आजादी और एकता के वंदेमातरम से कांग्रेस ने तुष्टिकरण का खेल हमेशा खेला, मोदीजी के सम्मान दिलाया

आजादी और एकता के वंदेमातरम से कांग्रेस ने तुष्टिकरण का खेल हमेशा खेला, मोदीजी के सम्मान दिलाया 

— अरविंद सिसोदिया

'वंदे मातरम्' केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की चेतना, स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा और देश की अखंडता का सबसे बड़ा उद्घोष है। भारत के नौजवानों की ऊर्जा रहा है। यह वह मंत्र था जिसे गाते हुए हंसते-हंसते हजारों क्रांतिकारियों ने फांसी के फंदे को चूम लिया। करोड़ों स्वतंत्रता सेनानियों के कृतित्व और व्यक्तित्व को राष्ट्रवाद से सिंचित किया।लेकिन दुर्भाग्यवश, जिस गीत ने पूरे देश को बिना किसी भेदभाव के एकता के सूत्र में पिरोया, उसे आजादी के बाद की राजनीति में कांग्रेस पार्टी और उसके सर्वेसर्वा जवाहरलाल नेहरू जी नें तुष्टिकरण की बलि चढ़ा दिया गया। वह तो संविधान सभा के अध्यक्ष ड़ा राजेंद्र प्रसाद जी का साहस था जो उन्होंने वन्देमातरम को राष्ट्रगान के बराबर कर दर्जा देकर राष्ट्रगीत बनबा दिया।


कांग्रेस ने सत्ता और वोटबैंक के लालच में इस गौरवमयी गीत के साथ जो समझौता किया, उसका सिलसिला आजादी के आंदोलन से लेकर आज तक निरंतर जारी रहा है। जबकि यह गीत स्वतंत्रता का महामंत्र था। इसमें ईश्वरीय शक्ति जैसा शौर्य था। यह राष्ट्रगान बनने का हकदार था।

बंग-भंग को मात देने वाली शक्ति, वंदे मातरम्

यह वही ऐतिहासिक गीत है जिसने 1905 के 'बंग-भंग' (बंगाल विभाजन) के क्रूर ब्रिटिश चक्रव्यूह को छिन्न-भिन्न कर दिया था। यह देश विभाजन का बीजारोपण था। जो अंग्रेजों ने मजहब के आधार पर बंगाल को बांट कर किया था। लेकिन पूरा बंगाल 'वंदे मातरम्' के एक नारे के नीचे एकजुट हो गया। सड़कों पर उतरकर क्रांतिकारियों और आम जनता ने इस गीत को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। यह वंदे मातरम् की ही शक्ति थी जिसने अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर किया और अंततः विभाजित बंगाल को 1911 में फिर से एक किया गया । जो गीत देश को टूटने से बचाने और जोड़ने के सामर्थ्य से पूर्ण था। जो भौगोलिक व सांस्कृतिक रूप से 'एक बंगाल' बनाने का जरिया बना, वह स्वाभाविक रूप से स्वतंत्र भारत का 'राष्ट्रगान' बनने का हकदार था। कांग्रेस नें संविधान सभा में भी अपने तुष्टिकरण की उसी नीति को अपनाया जो ब्रिटिश सरकार अपनाती रही।


राष्ट्रगान बनने की राह में कांग्रेस का तुष्टिकरण 

तमाम ऐतिहासिक और जनभावना के तर्कों के बावजूद, 'वंदे मातरम्' को भारत का राष्ट्रगान नहीं बनने दिया गया। इसके पीछे की मुख्य वजह हर कदम पर आड़े आने वाली कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति थी।

 1937 में गीत के टुकड़े,इस खेल की शुरुआत

 वर्ष 1937 में ही हो गई थी। जब प्रांतीय चुनाव जीतकर कांग्रेस सत्ता में आई और विधानसभाओं में इस गीत का गायन शुरू हुआ, तब मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने इस पर आपत्ति जताई। सांप्रदायिक तुष्टिकरण के दबाव में आकर कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने कोलकाता अधिवेशन में इस महान गीत के टुकड़े कर दिए और इसे केवल पहले दो छंदों तक सीमित कर दिया। यह राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर से पहला बड़ा वैधानिक समझौता था।

1950 और 1976 की कानूनी उपेक्षा

आजादी के बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने की घोषणा तो की, लेकिन कांग्रेस सरकारों ने इसे कभी भी कानूनी और दंडात्मक संरक्षण नहीं दिया। जब 1971 में 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम' बना, तो उसमें राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के अपमान को अपराध माना गया, लेकिन वंदे मातरम् को बाहर छोड़ दिया गया। इसके बाद 1976 में इंदिरा गांधी द्वारा किए गए 42वें संविधान संशोधन में भी अनुच्छेद 51A के तहत 'राष्ट्रगान' का उल्लेख तो हुआ, मगर 'राष्ट्रगीत' वंदे मातरम् का नाम लिखने से कांग्रेस फिर हिचकिचाती रही।

2026- कानूनन मिला हक और बेनकाब हुआ कांग्रेस सहित विपक्ष

दशकों से चली आ रही इस ऐतिहासिक और वैधानिक भूल को वर्तमान मोदी सरकार ने सुधारा है। संसद द्वारा पारित 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026' के माध्यम से अब वंदे मातरम् का अपमान करने वालों को भी 3 साल की जेल की सजा का कड़ा प्रावधान किया गया है। लेकिन देश के लिए यह देखना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी कांग्रेस सहित विपक्ष ने संसद के भीतर इस विधेयक का विरोध किया और सदन से वॉकआउट कर गए।

वंदे मातरम्' का इतिहास
राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' की रचना प्रख्यात बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1870 के दशक में संभवतः 1875 की थी, जिसे बाद में उन्होंने अपने प्रसिद्ध 1882 के उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया। इस गीत को पहली बार किसी राजनीतिक मंच पर 1896 के कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वरबद्ध करके गाया था। वर्ष 1905 के 'बंग-भंग', बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन के दौरान यह गीत ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय राष्ट्रवाद और अखंडता का सबसे बड़ा मंत्र और क्रांतिकारी नारा बन गया। हालांकि, मुस्लिम लीग के विरोध के कारण वर्ष 1937 में कांग्रेस ने इसके केवल शुरुआती दो छंदों को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया। अंततः, देश की स्वतंत्रता के बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे 'जन गण मन' (राष्ट्रगान) के समान ही आदर देते हुए भारत के 'राष्ट्रगीत' के रूप में गौरवमयी और आधिकारिक मान्यता प्रदान की। जिसे वास्तविक सम्मान 2026 में प्रधानमंत्री मोदीजी की सरकार ने प्रदान किया है।

- अरविंद सिसोदिया का यह आकलन भारतीय राजनीति के एक कड़वे सच को उजागर करता है। 'वंदे मातरम्' इस देश की मिट्टी की सुगंध है, जिसने अंग्रेजों के विभाजनकारी मंसूबों को नाकाम कर बंगाल को एक किया था। कांग्रेस ने 1937 से लेकर आज 2026 तक इस गीत के सम्मान को दबाने और इसके विरोधियों को खुश करने का जो खेल खेला है, उसे देश की जनता अब भली-भांति समझ चुकी है। संसद द्वारा पारित यह नया कानून न केवल वंदे मातरम् को उसका वास्तविक और ऐतिहासिक अधिकार दिलाता है, बल्कि दशकों से चले आ रहे तुष्टिकरण के इस राजनीतिक अध्याय का अंत भी करता है। जय हिंद जय भारत।




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