भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा,संवैधानिक संस्थाओं की अनिवार्य जबाबदेही है — अरविन्द सिसोदिया
विपक्ष की गैर-जिम्मेदार राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा पर अनुचित प्रहार
वर्तमान कांग्रेस और उसके ही प्रतिस्पर्धी कुछ दलों में इस समय असंवैधानिक और झूठ पर आधारित नौटंकी खड़ी करने की प्रतिस्पर्धा चल रही है, इन दलों को जनता नें सिरे से नकार दिया है और ये बिना वोट से ही जीते शासक बनना चाहते हैँ। इनकी इस बेतुकी जिद पर, पूरे देश में ही नहीं, विश्व में भी भारतीय विपक्ष मज़ाक बनकर रह गया है।
नेता प्रतिपक्ष की फ्रंट पेज पर छपने की इस बीमारी में देश के दिन-प्रतिदिन के ज़रूरी कार्यों सहित देश का विकास बाधित हो रहा है, वहीं देश की गरिमा और संवैधानिक संस्थाओं का निहित स्वार्थों हेतु मानमर्दन किया जा रहा है। इसलिए देश की सभी ज़िम्मेदार व जवाबदेह संस्थाओं सहित नागरिकों को भी लोकतंत्र की रक्षा हेतु प्रबलता से सक्रिय रहना होगा।
इक्कीसवीं सदी का नया युद्ध : हाइब्रिड वॉरफेयर और छद्म सूचना तंत्र
आज इक्कीसवीं सदी का विश्व एक अदृश्य, जटिल और अत्यंत ख़तरनाक युद्ध के दौर से गुज़र रहा है। भू-राजनीति (जियोपॉलिटिक्स) के मैदान में अब पारंपरिक हथियारों और सेनाओं से सीधे टकराव के बजाय एक नया और भयावह प्रतिमान (पैटर्न) विकसित किया गया है। इसे 'हाइब्रिड वॉरफेयर' या छद्म सूचना युद्ध कहा जाता है, जिसका मुख्य हथियार मिसाइलें नहीं, बल्कि विदेशी धनबल, ऑनलाइन पेमंटिंग से सोर्स जुटाना, सोशल मीडिया का मैनिपुलेशन और कृत्रिम रूप से तैयार की गई अराजकता है। इस रणनीति का शिकार केवल तीसरी दुनिया के विकासशील देश ही नहीं हो रहे हैं, बल्कि यूरोप के समृद्ध और सदियों पुराने लोकतांत्रिक देश भी इसकी चपेट में हैं। फ्रांस में होने वाले भीषण दंगे, ब्रिटेन की सड़कों पर भड़की नस्लीय व सामाजिक हिंसा, और जर्मनी से लेकर नीदरलैंड तक फैले हिंसक आंदोलन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि कोई भी संप्रभु राष्ट्र अब सुरक्षित नहीं है।
टूलकिट संस्कृति, विदेशी फंडिंग और सुनियोजित अराजकता का वैश्विक नेटवर्क
इस वैश्विक खेल के पीछे एक सोची-समझी 'टूलकिट संस्कृति' और वैश्विक लॉबी (डीप स्टेट) काम कर रही है। ये ताक़तें किसी भी देश की स्थानीय समस्याओं, नीतिगत मतभेदों या सामाजिक दरारों को चुनती हैं और फिर भारी विदेशी फंडिंग के दम पर उसे एक व्यापक हिंसक भीड़तंत्र (मॉबोक्रेसी) में बदल देती हैं। सोशल मीडिया एल्गोरिदम और कृत्रिम बॉट्स (बॉट्स) के ज़रिए रातों-रात ऐसा नैरेटिव (विमर्श) तैयार किया जाता है कि आम जनता को वह एक स्वाभाविक जन-आंदोलन लगने लगता है। परंतु, वास्तव में उसकी डोर दूर बैठी विदेशी शक्तियों के हाथों में होती है, जिनका एकमात्र उद्देश्य उस राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाना और वहाँ की चुनी हुई सरकार को अस्थिर करना होता है।
बांग्लादेश और नेपाल के घटनाक्रम : भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चेतावनी
हमारे अपने पड़ोस में घटित हालिया घटनाक्रम इस ख़तरे की सबसे बड़ी और ताज़ा चेतावनी हैं। बांग्लादेश में साल 2024 में हुआ तख़्तापलट और उसके बाद वहाँ भड़की लगातार हिंसा, तथा हाल ही में नेपाल में देखने को मिला व्यापक जन-आक्रोश और हिंसक प्रदर्शनों के बाद हुआ सत्ता परिवर्तन—ये दोनों इस बात के जीवंत उदाहरण हैं कि कैसे विदेशी ताक़तों ने मुट्ठीभर स्थानीय असंतोष को हवा देकर आम जनता को ही अपने देश के ख़िलाफ़ हथियार बना लिया। इन देशों को एक ऐसे दुष्चक्र और दीर्घकालिक अस्थिरता में झोंक दिया गया है, जिससे उबरने में इन्हें दशक लग सकते हैं। पड़ोसी देशों का यह हश्र भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र के लिए एक गंभीर अलार्म है। वहीं, भारत की संवैधानिक संस्थाओं को सतर्क व प्रत्युत्तरवादी होने की माँग करता है।
भारत की आंतरिक स्थिरता को चुनौती और विदेशी हस्तक्षेप की व्यापक आशंकाएँ
भारत अपनी भौगोलिक स्थिति, आर्थिक प्रगति और मज़बूत राष्ट्रवादी नेतृत्व के कारण हमेशा से इन वैश्विक ताक़तों के निशाने पर रहा है। हम पहले भी शाहीन बाग़ के प्रयोग, किसान आंदोलनों के नाम पर टूलकिट के खुलासे और नागरिकता कानून (सीएए) के विरोध में विदेशी संस्थाओं की संदिग्ध सक्रियता को देख चुके हैं। भारत की इस आंतरिक स्थिरता को डिगाने के लिए देश के भीतर और बाहर बैठे तत्व लगातार घात लगाए बैठे हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति संवैधानिक संस्थाओं की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और जबाबदेही
इस अत्यंत संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण समय में, भारत की सभी संवैधानिक संस्थाओं, चाहे वह हमारी न्यायपालिका हो, चुनाव आयोग हो या कार्यपालिका हो, को अपनी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। विशेषकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) सहित देश की सभी शीर्ष संस्थाओं का यह सर्वोपरि और ऐतिहासिक कर्तव्य है कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में किसी भी प्रकार की शिथिलता या रत्ती भर भी लापरवाही को स्वीकार न करें।
सेना, पुलिस और सुरक्षा बलों के शौर्य पर सवाल अस्वीकार्य हैं, ये रक्षक हैँ
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध-प्रदर्शन का अधिकार हमारे संविधान की आत्मा है, और उसका सम्मान होना ही चाहिए। लेकिन जब विरोध की आड़ में राष्ट्र की संप्रभुता को चुनौती दी जाने लगे, जब देश की कानून-व्यवस्था को बंधक बनाकर हिंसक भीड़तंत्र का प्रदर्शन किया जाने लगे, तो संवैधानिक संस्थाओं को बिना किसी हिचकिचाहट के वज्र की तरह कठोर होना पड़ेगा।
इसके साथ ही, हमारी खुफिया एजेंसियों (आईबी, रॉ) और सुरक्षा बलों का मनोबल बनाए रखना पूरे देश का सामूहिक दायित्व है। जब कुछ स्वार्थी राजनीतिक दल या छद्म बुद्धिजीवी (स्यूडो-इंटेलेक्चुअल्स) अपने निहित फ़ायदों के लिए हमारी सेना या पुलिस की निष्पक्षता और शौर्य पर सवाल उठाते हैं, तो वे अनजाने में उन्हीं विदेशी ताक़तों के एजेंडे को मज़बूत कर रहे होते हैं।
सुरक्षा बलों को सशक्त बनायें : ये राष्ट्र की प्रथम सुरक्षा दीवार हैँ
सुरक्षा बलों का मनोबल ही देश की रक्षा की पहली दीवार है; यदि उस दीवार में दरार आई, तो पूरा तंत्र ढह जाएगा। इसलिए, न्यायपालिका और समाज को मिलकर ऐसा रक्षा-कवच तैयार करना होगा कि राष्ट्रविरोधी तत्वों के मन में कानून का ख़ौफ़ हो, न कि कानून के लचीलेपन का फ़ायदा उठाने का हौसला।
सतर्कता, राष्ट्रभक्ति और जनशक्ति : लोकतंत्र की वास्तविक ताकत
भारत दुनिया का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र इसलिए है क्योंकि हमारी नींव 'मतदाता की शक्ति' पर टिकी है, किसी प्रायोजित 'भीड़' के उपद्रव पर नहीं। वैश्विक साज़िशों और सूचना युद्ध के इस दौर में हमें यह बुनियादी मंत्र याद रखना होगा कि 'सतर्कता ही स्वतंत्रता की कीमत है।' यदि हमारी संस्थाएँ सजग हैं और नागरिक राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत हैं, तो दुनिया की कोई भी ताक़त भारत की प्रगति के रथ को नहीं रोक सकती।
भवदीय,
अरविन्द सिसोदिया
शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी,
राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मण्डल,
9414180151
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