मझधार जीवन है ..,



- अरविन्द सिसोदिया , 
कोटा , राजस्थान |
एक कविता 
किनारा वह नीरस है ..,
जो सारी हलचल देख कर भी कुछ नहीं कर पाया..!
ठगा सा देखता रहता है ..,
अलसाया , उनिंदासा..,  
समय के धारों की उत्ताम निनाद  को ..;  
मझधार वह जीवन है ..,
जिसे निरंतर झंझावत के साथ बहते  रहना है ..!!
जीवन का रस यही है कि..,
तूफ़ान कि गती पैरों में लिए .., 
बड़ते रहो बड़ते रहो ..!!
न थका वह सूरज कभी..,
न थका वह चाँद  कभी..,
जो थक गया वह अस्तित्व में है नहीं ..!!
चरैवेती - चरैवेती - चरैवेती ..!!! 
यही जीवन का सच है ...! 


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