कविता - दान तो दान है, धर्म का सर्वोच्च मुकाम है

कविता - दान तो दान है, धर्म का सर्वोच्च मुकाम है

दान तो दान है, धर्म का सर्वोच्च मुकाम है।
समाज की शक्ति से , धर्म का सम्मान है।
निष्काम भाव से जो अर्पित होता है धर्म को ,
वही सच्चा दान,सच्चे समर्पण का प्रणाम है।

मंदिर के चंदे में धंधे होते हैं हज़ार,
कोई धर्मस्थल इससे नहीं बचा है, यार।
जिसने दान दिया, वह तो भगवान के नाम,
उसे क्या लेना किसने किया बंदरबाँट ।

दानपात्र के साए में कुछ चेहरे मुस्कुराते हैं,
आस्था की आड़ में अपने स्वार्थ सजाते हैं।
दोष न दान का है, न धर्म के द्वार का,
लोभ ही कारण बनता है हर व्यापार का।

श्रद्धा बिकती नहीं, न बिकता विश्वास है 
लोभ का हर साम्राज्य होता है एक दिन निराश।
दाता का कर्तव्य केवल अर्पण करना है,
शेष कर्मों का लेखा ईश्वर को रखना है।

दान न धन का अभिमान है, न यश का सामान है,
यह समाज के उत्थान का पावन विधान है।
धर्म तभी जीवित है जब सेवा निष्काम है,
दान तभी सार्थक है जब निर्मल उसका नाम है।

दान तो दान है, धर्म का सर्वोच्च मुकाम है।
समाज की शक्ति से , धर्म का सम्मान है।
निष्काम भाव से जो अर्पित होता है धर्म को ,
वही सच्चा दान,सच्चे समर्पण का प्रणाम है।

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जिसने दान गिनाया, उसने पाप कमाया ,
पुण्य के मुंह पर कभी न दान आया।
वही असली दानी कहलाता।
कुछ दान के दाता पहले बनते शातिर दानी ,
फिर करते दान की राजनैतिक मारामारी ,
अंत में ईश्वर उन्हें देता सजा भारी।


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