राष्ट्रहित सर्वोपरि : सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के भ्रामकता फैलाओ एजेंडे पर लगाम जरूरी - अरविन्द सिसोदिया
प्रेस विज्ञप्ति
राष्ट्रहित सर्वोपरि : सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के भ्रामकता फैलाओ एजेंडे पर लगाम जरूरी - अरविन्द सिसोदिया
कोटा 21 अक्टूबर। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया ने कहा कि " भारत सहित पूरा विश्व एलन मस्क के भारत के प्रति दबाब और जोरजबरदस्ती के इरादे को जान चुकी है। उनकी सोसल मीडिया प्लेटफार्म्स द्वारा भारत की मोदी सरकार के विरुद्ध चलाये जा रहे निगेटिव नैरेटिव अभियान को भी देश भली प्रकार समझ चुका है। इसलिए भारत सरकार को राष्ट्रहित में इन पर लगाम कसनी चाहिए और भारत में सेवाएं बंद कर देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि " चीन और रूस भी इन कंपनियों के बगैहर विश्वशक्ति बने हुये हैँ, तो भारत को भी स्वदेशी संसाधनों की और बढ़ना चाहिए। "
सिसोदिया ने कहा कि " डिजिटल युग में सूचनाओं का प्रवाह जितनी तेजी से बढ़ा है, देश की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता के सामने उतनी ही बड़ी चुनौतियां भी खड़ी हुई हैं। भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सोशल मीडिया दिग्गज 'मेटा' को जारी की गई सख्त चेतावनी इसी पृष्ठभूमि में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। फेसबुक और इंस्टाग्राम के कंटेंट-रैंकिंग और रिकमेंडेशन एल्गोरिदम की समीक्षा करने के सरकारी निर्देश यह साफ करते हैं कि लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में किसी भी तकनीकी प्लेटफॉर्म को देश में अराजकता या एकतरफा विमर्श (नैरेटिव) फैलाने की खुली छूट नहीं दी जा सकती।"
सिसोदिया नें कहा कि " किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए देश की सुरक्षा और अखंडता सर्वोपरि होती है। नागरिकों के मौलिक अधिकार और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता तभी तक सुरक्षित हैं, जब तक देश सुरक्षित है। हमारा संविधान नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अवश्य देता है, लेकिन इसके साथ ही राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था (पब्लिक आर्डर ) के हित में इस पर तार्किक प्रतिबंध लगाने की शक्ति भी सरकार को सौंपता है। इसका स्पष्ट संदेश है कि अभिव्यक्ति की आजादी का दायरा कभी भी राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर बड़ा नहीं हो सकता।"
सिसोदिया नें कहा कि " वर्तमान में वैश्विक टेक कंपनियों के एल्गोरिदम व्यावसायिक लाभ के लिए सनसनीखेज और एकतरफा सामग्री को कृत्रिम रूप से बढ़ावा देते हैं। संवेदनशील घटनाक्रमों या विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुरानी, असंबंधित या एडिट की गई तस्वीरों और वीडियो को गलत संदर्भ (आउट ऑफ़ कांटेक्स्ट ) में परोसना अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि देश को आंतरिक रूप से अस्थिर करने का डिजिटल षड्यंत्र है।"
सिसोदिया नें कहा कि " दुनिया के किसी भी सभ्य समाज में 'फ्रीडम' का अर्थ झूठ फैलाने या कानून-व्यवस्था को चुनौती देने का लाइसेंस नहीं हो सकता। मेटा जैसी वैश्विक कंपनियों को भारतीय कानूनों और आईटी नियम, 2021 के दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए, जिसका यह लगातार उल्लंघन कर रही है।"
उन्होंने कहा कि " सरकार द्वारा भ्रामक विजुअल्स के साथ सही तारीख, प्रामाणिक स्थान और वास्तविक संदर्भ जोड़ने का निर्देश देना किसी की आवाज दबाना नहीं, बल्कि डिजिटल स्पेस में सत्य और पारदर्शिता स्थापित करना है। सच्चाई को जानने का अधिकार भारत के नागरिकों का भी है, कि सोसल मीडिया प्लेटफार्म्स क्या परोस रहे हैँ? झूठ परोसने का अधिकार कोई भी देश किसी को कभी नहीं देता। राष्ट्रहित की सर्वोच्चता को बनाए रखने के लिए सरकार का यह कड़ा रुख बेहद सराहनीय और समय की मांग है। भारत सरकार इन्हें कठोरता से लागू कराये।"
भवदीय
अरविन्द सिसोदिया
9414180151
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राष्ट्रहित सर्वोपरि: सोशल मीडिया के भ्रामक एजेंडे और एल्गोरिदम पर लगाम क्यों जरूरी
कोटा 21 अक्टूबर । डिजिटल युग में सूचनाओं का प्रवाह जिस तेजी से बढ़ा है, उसने नागरिकों को सशक्त तो किया है, लेकिन इसके साथ ही देश की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता के सामने अभूतपूर्व चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। हाल ही में भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा सोशल मीडिया दिग्गज 'मेटा' (Meta) को जारी की गई सख्त चेतावनी और एडवाइजरी इसी पृष्ठभूमि में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्वागत योग्य कदम है। सरकार ने फेसबुक और इंस्टाग्राम के कंटेंट-रैंकिंग और रिकमेंडेशन एल्गोरिदम की समीक्षा करने के जो निर्देश दिए हैं, वे यह साफ करते हैं कि लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में किसी भी तकनीकी प्लेटफॉर्म को देश में अराजकता या एकतरफा विमर्श (नैरेटिव) फैलाने की खुली छूट नहीं दी जा सकती।
सुरक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं
किसी भी संप्रभु और लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए देश की सुरक्षा और अखंडता सर्वोपरि होती है। नागरिकों के मौलिक अधिकार, उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विकास की राह तभी तक सुरक्षित हैं, जब तक देश की सीमाएं और आंतरिक व्यवस्था अक्षुण्ण हैं। हमारा संविधान नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) का अधिकार अवश्य देता है, लेकिन इसके साथ ही अनुच्छेद 19(2) के तहत राज्य की सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) के हित में इस पर तार्किक प्रतिबंध लगाने की शक्ति भी सरकार को सौंपता है। इसका सीधा और स्पष्ट संदेश है कि अभिव्यक्ति की आजादी का दायरा कभी भी राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर बड़ा नहीं हो सकता।
एल्गोरिदम का खेल और देश के सामने खड़ी चुनौती
सरकार की चिंताएं पूरी तरह तार्किक और समय की मांग हैं। वर्तमान में वैश्विक टेक कंपनियों के एल्गोरिदम इस प्रकार काम करते हैं जो व्यावसायिक लाभ और यूजर को बांधे रखने के लिए सनसनीखेज, भड़काऊ और एकतरफा सामग्री को कृत्रिम रूप से ज्यादा बढ़ावा (Algorithmic Bias) देते हैं। किसी संवेदनशील राजनीतिक घटनाक्रम या विरोध-प्रदर्शन के समय जब करोड़ों यूजर्स के फीड में लगातार एक ही पक्ष की चुनिंदा और भ्रामक खबरें परोसी जाती हैं, तो यह सीधे तौर पर समाज में ध्रुवीकरण और कानून-व्यवस्था के लिए संकट पैदा करता है। पुरानी, असंबंधित या एडिट की गई तस्वीरों और वीडियो को वर्तमान परिस्थितियों से जोड़कर पेश करना (Out of Context Media) अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि देश को आंतरिक रूप से अस्थिर करने का एक डिजिटल षड्यंत्र है।
स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता का लाइसेंस नहीं
दुनिया के किसी भी सभ्य समाज में 'फ्रीडम' का अर्थ झूठ फैलाने, अफवाहें उड़ाने या संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने का लाइसेंस नहीं हो सकता। मेटा जैसी वैश्विक कंपनियों को यह समझना होगा कि वे भारत के विशाल बाजार से लाभ तो कमा सकती हैं, लेकिन वे भारत के कानूनों से ऊपर नहीं हैं। उन्हें आईटी नियम, 2021 के तहत अपनी 'ड्यू डिलिजेंस' (उचित सावधानी) की जिम्मेदारियों का कड़ाई से पालन करना ही होगा। सरकार द्वारा भ्रामक विजुअल्स के साथ सही तारीख, प्रामाणिक स्थान और वास्तविक संदर्भ (Context Labels) जोड़ने का निर्देश देना किसी की आवाज दबाना नहीं, बल्कि सत्य को स्थापित करना है।
निष्कर्ष
सूचनाओं के इस दौर में डिजिटल संप्रभुता की रक्षा करना भारत सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है। कोई भी विदेशी या घरेलू टेक प्लेटफॉर्म अपने व्यावसायिक हितों के लिए देश के ताने-बाने को खतरे में नहीं डाल सकता। राष्ट्रहित की सर्वोच्चता को बनाए रखने के लिए सरकार का यह हस्तक्षेप न केवल आवश्यक था, बल्कि यह टेक दिग्गजों को उनकी कानूनी और सामाजिक जवाबदेही याद दिलाने का एक कड़ा संदेश भी है। जब देश सुरक्षित रहेगा, तभी लोकतंत्र और नागरिकों के अधिकार भी सुरक्षित रहेंगे।
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