शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

सरदार पटेल ने चीन की कूटनीतिक चाल के प्रति आशंका जाहिर की थी



जब से गुजरात  मुख्यमंत्री और भाजपा की ओर से प्रस्तावित आगामी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने , भारत के पूर्व उपप्रधानमंत्री सरदार वल्ल्भ भाई पटेल को याद करना प्रारंभ् किया और उनकी विशाल प्रतिमा को स्थापित करने की योजना बनाई , तब से ही कोंग्रेस को अचानक पटेल याद आने लगे !!!
अन्यथा सारी सरकारी योजनाएं सिर्फ नेहरू खान दान के इर्दगिर्द ही रखी गई हैं !!! गैर नेहरू कोंग्रेसी को इस तरह भुला दिया गया जैसे उनका कोई योगदान ही नही हो ॥

जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी की गलतियों को देश भुगत रहा है आने वाले समय में हमारी पीढ़ियां इन्हे क्या कहेंगी यह तो समय ही बतायेगा , मगर सरदार पटेल समय के साथ और बड़े कद के होनें वाले हैं यह सच हे ! क्यों कि उन्होंने देशहित से कभी समझोता नहीं किया , इसी कारण रियासतों का एकीकरण हुआ और वे चीन के प्रति कितने सतर्क और चिंतित थे इसका भी उदाहरण यह पत्र है !!!! नेहरू की गलती से तिब्ब्त चीन ने निगल लिया ! मगर पटेल का पत्र इतिहास को यह बताता रहेगा कि सावधानी रखी गई होती तो तस्वीर और होती। पटेल कोंग्रेसी होने से नहीं अपितु देशभक्त होने से आने वाले इतिहास में और बड़े आदरणीय  नेता के रूप में उभरेँगे  !!! उनकी प्रस्तावित प्रतिमा उनके महान कार्यों के ही अनुरूप है ! ईश्वर करे यह जल्द स्थापित हो !!


सरदार पटेल का खत पंडित नेहरू के नाम
Issue Dated: जून 26, 2011
http://www.thesundayindian.com/hi/story/history-letter-patel-letter-to-nehru/12/4187/
यह पत्र भारत के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को लिखा था. इस पत्र में उन्होंने चीन की कूटनीतिक चाल के प्रति आशंका जाहिर की थी. उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि चीन भारतीय राजदूत को यह समझाने में सफल रहा है कि वह तिब्बत की समस्या को सुलझाना चाहता है. उन्होंने उन्हें याद दिलाया कि तिब्बत ने भारत पर भरोसा किया है पर परेशानी यह है कि भारत तिब्बतियों की मदद करने में खुद को असमर्थ पा रहा है.

मेरे प्रिय जवाहरलाल,
चीन सरकार ने हमें अपने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के आडंबर में उलझाने का प्रयास किया है. मेरा यह मानना है कि वह हमारे राजदूत के मन में यह झूठा विश्वास कायम करने में सफल रहे कि चीन, तिब्बत की समस्या को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना चाहता है. चीन की अंतिम चाल, मेरे विचार से कपट और विश्वासघात जैसी ही है. तिब्बतियों ने हम पर विश्वास किया है. हम उनका मार्गदर्शन भी करते रहे हैं और अब हम ही उन्हें चीनी कूटनीति या चीनी दुर्भावना के जाल से बचाने में असमर्थ हैं. यह दुखद बात है. ताजा प्राप्त सूचनाओं से ऐसा लग रहा है कि हम दलाई लामा को भी नहीं निकाल पाएंगे. यह असंभव ही है कि कोई भी संवेदनशील व्यक्ति तिब्बत में एंग्लो-अमेरिकन दुरभिसंधि से चीन के समक्ष उत्पन्न तथाकथित खतरे के बारे में विश्वास करेगा.
पिछले कई महीनों से रूसी गुट से परे केवल हम ही अकेले थे, जिन्होंने चीन को संयुक्तराष्ट्र की सदस्यता दिलवाने की कोशिश की. हमने फारमोसा के प्रश्न पर अमेरिका से कुछ न करने का आश्वासन भी लिया. मुझे इसमें संदेह है कि चीन को अपनी सदिच्छाओं, मैत्रीपूर्ण उद्देश्यों और निष्कपट भावनाओं के बारे में बताने के लिए हम जितना कुछ कर चुके हैं, उसमें आगे भी कुछ किया जा सकता है. हमें भेजा गया उनका अंतिम टेलीग्राम घोर अशिष्टता का नमूना है. इसमें न केवल तिब्बत में चीनी सेनाओं के घुसने के प्रति हमारे विरोध को खारिज किया गया है, बल्कि परोक्ष रूप से यह गंभीर संकेत भी दिया गया है कि हम विदेशी प्रभाव में आकर ऐसा रवैया अपना रहे हैं. उनके टेलीग्राम की भाषा साफ बताती है कि यह किसी दोस्त की नहीं, बल्कि भावी शत्रु की भाषा है.
हमें इस नई स्थिति को देखना और संभालना होगा. तिब्बत के गायब हो जाने के बाद हमें यह पता था चीन हमारे दरवाजे तक पहुंच गया है. कभी भी हमें अपनी उत्तर-पूर्वी सीमा की चिंता नहीं हुई है. हिमालय शृंखला उत्तर से आने वाले किसी भी खतरे के प्रति एक अभेद्य अवरोध की भूमिका निभाती रही है. तिब्बत हमारे एक मित्र के रूप में था, इसलिए हमें कभी समस्या नहीं हुई. हमने तिब्बत के साथ एक स्वतंत्र संधि कर हमेशा उसकी स्वायत्तता का सम्मान किया है. उत्तर-पूर्वी सीमा के अस्पष्ट सीमा वाले राज्य और हमारे देश में चीन के प्रति लगाव रखने वाले लोग कभी भी समस्या का कारण बन सकते हैं. चीन की कुदृष्टि हमारी ओर वाले हिमालयी इलाकों तक ही सीमित नहीं है. वह असम के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों पर भी नजर गड़ाए हुए है. बर्मा पर भी उसकी नजर है.
बर्मा के साथ और भी समस्या है, क्योंकि उसकी सीमा को निर्धारित करने वाली कोई रेखा नहीं है, जिसके आधार पर वह कोई समझौता कर सके. हमारे उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र आते हैं. संचार की दृष्टि से उधर हमारे साधन बड़े ही कमजोर व अपर्याप्त हैं, सो यह क्षेत्र 'कमजोर' है. उधर कोई स्थायी मोर्चा भी नहीं है. इसलिए घुसपैठ के अनेक रास्ते हैं. मेरे विचार से अब आत्मसंतुष्ट रहने या आगे-पीछे सोचने का समय नहीं है. हमारे मन में यह स्पष्ट धारणा होनी चाहिए कि हमें क्या प्राप्त करना है और किन साधनों से प्राप्त करना है. इन खतरों के अलावा हमें गंभीर आंतरिक संकटों का भी सामना करना पड़ सकता है. मैंने एचवीआर आयंगर को पहले ही कह दिया है कि वह इन मामलों की गुप्तचर रिपोर्टों की एक प्रति विदेश मंत्रालय का भेज दें. निश्चित रूप से सभी समस्याओं को बता पाना मेरे लिए थकाऊ और लगभग असंभव होगा, लेकिन समस्याओं का तत्काल समाधान करना होगा.

आपका
सरदार वल्लभ भाई पटेल

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