रविवार, 27 जून 2010

महान वीरांगना दुर्गावती







महान वीरांगना महारानी दुर्गावती  ने ,देश की अस्मिता और स्वतंत्रता के लिए लड़ा था महा संग्राम

- अरविन्द सिसोदिया
चंदेलों कि बेटी थी ,
गोंडवाने  कि रानी ,
चंडी थी-रणचंडी थी ,
वह दुर्गावती भवानी  थी .
भारत की नारियों ने देश की अस्मिता और स्वतंत्रता के लिए हमेशा ही यशस्वी  योगदान दिया है । महारानी दुर्गावती , मध्यप्रदेश की विलुप्त ऎतिहासिक धरोहर की महान यशोगाथा हे , वे  साहस और पराक्रम रहीं . .
उनकी वीर गाथा महारानी लक्ष्मी बाई जितनी  प्रसिद्ध नही हुई , मगर  उनका वीरोचित व्यवहार लक्ष्मी बाई से कम नही था .य़ू तो दो महान बिभुतियों में तुलना नही की जाती ,  यह विवाद का प्रश्न भी नही हे कि किसको प्रशिधि अधिक मिली और किसको नही मिला . लक्ष्मी बाई को प्रसिधी का एक कारण जबलपुर कि ही बहू सुभद्रा कुमारी चोहान कि झाँसी की रानी कविता को भी जाता हे  ,
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।जिसने उनकी यशोगाथा  को शिखर तक पहुचाया हे . उनकी सडक दुर्घटना में निधन होने से , बहुतसी रचनाएँ आने से रह गईं .., हो सकता वे दुर्गावती पर भी कविता लिखती . एक दूसरा कारण यह हे कि दुर्गावती के जीते जी कोई मुस्लिम शासक गोंडवाना  को जीत नही सका , उसके बलिदान के बाद उनके पुत्र ने भी बलिदानी  संघर्स किया . इस युध का अंत चोरागढ़ के जोहर से हुआ . यह सच हे कि राजपूत पुत्री और आदिवासी बहू दुर्गावती को और उनके सघर्ष  के बिखरे तमाम धरोहरों को उतनी प्राथमिकता से नही सजोया गया जितने कि आवश्यकता थी . 
इन वीरों का सच्चा सम्मान यही हे की इन से प्रेरण लें और भूलें नही ...!
कालिंजर के चंदेल राजा कीर्तिसिंह की इकलौती संतान थी। महोबा के राठ गाँव में सन् १५२४ की नवरात्रि दुर्गा अष्टमी के दिन जन्म होने के कारण इनका नाम दुर्गावती से अच्छा और क्या हो सकता था।देवी दुर्गा से दुर्गावती .  इनका तेज भी भगवती  दुर्गा की ही तरह था . वे  तीरंदाजी और तलवार चलाने में निपुण, रूपवती, चंचल, निर्भय वीरांगना थीं , उनकी वीरता के चर्चे दूर  दूर  तक चर्चित थे .  गोंडवाना शासक संग्राम सिंह के पुत्र दलपत शाह की सुन्दरता, वीरता और साहस की चर्चा धीरे धीरे दुर्गावती तक पहुँची परन्तु जाति भेद आड़े आ गया .फ़िर भी दुर्गावती और दलपत शाह दोनों के परस्पर प्रेम और भगबत इच्छा   ने अंततः उन्हें परिणय सूत्र में बाँध ही दिया .
विवाहोपरांत दलपतशाह को जब अपनी पैतृक राजधानी गढ़ा रुचिकर नहीं लगी तो उन्होंने सिंगौरगढ़ को राजधानी बनाया और वहाँ प्रासाद, जलाशय आदि विकसित कराये. रानी दुर्गावती से विवाह होने के ४ वर्ष उपरांत ही दलपतशाह की मृत्यु हो गई और उनके ३ वर्षीय पुत्र वीरनारायण को उत्तराधिकारी घोषित किया गया. रानी ने साहस और पराक्रम के साथ, पुत्र वीरनारायण का संरक्षण  करते हुए,  १५४९ से १५६५ अर्थात १६ वर्षों तक गोंडवाना साम्राज्य का कुशल संचालन किया.गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ा-मंडला सहित ५२ गढ़ों  के ३५००० गावों की शासक वीरांगना महारानी दुर्गावती थी  !
शानदार शाषन ------- 
वह तीर थी , तलवार थी ,
भालों और तोपों का वार थी ,
फुफकार थी , हुंकार थी ,
शत्रु का संहार थी , शत्रु का संहार  थी,
वह दुर्गावती भवानी थी .
उन्होंने अपने शासन काल में जबलपुर में दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल, मंत्री के नाम पर अधारताल आदि जलाशय बनवाये. १५५५-१५६० तक मालवा पर मुस्लीम शाषक बाज बहादुर का शाषन था , उसने कई बार युद्ध लड़ कर गोंडवाने को जीतने की कोशिशें की , मगर हर बार उसे हार ही हाथ लगी  रानी ने किश भी दुश्मन को पनपने नही दिया . मगर उनका देवर रजा बनाने का बहुत ही आकाक्षाएँ रखता था .
थर -थर दुश्मन कांपे ,
पग-पग भागे अत्याचार ,
लाशें  बिछी कई हजार ,  
नरमुंडों की झड़ी लगाई थी,
वह दुर्गावती भवानी थी .

अकबर की कामुकता
जो लोग अकबर को महान पढ़ते हें उन्हें नही मालूम की अकबर  एक कामुक और व्यभिचारी राजा  था , जो राजा  की भूमिका पर कलंक था . अकबर की ३४ रानियाँ थी जिसमें २१ रानियाँ ,रजवाड़ों के  राजाओं  राजकुमारियां  थीं . दुर्गावती जैसी विधवा  पर भी उसने कु द्रष्टि ही डाली थी , जिसकी जितनी भी निदा की जाये वह कम होगी .
संभत कांग्रेस और कई तथाकथित धर्म  निरपेछ दलों के नेत्कों को यही सब पसंद  हे , इश लिए अकबर को कामुक और व्यभिचारी के बजाये महान पढ़ाया जाता हे .
अकबर ने रानी दुर्गावती को पत्र भेजकर जैसे चेतावनी दी...वीरांगना रानी ने अकबर का पत्र तो फाड़कर फेंक दिया और जवाब भिजवा दिया।अकबर दुर्गावती के जवाब से तिलमिला उठा।
गोंडवाना के उत्तर में गंगा के तट पर कड़ा मानिकपुर सूबा था. वहाँ का सूबेदार आसफखां मुग़ल शासक अकबर का रिश्तेदार था.अकबर के कहने पर उसने रानी दुर्गावती के गढ़ पर हमला बोला परन्तु हार कर वह वापस चला गया, लेकिन उसने दुबारा पूरी तैयारी से हमला किया जिससे रानी की सेना के असंख्य सैनिक शहीद हो गए.
कर्म-मान थी , धर्म-प्राण थी ,
आजादी की शान थी ,
शोर्य का अनुसन्धान थी , 
वह दुर्गावती महान थी .
जबलपुर के निकट नर्रई नाला के पास भीषण युद्ध के दौरान जब झाड़ी के पीछे से एक सनसनाता तीर रानी की दाँयी कनपटी पर लगा तो रानी विचलित हो गयीं. रानी ने अर्धचेतना अवस्था में मंत्री अधारसिंह से अपने ही भाले के द्बारा उन्हें समाप्त करने का आग्रह किया. इस असंभव कार्य के लिए आधार सिंह द्बारा असमर्थता जताने पर उन्होंने स्वयं अपनी तलवार या कटार से अपना से  वीरगति पाई.
जब विपदा घिर आई थी ,
चाहुओर घटा घनघोर  थी ,
ना आगे राह थी, ना पीछे पार थी , 
घायल  रानी को लाज बचानी  थी ,
अपने ही सीने में अपना  ही खंजर; 
 वह दुर्गावती अमर बलिदानी थी .

बदला लिया शान से ....
दुर्गावती के वंसजों  ने हर नही मानी, उन्होंने घोषणा कि जो भी आसफ खान का सर काट कर लायेगा , उसे नगद इनाम और जागीर दी जायेगी , खलोटी के महाबली ने आसफ खान  का सर काट कर हाजिर किया , उसे कवर्धा कि जागीर दी गई .आसफ खा का सिर गढ़ा मंडला में दफन किया  हुआ हे और बांकी  का धड मडई-भाटा  में दफन किया  गया हे . दुनिया भर में यह एक मात्र मकबरा हे जो दो जगह बना हुआ हे .


वीरांगना रानी दुर्गावती ‘समाधि स्थल‘ नर्रई नाला में रानी के ४४६वें बलिदान दिवस ( २३ जून २०१० )पर आयोजित एक गरिमामय समारोह को संबोधित करते हुए कहा  आदिवासियों ने भी देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्य न्यौछावर किया है । उनके इस बलिदान की गाथा से युवा पीढी को अवगत कराने प्रदेश सरकार ने स्केचबुक श्रंखला का प्रकाशन प्रारंभ किया है । इस आशय की बात  प्रदेश के आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री कुंवर विजय शाह ने khii . ।
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने आज वीरांगना दुर्गावती के बलिदान दिवस पर महिला सशक्तिकरण के लिये मध्य प्रदेश पुलिस में रानी दुर्गावती के नाम पर नई बटालियन गठित करने की घोषणा की। उन्होंने बताया कि इस बटालियन में केवल महिलाओं की भर्ती की जायेगी।श्री चौहान जबलपुर से कोई 20 किलो मीटर दूर बारहा गांव में नर्रई नाले के समीप स्थित वीरांगना रानी दुर्गावती की समाधि पर श्रध्दा सुमन अर्पित करने के बाद आयोजित सभा को संबोधित कर रहे थे । उन्होंने रानी दुर्गावती तथा वीर शंकर शाह-रघुनाथ शाह के नाम पर प्रतिवर्ष दो-दो लाख रूपये के पुरस्कारों की भी घोषणा की।
--गौंड़ वंश की वीरांगना रानी दुर्गावती की स्मृति में स्थापित इस संग्रहालय का शिलान्यास 1964ई. को हुआ जबलपुर में हे ।
-- जबलपुर. रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर में हे .
- राधा कृष्ण मन्दिर रोड , डडवाडा, कोटा २ . राजस्थान .

------------------




इस रानी से हारा था बादशाह अकबर, मारे गए थे 3000 मुगल सैनिक
bhaskar newsOct 05, 2015

जबलपुर। मुगल बादशाह अकबर की 10,000 सैनिकों की सेना को रानी दुर्गावती ने तीन बार हरा दिया था। हार से अकबर बौखला गया, उसने रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधार सिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा। रानी ने यह मांग ठुकरा दी। इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसिफ खां के नेतृत्व में सेना भेज दीं। जबलपुर के पास नरई नाले के पास हुए युद्ध में 3000 हजार मुगल सैनिक मारे गए थे। 5 अक्टूबर को रानी दुर्गावती की जयंती है। dainikbhaskar.com इस मौके पर एक विशेष सीरीज के तहत बताने जा रहा है इस वीरांगना की पूरी कहानी।
अकबर की सल्तनत के अधीन मालवा के शासक बाज बहादुर और कड़ा मानिकपुर का सूबेदार आसिफ खां ने अकबर के कहने पर 10 हजार घुड़सवार, सशस्त्र सेना और तोपखाने के साथ आक्रमण किया। रानी दुर्गावती ने 2000 सैनिकों के साथ उसका सामना किया। इस युद्ध में 3000 हजार मुगल सैनिक मारे गए थे। आसिफ खां ने पहले भी रानी के राज्य पर हमला कर चुका था। हर बार वह बुरी तरह हारा। इसके बाद उसने दोगुनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। रानी उसी दिन अंतिम निर्णय कर लेना चाहती थीं। अतः भागती हुई मुगल सेना का पीछा करते हुए वे उस दुर्गम क्षेत्र से बाहर निकल गयीं। अगले दिन 24 जून, 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। ज्यादा घायल होने पर रानी ने अंत समय निकट देख अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंक कर आत्म बलिदान दे दिया था।
(रानी दुर्गावती की स्मृति में 1983 में मध्यप्रदेश सरकार ने जबलपुर विश्व विद्यालय का नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय कर दिया। भारत सरकार ने 24 जून 1988 को डाक टिकट जारी किया था।)

अकबर के सैनिकों ने लूटा खजाना
रानी के वीरगति को प्राप्त हो जाने के बाद अकबर की सेना ने राज्य पर जमकर अत्याचार कर खजाना लूट लिया। गढ़मंडला की इस जीत से अकबर को बहुत धन मिला। उसका ढहता हुआ साम्राज्य फिर से जम गया। इस धन से उसने सेना एकत्र कर अगले तीन वर्ष में चित्तौड़ को भी जीता।

चौरागढ़ का जौहर
आसिफ खां रानी की मृत्यु से बौखला गया था। वह उन्हें अकबर के दरबार में पेश करना चाहता था, उसने राजधानी चौरागढ़ (हाल में जिला नरसिंहपुर में) पर आक्रमण किया। रानी के पुत्र राजा वीरनारायण ने वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की। इसके साथ ही चौरागढ़ में जौहर हुआ। जिसमें हिन्दुओं के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं ने भी अपने आप को जौहर के अग्नि कुंड में छलांग लगा दी थी।

अकबर से झूठ बोला आसिफ खां
कहा जाता है कि आसिफ खां ने अकबर को खुश करने के लिए दो महिलाओं को यह कहते हुए भेंट किया कि एक राजा वीरनारायण की पत्नी है तथा दूसरी दुर्गावती की बहिन कलावती है। राजा वीरनारायण की पत्नी ने जौहर का नेतृत्व करते हुए बलिदान किया था और रानी दुर्गावती की कोई बहिन थी ही नहीं। बाद में आसिफ खां से अकबर नाराज भी रहा। मेवाड़ के युद्ध में वह मुस्लिम एकता नहीं तोडना चाहता था इसलिए उसने उससे कुछ नहीं कहा।

रानी की शौर्य की चर्चा होती थी हर जगह
पहले हुए युद्ध में में रानी द्वारा बाज बहादुर को हराने की चर्चा दूसरे राज्यों में होने लगी। यह जब अकबर के कानों तक पहुंची तो वह चकित रह गया। पहले उसने अपने दूत के माध्यम से रानी से मित्रता करनी चाही, रानी ने उसका संदेश स्वीकार कर लिया। लेकिन कुछ ही दिन बाद उसने छल से रानी के राज्य पर आधिपत्य जमाने का संदेश भेज दिया ये रानी को मंजूर नहीं था। रानी तलवार की अपेक्षा बंदूक का प्रयोग अधिक करती थीं।

आसिफ खां ने उकसाया था अकबर को
1555 से 1560 तक मालवा के मुस्लिम शासक बाज बहादुर और मियानी अफगानी के आक्रमण गौंडवाना पर कई वार हुए, हर बार रानी की सेना की ही विजय हुई। रानी स्वंय युद्धभूमि में रह कर युद्ध करती थी। अकबर के कडा मानिकपूर के सूबेदार आसिफ खां ने रानी दुर्गावती के विरूद्ध अकबर को उकसाया था। रानी की मृत्यु के बाद उनका देवर चन्द्र शाह शासक बना व उसने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। उसकी हत्या उसी के पुत्र मधुकर शाह ने कर दी। अकबर को कर नहीं चुका पाने के कारण मधुकर शाह के दो पुत्र प्रेमनारायण और हृदयेश शाह बंधक थे। मधुकरशाह की मृत्यु के पश्चात 1617 में प्रेमनारायण शाह को राजा बनाया गया।

चंदेल वंश की थीं रानी
रानी दुर्गावती चन्देल वंशीय राजपूत राजा कीर्तीराय की पुत्री थीं, उनका जन्म कालंजर किले (वर्तमान में बांदा जिला, उत्तरप्रदेश में ) में 5 अक्टूबर 1524 को हुआ था। उनके पिता तत्कालीन महोबा राज्य के राजा थे। उनका विवाह राज्य गौंडवाना के राज गौड़ राजा दलपत शाह से 1542 में हुआ था। उनका एक पुत्र वीरनारायण का जन्म 1545 में हुआ। 1550 में उनके पति राजा दलपत शाह की मृत्यु हो गई। पुत्र वीरनारायण को सिंहासन पर बिठा कर उन्होंने शासन संभाला। मालवा और दिल्ली के मुस्लिम शासकों से निरंतर संघर्ष करते हुए उन्होंने 24 जून 1564 को युद्ध भूमि में वीरगति प्राप्त की।



                                                        rani ka mahal 



वीरांगना महारानी दुर्गावती


१. बाल्यावस्थासे ही शूर, बुद्धिमान और साहसी रानी दुर्गावती
२. रानी दुर्गावतीने गोंड राजवंशवकी बागडोर (लगाम) थाम ली
३. आक्रमणकारी बाजबहादुर जैसे शक्तिशाली राजाको युद्ध में हराना
४. अकबरका सेनानी तीन बार रानिसे पराजित
५. गोंडवानाकी स्वतंत्रताके लिए आत्मबलिदान देनेवाली रानी
गोंडवानाको स्वतंत्र करने हेतु जिसने प्राणांतिक युद्ध किया और जिसके रुधिरकी प्रत्येक बूंदमें गोंडवानाके स्वतंत्रताकी लालसा थी, वह रणरागिनी थी महारानी दुर्गावती । उनका इतिहास हमें नित्य प्रेरणादायी है ।

 

१. बाल्यावस्थासे ही शूर, बुद्धिमान और साहसी रानी दुर्गावती

रानी दुर्गावतीका जन्म १० जून, १५२५ को तथा हिंदु कालगणनानुसार आषाढ शुक्ल द्वितीयाको चंदेल राजा कीर्ति सिंह तथा रानी कमलावतीके गर्भसे हुआ । वे बाल्यावस्थासे ही शूर, बुद्धिमान और साहसी थीं । उन्होंने युद्धकलाका प्रशिक्षण भी उसी समय लिया । प्रचाप (बंदूक) भाला, तलवार और धनुष-बाण चलानेमें वह प्रवीण थी । गोंड राज्यके शिल्पकार राजा संग्रामसिंह बहुत शूर तथा पराक्रमी थे । उनके सुपुत्र वीरदलपति सिंहका विवाह रानी दुर्गावतीके साथ वर्ष १५४२ में हुआ । वर्ष १५४१ में राजा संग्राम सिंहका निधन होनेसे राज्यका कार्यकाज वीरदलपति सिंह ही देखते थे । उन दोनोंका वैवाहिक जीवन ७-८ वर्ष अच्छेसे चल रहा था । इसी कालावधिमें उन्हें वीरनारायण सिंह नामक एक सुपुत्र भी हुआ ।

 

२. रानी दुर्गावतीने गोंड राजवंशवकी बागडोर (लगाम) थाम ली

दलपतशाहकी मृत्यु लगभग १५५० ईसवी सदीमें हुई । उस समय वीर नारायणकी आयु बहुत अल्प होनेके कारण, रानी दुर्गावतीने गोंड राज्यकी बागडोर (लगाम) अपने हाथोंमें थाम ली । अधर कायस्थ एवं मन ठाकुर, इन दो मंत्रियोंने सफलतापूर्वक तथा प्रभावी रूपसे राज्यका प्रशासन चलानेमें रानीकी मदद की । रानीने सिंगौरगढसे अपनी राजधानी चौरागढ स्थानांतरित की । सातपुडा पर्वतसे घिरे इस दुर्गका (किलेका) रणनीतिकी दृष्टिसे बडा महत्त्व था ।

कहा जाता है कि इस कालावधिमें व्यापार बडा फूला-फला । प्रजा संपन्न एवं समृद्ध थी । अपने पतिके पूर्वजोंकी तरह रानीने भी राज्यकी सीमा बढाई तथा बडी कुशलता, उदारता एवं साहसके साथ गोंडवनका राजनैतिक एकीकरण ( गर्‍हा-काटंगा) प्रस्थापित किया । राज्यके २३००० गांवोंमेंसे १२००० गांवोंका व्यवस्थापन उसकी सरकार करती थी । अच्छी तरहसे सुसज्जित सेनामें २०,००० घुडसवार तथा १००० हाथीदलके साध बडी संख्यामें पैदलसेना भी अंतर्भूत थी । रानी दुर्गावतीमें सौंदर्य एवं उदारताका धैर्य एवं

बुद्धिमत्ताका सुंदर संगम था । अपनी प्रजाके सुखके लिए उन्होंने राज्यमें कई काम करवाए तथा अपनी प्रजाका ह्रदय (दिल) जीत लिया । जबलपुरके निकट ‘रानीताल’ नामका भव्य जलाशय बनवाया । उनकी पहलसे प्रेरित होकर उनके अनुयायियोंने चेरीतल का निर्माण किया तथा अधर कायस्थने जबलपुरसे तीन मीलकी दूरीपर अधरतलका निर्माण किया । उन्होंने अपने राज्यमें अध्ययनको भी बढावा दिया ।

 

३. आक्रमणकारी बाजबहादुर जैसे शक्तिशाली राजाको युद्ध में हराना

राजा दलपतिसिंहके निधनके उपरांत कुछ शत्रुओंकी कुदृष्टि इस समृद्धशाली राज्यपर पडी । मालवाका मांडलिक राजा बाजबहादुरने विचार किया, हम एक दिनमें गोंडवाना अपने अधिकारमें लेंगे । उसने बडी आशासे गोंडवानापर आक्रमण किया; परंतु रानीने उसे पराजित किया । उसका कारण था रानीका संगठन चातुर्य । रानी दुर्गावतीद्वारा बाजबहादुर जैसे शक्तिशाली राजाको युद्धमें हरानेसे उसकी कीर्ति सर्वदूर फैल गई । सम्राट अकबरके कानोंतक जब पहुंची तो वह चकित हो गया । रानीका साहस और पराक्रम देखकर उसके प्रति आदर व्यक्त करनेके लिए अपनी राजसभाके (दरबार) विद्वान `गोमहापात्र’ तथा `नरहरिमहापात्र’को रानीकी राजसभामें भेज दिया । रानीने भी उन्हें आदर तथा पुरस्कार देकर सम्मानित किया । इससे अकबरने सन् १५४० में वीरनारायणसिंहको  राज्यका शासक मानकर स्वीकार किया । इस प्रकारसे शक्तिशाली राज्यसे मित्रता बढने लगी । रानी तलवारकी अपेक्षा बंदूकका प्रयोग अधिक करती थी । बंदूकसे लक्ष साधनेमें वह अधिक दक्ष थी । ‘एक गोली एक बली’, ऐसी उनकी आखेटकी पद्धति थी । रानी दुर्गावती राज्यकार्य संभालनेमें बहुत चतुर, पराक्रमी और दूरदर्शी थी ।

 

४. अकबरका सेनानी तीन बार रानिसे पराजित

अकबरने वर्ष १५६३ में आसफ खान नामक बलाढ्य सेनानीको (सरदार) गोंडवानापर आक्रमण करने भेज दिया । यह समाचार मिलते ही रानीने अपनी व्यूहरचना आरंभ कर दी । सर्वप्रथम अपने विश्वसनीय दूतोंद्वारा अपने मांडलिक राजाओं तथा सेनानायकोंको सावधान हो जानेकी सूचनाएं भेज दीं । अपनी सेनाकी कुछ टुकडियोंको घने जंगलमें छिपा रखा और शेषको अपने साथ लेकर रानी निकल पडी । रानीने सैनिकोंको मार्गदर्शन किया । एक पर्वतकी तलहटीपर आसफ खान और रानी दुर्गावतीका सामना हुआ । बडे आवेशसे युद्ध हुआ । मुगल सेना विशाल थी । उसमें बंदूकधारी सैनिक अधिक थे । इस कारण रानीके सैनिक मरने लगे; परंतु इतनेमें जंगलमें छिपी सेनाने अचानक धनुष-बाणसे आक्रमण कर, बाणोंकी वर्षा की । इससे मुगल सेनाको भारी क्षति पहुंची और रानी दुर्गावतीने आसफ खानको पराजित किया । आसफ खानने एक वर्षकी अवधिमें ३ बार आक्रमण किया और तीनों ही बार वह पराजित हुआ ।

 

५. गोंडवानाकी स्वतंत्रताके लिए आत्मबलिदान देनेवाली रानी

अंतमें वर्ष १५६४ में आसफखानने सिंगारगढपर घेरा डाला; परंतु रानी वहांसे भागनेमें सफल हुई । यह समाचार पाते ही आसफखानने रानीका पीछा किया । पुनः युद्ध आरंभ हो गया । दोनो ओरसे सैनिकोंको भारी क्षति पहुंची । रानी प्राणोंपर खेलकर युद्ध कर रही थीं । इतनेमें रानीके पुत्र वीरनारायण सिंहके अत्यंत घायल होनेका समाचार सुनकर सेनामें भगदड मच गई । सैनिक भागने लगे । रानीके पास केवल ३०० सैनिक थे । उन्हीं सैनिकोंके साथ रानी स्वयं घायल होनेपर भी आसफखानसे शौर्यसे लड रही थी । उसकी अवस्था और परिस्थिति देखकर सैनिकोंने उसे सुरक्षित स्थानपर चलनेकी विनती की; परंतु रानीने कहा, ‘‘मैं युद्ध भूमि छोडकर नहीं जाऊंगी, इस युद्धमें मुझे विजय अथवा मृत्युमें से एक चाहिए ।” अंतमें घायल तथा थकी हुई अवस्थामें उसने एक सैनिकको पास बुलाकर कहा, “अब हमसे तलवार घुमाना असंभव है; परंतु हमारे शरीरका नख भी शत्रुके हाथ न लगे, यही हमारी अंतिम इच्छा है । इसलिए आप भालेसे हमें मार दीजिए । हमें वीरमृत्यु चाहिए और वह आप हमें दीजिए”; परंतु सैनिक वह साहस न कर सका, तो रानीने स्वयं ही अपनी तलवार गलेपर चला ली ।

वह दिन था २४ जून १५६४ का, इस प्रकार युद्ध भूमिपर गोंडवानाके लिए अर्थात् अपने देशकी स्वतंत्रताके लिए अंतिम क्षणतक वह झूझती रही । गोंडवानापर वर्ष १९४९ से १५६४ अर्थात् १५ वर्ष तक रानी दुर्गावतीका अधिराज्य था, जो मुगलोंने नष्ट किया । इस प्रकार महान पराक्रमी रानी दुर्गावतीका अंत हुआ । इस महान वीरांगनाको हमारा शतशः प्रणाम !

जिस स्थानपर उन्होंने अपने प्राण त्याग किए, वह स्थान स्वतंत्रता सेनानियोंके लिए निरंतर प्रेरणाका स्रोत रहा है ।
उनकी स्मृतिमें १९८३ में मध्यप्रदेश सरकारने जबलपुर विश्वविद्यालयका नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय रखा ।
इस बहादुर रानीके नामपर भारत सरकारने २४ जून १९८८ को डाकका टिकट प्रचलित कर (जारी कर) उनके बलिदानको श्रद्धांजली अर्पित की ।

2 टिप्‍पणियां: