के साथ निरंतर संवाद बनाकर अपराध-निवारण में सहभागी बने।
8. बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए स्थानीय स्तर पर निगरानी, सहायता और परामर्श की प्रभावी व्यवस्था विकसित की जाए।
9. वरिष्ठ नागरिकों की संपत्ति का हस्तांतरण, बिना कलेक्टर या एसडीएम जांच के नहीं होना चाहिए। वरिष्ठ नागरिकों के सभी प्रकार के संपत्ति संबंधी निर्णय, डीएम अथवा एसडीएम की मौजूदगी में ही, निष्पक्ष स्थिति बिना किसी दवा की स्थिति की प्रमाणिकता के बाद ही स्वीकार किए जाने चाहिए। इससे जोर जबरदस्ती का कमीनापन खत्म होगा।
9. संपत्ति विवादों के त्वरित समाधान के लिए विशेष न्यायिक एवं प्रशासनिक तंत्र विकसित किया जाए, क्योंकि ऐसे विवाद अनेक गंभीर अपराधों का कारण बनते हैं।
10. नशामुक्ति, पारिवारिक संवाद और डिजिटल संयम पर व्यापक जन-जागरण अभियान चलाए जाएँ।
11. सरकारें संतों, समाजसेवियों, शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों, धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों तथा नागरिक संस्थाओं के सहयोग से राष्ट्रव्यापी सामाजिक समरसता और पारिवारिक सुदृढ़ीकरण अभियान प्रारंभ करें।
विश्व के अनेक देशों ने भी ऐसे समन्वित मॉडल अपनाए हैं। जापान की समुदाय आधारित पुलिस व्यवस्था (कोबान मॉडल), सिंगापुर का अनुशासन एवं नागरिक उत्तरदायित्व पर आधारित प्रशासन, फिनलैंड और अन्य नॉर्डिक देशों की जीवन-कौशल एवं मानसिक स्वास्थ्य आधारित शिक्षा व्यवस्था तथा अनेक यूरोपीय देशों की पारिवारिक मध्यस्थता प्रणाली इस बात का प्रमाण हैं कि अपराधों की रोकथाम केवल कठोर दंड से नहीं, बल्कि मजबूत सामाजिक व्यवस्था से होती है।
भारत के पास इससे भी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। यदि आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था और भारतीय जीवन-दर्शन का संतुलित समन्वय किया जाए, तो एक ऐसा समाज निर्मित किया जा सकता है जहाँ कानून का भय भी हो, नैतिकता का सम्मान भी हो, परिवारों में संवाद भी हो, नागरिकों में अनुशासन भी हो और जीवन में संतोष भी हो।
आज आवश्यकता केवल अपराधियों को दंडित करने की नहीं, बल्कि अपराध पैदा करने वाली परिस्थितियों को समाप्त करने की है। यही लोकतांत्रिक शासन का व्यापक दायित्व है और यही संविधान की उस भावना के अनुरूप भी है, जिसमें लोककल्याणकारी राज्य की परिकल्पना निहित है। जब शासन, समाज और परिवार तीनों मिलकर इस दिशा में कार्य करेंगे, तभी भारत वास्तव में सुरक्षित, समृद्ध, संतुष्ट और संस्कारित राष्ट्र बन सकेगा।
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