सोमवार, 30 दिसंबर 2013

30 दिसंबर 1943 को भारत कि प्रथम स्वतंत्रता



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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन 1942 में भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज या इन्डियन नेशनल आर्मी (INA) नामक सशस्त्र सेना का संगठन किया गया। इसकी संरचना रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से टोकियो में की।
आरम्भ में इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे। बाद में इसमें बर्मा और मलाया में स्थित भारतीय स्वयंसेवक भी भर्ती किये गये। एक वर्ष बाद सुभाष चन्द्र बोस ने जापान पहुँचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा की कि अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे। हमें भारत के भीतर व बाहर से स्वतंत्रता के लिये स्वयं संघर्ष करना होगा। इससे गद्गद होकर रासबिहारी बोस ने 4 जुलाई 1943 को 46 वर्षीय सुभाष को इसका नेतृत्व सौंप दिया। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने 'सुप्रीम कमाण्डर' के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए "दिल्ली चलो!" का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया ।
21 अक्टूबर 1943 के सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपाइन, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया। 4 फरवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।
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 दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में भारतीय स्वाधीनता के आंदोलन का नेतृत्व उस समय देश भक्त रासबिहारी बोस कर रहे थे। 4 जुलार्इ 1943 को सिंगापुर में आयोजित एक विशाल ऐतिहासिक रैली में श्री रासबिहारी बोस ने इंडियन इंडिपैन्डैंस लींग (Indian Independence League) की कमान सुभाष बाबू जी को सौंप दी। 5 जुलार्इ 1943 को उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज (I.N.A.) की स्थापना की। इस अवसर पर उन्होंने ‘दिल्ली चलो’ का आह्वान किया और वह ‘नेताजी’ के नाम से सारे विश्व में प्रख्यात हो गए। 21 अक्टूबर 1943 में उनके नेतृत्व में आज़ाद हिंद सरकार का गठन किया गया। जापान के प्रधानमंत्री ने नेताजी का अपने देश की संसद में स्वागत किया और 23 अक्टूबर 1943 को उनके नेतृत्व में भारत को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में धुरी शक्तियों ने मान्यता प्रदान कर दी। तत्पश्चात इस सरकार ने ‘नेशनल बैंक ऑफ आज़ाद हिंद फ़ौज लिमिटिड’ के नाम से एक बैंक की स्थापना की जिसमें जनता ने अल्पावधि में ही लगभग 13 करोड़ रुपयों की राशि जमा करवार्इ। तत्कालीन ‘बर्मा सरकार’ द्वारा इस बैंक से ऋृण लेने की आवश्यकता इस बैंक की आर्थिक सुदृढ़ता एवं विश्वसनीयता को प्रकट करती है। कालातंर में ब्रिटिश सामा्रज्य द्वारा इस बैंक पर आधिपत्य स्थापित करने के समय इस बैंक में करोड़ों रुपये की राशि जमा थी तथा बैंक की देनदारियां शून्य थी। ‘आज़ाद हिंद सरकार’ द्वारा अनेकों अस्पतालों के अतिरिक्त 80 के लगभग विद्यालयों की स्थापना की गर्इ। सुभाष बाबू जी ने 30 दिसंबर 1943 को अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट-ब्लेयर में आर्इ.एन.ए. का झंडा लहराया और विश्वभर में बदनाम सैलूलर (Cellular Jail) को देखकर उनका हृदय पसीज उठा। वर्णनीय है कि 1906 में निर्मित ‘काले-पानी’ के नाम से कुख्यात इस जेल की 698 कालकोठरियों में स्वतंत्रता सेनानियों एवं देश भक्तों को ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा क्रूर यातनाएं दी जाती थी। पांव तथा हाथों में बेड़ियों से जकड़े देश भक्तों को जेल की चार दीवारी में बंद कोठरियों में कोल्हू में जोतकर नारियल से छिलका अथवा छाल उतारकर उसकी गिरी से तेल निकालने के लिए विवश किया जाता था। इसके अतिरिक्त उनको दलदल भूमि को समतल करने एवं जंगल में वृक्ष काटने के लिए मजबूर किया जाता था। किसी भी देश भक्त द्वारा इंकार करने पर बड़ी निर्दयता से कोड़े मारे जाते थे। सबसे दु:खदायी बात यह थी कि इतना कठिन परिश्रम करने के बावजूद उन्हें एक वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती थी। वास्तव में ज़ालिम अंग्रेज़़ हकुमत ने अपने अधिकारियों को यह निर्देश दे रखे थे कि कोर्इ भी देश भक्त जीवित बचकर वापस न लौट सके। फिर भी वे अनन्य देश प्रेमी देश के लिए हंसते हुए यह सारे कष्ट सहन करते थे। अंग्रेज़़ अधिकारियों द्वारा रौंगटे खड़े कर देने वाली क्रूर यातनाओं की कहानियों से आज की पीढ़ी परिचित नहीं है। उन्होंने इन द्वीपों को अंग्रेज़़ों से स्वतंत्र करवाकर अंडमान-निकोबार का नाम क्रमश: ‘शहीद एवं स्वराज’ रखा।
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आज ही के दिन 30 दिसंबर, 1943 को माँ भारती के वीर सपूत "नेताजी सुभाष चंद्र बोस" ने भारतीय स्वतंत्रता का जयघोष करते हुए पोर्ट ब्लेयर में स्वतंत्र भारत का ध्वज फहराकर वहाँ अपने मुख्यालय की स्थापना की, और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को ब्रिटिश शासन से मुक्त पहला भारत शासित प्रदेश घोषित कर दिया था। इसी दिन सिंगापुर से भारत की अस्थायी सरकार के द्वारा राज्य के प्रमुख, प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री के रूप में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के हस्ताक्षर के तहत एक घोषणा पत्र जारी किया गया था। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और राज्य के प्रमुख के रूप में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा निम्नलिखित शब्दों में भारत के प्रति निष्ठा की शपथ ली: "मैं सुभाषचन्द्र बोस ईश्वर को साक्षी मानकर अपने देश भारत और मेरे 38 करोड़ देशवासियों की आज़ादी के लिए ये पवित्र शपथ लेता हूँ, कि में सुभाषचंद्र बोस स्वतन्त्रता के इस पवित्र युद्ध को अपने जीवन की अंतिम साँस तक जारी रखूंगा, मैं सदैव भारत का एक दास रहूंगा और मेरे 38 करोड भाई बहनों के कल्याण का ध्यान रखूंगा, मेरे लिए यह मेरा सर्वोच्च कर्तव्य हो जायेगा, आज़ादी मिलने के बाद भी भारत कि स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए अपने रक्त कि आखिरी बूंद बहाने के लिए सदैव तत्पर रहूंगा.......जय हिंद।” 1943 में भारत कि अस्थायी सरकार कि केबिनेट के सदस्य: प्रथम पंक्ति में(बाये से दाये): लेफ्टिनेंट कर्नल चटर्जी, लेफ्टिनेंट कर्नल जे.के.भोंसले, डॉक्टर लक्ष्मी स्वामीनाथन, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, ऐ.एम्.सहाय और एस.ए. अय्यर द्वितीय पंक्ति में(बाये से दाये): लेफ्टिनेंट कर्नल गुलजारा सिंह, लेफ्टिनेंट कर्नल शाहनवाज खान, लेफ्टिनेंट कर्नल अज़ीज़ अहमद, लेफ्टिनेंट कर्नल एम.जेड.कियानी, लेफ्टिनेंट कर्नल एन.एस.भगत, लेफ्टिनेंट कर्नल एहसान कदीर, लेफ्टिनेंट कर्नल लोगनाथन। जय हिन्द, जय भारत !!
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