मीडिया : पेड न्यूज : आम व्यक्ति की अभिव्यक्ति..?






कुछ वर्षों में मीडिया ने आम व्यक्ति की अभिव्यक्ति व आकांक्षा की पहल और जिम्मेवारी से अपनी जबावदेही समाप्त कर ली है। बल्कि मीडिया में घुस आये व्यावसायिक घरानों ने एक अण्डरवल्र्ड स्थापित कर लिया है। और समाचारों और सत्य की सौदेबाजी कर आम व्यक्ति को सच्ची सूचनाओं से अनभिज्ञ रख रहा है। फेसबुक और टिविटर तथा ब्लाग नये जन अभिव्यक्ति के मंच बन कर उभरे हें। कुछ कांग्रेसजन को यह पशंद नहीं आ रहे हैं वे इन पर कानूनी रास्ते सिकंजा कसने की कोशिश कर रहे है। मगर जनता की आवाज रोकने का यह कदम कांग्रेस सरकरों को उल्टा पडेगा।
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खासकर खबरों की खरीद-बिक्री यानी पेड न्यूज का चलन इस हद तक बढ़ गया है कि संसद से लेकर सड़क तक थू - थू होने लगी है। निश्चय ही, इसके कारण समाचार मीडिया की साख दरकी है ( गिरी है )। लोकतंत्र के चैथे खंभे ( स्तंम्भ ) और सार्वजनिक हितों के पहरेदार की उसकी छवी विखंडित हुई हे और उस पर सार्वजनिक तौर पर सवाल उठने लगे हैं। इसके बावजूद खुद मीडिया ने अपने तई इसे अनदेखा करने की बहुत कोशिश की और सब कुछ खुलने के बावजूद अभी भी एक परदादारी ( छुपाव ) दिखती है। यह शव्द आनंद प्रधान के हैं जिन्होने “ इण्डिया टुडे ” 13 जुलाई 2011 के अंक में “मीडिया का अंडरवल्र्ड“ नामक पुस्तक समीक्षा में लिखे हैं।

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