रविवार, 22 मई 2011

यूपीए २ .......दो साल .. भूल गया सब कुछ .. याद रही मंहगाई .....


- अरविन्द सिसोदिया 
यूपीए २  .......दो साल .. 
भूल गया सब कुछ .. याद रही मंहगाई ..... 
.......पिछले काफी समय से आम जनता मांहगाई से परेशान है, काफी धरने और हा-हा-कर कर के भी देख लिया सबने, लेकिन यूपीये सरकार के कानो पर जूं तक नहीं रैंगी। प्रधानमंत्री जी ने भी जनता को कह दिया कि वो इस बारे में चर्चा करेंग और कहे मुताबिक उन्होंने मांहगाई के मुद्दे पर काफी विचार-विमर्श भी किया। अब आप सोच रहे होंग की भाई उन्होंने तो ठीक ही किया है, जनता कि परेशानी को समझा और उस पर विचार भी किया। भाई वो तो बहुत अच्छे प्रधानमंत्री है, लेकिन मुझे ये समझाए कि सिर्फ चर्चा करने भर से ही परेशानी का हल थोड़ी निकल आता है। प्रधानमंत्री साहब के सामने जब भी कोई समस्या रखता है तो वो उस समस्या पर अपने सभी ज्ञानी मंत्रियों के साथ बैठ कर चर्चा करते है। चाय पकोड़े खाते है, यूपीए सरकार के मंत्रियों को बस चाय-पकोड़े खाने में ही दो-चार घंटों का समय लग जाता है और चाय-पकोड़े खाने में ही चर्चा का सार समय खत्म हो जाता है। तभी तो चर्चा करने के बाद भी प्रधानमंत्री साहब के पास जनता की समस्याओं का कोई हल नहीं होता है। लेकिन ठीक तो है इसी बहाने प्रधानमंत्री साहब चाय-पकोडे भी खा लेते है और इसी बहाने वो अपने मंत्री मंडल का हाल-चाल भी जान लेते है। जनता का क्या हो उसका तो काम ही हो-हल्ला मचाना है, और वैसे भी बैबस आदमी हो-हल्ला करने के आलावा और कर भी क्या सकता है ? 



नई दिल्ली [जयप्रकाश रंजन]। घर में लगी आग को बुझाने में ही सरकार दो साल तक ऐसे व्यस्त रही कि उसका शुरुआती सौ दिनों का सामाजिक एजेंडा कभी कागजों से बाहर ही नहीं निकल सका। न गरीब जनता को दो रुपये किलो गेहूं व तीन रुपये किलो चावल मिल पाया और न ही लोगों को महंगाई से निजात मिल सकी।
सत्ता में वापसी के साथ ही संप्रग-2 सरकार ने एलान किया था कि वह पहले सौ दिनों के भीतर इस तरह के तमाम कदम उठाएगी। रविवार को सरकार अपनी दूसरी वर्षगांठ सौ दिन के वादों की बदहाली के साथ मनाएगी।
संप्रग-2 के सौ दिनों के एजेंडे की जानकारी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए दी थी। आलाकमान के निर्देश पर विभिन्न मंत्रालयों ने भी अपने पहले सौ दिनों का कार्यक्रम तैयार किया था। इनमें स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, मानव संसाधन विकास, शहरी विकास और कृषि मंत्रालय प्रमुख थे। लेकिन इनके सौ दिनों का एजेंडा अधूरा का अधूरा ही रहा। अधिकांश घोषणाओं पर ये मंत्रालय चुप्पी साधे हुए हैं।
सरकार के सौ दिनों के एजेंडे में सबसे ऊपर था खाद्य सुरक्षा विधेयक और महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पारित करवाना। राज्यसभा से पारित होने के बावजूद महिला आरक्षण विधेयक के भविष्य को लेकर तमाम तरह की चिंताएं बरकरार हैं। जबकि खाद्य सुरक्षा विधेयक पर बैठकों से आगे बात नहीं बढ़ी है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की गणना के बाद ही सही तस्वीर निकलेगी।
महंगाई को लेकर सरकार का वादा पूरी तरह से मुंह चिढ़ाने वाला साबित हुआ है। सरकारी आंकड़े स्वयं गवाह हैं कि महंगाई की दर पर लगाम लगाने की सारी कोशिशें बेकार साबित हुई है। उस समय महंगाई सिर्फ खाद्य उत्पादों में थी, लेकिन अब यह अन्य उत्पादों को भी अपनी जद में ले चुकी है। खाद्य उत्पादों की महंगाई दर पिछले दो वर्षो से औसतन दहाई अंकों में हैं। मौद्रिक उपायों की वजह से कर्ज लेना काफी महंगा हो चुका है। इसी तरह सरकार ने काले धन पर रोक लगाने और विदेशी बैंकों में जमा धन को स्वदेश लाने की बात कही गई थी। इस पर भी सरकार के पास दिखाने के लिए कुछ खास नहीं है।
घोषणाएं जो एजेंडे से बाहर नहीं निकल सकीं :
1. भारत निर्माण की त्रैमासिक रिपोर्ट जारी होगी
2. पीएमओ में कार्य निष्पादन मानीटरिंग यूनिट का गठन
3. केंद्र सरकार की नौकरियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के संगठित प्रयास
4. महिला सशक्तिकरण पर एक राष्ट्रीय मिशन
5. मनरेगा से संबंधित शिकायत निवारण के लिए जिला स्तर पर लोकायुक्त नियुक्त करना
6.प्रमुख कार्यक्रमों में जनता के प्रति जबावदेही बढ़ाने के लिए स्वतंत्र मूल्यांकन कार्यालय की स्थापना
7. पंचायतों में इलेक्ट्रॉनिक शासन व्यवस्था।

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