सोमवार, 4 अप्रैल 2011

परमपूज्य डॉक्टर हेडगेवार : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रणेता



- हरिकिशन पुरोहित
(फलोदी से हैं , जोधपुर में रहते हैं )
( पुरोहित ने यह लेख facebook पर डाला हुआ है , मेंने यह उठा कर यहाँ आप सब के लिए प्रस्तुत भर कर दिया है | )      आन्ध्र प्रदेश के कन्द्कुर्ती गाँव में हेडगेवार परिवार रहता था। उसकी एक शाखा महाराष्ट्र के नागपुर में आ गयी थी। इसी शाखा के एक कर्मनिष्ठ और परोपकारी व्यक्ति, बलिराम हेडगेवार और उनकी सहृदय पत्नी, रेवती सुशीला के यहाँ केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ। इनका जन्म एक अप्रैल, 1889 को गुढी पाडवा पर्व के दिन हुआ। गुढ़ी पाड़वा का अर्थ है—ध्वजारोहण करना। इस दिन सभी लोग अपने घरों पर झंडा फहराते हैं एवं द्वारों पर तोरणादि बांधकर उल्लास प्रदर्शित करते हैं। यह दिन बड़ा शुभ माना जाता है। शुभ दिवस और पुत्र जन्म से हेडगेवार परिवार में दोहरा हर्ष छा गया। लोग बालक को बड़ा पराक्रमी एवं भाग्यशाली मान रहे थे। दरअसल गुढ़ी-पाड़वा दिवस का इतिहास ही पराक्रम एवं विजय से परिपूर्ण रहा है। हजारों वर्ष पूर्व आज ही के दिन लंका विजय के बाद भगवान राम ने अयोध्या में प्रवेश किया था और इसी दिन राजा शालिवाहन ने मिट्टी के घुड़सवारों में प्राण फूंककर उनके द्वारा आक्रमणकारी शकों को मार भगाया था।

     बचपन में माता रेवतीबाई उन्हें शिवाजी की देशभक्तिपूर्ण कथाएं सुनाती थीं। उन्हें सुनकर वह बहुत खुश होते थे। बचपन में सुनी इन कहानियों का केशव के मन पर गहरा असर पड़ा। उनके मन में देश-प्रेम की भावना जाग उठी। उनकी ये भावनाएं उनके छात्र जीवन में ही झलकने लगीं थीं। 22 जून 1897 का दिन था। अंग्रेज अपनी महारानी विक्टोरिया के राज को 60 वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में देश भर में बड़ा समारोह मना रहे थे। जिस विद्यालय में केशव पढ़ते थे वहां मिठाइयाँ बांटी गयी। सब छात्र खुश हुए और अंग्रेजों तथा रानी विक्टोरिया की स्तुति करने लगे। केशव से ये सब नहीं देखा गया। उन्होंने मिठाई को कूड़ेदान में फेंकते हुए कहा, " अंग्रेज हमारे दुश्मन हैं। वे मिठाई खिलाकर हमें गुलामी की जंजीरों में और अधिक कसना चाहते हैं।" केशव के एक इशारे पर सभी छात्रों ने मिठाई फेंक दी। केशव पढने में एक साधारण विद्यार्थी थे, लेकिन अंग्रेजों के विरुद्ध अपने साथियों को संगठित करने और उनमें देश-प्रेम की भावना जगाने में सबसे आगे थे।

     सन् 1902 की बात है। भारत के कई शहरों में प्लेग की बीमारी फैली हुई थी। इस बीमारी से नागपुर के लोग भी नहीं बच पाये। वहां बहुत-से लोगों को अपनी जिन्दगी से हाथ धोना पड़ा। ऐसे में कोई अपने रिश्तेदारों के यहां उनका हाल पूछने भी नहीं जाता था, लेकिन केशव के माता-पिता सामान्य रूप से लोगों के घर जा-जाकर उनका हाल पूछते थे। छुआछूत के चलते उन्हें भी प्लेग का शिकार होना पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई।

     जब केशव नागपुर में हाई स्कूल में पढ़ रहे थे तब एक दिन अंग्रेज निरीक्षक विद्यालय में निरीक्षण के लिए आये। विद्यार्थियों ने उनके स्वागत की अनूठी योजना बनाई। कक्षा में उनके आते ही सभी छात्र एक साथ गा उठे, 'वन्दे मातरम्!' सभी कक्षाओं में यही हुआ। पूरे विद्यालय में 'वन्दे मातरम्' गूँज उठा। निरीक्षण कार्य ठप्प हो गया। अधिकारी क्रोध से तमतमा उठे। वे हेडमास्टर पर बरस पड़े, "यह कैसी बगावत हो रही है? कौन है इसकी जड़ में? सबको कड़ी सजा दो।" हेडमास्टर ने छात्रों को कड़ी डाँट पिलाई। शिक्षकों ने लड़कों को मारा-पीटा, डराया-धमकाया, पुचकारा-ललचाया और बार-बार पूछा, "यह किसकी शरारत है?" लेकिन किसी ने भी केशव का नाम नहीं लिया। 'वन्दे मातरम्' और 'भारत माता की जय' के नारे लगाते हुए विद्यार्थी अपने-अपने घर चले गए। फिर भी बात छिपी नहीं रही। माफ़ी मांगने के लिए केशव पर दबाव डाला गया। केशव ने माफ़ी मांगने से साफ़ मना कर दिया। उन्होंने कहा, "जो शासन अपनी माँ को प्रणाम नहीं करने देता, वह अन्यायी है। उसे उखाड़ फेंकना चाहिए।" इस पर केशव को विद्यालय से निकाल दिया गया। इसके बाद केशव ने यवतमाल व पूना में शिक्षा प्राप्त की। केशव का शरीर सुगठित था। उनका अध्ययन व्यापक और विचार शक्ति पैनी थी। यवतमाल तथा पूना में उन्हें बड़े नेताओं का साथ मिला। अब छोटे-बड़े उनका आदर करने लगे। सब उन्हें केशवराव कहने लगे।

     केशव ने दो बातें ठान ली थीं। पहली बात, उन्हें बंगाल जाना था क्योंकि वह बंगाल के देशभक्त क्रांतिकारियों से बहुत प्रभावित थे। उस भूमि को वह निकट से देखना चाहते थे। दूसरी बात, वह आगे पढना चाहते थे। विशेषतः उनकी इच्छा डाक्टर बनने की थी। इस व्यवसाय में जन-सेवा, प्रतिष्ठा तथा धन-लाभ - तीनों ही थे। उनका मन ऊंची उड़ानें भर रहा था, परन्तु उनकी आर्थिक स्थिति ने उनका जमीन पर चलना भी कठिन कर दिया था।

     केशवराव की आगे की पढ़ाई कलकत्ता में हुई। उनकी दृष्टि में कलकत्ता केवल महानगरी ही नहीं थी, वह आत्मबलिदान की वेदी भी थी। वहां के युवक मातृभूमि को गुलामी से मुक्त कराने के लिए क्रांति करना चाहते थे। जल्दी ही केशवराव बंगला भाषा बोलना सीख गए। वह नलिनी किशोर गुह, अमूल्यरत्न घोष, प्रतुलचंद गांगुली, श्यामसुंदर चक्रवर्ती, विपिनचंद्र पाल आदि गणमान्य बंगाली सज्जनों के घर आने-जाने लगे। धीरे-धीरे वह उनके घर के सदस्य जैसे बन गए।

       केशवराव ने प्रतिज्ञाबद्ध होकर क्रांतिकारी दल में प्रवेश किया। वह अनुशीलन समिति के सदस्य बने। एक दिन मेडिकल कॉलेज के एक प्राध्यापक नहीं आये थे। इसलिए कक्षा में छात्र अपनी-अपनी धुन में मस्त थे। अमूल्य रत्न घोष नाम का एक छात्र अपने आपको कुछ दादा समझता था। वह केशवराव के सामने आ खड़ा हुआ और कहने लगा, "जरा तुम्हारी ताकत तो देखें, मेरी भुजा पर मुक्के मारो।" केशवराव ने अपनी भुजा खोलकर कहा, "पहले आप।" 'अच्छा! मुझे चुनौती देता है? देखता हूँ।' यह सोचते हुए अमूल्य ने दांत किटकिटाकर केशव की बाजू पर कसकर मुक्के जमाये। वह मुक्के मारते ही चला गया, परन्तु केशव टस-से-मस नहीं हुए। आख़िरकार अमूल्य ने अपनी हार मान ली और हमेशा के लिए केशव का प्रशंसक बन गया।

      अनेक गतिविधियों में लगे रहने के बावजूद केशव पढाई में पीछे नहीं रहे। उन्हें अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ता था। उनके पास पर्याप्त पुस्तकें नहीं थीं। वह दूसरों से पुस्तकें मांग लाते थे। रात के एकांत में एकाग्र होकर पढ़ते थे तथा सुबह लौटा देते थे। हर परीक्षा में केशव को अच्छे अंक मिलते थे। यह देखकर उनके साथी चकित होते थे। अंतिम परीक्षा में भी उन्हें अच्छे अंक मिले। अंततः उन्हें एल. एम. एस. की उपाधि प्राप्त हुई और वे डॉक्टर बने। कॉलेज के प्राचार्य उन्हें बहुत चाहते थे। वह एक बड़े अस्पताल में उनको नौकरी दिलाना चाहते थे, लेकिन केशव ने विनम्र शब्दों में उनसे मना कर दिया, "महोदय, अपने देश की परिस्थिति सुधारने के लिए मेरे जैसे हजारों युवकों को अपना सब कुछ न्योछावर करना होगा। इसलिए मैंने नौकरी, विवाह आदि न करने का फैसला किया है। मैं केवल आपका आशीर्वाद चाहता हूँ।" बंगाल से डॉक्टर बनकर केशव नागपुर लौटे। परन्तु उन्होंने न तो कहीं नौकरी की और न क्लिनिक ही खोला। उनके भाई तथा रिश्तेदार उन्हें तरह-तरह के सुझाव देते रहे। डॉक्टर जी सबकी बातें सुनते थे और अपने देश की सेवा में लगे रहते थे।

      जब विवाह के सम्बन्ध में बार-बार प्रस्ताव आने लगे तब उन्होंने अपने चाचाजी को साफ शब्दों में पत्र लिखा - "मैंने आजन्म देश-सेवा का व्रत लिया है। मेरे जीवन में न निजी सुख के लिए कोई जगह है और न निजी परिवार के लिए। देश की सेवा करते समय न जाने कितनी बार जेल जाना होगा। हो सकता है जान की बाजी भी लगानी पड़े। इसलिए मेरे विवाह के बारे में न सोचें।"

      डॉक्टर बनने की इच्छा पूरी होने पर केशव के सामने दो लक्ष्य थे- अंग्रेजो की गुलामी से देशवासियों को छुटकारा दिलाना और देश की उन्नती के नए रास्ते खोजना। युवकों के दिलों में देश-प्रेम की भावना जगाना ही उनका प्रमुख कार्य था। उसे करने का वह कोई मौका नहीं छोड़ते थे। डॉक्टर जी ने प्रांतीय कांग्रेस के कार्यवाह के नाते कार्य किया। सन 1920 के नागपुर अधिवेशन में उन्हें भोजन-व्यवस्था का कार्य दिया गया था। सन 1921 में जब असहयोग आन्दोलन छिड़ा तब उन्होंने उग्र भाषण दिए। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ा, उन पर मुक़दमा चलाया और उन्हें एक वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हुई। कारागार में उनका व्यव्हार बहुत धैर्यपूर्ण तथा संतुलित रहा। वह सदा प्रसन्न रहते थे और दूसरों की सहायता करते थे।

      जेल से छूटने के बाद डॉक्टर जी ने अनेक कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श करके सच्चरित्र नवयुवकों को एकत्र किया और सन 1925 के विजयादशमी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। शुरुआत में सब सदस्य सप्ताह में एक दिन इकट्ठे होते थे। फिर नागपुर के सलूबाई मोहिते के बाड़े में संघ ने शाखा का रूप धारण किया। धीरे-धीरे स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ने लगी। नागपुर में कई स्थानों पर शाखाएं शुरू हुईं। स्वयंसेवक जब भी दूसरे गाँव जाते, वहां शाखा शुरू करते। कई बुद्धिमान स्वयंसेवकों को डॉक्टर जी ने पढाई के बहाने अन्य प्रान्तों में भेजा। लाहौर, दिल्ली, लखनऊ, पटना, कलकत्ता, मद्रास, बम्बई, पूना, अहमदाबाद, जयपुर आदि स्थानों पर शाखाएं चलने लगीं। इन शाखाओं में न तो अंग्रेजों को गालियाँ दी जाती थीं और न मुसलमानों को। वहां कहा जाता था- 'अपनी मातृभूमि से प्रेम करो। जाति-पांति आदि का भेद मन में न लाते हुए भारत माता के पुत्रों से प्रेम करो। स्वावलंबी बनो। वीर बनो। दुनिया के दूसरे देशों की तरफ मत ताको। त्याग करते हुए हिन्दुओं को संगठित करो। इसी दवा से देश के सब रोग दूर हो जायेंगे।' संघ में सभी आयु, वर्ग और जाति के लोग आने लगे। संघ का कार्य दिन दूना रात चौगुना बढ़ता चला गया। डॉक्टर जी हर छोटे बड़े स्वयं सेवक के साथ अपनेपन से पेश आते थे।

       सन १९३० में अंग्रेजों के विरुद्ध कानून तोड़ने का आन्दोलन चला। इसी आन्दोलन के अंतर्गत उन्होंने यवतमाल जिले में जंगल सत्याग्रह किया, जिसके लिए उन्हें नौ महीने की कैद की सजा मिली। जेल में भी वह संघ का कार्य करते रहे। उन्होंने अनेक कैदियों को संघ का उद्देश्य और महत्त्व समझाया। कई कैदियों को स्वयंसेवक भी बनाया।

       लम्बे समय तक सतत काम करते रहने से डॉक्टर जी बीमार हो गए। यह सन 1940 की बात है। नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग लगा था। डॉक्टर जी उसमे स्वयंसेवकों से मिलने के लिए परेशान थे। अंत में डॉक्टरों ने उन्हें इजाजत दे दी। 9 जून, 1940 को वह स्वयंसेवकों से मिले। उस समय उनका शरीर बुखार से तप रहा था। फिर भी उनका मन उछल रहा था। उन्होंने स्वयंसेवकों को संघ के महत्त्व के बारे में समझाया। थोड़े में ही बहुत सी बातें कह दीं। धीरे-धीरे डॉक्टर जी की सेहत गिरने लगी। 21 जून, 1940 को डॉक्टर जी ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।

आज भी डॉक्टर हेडगेवार के विचार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के रूप में हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं।

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