प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने परिसीमन पर अपनी स्टडी रिपोर्ट उत्तर दक्षिण का समाधान प्रस्तुत करती है
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने परिसीमन पर अपनी स्टडी रिपोर्ट में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 824 करने का एक संभावित गणितीय मॉडल पेश किया है।
इस "लक्षित परिसीमन" के तहत सभी सीटों के बजाय केवल 170 चुनिंदा सीटों को कई हिस्सों में बांटकर नई सीटें बनाने का सुझाव दिया गया है।
रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशें और गणितीय मॉडल:
सीटों का विभाजन: रिपोर्ट के अनुसार, कुल 170 सीटों को विभाजित किया जाएगा। इनमें से 59 सीटों को दो हिस्सों में और 111 सीटों को तीन हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव है।सीटों की कुल संख्या: इस विभाजन प्रक्रिया के बाद देश में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 824 हो जाएगी।
राज्यों के अनुपात में संतुलन: जनसंख्या के आधार पर राज्यों के प्रतिनिधित्व में असंतुलन न आए, इसके लिए लक्षित मानदंडों का इस्तेमाल कर सभी बड़े राज्यों की सीटों का वर्तमान अनुपात बनाए रखने की सिफारिश की गई है।
क्षेत्रीय असर: उदाहरण के लिए, इस मॉडल के लागू होने से राजस्थान की वर्तमान 25 लोकसभा सीटों के ढांचे में बदलाव होगा और इनकी संख्या बढ़कर 38 तक हो सकती है।यह एक सैद्धांतिक कार्य-पत्र (working paper) और संभावित मॉडल है। परिसीमन की अंतिम प्रक्रिया और सीटों के बंटवारे पर अंतिम फैसला परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा ही लिया जाएगा।
प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के वर्किंग पेपर में उन 170 विशिष्ट सीटों की सूची व्यक्तिगत रूप से (सीट के नाम से) सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन राज्यवार सीटों की संख्या में होने वाली बढ़ोतरी और कुछ प्रमुख क्षेत्रों का ब्यौरा स्पष्ट दिया गया है।
इस गणितीय मॉडल का मुख्य उद्देश्य सभी बड़े राज्यों में सीटों की संख्या को लगभग 50% बढ़ाना है, ताकि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व कम न हो।
राज्यवार सीटों में संभावित बदलाव
(वर्तमान बनाम प्रस्तावित 824 सीटें)
इस मॉडल के अनुसार, बड़े राज्यों में सीटों का विभाजन इस प्रकार किया जाएगा जिससे वर्तमान अनुपात न बिगड़े:
राज्य/वर्तमान सीटें / प्रस्तावित सीटें /अतिरिक्त बढ़ी हुई सीटें
उत्तरप्रदेश 80/120/+40
महाराष्ट्र 48/72/+24
बिहार 40/60/+20
तमिलनाडु 39/59/+20
मध्यप्रदेश 29/44/+15
कर्नाटक 28/42/+14
गुजरात 26/39/+13
राजस्थान 25/38/+13
आंध्र प्रदेश 25/38/+13
केरल 20/30/+10
तेलंगाना 17/26/+9
(नोट: कुल 170 सीटों के विभाजन से कुल 281 नई सीटें पैदा होंगी, जिससे 543 + 281 = 824 का आंकड़ा पूरा होगा।) किन क्षेत्रों की सीटों को बांटने का प्रस्ताव है?
रिपोर्ट में उन 170 सीटों को चिह्नित करने के लिए मतदाता संख्या (Constituency Size) और मतदान प्रतिशत (Voter Turnout) को आधार बनाया गया है।
इसमें तीन प्रमुख श्रेणियों की सीटों को 3 हिस्सों में (Three-way split) बांटने की बात कही गई है :-
दक्षिण भारत की महानगरीय सीटें: जैसे तेलंगाना की Hyderabad और Secunderabad सीटें, तथा पश्चिम बंगाल की Kolkata Dakshin सीट।
हिंदी बेल्ट और पश्चिमी राज्यों के बड़े महानगरीय व अर्ध-शहरी क्षेत्र:
जैसे गुजरात की Bhavnagar और Rajkot सीटें,
आंध्र प्रदेश की Visakhapatnam और
तमिलनाडु की Kanniyakumari सीट।
अधिक आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्र: उत्तर भारत के वे निर्वाचन क्षेत्र जहाँ एक सांसद पर अत्यधिक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने का बोझ है।
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## 1. मुख्य बात: यह क्या है और क्यों चर्चा में है?
सीधे शब्दों में कहें तो, "यह देश की लोकसभा सीटों को बिना किसी राज्य का नुकसान किए बढ़ाने का एक नया फॉर्मूला (आइडिया) है।"
सरकार के आर्थिक सलाहकारों ने एक रिसर्च पेपर जारी किया है। इसमें उन्होंने बताया है कि बिना किसी विवाद के देश में लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 824 कैसे की जा सकती हैं।
## 2. सबसे बड़ी समस्या क्या थी? (जिसका हल इस रिपोर्ट में है)
अभी हमारे देश में साल 2026 के बाद नई जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटें बढ़ाने की तैयारी है। लेकिन इसमें एक बड़ा पेच (विवाद) था:
* उत्तर भारत (जैसे यूपी, बिहार) की आबादी तेजी से बढ़ी है, इसलिए आबादी के हिसाब से उनकी सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जातीं।
* दक्षिण भारत (जैसे केरल, तमिलनाडु) ने सरकारी नीतियों को मानकर अपनी आबादी को कंट्रोल किया है, इसलिए उनकी सीटें कम बढ़तीं।
* दक्षिण के राज्यों को डर था कि अच्छा काम करने के बावजूद संसद में उनकी ताकत (राजनीतिक वजन) कम हो जाएगी।
## 3. रिपोर्ट का 'जादुई फॉर्मूला' क्या है?
इस रिपोर्ट ने एक ऐसा गणित लगाया है जिससे "सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।"
* सब कुछ बदलने की जरूरत नहीं: देश की सभी 543 सीटों को दोबारा से नापने-काटने की जरूरत नहीं है।
* सिर्फ 170 सीटों पर फोकस: रिपोर्ट कहती है कि देश की सिर्फ 170 सीटें ऐसी हैं जो बहुत बड़ी हैं या जहाँ आबादी का बोझ ज्यादा है। सिर्फ इन्हें ही दो या तीन टुकड़ों में बांट दिया जाए।
* सबको बराबर फायदा: इस फॉर्मूले से उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान के साथ-साथ तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे सभी बड़े राज्यों की सीटें करीब 50% बढ़ जाएंगी। यानी संसद में राज्यों का जो आपसी संतुलन आज है, वह कल भी वैसा ही रहेगा। किसी भी राज्य की ताकत कम नहीं होगी।
## 4. एक आसान उदाहरण से समझें (पिज़्ज़ा मॉडल)
मान लीजिए आपके पास एक पिज़्ज़ा (संसद) है, जिसके अभी 543 टुकड़े (सीटें) हैं।
* पुराना तरीका: अगर हम सिर्फ आबादी के हिसाब से नए टुकड़े करते, तो उत्तर भारत को बड़े टुकड़े मिलते और दक्षिण भारत के हिस्से में छोटे टुकड़े आते।
* यह नया तरीका: इस नए फॉर्मूले में पूरे पिज़्ज़ा का आकार ही बड़ा कर दिया गया है (824 टुकड़े)। अब उत्तर भारत को भी ज्यादा टुकड़े मिलेंगे और दक्षिण भारत को भी उतने ही अनुपात में ज्यादा टुकड़े मिलेंगे। किसी का हिस्सा छोटा नहीं होगा।
## 5. जनता के लिए इसका क्या मतलब है?
* बेहतर सुनवाई: अभी एक-एक सांसद के नीचे 20 से 30 लाख की आबादी होती है। इतनी बड़ी भीड़ में नेताजी सबका काम नहीं देख पाते।
* छोटा क्षेत्र, बेहतर विकास: जब बड़ी सीटें टूटकर छोटी होंगी, तो सांसदों का क्षेत्र छोटा होगा। वे जनता के ज्यादा करीब होंगे और आपके इलाके का विकास बेहतर तरीके से हो सकेगा।
## 6. सबसे जरूरी बात (जो जनता को पता होनी चाहिए)
यह कोई सरकारी कानून या अंतिम फैसला नहीं है। यह सिर्फ एक सुझाव (आइडिया) है। असली फैसला भविष्य में बनने वाला 'परिसीमन आयोग' ही लेगा, लेकिन यह आइडिया देश के सामने चल रहे एक बहुत बड़े विवाद को सुलझाने का एक बेहतरीन रास्ता दिखाता है।
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उत्तर बनाम दक्षिण का विवाद खत्म! समझिए लोकसभा सीटों को 824 करने का नया 'जादुई फॉर्मूला'
भारत की राजनीति में इस समय एक बड़ा सवाल हर किसी के जेहन में है—साल 2026 के बाद जब देश में लोकसभा सीटों का दोबारा निर्धारण (परिसीमन) होगा, तो क्या होगा? क्या आबादी बढ़ाने वाले राज्यों की संसद में ताकत बढ़ जाएगी? और क्या आबादी पर नियंत्रण पाने वाले दक्षिण के राज्य राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाएंगे?
इस गंभीर क्षेत्रीय विवाद को सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने एक बेहद दिलचस्प और व्यावहारिक रिसर्च रिपोर्ट पेश की है। आइए बिल्कुल सरल भाषा में समझते हैं कि संसद का यह नया गणित क्या है और यह आम जनता के जीवन को कैसे बदलेगा।
## सबसे बड़ा डर: उत्तर बनाम दक्षिण की जंग
मौजूदा नियम के अनुसार, संसद की सीटें जनसंख्या के अनुपात में तय होती हैं। पिछले कुछ दशकों में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे उत्तर भारतीय राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी है। वहीं, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों ने सरकारी नीतियों का पालन करते हुए अपनी जनसंख्या को बखूबी नियंत्रित किया है।
यदि आज सीधे आबादी के आधार पर सीटें बढ़ाई जाएं, तो उत्तर भारत की सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी और दक्षिण भारत का संसद में दबदबा कम हो जाएगा। दक्षिण के राज्यों का डर जायज है कि "देशहित में आबादी कम करने की उन्हें सजा क्यों मिले?" इसी डर और विवाद को खत्म करने के लिए आर्थिक सलाहकारों ने एक 'बीच का रास्ता' निकाला है।
## 'लक्षित परिसीमन': सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि हमें पूरे देश की सभी 543 सीटों को फिर से काटने-छांटने की कोई जरूरत नहीं है। इसके बजाय, हमें केवल 170 भारी-भरकम सीटों पर ध्यान देना चाहिए जो आबादी या वोटर्स के लिहाज से बहुत बड़ी हो चुकी हैं।
इस फॉर्मूले के तहत:
* सीटों का बंटवारा: इन 170 सीटों में से 59 सीटों को दो हिस्सों में और 111 सीटों को तीन हिस्सों में बांट दिया जाएगा।
* नया आंकड़ा: इस मामूली बदलाव से ही देश में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 824 हो जाएगी।
* 50% का नियम: सबसे मजेदार बात यह है कि इस गणित से उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर तमिलनाडु और केरल तक—सभी बड़े राज्यों की सीटें करीब 50% बढ़ जाएंगी।
यानी, सीटों की संख्या तो बढ़ेगी, लेकिन संसद में राज्यों का जो आपसी राजनीतिक संतुलन आज है, वह कल भी बिल्कुल वैसा ही रहेगा। किसी भी राज्य की ताकत कम नहीं होगी।
## राज्यों को क्या मिलेगा? (एक नजर में)
इस नए मॉडल के लागू होने से प्रमुख राज्यों की लोकसभा सीटें कुछ इस तरह बदल सकती हैं:
* उत्तर प्रदेश: 80 सीटों से बढ़कर 120 सीटें (+40)
* महाराष्ट्र: 48 सीटों से बढ़कर 72 सीटें (+24)
* बिहार: 40 सीटों से बढ़कर 60 सीटें (+20)
* तमिलनाडु: 39 सीटों से बढ़कर 59 सीटें (+20)
* मध्य प्रदेश: 29 सीटों से बढ़कर 44 सीटें (+15)
* कर्नाटक: 28 सीटों से बढ़कर 42 सीटें (+14)
* राजस्थान: 25 सीटों से बढ़कर 38 सीटें (+13)
* केरल: 20 सीटों से बढ़कर 30 सीटें (+10)
## आम जनता को इससे क्या फायदा?
एक नागरिक के तौर पर आपके मन में सवाल आ सकता है कि नेताओं की संख्या बढ़ने से हमारा क्या फायदा? इसका सीधा असर आपके इलाके के विकास पर पड़ेगा:
1. सांसद अब आपके करीब होगा: अभी भारत में एक-एक सांसद 20 से 30 लाख की आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में एक नेता पर इतना बोझ नहीं है। सीटें छोटी होने से सांसद अपने क्षेत्र की समस्याओं को बेहतर ढंग से सुन पाएंगे।
2. तेजी से होगा विकास: जब चुनावी क्षेत्र छोटा होगा, तो विकास फंड (MPLAD) का इस्तेमाल कम दायरे में और ज्यादा प्रभावी ढंग से हो सकेगा। आपके इलाके की सड़कें, पानी, स्कूल और अस्पतालों की सुध जल्दी ली जाएगी।
## निष्कर्ष: यह कानून नहीं, एक बेहतरीन रास्ता है
यह ध्यान रखना जरूरी है कि आर्थिक सलाहकार परिषद की यह रिपोर्ट कोई कानून नहीं है, बल्कि एक अकादमिक सुझाव (Working Paper) है। अंतिम फैसला आने वाले समय में गठित होने वाला 'परिसीमन आयोग' ही लेगा।
लेकिन, इस रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि बिना किसी राज्य का नुकसान किए और बिना देश की एकता को प्रभावित किए भी लोकतंत्र को मजबूत बनाया जा सकता है। यह मॉडल भारत के 'फेडरलिज्म' (संघवाद) को बचाते हुए आगे बढ़ने का एक शानदार रोडमैप है।
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वर्तमान में इसका कोई कानूनी औचित्य नहीं है; यह सिर्फ और सिर्फ एक अकादमिक सलाह (Working Paper) है। [1]
कानूनी रूप से इसे बाध्यकारी न होने के पीछे निम्नलिखित संवैधानिक कारण हैं:
## 1. आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की कानूनी स्थिति
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) कोई संवैधानिक (Constitutional) या वैधानिक (Statutory) संस्था नहीं है। यह केवल प्रधानमंत्री को नीतिगत मामलों पर सुझाव देने के लिए बनाई गई एक स्वतंत्र समिति है। इसके द्वारा जारी किसी भी रिसर्च या वर्किंग पेपर को सरकार मानने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।
## 2. परिसीमन का अधिकार केवल 'परिसीमन आयोग' के पास है
भारत के संविधान के अनुच्छेद 82 (Article 82) के तहत, लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं को तय करने का कानूनी अधिकार केवल [Delimitation Commission of India]
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* इस आयोग का गठन संसद द्वारा पारित कानून के तहत राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
* इस आयोग का अध्यक्ष आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट का एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है। [4]
* इस आधिकारिक आयोग के फैसलों को देश की किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती (Force of Law)।
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## 3. यह रिपोर्ट फिर क्यों बनाई गई?
भले ही यह सिर्फ एक सलाह है, लेकिन इसका राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व बहुत बड़ा है:
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* चर्चा की शुरुआत: साल 2026 के बाद होने वाले आगामी परिसीमन को लेकर उत्तर और दक्षिण भारतीय राज्यों के बीच जो टकराव की स्थिति बनी हुई है, उसे सुलझाने के लिए यह रिपोर्ट सरकार को एक 'संभावित विचार' (Idea) देती है। [2, 6]
* आयोग के लिए संदर्भ: जब भविष्य में आधिकारिक 'परिसीमन आयोग' अपनी बैठकें शुरू करेगा, तब वह इस मॉडल को एक संदर्भ (Reference) के रूप में देख सकता है कि देश के विचारकों ने समस्या का क्या समाधान सोचा है। [4, 7]
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संक्षेप में कहें तो: यह सरकार द्वारा किसी नीति को लागू करने का आदेश नहीं है, बल्कि देश के बड़े विचारकों और अर्थशास्त्रियों द्वारा संसद के सामने रखी गई एक 'सुझाव पुस्तिका' मात्र है।
यदि आप परिसीमन से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों (जैसे अनुच्छेद 81 या 82) के बारे में या 1971 की जनगणना के फ्रीज होने के इतिहास को जानना चाहते हैं, तो मुझे बताएं। [2, 6]
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यह सबसे सटीक और महत्वपूर्ण सवाल है। वर्तमान में यह रिपोर्ट विधानसभाओं के परिसीमन को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पा रही है, क्योंकि यह वर्किंग पेपर मुख्य रूप से सिर्फ लोकसभा (संसद के निचले सदन) के ढांचे को केंद्र में रखकर तैयार किया गया है।
विधानसभाओं के परिसीमन के संदर्भ में इस रिपोर्ट की सीमाएं और चुनौतियां निम्नलिखित हैं:-
## 1. मुख्य फोकस केवल लोकसभा पर है
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने जो "लक्षित परिसीमन" (Targeted Delimitation) का गणितीय मॉडल दिया है, वह केवल लोकसभा की 170 बड़ी सीटों को दो या तीन हिस्सों में बांटने की बात करता है ताकि कुल सीटें 824 हो सकें। इस रिपोर्ट में राज्यों की विधानसभा सीटों (MLAs) को उसी अनुपात में कैसे बढ़ाया या बदला जाएगा, इस पर कोई स्पष्ट खाका या विस्तृत फॉर्मूला नहीं दिया गया है।
## 2. 'समान अनुपात' का गणित विधानसभाओं पर फेल हो सकता है
* लोकसभा के लिए: इस रिपोर्ट का मॉडल बहुत शानदार काम करता है क्योंकि यह उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के वर्तमान 50% के आनुपातिक संतुलन को बनाए रखता है।
* विधानसभा के लिए पेच: संविधान के अनुच्छेद 170 (Article 170) के अनुसार, राज्य की विधानसभा सीटों का निर्धारण पूरी तरह से राज्य के भीतर की जनसंख्या के आधार पर होता है। अगर किसी राज्य के भीतर किसी जिले (जैसे शहरी क्षेत्र) की आबादी बहुत तेजी से बढ़ी है और ग्रामीण क्षेत्र की धीमी, तो राज्य के भीतर ही क्षेत्रीय असंतुलन पैदा हो जाएगा। EAC-PM का मॉडल इस जमीनी (inter-state vs intra-state) अंतर को पूरी तरह हल नहीं करता।
## 3. प्रशासनिक और कानून व्यवस्था की समस्या (Asymmetry)
आमतौर पर भारतीय चुनाव व्यवस्था में एक लोकसभा सीट के भीतर निश्चित संख्या में (जैसे 6 से 8) पूरी विधानसभा सीटें आती हैं।
* यदि सरकार इस रिपोर्ट के अनुसार केवल कुछ चुनिंदा 170 लोकसभा सीटों को 3 हिस्सों में तोड़ती है, तो उन लोकसभा क्षेत्रों के भीतर आने वाली विधानसभा सीटों का भूगोल पूरी तरह गड़बड़ा जाएगा।
* विधानसभाओं का परिसीमन किए बिना केवल चुनिंदा लोकसभा सीटों को काटना प्रशासनिक और मतदान केंद्रों (Polling Booths) के प्रबंधन के लिहाज से बहुत जटिल हो जाएगा।
## 4. वास्तविक कानूनी स्थिति और सरकार का इरादा
सरकार ने पूर्व में संसद में जो विधेयक पेश किए थे, उनका उद्देश्य लोकसभा के साथ-साथ राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ाना और [Women's Reservation Bill](https://prsindia.org/billtrack/the-delimitation-bill-2026) (33% महिला आरक्षण) को लागू करना था। महिला आरक्षण को विधानसभाओं में भी लागू करने के लिए सीटों का व्यापक स्तर पर परिसीमन जरूरी है।
निष्कर्ष:
जनता और राजनीतिक दलों के दृष्टिकोण से कहें तो यह रिपोर्ट लोकसभा के स्तर पर उत्तर-दक्षिण के विवाद को तो 'संतुष्ट' या शांत करती है, लेकिन राज्यों की विधानसभाओं के परिसीमन के मोर्चे पर यह अधूरी है। जब तक आधिकारिक [Delimitation Commission] का गठन नहीं होता और वह दोनों सदनों (संसद और विधानसभा) के लिए संयुक्त रूप से नियम तय नहीं करता, तब तक विधानसभा स्तर के जनप्रतिनिधि इस मॉडल से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो सकते।
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