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भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम १८५७ : 10 मई की तारीख देश के गौरव का दिन है

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- अरविन्द सिसोदिया  इतिहासकारों का  कहना है कि 10 मई की तारीख स्वाधीनता संग्राम के इतिहास की सर्वाधिक महत्वपूर्ण तारीख है, क्योंकि आज ही के दिन 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ योजनाबद्ध ढंग से लड़ाई शुरू हुई थी। हालाकिं मंगल पांडे और ईश्वरी प्रसाद ने हालांकि 1857 के मार्च और अप्रैल महीने में ही आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंक दिया था लेकिन योजनाबद्ध संग्राम की शुरुआत की तारीख 10 मई मानी जाती है। मेरठ, झांसी, लखनऊ और कानपुर इस संग्राम के बहुत बड़े केंद्र थे |  लेकिन इस दिन उत्तरप्रदेश और भारत सरकार ने भी कोई खास आयोजन नहीं किया। जबकि 10 मई की तारीख देश के गौरव का दिन है लेकिन इसे भुला देना शर्म की बात है। 10 मई को भड़की चिनगारी दिल्ली तक पहुंची थी और आजादी के मतवालों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे, लेकिन अंग्रेजों की कुटिल नीति और अपनों की ही दगाबाजी से यह आंदोलन सफल नहीं हो पाया। भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम १८५७ यूं तो भारत लगभग २५००  से भी अधिक वर्षों से विदेशी आक्रमणों से पीड़ित है और उसने निरंतर प्रतिरोध  किया .., इसी कारण हम दुनिया के एक मात्र देश तथा संस्कृति  हैं जिसन

भैंरोसिंह शेखावत : सांस्कृतिक मूल्यों के संवाहक

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- arvind sisodia  - अरविन्द सिसोदिया , कोटा , राजस्थान | १५ मई २०११ को पूर्व उप राष्ट्रपति एवं राजस्थान के मुख्यमंत्री  रहे भैरों सिंह शेखावत की प्रथम पुन्यतिथि है , उन्हें शत शत नमन ..! भैरोंसिंह शेखावत (२३ अक्तूबर १९२३ - १५ मई, २०१०)  भारत के उपराष्ट्रपति थे। वे १९ अगस्त २००२ से २१ जुलाई २००७ तक इस पद पर रहे।  वे १९७७ से १९८०, १९९० से १९९२ और १९९३ से १९९८ तक राजस्थान के मुख्यमंत्री भी रहे। वे भारतीय जनता पार्टी के सदस्य थे। भैरोंसिंह शेखावत का जन्म तत्कालिक जयपुर रियासत के गाँव खाचरियावास में हुआ था। यह गाँव अब राजस्थान के सीकरजिले में है। इनके पिता का नाम श्री देवी सिंह शेखावत और माता का नाम श्रीमती बन्ने कँवर था। गाँव की पाठशाला में अक्षर-ज्ञान प्राप्त किया। हाई-स्कूल की शिक्षा गाँव से तीस किलोमीटर दूर जोबनेर से प्राप्त की, जहाँ पढ़ने के लिए पैदल जाना पड़ता था। हाई स्कूल करने के पश्चात जयपुर के महाराजा कॉलेज में दाखिला लिया ही था कि पिता का देहांत हो गया और परिवार के आठ प्राणियों का भरण-पोषण का भार किशोर कंधों पर आ पड़ा, फलस्वरूप हल हाथ में उठाना पड़ा। बाद में पुलि