रविवार, 23 फ़रवरी 2014

कम्बोदिया में भी हैं शंकराचार्य




कौंडिन्य ने बसाया था कम्बोदिया को
कम्बोदिया में भी हैं शंकराचार्य
- पाथेयकण से
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भारत में आदि शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों में मठ स्थापित कर उनमें अपने प्रतिनिधि नियुक्त किये थे। उनके अतिरिक्त कांची मठ के पूज्य शंकराचार्य भी हिन्दू समाज के सर्वाधिक प्रतिष्ठित धर्माचार्यों में से हैं। भारत ही की तरह कम्बोदिया में भी शंकराचार्य हैं और उनका भी पूरे देश में वही सम्मान और प्रतिष्ठा है, जो भारत में पूज्य शंकराचार्यों का है।
गत दिनों कम्बोदिया और थाईलैण्ड की यात्रा पर गये वनवासी कल्याण आश्रम के प्रतिनिधिमण्डल में शामिल मेजर एस.एन.माथुर ने उक्त जानकारी दी। मेजर माथुर कल्याण आश्रम के विदेश विभाग के प्रभारी हैं। उन्होंने बताया कि कम्बोदिया में शंकराचार्य को "शंकराज' कहा जाता है और उनकी भारत-भूमि का दर्शन करने की बड़ी तीव्र इच्छा है। उनका शिष्य समुदाय भी हैजिसकी शिक्षा संस्कृत में हुई है। देश के सभी राज्याधिकारी उनका सम्मान करते हैं तथा उनसे परामर्श लेते हैं। कम्बोदिया में सैकड़ों मन्दिर हैं। विश्व का सबसे बड़ा मन्दिर अंगकोरवाट भी इसी देश में है। सभी मन्दिरों में प्रवेश द्वार के दोनों ओर शेषनाग की मूर्तियॉं हैं। शेषनाग की वहॉं विशेष पूजा की जाती है। प्रत्येक मन्दिर में गणेश जी की मूर्ति एवं शिवलिंग भी मिलते हैं।
इसी प्रकार थाईलैण्ड में राजगुरू हैं जो ब्राह्मण हैं। देश का राजा और प्रधानमंत्री भी पैर छू कर उन्हें आदर देते हैं। मेजर माथुर ने बताया कि राजगुरु के शिष्यों की शिक्षा भारत में "कांची-मठ' में हुई है। पिछले दिनों उनके तीन शिष्य कांची में दीक्षित हो थाईलैण्ड लौटे हैं। भारतीयों के प्रति उनमें इतना आदर है कि कल्याण-आश्रम के शिष्ट-मण्डल के चरण स्पर्श कर उन्होंने अगवानी की। दक्षिण-एशिया के सभी देशों में कुछ सौ वर्षों पहले तक हिन्दू नरेशों का ही शासन रहा है। अधिकांश शासक ब्राह्मण थे। आज भी ये देश अपने पुरखों और परम्पराओं को भूले नहीं हैं।
हंगरी पूर्वी यूरोप का एक देश है। पहले यह भी सोवियत संघ के प्रभाव में था। सोवियत संघ के विघटन के बाद इसे भी साम्यवादी तानाशाही से छुटकारा मिला। यहॉं की खुफिया पुलिस रूसी के.जी.बी. से भी अधिक बदनाम थी। मेजर माथुर ने बताया कि यहॉं के लोग अपने को राजपूत चौहानों का वंशज मानते हैं। कामरेडों के मकड़-जाल से निकलने के बाद वे अब "चर्च' से परेशान हैं। पादरियों को वे समस्याओं की जड़ मानते हैं।
इतिहास

कम्बोदिया जिसे आज कम्पूचिया के नाम से जाना जाता है, आज से दो हजार वर्ष पहले काफी विस्तृत भू-प्रदेश था। उस पूरे भू-प्रदेश पर नागवंशी शासन करते थे। जिस समय उज्जैन में प्रतापी सम्राट विक्रमादित्य का शासन था, दक्षिण के पल्लव राज्य से एक पराक्रमी ब्राह्मण युवक "कौण्डिन्य' विशान नौका पर सवार हो सागर पार करता हुआ नाग-राज्य जा पहुँचा। उसने वहॉं की रानी सोमा से विवाह कर एक नये और उत राजवंश की स्थापना की। कौण्डिन्य के साथ भारतीय हिन्दू संस्कृति भी कम्बोदिया पहुँच गई। यहॉं अनेक शिलालेख मिले हैं जिनमें संस्कृत में उक्त प्रसंग का वर्णन है। अंगकोरवाट में मिले एक शिलालेख में लिखा है-
कुलासीद्‌भुजगेन्द्रकन्या सोमेति सा वंशकरी पृथिव्याम्‌।
कौण्डिन्यनाम्ना द्विजपुंगवेन कार्य्यार्थपत्नीत्वमनायियापि।।
अर्थात्‌ कौण्डिन्य नाम के ब्राह्मणवीर ने नागकन्या सोमा से विवाह कर इस भूमि पर नये राजवंश की स्थापना की।
चीनी इतिहास में कौण्डिन्य के राजवंश के बारे में "फूनान साम्राज्य' के रूप में विस्तार से लिखा गया है। यह साम्राज्य छह सौ वर्षांे तक बना रहा। इस कालखण्ड में एक और कौण्डिन्य हुआ जो जयवर्मन नाम से सम्राट बना। जयवर्मन के समय इस साम्राज्य की सीमाएं सागर-तट से चीन तक विस्तृत हो गईं तथा यह एक वैभवशाली राज्य बन गया। आज के लाओस, वियेतनाम,थाईलैण्ड, मलयेशिया आदि सभी देश इस फूनान-साम्राज्य में शामिल थे। उस समय इसकी राजधानी का नाम व्याधपुर था।
कम्बु से कम्बोदिया-
छह सौ वर्ष के बाद फूनान में अराजकता उत्प हुई तो कम्बु नाम के भारतवंशी ने शासन की बागडोर अपने हाथ में ली। वह बहुत लोकप्रिय हुआ और इसीलिये उस देश का नाम कम्बुज हो गया। कालांतर में यह कम्बोदिया हो गया। कम्बु के वंशज भववर्मन और महेन्द्रवर्मन ने साम्राज्य को वैभव की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। कहते हैं कि उस काल में कम्बुज के लोग चॉंदी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। रामायण, महाभारत, पुराण व उपनिषद उस समय घर-घर पढ़े जाते थे। शिलालेखों के अनुसार महेन्द्रवर्मन के पुत्र ईशानवर्मन ने ईशानपुर को अपनी नई राजधानी बनाया। इसके अवशेष आज भी "कौमपोंगथाम' नगर के पास मिलते हैं।

नवीं शताब्दी में जयवर्मन द्वितीय ने खमेर साम्राज्य की स्थापना की। उसके पौत्र यशवर्मन ने यशोधरपुर नाम से नई राजधानी बनाई। अनेक मन्दिर और बौद्ध विहार उसके शासन में बनाये गये। युगाब्द 4215(सन्‌ 1113) में इसी वंश के प्रतापी सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय ने भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मन्दिर अंगकोरवाट बनवाया। आज यह भी विश्व का सबसे बड़ा मन्दिर है। एक हजार फीट लम्बे और 750 फीट चौड़े इस भव्य मन्दिर में रामायण और महाभारत के प्रसंग उकेरे हुए हैं।
श्यामदेश (थाईलैण्ड)-

यह प्रदेश कई शताब्दियों तक कम्बुज-साम्राज्य के अन्तर्गत ही रहा। इसलिये यहॉं भी वैदिक-हिन्दू संस्कृति का व्यापक प्रभाव रहा। दक्षिण चीन के "विदेह' राज्य से कुबलई खान द्वारा निकाले गये भारतीय थाईलैण्ड में बस गये। छाओ-छक्री नाम के एक पराक्रमी युवक ने श्यामदेश में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। "इन्द्रादित्य' के नाम से वह थाईलैण्ड का राजा बना। यह चवालीसवें युगाब्द (तेरहवीं सदी) के अंत की घटना है। इसी के एक वंशज ने अपना नाम "रामाधिपति' रखा। अपनी राजधानी द्वारावती का नाम भी बदल कर उसने "अयोध्या कर दिया। हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अध्ययन को उसने बढ़ावा दिया और "मनुस्मृति' के आधार पर राज्य के कानून बनवाये।
सन्‌ 1782 में वर्तमान राजवंश के पहले राजा "राम-प्रथम' के नाम से सिंहासन पर बैठे। सुरक्षा के दृष्टि से वे राजधानी को अयोध्या से "बंगकोक' ले आये। इस समय "राम-नवम' थाईलैण्ड के नरेश हैं। रामायण यहॉं राष्ट्रीय ग्रंथ की तरह मान्य है। थाई भाषा में जगज्जननी सीता को "सीदा' दशरथ को "तसरथ' रावण को "तसकंध' और लक्ष्मण को "लक' कहा जाता है। सुग्रीव' "सुक्रीव' और किष्किन्धा नगरी "खिदखि' हो गये। राम-कथा का स्वरूप वही है जो वाल्मीकि रामायण में है।

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