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दो धरनों में दो कथित आत्महत्यायें : जांच कराओ राजनैतिक हत्याओं की आशंका

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*    धारा 306 के तहत किसी व्यक्ति के लिए ऐसे हालात पैदा कर  दबाव डालना या मजबूर करना, जिससे वह आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए। यह गैर जमानती धारा है। इसके तहत दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को 10 साल तक की सजा जुर्माना हो सकता है। साथ ही इस केस की सुनवाई केवल सेशन कोर्ट या उससे ऊपर की अदालत में हो सकती है। अपराध के लिए उकसाने , खुदकुशी के लिए उकसाने , आपराधिक षड्यंत्र  सहित अनेकों अपराधों का युग्म महसूस हो रहा हे इस लिए  उच्चस्तरीय जाँच हो । जाँच अधिकारी इस स्तर का हो जो कांग्रेस राजकुमार और केजरीवाल से भय नहीं खाये । कोई विवाहिता सुसराल में आत्महत्या कर लेती हे तो पुलिस सुसराल पक्ष के अनगिनित लोगों को अपराधी मान  कर मुकदमा दर्ज कर लेती  है । फिर धरना आयोजकों को कैसे बक्सा जा सकता है । प्रत्येक सह भागी की जिम्मेवारी उनकी हे । ** जांच कराओ राजनैतिक हत्याओं की आशंका है:-  दिल्ली में दो धरनों में दो कथित आत्म हत्यायें !! मामले को तूल देनें और सरकार पर अत्याधिक दवाब बनानें के मकसद से !! यह मीडिया मनेजमेंट का तरीका है। मगर इसमें आपराधिकता स्पष्टतौर पर झलक रही हे। यदि कोई भी षड़यंत्र

पुलिस मुठभैड़ और आन्तरिक सुरक्षा - पवन जैन

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भोपाल एनकाउन्टर पर मप्र पुलिस के जबांज और विलक्षण प्रतिभा के धनी आईपीएस अधिकारी श्री पवन जैन ने क्या शानदार लिखा है। आप भी पढिए : - पुलिस मुठभैड़ और आन्तरिक सुरक्षा   - पवन जैन     आजकल मध्यप्रदेश की जेल में प्रहरी की जघन्य हत्या कर  फरार हुए 8 अपराधियों की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने पर तमाम मीडिया, जनवादी संगठनों, राजनेताआें, राष्ट्रवादी और  मौका परस्तों द्वारा घटना के तथ्यों की मनचाही विवेचना कर निष्कर्ष पर पहुंचने की होड़ मची हुई है।निन्दा, आलोचना, दोषारोपण, तोहमत और  कालिख लगाने के लिये पुलिस से बेहतर लक्ष्य कोई दूसरा नहीं हो सकता है।यूं तो पानी, बिजली, सड़क, भ्रष्टाचार,मंहगाई, बेरोजगारी, तमाम समस्याएं हैं, जुलूस, धरने,आंदोलन और प्रदर्शन के लिये, पुलिस न तो इन समस्याआें के कारण में है और न समाधान में, इतना जरूर है कि जब भी इन प्रदर्शनों में जमा भीड़ बेकाबू होती है और हिंसा, तोड़-फोड़ तथा आगजनी पर उतारू हो जाती है तो कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये पुलिस को कमान संभालनी पड़ती है।  हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिये पुलिस को कभी लाठी, कभी अश्रु गैस और कभी गोलीबारी का सहारा