हिंदुत्व विरोधी, मोदी विरोधी और 'माफीनामे' के भंवर में फंसा हुआ आराजक कुनबा मात्र बन गया विपक्ष - अरविन्द सिसोदिया


हिंदुत्व विरोधी , मोदी विरोधी और 'माफीनामे' के भंवर में फंसा हुआ, मात्र आराजक कुनबा बन गया विपक्ष - अरविन्द सिसोदिया 
19 जुलाई कोटा। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया नें भारतीय विपक्ष के आराजकतावाद पर कटाक्ष करते हुये कहा है कि " लोकतंत्र में एक मजबूत और वैचारिक रूप से समृद्ध विपक्ष का होना अनिवार्य माना जाता है। सत्तापक्ष की कमियों को उजागर करना, जनहित के मुद्दों पर सरकार को घेरना और वैकल्पिक नीतियां पेश करना विपक्ष का प्राथमिक धर्म है। लेकिन, पिछले एक दशक और विशेषकर हालिया वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर डालें, तो भारतीय राजनीति का परिदृश्य बदला हुआ नजर आता है। आज देश का विपक्ष बुनियादी मुद्दों की राजनीति करने के बजाय चार धुरियों के इर्द-गिर्द सिमटता दिख रहा है, सनातन हिंदुत्व का अंधविरोध, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति व्यक्तिगत शत्रुतापूर्ण बदजुबानी और गलत बयानों के लिए अदालतों में जाकर माफी मांगने का सिलसिला। ऐसा लगता है मानो विपक्ष जनसरोकारों से कटकर केवल एक विशिष्ट नकारात्मक आराजक एजेंडे और 'माफी मांगो समूह बनकर रह गया है।

वैचारिक भटकाव और हिंदुत्व का विरोध

सिसोदिया नें कहा कि " विपक्ष की सबसे बड़ी वैचारिक कमजोरी यह साबित हो रही है कि वह 'सत्तारूढ़ दल के विरोध' और 'बहुसंख्यक समाज की आस्था के विरोध' के बीच का अंतर भूल चुका है। उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन धर्म की तुलना जानलेवा बीमारियों से करना, ए. राजा द्वारा 'जय श्री राम' के उद्घोष को चुनौती देना, और समाजवादी पार्टी के नेताओं द्वारा रामचरितमानस जैसी पूजनीय कृतियों पर कीचड़ उछालना, यह महज इत्तेफाक नहीं हो सकता। चुनावी लाभ और एक खास वोट बैंक को साधने की इस होड़ ने बहुसंख्यक समाज के मन में यह संदेश गहरा कर दिया है कि विपक्ष को हिंदू आस्था और संस्कृति से परहेज है। राजनीति में नीतियों का विरोध स्वीकार्य है, लेकिन किसी सभ्यता और संस्कृति के समूल नाश की पैरवी करना आत्मघाती साबित हो रहा है।"

 मोदी विरोध में व्यक्तिगत नफरत तक

सिसोदिया नें कहा कि "विपक्ष का दूसरा सबसे बड़ा संकट प्रखर राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी के प्रति बदजुवानी पूर्ण शत्रुता है। विपक्ष के नेताओं का विरोध व्यक्तिगत नफरत में बदल गया है, इसीलिए भारत की जनता उनसे दूरी बना रही है। राफेल सौदे को लेकर 'चौकीदार चोर है' के अनर्गल नारे से लेकर प्रधानमंत्री के संदर्भ में "बोटी-बोटी काटने" जैसे हिंसक बयानों ने विपक्ष की भाषा की गरिमा को तार-तार किया है। नीतिगत कमियां ढूंढने के बजाय विपक्ष हर उस अंतरराष्ट्रीय मंच या घरेलू मोर्चे पर सरकार को कोसने लगता है, जहां देश गौरव महसूस कर रहा होता है। नतीजा यह होता है कि जनता इस विरोध को सरकार का विरोध न मानकर देश के मान सम्मान और विकास का विरोध मानने लगी है।"

 माफी मांगो समूह, कानूनी घुटने टेकना

सिसोदिया नें कहा कि " विपक्ष की राजनीति का सबसे दिलचस्प और कमजोर पहलू है 'बयान दो और बाद में माफी मांगो' की संस्कृति। देश के शीर्ष विपक्षी नेता सुर्खियों में रहने के लिए बड़े-बड़े मंचों से गंभीर और आधारहीन आरोप लगाते हैं, लेकिन जैसे ही कानून का शिकंजा कसता है, वे अदालतों में जाकर लिखित में बिना शर्त माफी मांग लेते हैं। अरविंद केजरीवाल द्वारा अरुण जेटली, नितिन गडकरी और अन्य नेताओं से कोर्ट में लिखित माफी मांगना, या फिर राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को गलत तरीके से पेश करने पर राहुल गांधी द्वारा हलफनामा देकर क्षमा याचना करना,यह दर्शाता है कि विपक्ष के आरोपों में कोई तथ्यात्मक दम नहीं होता। जब आप बिना सबूत के किसी की साख पर हमला करते हैं और बाद में कानूनी डर से माफी मांगते हैं, तो जनता की नजरों में आपकी राजनीतिक विश्वसनीयता शून्य हो जाती है।"

विपक्ष स्वयं को ही खलनायक सिद्ध करने में जुटा

सिसोदिया नें कहा कि " इस चार कोणीय जाल (हिंदुत्व विरोध, मोदी विरोध, माफीनामा और आराजकता) में फंसे होने के कारण विपक्ष आज जनता के सामने एक मजबूत 'वैकल्पिक विजन' रखने में पूरी तरह नाकाम रहा है। जब तक विपक्ष अपनी इस नकारात्मक छवि से बाहर नहीं निकलेगा, तब तक वह जनता का विश्वास हासिल नहीं कर पाएगा। किन्तु तुष्टिकरण की प्रतियोगिता में विपक्ष नें अपने आपको स्वयं ही खलनायक सिद्ध कर लिया है। उसकी यह छवि उसे भावी राजनीती से भी बाहर कर रही है।"

वरिष्ठ बुद्धिजीवी सिसोदिया नें कहा कि " भारतीय मतदाताओं के लिए देश और देशहित सबसे महत्वपूर्ण है। उन्हें केवल सत्ता का विरोध करने वाला नहीं, बल्कि देश को आगे ले जाने वाला एक जिम्मेदार और सकारात्मक नेतृत्व चाहिए। जो फिलहाल पूरे देश को प्रधानमंत्री मोदीजी में ही नजर आता है।" 

भवदीय 
अरविन्द सिसोदिया 
9414180151



भारत की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में 'हिंदू विरोध' या 'हिंदू धर्म (सनातन धर्म)' पर की जाने वाली टिप्पणियां अक्सर बड़े विवादों का कारण बनती हैं। इस तरह की बयानबाजी करने वालों में मुख्य रूप से विपक्षी दलों के नेता और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। इन बयानों का मुख्य निशाना हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था, देवी-देवता और हिंदुत्व की विचारधारा होती है।

प्रमुख हस्तियां और उनके चर्चित बयान:1. राहुल गांधी (कांग्रेस नेता)संसद में अपने एक संबोधन के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि जो लोग खुद को हिंदू कहते हैं, वे "हिंसा, घृणा और नफरत" फैलाते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने इस बयान को हिंदू समुदाय का अपमान बताया था।

2. ए. राजा (द्रमुक - DMK सांसद)तमिलनाडु के कद्दावर नेता ए. राजा ने हिंदू धर्म को एक "बीमारी" और "दुनिया के लिए खतरा" बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि जब तक आप हिंदू हैं, तब तक आप शूद्र हैं और शूद्र वेश्या की संतान होते हैं।

3. स्वामी प्रसाद मौर्य (सपा/पूर्व मंत्री)इन्होंने हिंदू धर्म और ग्रंथों को लेकर कई विवादित बयान दिए। उन्होंने दावा किया था कि हिंदू नाम का कोई धर्म नहीं है, बल्कि यह एक "धोखा" और दलितों-पिछड़ों को फंसाने की साजिश है।

4. रेवंत रेड्डी (तेलंगाना के मुख्यमंत्री - कांग्रेस)एक जनसभा के दौरान हिंदू देवी-देवताओं पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने सवाल उठाया था कि हिंदू "तीन करोड़ देवी-देवताओं" की पूजा क्यों करते हैं और अलग-अलग वर्गों के लिए अलग-अलग भगवान क्यों हैं।

5. जावेद अली खान (समाजवादी पार्टी सांसद)उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने विवादित टिप्पणी की थी कि बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के एक बड़े हिस्से के मन में जहर भर गया है।

इन बयानों पर अक्सर भारी राजनीतिक बवाल मचता है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और दक्षिणपंथी संगठन इन बयानों को वोट बैंक की राजनीति, तुष्टिकरण और हिंदू विरोधी मानसिकता का हिस्सा करार देते हैं। वहीं, बयान देने वाले नेताओं का अक्सर यह तर्क होता है कि उनका विरोध हिंदू धर्म से नहीं, बल्कि हिंदुत्व की राजनीतिक विचारधारा और सामाजिक असमानताओं से है।

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भारतीय राजनीति में कांग्रेस नेताओं—विशेषकर राहुल गांधी, दिग्विजय सिंह और इमरान मसूद—पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा अक्सर 'हिंदुत्व विरोधी' या 'हिंदू विरोधी' होने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। इन नेताओं के कुछ बयानों और राजनीतिक रुख को लेकर देश में बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ है। 

इन तीनों प्रमुख नेताओं के वे चर्चित बयान और घटनाक्रम नीचे दिए गए हैं, जिनके कारण उन्हें इस आलोचना का सामना करना पड़ा:

## 1. राहुल गांधी (कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता)
राहुल गांधी के कई बयानों को बीजेपी ने सीधे तौर पर हिंदू आस्था और हिंदुत्व पर हमला बताया है:

* 'हिंदू' बनाम 'हिंदुत्ववादी' का बयान (2021): जयपुर की एक रैली में उन्होंने कहा था, "भारत हिंदुओं का देश है, हिंदुत्ववादियों का नहीं। हिंदू सत्य को ढूंढता है और उसका रास्ता सत्याग्रह है, जबकि हिंदुत्ववादी सत्ता चाहते हैं और उनका रास्ता 'सत्ताग्रह' है। महात्मा गांधी हिंदू थे और नाथूराम गोडसे हिंदुत्ववादी।" 

* लोकसभा में 'हिंसक' शब्द का विवाद (जुलाई 2024): संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान भगवान शिव का चित्र दिखाते हुए उन्होंने कहा, "जो लोग खुद को हिंदू कहते हैं, वे 24 घंटे हिंसा, नफरत और असत्य की बात करते हैं। आप हिंदू हो ही नहीं।" बीजेपी ने इस पर भारी हंगामा किया और आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने पूरे हिंदू समाज को हिंसक कह दिया, जबकि राहुल गांधी ने स्पष्टीकरण दिया कि उनका इशारा केवल बीजेपी और संघ (RSS) के नेताओं की तरफ था। 

* अमेरिका में देवी-देवताओं पर टिप्पणी (सितंबर 2024): वाशिंगटन में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि "भारत में राजनीति इस बात पर है कि आप क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं। जब हम देवताओं की बात करते हैं, तो वे केवल मूर्तियां नहीं हैं, वे विचार हैं। बीजेपी इन विचारों को दबाना चाहती है।" आलोचकों ने इसे हिंदू पूजा पद्धतियों को कमतर आंकने वाला बयान माना।

## 2. दिग्विजय सिंह (पूर्व मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश)
दिग्विजय सिंह कांग्रेस के उन नेताओं में गिने जाते हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और हिंदुत्व की विचारधारा पर सबसे मुखर हमला करते हैं:  

* 'भगवा आतंकवाद' और 'हिंदू आतंकवाद' का मुद्दा: 2008 के मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट के बाद दिग्विजय सिंह ने 'भगवा आतंकवाद' (Saffron Terror) या 'हिंदू आतंकवाद' शब्द का इस्तेमाल किया था। बीजेपी का आरोप है कि उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए आतंकवाद को हिंदू धर्म से जोड़ने की कोशिश की। 

* 26/11 मुंबई हमले पर किताब का विमोचन: उन्होंने एक ऐसी किताब का विमोचन किया था जिसमें मुंबई आतंकी हमले (26/11) के पीछे RSS का हाथ होने का दावा करने की कोशिश की गई थी। इस कदम की देश भर में तीखी निंदा हुई थी।

* सावरकर और बीफ पर बयान (2021): उन्होंने एक सार्वजनिक मंच से दावा किया था कि "वीर सावरकर ने अपनी किताब में लिखा है कि हिंदू धर्म का हिंदुत्व से कोई लेना-देना नहीं है और गाय एक ऐसा जानवर है जो अपने मलमूत्र में लेटी रहती है, वह हमारी माता कैसे हो सकती है? बीफ खाने में कोई खराबी नहीं है।" इस बयान से हिंदू संगठनों में भारी आक्रोश फैला था। 

## 3. इमरान मसूद (कांग्रेस सांसद, उत्तर प्रदेश)
इमरान मसूद अपने बेहद आक्रामक और विवादित बयानों के लिए जाने जाते हैं, जिन्हें हिंदू समाज और उनके नेतृत्व के खिलाफ माना गया: -

* 'बोटी-बोटी काटने' वाला बयान (2014): लोकसभा चुनाव के दौरान इमरान मसूद का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें उन्होंने तत्कालीन पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के संदर्भ में कहा था, "यह गुजरात नहीं है। यूपी में मुसलमान 42 फीसदी हैं... अगर मोदी ने यूपी को गुजरात बनाने की कोशिश की, तो उनकी बोटी-बोटी काट देंगे।" इस बयान के लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। 

* धार्मिक ध्रुवीकरण के आरोप: उन पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगातार ऐसे बयान देने के आरोप लगते रहे हैं जो बहुसंख्यक समाज के खिलाफ अल्पसंख्यकों को लामबंद करने का काम करते हैं।

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## इस विमर्श के दो पहलू (राजनीतिक दृष्टिकोण)

* बीजेपी और आलोचकों का तर्क: भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस पार्टी वैचारिक रूप से 'हिंदू विरोधी' है। उनका कहना है कि राहुल गांधी और अन्य नेता जानबूझकर 'हिंदू' और 'हिंदुत्व' के बीच एक फर्जी विभाजन पैदा करते हैं ताकि बहुसंख्यक समाज को जातियों में बांटा जा सके और मुस्लिम वोट बैंक को सुरक्षित (तुष्टिकरण) किया जा सके। बीजेपी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का कांग्रेस द्वारा बहिष्कार किए जाने को भी इसी सोच का हिस्सा बताती है। 

* कांग्रेस और समर्थकों का स्पष्टीकरण: इसके विपरीत, कांग्रेस का रुख यह है कि वे 'हिंदू धर्म' के विरोधी नहीं हैं, बल्कि बीजेपी की 'हिंदुत्व' की राजनीतिक विचारधारा के विरोधी हैं। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि हिंदू धर्म सहिष्णुता, प्रेम और 'वसुधैव कुटुंबकम' (पूरी दुनिया एक परिवार है) की बात करता है, जबकि बीजेपी का हिंदुत्व नफरत, विभाजन और सत्ता हासिल करने का एक राजनीतिक हथियार है। राहुल गांधी खुद को 'शिवभक्त' और जनेऊधारी हिंदू बताते हुए लगातार मंदिरों का दौरा भी करते हैं ताकि इस 'हिंदू विरोधी' वाली छवि को काउंटर किया जा सके। 

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भारत में राजनीतिक भाषणबाजी और बयानों (नफरती भाषण, मानहानि, या धार्मिक ठेस) के कारण कई बड़े नेताओं को कानूनी शिकंजे का सामना करना पड़ा है। इनमें से कई नेताओं को अदालतों द्वारा सजा सुनाई गई, जबकि कुछ नेताओं ने कानूनी कार्रवाई और जेल से बचने के लिए न्यायालय में लिखित व बिना शर्त माफी मांगकर मामले को रफा-दफा किया।
गलत बयानबाजी के कारण सजा पाने वाले और माफी मांगने वाले प्रमुख राजनेताओं की सूची निम्नलिखित है:
## 1. अदालत द्वारा सजा पाने वाले राजनेता

* राहुल गांधी (कांग्रेस): साल 2019 में एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने "सभी चोरों का सरनेम मोदी क्यों होता है?" टिप्पणी की थी। इस बयान पर गुजरात की सूरत अदालत ने मार्च 2023 में उन्हें आपराधिक मानहानि का दोषी ठहराते हुए 2 साल जेल की अधिकतम सजा सुनाई थी। इस सजा के कारण उनकी लोकसभा सदस्यता भी रद्द हो गई थी। हालांकि, बाद में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने उनकी सजा पर रोक (Stay) लगा दी थी, जिससे उनकी संसद सदस्यता बहाल हुई। राहुल गांधी ने इस मामले में माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया था। 

* इमरान मसूद (कांग्रेस): वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ "बोटी-बोटी काट देंगे" वाला भड़काऊ बयान देने के मामले में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया था। इस नफरती बयानबाजी के मामले में उन्हें अदालत के आदेश पर जेल की सजा काटनी पड़ी थी।

* आजम खान (सपा): उत्तर प्रदेश के रामपुर में २०१९ के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन जिलाधिकारी और प्रशासनिक अधिकारियों व प्रधानमंत्री के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक और भड़काऊ भाषण देने के मामले में रामपुर की विशेष [MP-MLA कोर्ट](https://ecourts.gov.in/) ने उन्हें 3 साल जेल की सजा सुनाई थी। इस सजा के कारण उन्हें अपनी उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्यता भी गंवानी पड़ी थी। 

* नवजोत सिंह सिद्धू (कांग्रेस): राजनीति में आने से पहले का एक पुराना रोड रेज (सड़क पर लड़ाई-झगड़ा) का मामला था, जिसमें एक बुजुर्ग की मौत हो गई थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मई 2022 में सिद्धू को 1 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी, जिसके तहत उन्होंने पटियाला जेल में अपनी सजा पूरी की। 

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## 2. न्यायालय में लिखित/बिना शर्त माफी मांगने वाले राजनेता

* अरविंद केजरीवाल (आम आदमी पार्टी): दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर एक समय देश भर में करीब 33 से अधिक मानहानि के मुकदमे दर्ज थे। कानूनी पचड़ों और अदालती चक्करों से बचने के लिए उन्होंने वर्ष 2018 में एक के बाद एक कई नेताओं से लिखित माफी मांगी:-

* नितिन गडकरी (BJP): केजरीवाल ने उन्हें "भारत के सबसे भ्रष्ट नेताओं" की सूची में शामिल किया था, जिस पर मानहानि का केस होने के बाद उन्होंने कोर्ट में लिखित माफी मांगी।

   * दिवंगत अरुण जेटली (पूर्व वित्त मंत्री): केजरीवाल और AAP नेताओं ने उन पर DDCA में भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाए थे। जेटली द्वारा 10 करोड़ रुपये का मानहानि केस करने के बाद केजरीवाल ने अदालत में लिखित में बिना शर्त माफी मांगी और मामला वापस लिया गया।

   * विक्रम सिंह मजीठिया (अकाली दल): पंजाब चुनाव के दौरान ड्रग्स रैकेट में शामिल होने के आरोप लगाने के बाद केजरीवाल ने लिखित पत्र भेजकर माफी मांगी थी।

   * कपिल सिब्बल और अमित सिब्बल: उनके खिलाफ की गई टिप्पणियों को कोर्ट में "आधारहीन" मानते हुए फरवरी 2024 में केजरीवाल ने लिखित रूप से माफी मांगी, जिसके बाद केस बंद हुआ। 

* संजय सिंह (AAP सांसद): आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने भाजपा के युवा मोर्चा नेता अंकित भारद्वाज पर एक मंत्री को थप्पड़ मारने का गलत आरोप लगाया था। दिल्ली की विशेष अदालत में मानहानि का केस चलने के बाद संजय सिंह ने दिसंबर 2018 में अदालत के सामने बिना शर्त लिखित माफी मांगी, जिसके बाद कोर्ट ने उन्हें बरी किया। 

* राहुल गांधी (राफेल मामले में अवमानना): साल 2019 के आम चुनाव में राफेल विमान सौदे को लेकर राहुल गांधी ने "चौकीदार चोर है" का नारा दिया था और दावा किया था कि सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है कि चौकीदार चोर है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को गलत तरीके से पेश करने पर उनके खिलाफ 'न्यायालय की अवमानना' (Contempt of Court) का केस दायर हुआ। इस मामले में राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट में लिखित हलफनामा (Affidavit) देकर बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी थी, जिसके बाद कोर्ट ने उन्हें दोबारा ऐसा न करने की चेतावनी देकर छोड़ दिया था। 

## वर्तमान कानूनी स्थिति (धार्मिक बयानों पर):
पिछले वर्ष स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा रामचरितमानस की चौपाइयों पर की गई विवादित टिप्पणियों को लेकर उत्तर प्रदेश की अदालतों में आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे। हालांकि, जनवरी 2024 में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश में चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियों पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी थी, जिसके कारण फिलहाल उन्हें न तो सजा हुई है और न ही उन्होंने माफी मांगी है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मृत्यु की कामना या अमर्यादित भाषा से जुड़े बयानों की कोई निश्चित आधिकारिक संख्या तय नहीं है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रमों और सार्वजनिक बहसों में विपक्षी नेताओं या प्रदर्शनकारियों द्वारा दिए गए कई बड़े और चर्चित बयान सामने आए हैं। भारतीय राजनीति में इस तरह के विवादित बयानों की एक लंबी सूची रही है, जिनमें से कुछ प्रमुख उदाहरण नीचे दिए गए हैं: 

## 1. काशी में मृत्यु की कामना का विवाद (2022)

* बयान: समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बनारस (काशी) में चुनाव प्रचार के दौरान एक टिप्पणी की थी, जिसे भाजपा ने प्रधानमंत्री की मृत्यु की कामना से जोड़ा था। 

* प्रतिक्रिया: पीएम मोदी ने खुद वाराणसी के बूथ विजय सम्मेलन में इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, "जब सार्वजनिक रूप से काशी में मेरी मृत्यु की कामना की गई तो वाकई मुझे बहुत आनंद आया... उन लोगों ने मेरे मन की मुराद पूरी कर दी"। 

## 2. "हिटलर की मौत मरेगा" बयान (2022)

* बयान: कांग्रेस नेता सुबोध कांत सहाय ने अग्निपथ योजना के विरोध में हो रहे एक प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की तुलना हिटलर से करते हुए कहा था कि "मोदी हिटलर की राह चलेगा तो हिटलर की मौत मरेगा"। 

* प्रतिक्रिया: इस बयान पर भारी राजनीतिक विवाद हुआ था और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसकी कड़ी निंदा की थी। कांग्रेस पार्टी ने भी इस तरह के बयानों से खुद को अलग कर लिया था। 

## 3. "मोदी की हत्या के लिए तत्पर रहो" बयान (2022)

* बयान: मध्य प्रदेश कांग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री राजा पटेरिया का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वह कथित तौर पर कार्यकर्ताओं से कह रहे थे कि "अगर संविधान बचाना है तो मोदी की हत्या करने के लिए तत्पर रहो"। 

* सफाई व कार्रवाई: इस बयान के वायरल होने के बाद पटेरिया पर पुलिस केस दर्ज हुआ। बाद में उन्होंने सफाई दी कि उनके कहने का मतलब केवल चुनाव में मोदी को "राजनीतिक रूप से हराना" था, न कि शारीरिक नुकसान पहुंचाना। 

## 4. "मोदी की कब्र खुदेगी" नारे (2023)

* बयान: दिल्ली में पवन खेड़ा की गिरफ्तारी के विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर "मोदी तेरी कब्र खुदेगी" जैसे नारे लगाए गए थे। 

* प्रतिक्रिया: इस पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर के राज्यों में एक रैली के दौरान कहा था, "देश का कोना-कोना कह रहा है कि 'मोदी तेरा कमल खिलेगा'"।

राजनीतिक रैलियों, सोशल मीडिया और विरोध प्रदर्शनों में इस प्रकार की भाषा या नारों को लेकर समय-समय पर विवाद होते रहते हैं, जिनकी संख्या और डेटा किसी एक जगह संकलित नहीं हैं। 


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