राजनैतिक कालनेमियों से भारी खतरा, सर्व हिंदुसमाज सावधान रहे - अरविन्द सिसोदिया
राजनैतिक कालनेमियों से भारी खतरा, सर्व हिंदुसमाज सावधान रहे - अरविन्द सिसोदिया
वर्तमान भारतीय राजनीति वैचारिक संक्रमण के एक अत्यंत दिलचस्प दौर से गुजर रही है। दशकों के वैचारिक और सांस्कृतिक संघर्ष के बाद आज देश में जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का उदय हुआ है, उसने समकालीन राजनीति के एजेंडे को पूरी तरह बदल दिया है। कल तक जो राजनीतिक दल हिंदुत्व और सनातन प्रतीकों से दूरी बनाए रखने में ही अपनी धर्मनिरपेक्षता की सार्थकता समझते थे, आज वे अचानक रामभक्ति और सॉफ्ट-हिंदुत्व की राह पर चलने को विवश दिखाई दे रहे हैं। इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य पर वरिष्ठ विश्लेषक अरविंद सिसोदिया का बयान एक गहरा पौराणिक और रणनीतिक संदर्भ प्रस्तुत करता है। उन्होंने वर्तमान विपक्षी खेमे की तुलना रामायण काल के कुख्यात पात्र 'कालनेमि' से करते हुए एक बड़े वैचारिक षड्यंत्र की ओर इशारा किया है।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब लक्ष्मण जी की मूर्छा को दूर करने के लिए हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे, तब रावण के आदेश पर कालनेमि नामक राक्षस ने उनका रास्ता रोकने के लिए एक छल रचा था। उसने किसी हिंसक राक्षस का नहीं, बल्कि एक परम रामभक्त साधु का वेश धारण किया था ताकि वह हनुमान जी को भ्रमित कर अपने उद्देश्य में सफल हो सके। आज की राजनीति में भी कुछ ऐसा ही छद्म वेश (Political Camouflage) देखने को मिल रहा है। जो राजनीतिक ताकतें कल तक राम मंदिर के अस्तित्व पर सवाल उठाती थीं या सनातन संस्कृति को पिछड़ा मानती थीं, वे आज अचानक खुद को सबसे बड़ा रामभक्त सिद्ध करने की होड़ में शामिल हैं। मुंह में राम का नाम और मन में सनातन के ध्वजवाहकों को परास्त करने की यह नियत हूबहू कालनेमि के उस कपट जैसी है, जो साधु बनकर भी हनुमान जी का अहित चाहता था।
अरविंद सिसोदिया का यह आकलन विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की राजनीतिक उथल-पुथल और उसके बाद देशव्यापी स्तर पर उभरे ध्रुवीकरण के संदर्भ में बेहद सटीक बैठता है। बंगाल जैसे चुनौतीपूर्ण राज्यों में वैचारिक विचारधारा की बढ़ती पैठ और राष्ट्रवाद की विजय ने विपक्षी खेमे की पारंपरिक राजनीति को हिलाकर रख दिया है। जब विपक्ष सीधे तौर पर इस वैचारिक और सांस्कृतिक लहर का मुकाबला करने में अक्षम साबित हुआ, तो उसने 'अंदरूनी फूट' डालने की रणनीति अपनाई। वर्तमान में हिंदुत्व की इस सांस्कृतिक एकता को तोड़ने के लिए जातियों का उप-विभाजन, क्षेत्रीय अस्मिताओं का टकराव और बहुसंख्यक समाज के मन में अपने ही वैचारिक नेतृत्व के प्रति अविश्वास पैदा करने के सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं।
यह स्थिति देश के मतदाताओं के सामने एक गंभीर चुनौती पेश करती है। 'चुनावी अवसरवाद' (Electoral Opportunism) के तहत ओढ़े गए इस नए धार्मिक स्वरूप का असली उद्देश्य बहुसंख्यक समाज का कल्याण नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना को खंडित करना है जो लंबे समय बाद एकजुट हुई है। रामायण काल में कपटी कालनेमि का अंत हनुमान जी के हाथों हुआ था, क्योंकि हनुमान जी ने समय रहते उसके छद्म वेश के पीछे छिपे राक्षस को पहचान लिया था। आज के लोकतांत्रिक भारत में 'जनता जनार्दन' ही उस हनुमान की भूमिका में है। भारतीय मतदाता के पास वह 'दिव्य दृष्टि' और राजनीतिक परिपक्वता है जो कथनी और करनी के अंतर को समझती है। सिसोदिया का यह दावा अटूट प्रतीत होता है कि भारत की सजग जनता इस वैचारिक ढोंग और षड्यंत्रपूर्ण कृत्यों को भली-भांति पहचान चुकी है और आने वाले समय में अपने मताधिकार रूपी लोकतांत्रिक दंड से इस राजनीतिक कालनेमि प्रवृत्ति को परास्त कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के ध्वज को और सुदृढ़ करेगी।
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