कविता - राम आज स्वयं को मानें
राष्ट्र अस्मिता से जो खेले, ऐसे रावण को पहचानें। अविलंब दुष्ट दमन करने को, राम आज स्वयं को मानें।।
जो सत्य धर्म के पथ से भटके, उनको सत्य का बोध कराएँ। जो माँ भारती का मान गिराएँ, उनको उनकी औकात बताएँ।।
जाति-धर्म के विषधर बनकर, जो जन-जन में वैर जगाते। प्रेम, एकता, सद्भाव मिटाकर, अपना स्वार्थ सिद्ध कर जाते।।
उनके छल-प्रपंच को समझें, उनके झूठ को आज न मानें। राष्ट्र-धर्म की रक्षा हित में, कर्तव्य अपना सर्वोपरि जानें।।
नहीं धनुष की आज आवश्यकता, नहीं बाण की धार चाहिए। कलम, विचार, विवेक के बल पर, सत्य की प्रखर पुकार चाहिए।।
अन्यायों के महलों को अब, जनशक्ति से ध्वस्त कराएँ। संविधान, संस्कार, सत्य के पथ पर, भारत का गौरव बढ़ाएँ।।
नहीं किसी से द्वेष हमारा, नहीं घृणा का भाव जगाएँ। दुष्ट विचारों का दमन करें, मानवता का धर्म निभाएँ।।
जब-जब संकट राष्ट्र पर आए, एकजुट होकर खड़े हो जाएँ। मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनें हम, भारत को फिर स्वर्ग बनाएँ।।
राष्ट्र अस्मिता सर्वोपरि हो,
मन में यही विचार जगाएँ।
सत्य, न्याय और धर्म की खातिर,
हर भारतवासी राम बन जाए।।
🇮🇳
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