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भोपाल गैस त्रासदी - अर्जुन सिंह रहस्य बता दो, कोंन था जनसंहार का सोदागर !

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  भोपाल गैस त्रासदी , एक नरसंहार था, इस नरसंहार को इसी रूप में प्रस्तुत नही करने से सारी समस्या ने जन्म लिया हे , तब जो भी सत्ता में थे , उन लोगों का यह कम था कि सही विवेचना करते और सही ढंग से न्याय हो जाये यह सोचते , भोपाल पुलिस ने कम्पनी चेयरमेन को गिरिफ्तर किया ही था , बाद में ऊची राजनीती ने , लगता हे कि अन्याय करना शिरू कर दिया और इस विकराल महा अपराध को एक मामूली कर के एक्सीडेंट में बदल दिया . प्रशासन का दोष यह हे  कि उसने कानून  और देश के बजाये कुछ गलत लोगों के दवाव में काम किया , निश्चित रूप से कांग्रेस ही रही होगी , क्यों कि बाद में यह मामला सी बी आई को चला जाना भी तो इसी का सबूत हे , जरूरत तो अब फिर से सही जाँच  और सही न्याय दिलाने क़ी हे , सरकार क़ी दो प्रतिकियायें सामने हें -  १- भोपाल गैस हादसे से जुड़े मामले में अदालत के फैसले से असंतुष्ट मप्र सरकार अब इसे हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार सुबह मुख्यमंत्री निवास पर पत्रकारों से चर्चा में कहा कि इस मामले में हस्तक्षेपकर्ता के रूप में सरकार हाईकोर्ट जाएगी। इसके लिए सरकार

भोपाल गैस त्रासदी, चुल्लू भर पानी में डूब मरने जेसी बात

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   भोपाल गैस त्रासदी, चुल्लू भर पानी में डूब मरने जेसी बात हे ,स्वतंत्र भारत के राजनेतिक कर्णधारों को ,संवेधानिक व्यवस्था को, लगता नही इस  सरकार में कोई शर्म बाकीं हे , एक अपमानजनक  फेसले के २४ घंटे गुजर जाने के बाद भी कोई ठीक प्रतिक्रिया केंद्र सरकार क़ी और से नही आई , लगता भी नही क़ी सरकार कोई कदम उठाएगी,क्यों क़ी उसने तो यह मामला दवाया ही था , मुआवजे की बात पर, दिल्ली के उपहार अग्निकांड का उदाहरण हैं कि इस घटना में मृतकों के परिजनों को 15 लाख मुआवजे की राशि के साथ 9 फीसदी की दर से ब्याज भी दिया गया। लेकिन क्या भोपाल गैस पीड़ितों के जीवन की कीमत महज 25 हजार रूपये है? जबकि प्रभावित लोगों की भावी पीढ़ियों को भी अभी तक जहरीले रसायनों का दंश झेलना पड़ रहा है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि बीमार लोग काम नहीं कर सकते, उस पर ईलाज का खर्च गरीब लोगों की कमर तोड़ देता है। ऐसे में भरण पोषण कैसे हो, यह एक बड़ा सवाल है।          जानकारों की मानें तों 24 साल के बाद भी पीड़ितों की पहचान उनके रोगों के आधार पर नहीं की जा सकी है। 1980 से लेकर 1996 तक मुआवजे के नाम पर 14,400 रुपये अंतरिम राहत के तौर पर प