मंगलवार, 31 जनवरी 2012

राष्ट्रवाद के महानायक ‘ पूज्य श्री गुरूजी ’



5 जून, पूज्य श्री गुरूजी की पुण्यतिथि पर विशेष
राष्ट्रवाद के महानायक ‘‘पूज्य श्री गुरूजी’
अरविन्द सीसौदिया
विश्व स्तर पर भारतीय क्षितिज के जिन व्यक्तित्वों की आहट सुनी जाती थी, उनमें 1940 से 1945 तक, महात्मा गांधी ( नरमपंथी और अहिंसक के नाते ) सरदार वल्लभ भाई पटेल (गरमपंथी और कट्टरता के नाते) नेताजी सुभाषचन्द्र बोस (हर कीमत पर देश की आजादी के लिए प्रतिबद्ध सेनापति के नाते ), मौहम्मद अली जिन्ना (हर हाल में मुस्लिम वर्चस्व के नाते) और पं. जवाहरलाल नेहरू (साम्यवादी विचारों के साथ-साथ, रशिया के प्रति श्रृद्धा और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के वफादार नेहरू खानदान के वंशज के नाते अंग्रेजवादी)।
इस सूची में परिवर्तन 1945 में हुआ। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की 18 अगस्त 1945 को हवाई दुर्घटना में कथित मृत्यु के पश्चात इस रिक्त स्थान की पूर्ति प्रखर राष्ट्रवादी ‘माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर’ उपनाम ‘श्री गुरूजी’ के प्रखर व्यक्तित्व ने की, जो उनके स्वर्गवास होने तक बनी रही।
इसी कारण पूज्य श्री गुरूजी के संदर्भ में बी.बी.सी. लंदन ने अपने प्रसारण में कहा था ‘‘नेहरू और सरदार पटेल के बाद कौन....? इस प्रश्न का उत्तर वामपंथियों के नेता नहीं, संघ प्रमुख गोलवलकर हैं।’’ श्री गुरूजी के कृतित्व और व्यक्तित्व के संदर्भ में कोई एक पंक्ति में बात कहनी हो तो वह सिर्फ यह है कि ‘‘श्री गुरूजी के विचारों को देश की तत्कालीन नेहरू जी की सरकार ने सुना होता तो, आज भारत अमरीका की तरह विश्व नेतृत्व कर रहा होता।’’ 
उन्होंने भारतमाता को परम वैभव पर पहुंचाने के लिए 33 वर्ष तक जो साधना की उसी का परिणाम है कि भारत में आज भी राष्ट्रवाद है, कश्मीर है और लोकतंत्र है। उनके ही प्रेरित राष्ट्रभक्तों की वह शक्ति थी, जिसने 1948 में जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय सम्भव करते हुए इस क्षैत्र की कबाईली सेनाओं से रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1942 के भारत छोडो आंदोलन में भी स्वयंसेवकों ने भरपूर काम किया, रियासतों के विलय करने में तो सर्वाधिक मेहनत किसी ने की तो वह संघ था। बिना श्रेय लिये सब कुछ करने की आदत के कारण भले ही इतिहास के पन्नों पर कम अंकित हो मगर जिन्होने इन कार्यों को किया उन्हें  सब कुछ मालूम है। संघ के ही संघर्ष ने 1975 में लागू किये गये कांग्रेस के आपातकाल रूपी हिटलरी साम्राज्य को देश से समाप्त करने पर मजबूर कर दिया ।
जन्मकाल
फाल्गुन कृष्ण पक्ष, विजया एकादशी, सोमवार, संवत् 1962, दिनांक 19 फरवरी 1906, भोर के 4 बजकर 21 मिनिट, जन्म स्थान नागपुर, मूल नक्षत्र, चतुर्थ चरण, धनु लग्न चन्द्र भी धनु में।
श्री गुरूजी के नाम से विख्यात, उदीयमान भारत के प्रतिरूप राष्ट्रचेतना के महानायक मा. माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघ चालक थे। उन्होंने अथक परिश्रम और निरंतर देश भ्रमण से लगभग 33 वर्ष तक इस पद पर रहते हुए भारत के राष्ट्रीय चरित्र के उत्थान का नवनिर्माण किया। उनकी प्रेरणा से भारतमाता को परम वैभव पर पहुंचाने के लिए एक विशाल श्रृंखला समाज के विविध क्षैत्रों में निरंतर कार्यबद्ध हैं। 
वे अंग्रेजी, विज्ञान और विधि के प्रकाण्ड ज्ञाता थे,  आध्यात्मिक संवेगों के कारण वे आजीवन संत के रूप में सामाजिक उन्नयन, विकास और कुरीतियों के निवारणार्थ मानवता की सेवा में कार्यरत रहे। उन्हें अपनी मृत्यु का आभास था। उन्होंने मृत्यु से पूर्व 2 अप्रैल 1973 को ही तीन पत्र लिख कर नागपुर संघ कार्यालय प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिये थे और उन्हें उनकी मृत्यु के उपरांत खोले जाने को कह दिया था।
अंतिम समय में भी हास्य-विनोद
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लिखते हैं , ‘‘दिनांक 5 जून 1973, सवेरे का समय, चायपान का वक्त, परम पूज्य श्री गुरूजी के कमरे में जब हम लोग प्रविष्ट हुए तब वे कुर्सी पर बैठे हुए थे। चरण स्पर्श के लिए हाथ बढ़ाते ही उन्होंने पैर पीछे खींच लिए। श्री गुरूजी विनोद वार्ता सुनाने लगे कि एक मरीज एक डाॅक्टर के पास गया। डाॅक्टर ने पूछा - क्या कष्ट है ? सारी कहानी सुनाओ ! मरीज बिगड़ गया और बोला ‘‘अगर मुझे ही अपना रोग बताना है तो फिर आप निदान क्या करेंगे ? बिना बताये जो बिमारी समझे, ऐसा डाॅक्टर मुझे चाहिये! ’’ डाॅक्टर एक क्षण चुप रहे, फिर बोले ‘‘ठहरो, तुम्हारे लिये दूसरा डाॅक्टर बुलाता हूं।’’ दूसरा डाॅक्टर आया, वह जानवरों का डाॅक्टर था, बिना कुछ कहे सब समझ लेता था।’’ यह कहानी सुन कर सभी हंसने लगे। मृत्यु शैया, कठिन बीमारी, अशक्त शरीर के बावजूद इतना अधिक आत्मबल, एक तरफ शरीर छूट रहा है, दूसरी तरह कोई दुःखी न हो, इसलिए वे लगातार विनोद किये जा रहे हैं और अन्ततः इसी दिन रात्रि 9 बजकर 5 मिनिट पर उनकी इस लोक की यात्रा पूरी हुई।
तृतीय सरसंघचालक बाला साहब देवरस
श्री गुरूजी द्वारा पांडुरंग पंत क्षीरसागर को दिये गये तीनों पत्र सबके सामने खोले गये। एक पत्र में श्री गुरूजी ने संघ के सरसंघचालक के नाते नेतृत्व का भार श्री बालासाहब देवरस के कंधो पर सौंपा था। दूसरे पत्र में उन्होंने आज्ञा दी थी कि उनका कोई स्मारक न बनाया जाये। तीसरे पत्र में श्रीगुरूजी ने अत्यंत विनम्रता से भावभीने शब्दों में प्रार्थना की थी।
अंतिम संस्कार 
गुरूजी की अंतिम संस्कार यात्रा ‘रेशम बाग’ में सायं 7ः45 बजे सम्पन्न हुई। उनके चचेरे भाई वासुदेव राव गोलवलकर ने मुखाग्नि दी। लगभग तीन लाख लोगों ने इस अंतिम यात्रा में भाग लिया। देश के लगभग सभी बड़े राजनेताओं, समाचार पत्र समूहों और संतों ने उनको श्रृद्धांजलियां अर्पित की। जिसमें आचार्य विनोबा भावे, शंकराचार्य कांची कोटि पीठ स्वामी जयेन्द्र सरस्वती, पुरी के जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ, स्वामी करपात्री जी महाराज, जैन संत तुलसी, राष्ट्रपति व्ही.व्ही. गिरी, उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरूप पाठक, प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी, लोकसभा अध्यक्ष गुरूदयाल सिंह ढिल्लो, जयप्रकाश नारायण, जगजीवन राम, बाल ठाकरे, कामरेड़ तकी रहीम, साहित्यकार गुरूदत्त सहित नागपुर टाईम्स, ट्रिब्यून, टाइम्स आॅफ इण्डिया, इण्डियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, ब्लिट्ज सहित यह श्रृंखला अनन्त अनगिनत थी।
आत्मरक्षा: जन्मसिद्ध अधिकार
वर्ष 1946, स्थान नागपुर, अवसर विजयदशमी महोत्सव, ‘‘प्रतिकार न करने की भाषा पराक्रमी वृत्ति का घोतक नहीं है। आप भले ही प्रतिकार न करें , परन्तु उतने से ही आप पर आक्रमण करने के लिए तैयार बैठे लोग अपनी काली करतूतों से बाज थोड़े ही आने वाले हैं ? यह कभी न भूलिये कि काली मंदिर में बलि के लिए ले जाने वाला अजापुत्र (बकरा) अप्रतिकार की ही साक्षात मूर्ति होता है। हमें बलि का बकरा नहीं बनना है। आत्मरक्षा प्रत्येक व्यक्ति और समाज का प्रकृति सिद्ध अधिकार है।
देशभक्त है संघ: सरदार पटेल
पटेल का संघ को कांग्रेस के विलय का आमंत्रण
भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल, विभाजन के दौरान व्यवस्था निर्माण और रियासतों के विलय में संघ के सहयोग से बहुत प्रसन्न थे। 
      विभाजन के दौरान संघ का ही सेवा कार्य हिन्दुओं के काम आ रहा था, पूरे देश का एक सूत्र में पिरोने के लिये, रियासतों का विलय संभव करवाने में संघ ही पटेल के साथ खडा था। पटेल ने 1948 में परम पूज्य श्री गुरू जी को एक पत्रोत्तर में लिखा ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने संकटकाल ( विभाजन के दौरान ) में हिन्दू समाज की सेवा की, इसमें कोई संदेह नहीं। ऐसे क्षैत्रों में जहां उनकी सहायता की आवश्यकता थी, संघ के नवयुवकों ने स्त्रियों तथा बच्चों की रक्षा की तथा उनके लिए काफी काम किया। किंतु मुझे विश्वास है कि संघ के लोग अपने देशप्रेम को कांग्रेस के साथ मिलकर ही सम्पन्न कर सकते हैं।’’ 
यह दूसरी बात है कि संघ ने कभी भी अन्य किसी संस्था में अपने विलय के आमंत्रण को स्वीकार ही नहीं किया।
सरदार पटेल की कांग्रेस को चेतावनी
6 जनवरी 1948 को आकाशवाणी केन्द्र, लखनऊ से सरदार पटेल का भाषण प्रसारित हुआ, जिसमें उन्होंने संघ को श्रेष्ठ राष्ट्रभक्ति का स्रोत ठहराते हुए कहा ‘‘कांग्रेस में जो लोग सत्तारूढ़ हैं, सोचते हैं कि वे अपनी सत्ता के बल पर संघ को कुचल सकेंगे। डण्डे के बल पर आप किसी संगठन को दबा नहीं सकते। डण्डा तो चोर - डाकुओं के लिए होता है। आखिर संघ के लोग चोर - डाकू तो हैं नहीं ! वे देशभक्त हैं और अपने देश से प्रेम करते हैं।’’
चीनी आक्रमण से पूर्व सचेत किया
18 मई 1956 के पाचंजन्य साप्ताहिक में श्री गुरूजी का ‘‘तिब्बत और कम्यूनिस्ट मुक्ति’’ नामक लेख प्रकाशित हुआ। उसमें उन्होंने सचेत किया ‘‘......यह सब मानव की लिप्सा, विस्तार वृत्ति और निरंकुशता का ही नया रूप है, जो आज तिब्बत में खुलकर मृत्यु का ताण्डव रच रहा है। तिब्बत में चीनी विजय पर खुशियां मनाने वालों के लिए तथा अपने इस देश में भी इसी प्रकार की ‘मुक्ति’ का स्वप्न देखने वालों के लिए इतिहास का यह सबक है।’’ वे लगातार कहते रहे हैं कि चीन की आंख भारत पर है, वह लद्दाख को निगल जाना चाहता है।
प्रधानमंत्री नेहरू के आमंत्रण पर
गणतंत्र दिवस की परेड में संघ
नई दिल्ली, 26 जनवरी 1963, गणतंत्र दिवस समारोह। तत्कालीन प्रधानमंत्री,जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर परेड़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक टुकड़ी 3000 संख्या सम्मिलित हुई। पूर्ण गणवेशधारी स्वयंसेवकों की स्फूर्ति, कदमताल ने अपनी आभा अलग ही बिखेरी। गणतंत्र दिवस परेड़ का एक प्रमुख आकर्षण यह दल रहा। जब कुछ कांग्रेसी नेताओं ने संघ को परेड में आमंत्रित किये जाने पर आपत्ति की थी, तब पंडित नेहरू ने यह कहते हुए उनकी आपत्ति रद्द कर दी थी कि ‘‘देशभक्त नागरिकों को मैंने आमंत्रित किया है।’’
नेहरू की समझ में जब संघ आया और साम्यवादी विश्वासघात का पर्दा उठा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। चीन जमीन हड़प चुका था, देश की फौजों ने निशस्त्र लड़ाई लड़ी, बलिदान दिया और इसी पश्चाताप में नेहरू 1964 में चल बसे।
अणुबम बनाया जाये: श्री गुरूजी
उन्होंने सरकार को चेताया था कि ‘‘सरकार को चाहिये कि सभी उद्योगपतियों, वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का आव्हान करें तथा उनके सहयोग से यथाशीघ्र ऐसे आयुधों का निर्माण करें जो शत्रु के प्राप्त होने वाले आयुधों से श्रैष्ठतर हों। कम्यूनिस्ट चीन के पास अणुबम होने से, उसका बनाना हमारे लिए भी अत्यावश्यक हो गया है। यह हमारी अंतिम विजय प्राप्ति की क्षमता के सम्बन्ध में जनता तथा सेना के मस्तिष्क में विश्वास उत्पन्न करेगा। सिद्धान्त एवं तात्विक निषेधों को बाधास्वरूप इसके मार्ग में नहीं आने देना चाहिए।’’ इस वक्तव्य के पश्चात श्रीमति इंदिरा गांधी ने इस पर कार्य को किया और 1971 में हम परमाणु क्षमता अर्जित कर चुके थे, मगर अमरीकी दबाव में आगे नहीं बढ़ सके।  1998 में अटलबिहारी वाजपेयी की 13 महीने की दूसरी सरकार ने पांच परमाणु परीक्षण कर भारत में अपने आप को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश घोषित कर दिया। तब से सारी दुनिया में भारत का सम्मान बढ़ गया और उसकी बात सुनी जाने लगी।
युअर आर्मी नहीं अवर आर्मी
1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने श्री गुरूजी को दूरभाष करके दिल्ली बुलाया और सर्वपक्षीय मंत्रणा समिति की बैठक में भाग लेने का अनुरोध किया। गुरूजी ने बैठक में जोर देकर कहा ‘‘हमारा ‘एम’ (लक्ष्य) निश्चित है, वह है अपने सम्मान की रक्षा कर आक्रामकों को करारा सबक सिखाना और विजय प्राप्त करना।’’ इसी बैठक में एक सहभागी बार-बार ‘‘युअर आर्मी’’ ( तुम्हारी सेना) शब्द का प्रयोग कर रहे थे, जब उन्होंने तीसरी बार यही शब्द कहा तो श्री गुरूजी ने टोकते हुए कहा ‘‘युअर आर्मी नहीं अवर आर्मी (हमारी सेना) बोलिये।’’
यह एकरस हिन्दू राष्ट्र है: श्री गुरूजी
काशी विश्वविद्यालय में पहले छात्र और फिर प्राध्यापक के रूप में रहते हुए वहां के पुस्तकालय से अनेक ग्रन्थ उन्होंने पढ़े। दर्शनशास्त्र के गहन अध्ययन ने उन्हें आध्यात्म से जोड़ दिया। उन्होंने विविध उपासना मार्गों का मनोयोग से अध्ययन किया, मगर उनके तार्किक मन की तृप्ति नहीं हुई, उनकी भेंट स्वामी विवेकानन्द के गुरूभाई स्वामी अखण्डानन्द जी से हुई, जो उस समय रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष भी थे। सारगाछी में उनसे ‘‘श्री गुरूजी’’ ने सन्यास जीवन की दीक्षा ली। अखण्डानन्द जी के निधन के पश्चात वे नागपुर लौट आये।
प्रतिज्ञा: संघ में सक्रीय प्रवेश
‘‘सर्वशक्तिमान श्री परमेश्वर तथा अपने पूर्वजों का स्मरण कर मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि अपने पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू समाज का संरक्षण कर हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं। संघ का कार्य मैं प्रमाणिकता, निःस्वार्थ-बुद्धि तथा तन-मन-धन पूर्वक करूंगा और इस व्रत का मैं आजन्म पालन करूंगा। भारत माता की जय।’’
पूर्व में ही काशी में उनके संघ से सम्बन्ध जुड़ गया था, नागपुर में तुलसी बाग मुख्य शाखा के कार्यवाही का कार्य उन्होंने किया था, मुम्बई जाकर प्रचारक का काम किया था। अकोला के संघ शिक्षा वर्ग के सर्वाधिकारी के नाते भी उत्तम कार्य किया था।
उन्होंने डाॅ. हेडगेवार जी से धर्म, राष्ट्र, स्वतंत्रता, समाज-सुधार, संस्कृति आदि विषयों पर गहन विचार विमर्श किया। डाॅक्टर साहब के विचार सटीक और स्पष्टता से पूर्ण होते थे, जिनका गहरा प्रभाव श्री गुरूजी पर पड़ा।
‘‘हेडगेवार जी की दृष्टि में श्री गुरूजी’’
‘‘माधवराव (श्री गुरूजी) प्राध्यापक हैं, अधिवक्ता हैं, विद्वान हैं, विचारक हैं और सबसे अधिक संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक हैं।’’
हिन्दुत्व का शंखनाद: हम स्वराज चाहते हैं
अपनी भूमिका को स्पष्ट करते हुए उन्होंने प्रारम्भ में ही लिखा ‘‘राष्ट्रीय पुनरूत्थान के लिए कटिबद्ध होकर हम खड़े हैं। कुछ राजनीतिक अधिकारों का सतनजा बने हुए नये राज्य भाव के लिए नहीं! हम स्वराज्य चाहते हैं। ‘स्व-राज्य’ अर्थात् हमारा राज्य! पर हम कौन हैं ? हमारी ‘राष्ट्रीयता’ क्या है ? आज के इस क्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण इस प्रश्न का समुचित उत्तर देने का अब हम प्रयास करेंगे।’’ यही था श्री गुरूजी का संकल्प, यही था वह शंखनाद, जिसने उनकी भी और देश की भी एक नई राह तय कर दी, जो स्वाभिमान और सार्वभौमिकता के स्वावलम्बन से सम्मुन्नत थी।
यह हिन्दू राष्ट्र है.....
‘मराठे, राजपूत, सिख आदि क्षात्रतेज से चमकते वीरों ने प्राणों की बाजी लगाकर इस हिन्दू राष्ट्र को बनाये रखा। वह दुर्बल हुआ, पर विजीत या नमित नहीं हुआ। आज भी वह लड़ाई चल रही है।
जी हां, यह राष्ट्र है। यह हिन्दू राष्ट्र है। देश, वंश,    धर्म, संस्कृति और भाषा इन पांच प्रमुख घटकों से युक्त, यह एक रस हिन्दू राष्ट्र है।
ताशकन्द वार्ता भूल सिद्ध होगी: श्री गुरूजी
12 दिसम्बर 1965 को अंग्रेजी साप्ताहिक ‘‘आॅर्गेनाईजर’’ में गुरूजी की एक विशेष भेंटवार्ता प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने कहा था ‘‘मेरे मतानुसार प्रधानमंत्री के लिए ताशकन्द न जाना ही उचित होगा, क्योंकि आक्रांता और आक्रान्त को समान धरातल पर रखकर दोनों को ही वार्ता के लिए आमंत्रण दिया गया है। ताशकन्द वार्ता में यदि कोई परिणाम निकला तो वह भारतवर्ष के राष्ट्रीय हितों के लिए अत्याधिक घातक होगा। पाकिस्तान अभी भी आक्रामक दृष्टिकोण बनाए हुए है। इसलिये वृहद परिणाम पर पुनः यु( अवश्य होगा।
उनकी बात सही निकली, ताशकन्द में जीती जमीन वापस गई, सैनिकों का बलिदान व्यर्थ हुआ। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जीवित नहीं लौटे और 1971 में फिर से युद्ध हुआ। पाकिस्तान का विभाजन, बांग्लादेश बना।
प्रमुख संगठनों की स्थापना के मार्गदर्शी
सामाजिक क्षैत्र के जिन संगठनों को स्थापित करवाने में श्री गुरूजी ने महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया उनमें प्रमुख हैंः
1. विद्यार्थी क्षैत्र में अखिल भारत विद्यार्थी परिषद 
2. राजनैतिक क्षैत्र में भारतीय जनसंघ (भा.ज.पा.)
3. श्रमिक क्षैत्र में भारतीय मजदूर संघ
4. कृषि क्षैत्र में किसान संघ
5. हिन्दु समाज के लिये विश्व हिन्दू परिषद।
- राधाकृष्ण मंदिर रोड, डडवाड़ा, कोटा जं.-2

सोमवार, 30 जनवरी 2012

जय हो भ्रस्टाचार की : नियम तोड़कर ओएसडी को दिए आठ प्लॉट

 

जय हो भ्रस्टाचार की : भास्कर न्यूज.कोटा
पूर्व मंत्री प्रमोद जैन भाया के तत्कालीन ओएसडी को रीको ने जमकर ऑब्लाइज किया। सरकारी सेवा में रहते हुए न केवल ओएसडी ने खुद के नाम रियायती दर पर आठ भूखंड आवंटित करवाए बल्कि पार्टनर्स के नाम भी जमीन आवंटित करवा ली। ये सभी भूखंड आवंटित तो अलग-अलग समय में हुए लेकिन रीको ने इतनी मेहरबानी दिखाई कि सारे भूखंड एक ही लाइन में आवंटित किए। इस प्रक्रिया से तत्कालीन ओएसडी राजेंद्र सिंह ने एक ही जगह खुद के नाम करीब 16 हजार वर्गमीटर जमीन इकट्ठी कर ली। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में यह खुलासा हुआ है।

पीडब्ल्यूडी में एईएन राजेंद्र सिंह को पूर्व मंत्री ने ओएसडी बनाया था। सिंह ने अपने रसूखात का उपयोग करते हुए कोटा में नंाता के समीप पर्यावरण औद्योगिक क्षेत्र में रीको से आठ भूखंड खुद के नाम आवंटित करवाए। नियम है कि सरकारी सेवा में रहते हुए कोई खुद के नाम से व्यावसायिक गतिविधियां शुरू नहीं कर सकता जबकि सिंह ने वर्ष 2006 से 2010 के बीच कुल आठ भूखंड रियायती दर पर खरीदे।

इसमें से ४ भूखंड उन्होंने मौजूदा सरकार के कार्यकाल में खरीदे।
ये भूखंड उन्हें 200 रुपए प्रति वर्गमीटर की दर से आवंटित हुए। जिस जगह पर यह आवंटन हुआ उससे महज 5 प्लॉट छोड़कर ही रीको ने खुली नीलामी में 491 रुपए प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से एक अन्य फर्म को भूखंड आवंटित किए।
आरटीआई में भी हेराफेरी की कोशिश: रीको के अधिकारियों ने आरटीआई में भी गुमराह करने की कोशिश की। पहले मांगी गई सूचना में राजेंद्र सिंह की जगह राजेश सिंह बताया लेकिन पता ऑरिजनल '7-सी-13, महावीर नगर विस्तार योजना' ही था। दुबारा जब जानकारी मांगी तब सही सूचना दी।
तीन साल में एक ही फर्म को एक साथ लगते आठ भूखंड...? : राजेंद्र सिंह को आवंटित भूखंडों का संख्या क्रम एक के बाद एक है। सिंह की फर्म मैसर्स टेक्नो फ्लाई ऐश प्रोडक्ट के नाम 20 दिसंबर 2007 को भूखंड संख्या एफ-27, 29 अक्टूबर 2007 को भूखंड संख्या एफ-28, 22 अक्टूबर 2007 को भूखंड संख्या-29, 28 जनवरी 2010 को भूखंड संख्या एफ-32, 28 अक्टूबर 2009 को भूखंड संख्या एफ-33, 28 जनवरी 2010 को भूखंड संख्या एफ- 34 और एफ- 35 तथा 29 सितंबर 2009 को भूखंड संख्या एफ-26 भूखंड आवंटित हुए। उनके पार्टनर को एफ-30 और एफ 31 भूखंड 28 जनवरी और 29 अक्टूबर 07 को आवंटित हुए।
सब कुछ तुरत-फुरत में: आरटीआई कार्यकर्ता पंकज लोढ़ा ने बताया कि पूर्व मंत्री के ओएसडी राजेंद्रसिंह को भूखंड आवंटन में रीको ने सारे काम हाथोंहाथ निबटाए। आवंटन भी न्यूनतम दर पर किया गया। दिसंबर 2011 में रीको के वरिष्ठ क्षेत्रीय प्रबंधक ने एक पत्र के जवाब में इस बात को स्वीकार भी किया कि राजेंद्रसिंह ने आवंटन से पूर्व राजकीय सेवा में होने की जानकारी रीको से छिपाई। आवंटन के लिए शनिवार को निविदा निकली। सिंह ने बैंक ड्राफ्ट सहित अन्य सभी कागजी तैयारी भी शनिवार को ही पूरी कर ली। रविवार को छुट्टी थी और सोमवार को ऑफिस खुलते हुए सिंह को भूखंड आवंटित कर दिए। उन्होंने मामले की शिकायत मुख्यमंत्री से कर निष्पक्ष जांच की मांग की है।

तथ्य छिपाकर आवंटन करवाया तो हमारी क्या गलती
'वैसे तो रीको से कोई भी व्यक्ति भूखंड आवंटित करवा सकता है। रही बात सरकारी विभाग के कर्मचारी के भूखंड आवंटित होने की तो उसे नियमानुसार अपने विभाग से परमिशन लेनी होती है। रीको का इस बात से कोई लेना देना नहीं होता कि आवंटी सरकारी कर्मचारी है या नहीं। - जीसी जैन, क्षेत्रिय प्रबंधक,रीको, कोटा
खुद के नाम से नहीं, पत्नी व परिजनों के नाम से हो सकता है आवंटन
'कोई भी कर्मचारी सरकारी योजना में भूखंड ले तो सकता है, लेकिन अपने नाम से नहीं। अगर वह व्यवसायिक गतिविधि के लिए भूखंड लेता है तो पत्नी या अन्य परिजन के नाम से ले सकता है। लेकिन उसे संपत्ति का ब्यौरा तो देना ही पड़ेगा। अगर कोई तथ्य छिपाकर ऐसा करता है तो गलत है।'- जेपी गुप्ता, क्षेत्रीय प्रबंधक, रीको, जोधपुर
एक्सपर्ट व्यू-
यह तो जांच का विषय है:पूर्व कलेक्टर
'सरकारी सेवा में रहते हुए कोई भी व्यक्ति किसी भी सरकारी योजना का लाभ खुद के नाम से नहीं ले सकता। व्यवसायिक गतिविधि भी नहीं कर सकता। अगर कोई अपने परिजनों के नाम से कोई लाभ लेता है या व्यवसायिक गतिविधि करता है तो इसकी जानकाी सरकार को देना जरूरी है। रही बात रीको से मंत्री के ओएसडी द्वारा खुद के नाम से भूखंड आवंटन की, तो यह नियम विरुद्ध है। ये सरकारी कर्मचारियों के लिए बनी आचार संहिता के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। आवंटन की प्रक्रिया से पहले रीको के जिम्मेदार अधिकारियों को जांच करनी चाहिए थी। यह जांच का विषय हैं।'- आरएस गठाला, पूर्व कलेक्टर, कोटा
-'मैंने रीको से नियमानुसार ही भूखंड आवंटित करवाए है। करीब एक साल पहले ही मैंने रिटायरमेंट ले लिया । सरकारी कर्मचारी भी नियमों के तहत खुद का व्यवसाय कर सकता है, और मैंने किया। मंत्री भाया के नाम का आवंटन में कहीं दुरुपयोग नहीं किया। कुछ लोग पता नहीं क्यों पीछे पड़े हुए है। मुख्यमंत्री तक भी शिकायत कर दी। अगर मैं गलत होता तो अब तक रीको आवंटन निरस्त कर चुका होता।'-राजेंद्रसिंह, निदेशक, मैसर्स टेक्नो फ्लाई ऐश प्रोडक्ट
 

गांधी और गोडसे



- अरविन्द सिसोदिया 
महात्मा गांधी की हत्या को कभी भी सही नही ठहराया जा सकता , मगर गोडसे को भी कभी गद्दार नहीं कहा जा सकता , क्यों की वह भी सच्चा राष्ट्भाक्त था ...देश के विभाजन से पूरा हिन्दू समाज और राष्ट्रभक्त समुदाय स्तब्ध था दुखी था . जिन्ना की विजय और बयान जले पर नमक झिडकते थे , गांधी जी ने अनशन  कर पाकिस्तान को करोड़ों रूपये दिलवाए , वे शीघ्र ही पाकिस्तान यात्रा पर जाने वाले थे, उनकी सहायक पाकिस्तान में कार्यक्रम यात्रा मार्ग आदी पूरा कर चुकीं थी , देश को दर था की वे पाकिस्तान यात्रा के दौरान कही कश्मीर ही पाकिस्तान को न दे आयें ..!!!! नाथूराम गोडसे एक पत्रकार थे , अख़बार के संपादक थे , कोइ गैर जिम्मेवार व्यक्ती नहीं थे ... उन परिथितियों में  जो भी हुआ राष्ट्रहित के लिए ही किया गया इसमें संदेह नहीं है ...
महात्मा गांधी की पुण्यतिथी पर यह बातें सामने आनी चाहियें थीं ....नाथूराम गोडसे के उन बयानों और बहसों को भी सामने आना चाहिए जिन्हें बैन किया हुआ है ...और यूँ तो आज देश गांधी जी कई जिदों के कारण कई कष्टों को भोग रहा है मगर उनके महान योगदान को भी नमन किया ही जाना चाहिए.......
क्या आप  जानते है कि---
३० जनवरी को यदि गांधी वध रुक जाता तो ३ फरवरी १९४८ को
देश का एक और विभाजन पक्का था
जिन्ना की मांग थी कि पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने में बहुत समय लगता है और हवाई जहाज से जाने की सभी की औकात नहीं, तो हमको बिलकुल बीच भारत से एक कोरिडोर बना कर दिया जाए जो :-
१. लाहौर से ढाका जाता हो
२. दिल्ली के पास से जाता हो
३. जिसकी चौड़ाई कम से कम १० मील यानि १६ किलोमीटर हो
४. १० मील के दोनों और सिर्फ मुस्लिम बस्तियां ही बनेगी
तत्कालीन परिस्थितियों में सभी भारतीय और पाकिस्तानी इस सत्य से परिचित थे कि एक और विभाजन निश्चिंत है, उसके बाद नाथूराम गोडसे ने जो किया वो इतिहास है, अगर गाँधी वध का संकल्प पूरा ना होता........... .तो आप ही बताइये क्या आज भारत कितना होता ?
गोडसे जी भागे नहीं, और इस पुन्य कार्य को न्यायलय के सभी ३५ सुनवाइयों पर स्वीकार किया........... ....
पर क्या हम इस देवतुल्य वीर पुरुष के त्याग और बलिदान को सार्थक कर पा रहे है या फिर अनेको जिन्ना और अनेको गाँधी के स्वार्थ में सनातन की बलि दी जा रही है
जय हिन्दू राष्ट्र !!!!!

Shree Ram Setu : 9,00,000 years old



Jai Shree Ram Setu (48 kms long, 3 kms wide & 22 feets deep)
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The exact date of Lord Ram's birth according to Valmiki Ramayan & Mordern Science.
Lord Rama incarnated in Tretayuga which lasted for 4,32,000 x 3 years.
Later came Dwapyuga which was 4,32,000 x 2 years
Kaliyuga is 4,32,000 years & we already passed 5100 after lord Krishna Disappeared.
Total of Dwapar is 8,64,000 + kaliyuga 5100 + 25,000 treta years when lord Rama took SwadhamGaman" means going to own Dham i.e. eternal place Vaikuntha.So approximately Lord Rama left 8,94,100 years back according to Valmiki Ramayan & about the Ram Setu project which was stopped in the year 2008 after the court got evidence about this setu which is Authentic. NASA first claimed it is 17,00,500 years old only because they had their greedy eyes on many usefull things found on the bridge (antibiotic, alge for space travellers, Munga stones etc) so claimed the wrong dates & keep us on a loop for us to find the 9,00,000 years old birdge of our Sri Rams , but later the German team did carbon dating & found the stones in the water is exactly the stone which are still present in the Gandhamadan Mountain. German Scientist team did the CARBON DATING of this Ramsetu stone which also dated 9,00,000 years old exactly as mentioned in the Valmiki Ramayan. The

Ram setu project taken by LNT was stopped, they speneded 200 thousand crore in 2 years & cant even break 1 meter bridge indeed all their Titinum blades were a waste. 2 Ilands on this Bridge are under the US Government, we are always been cheated by the West & our Congress Government. The only reason these things are hidden by our Government is only so that the Mordern Education doesn't go for a TOSS, few political issues, GREED of our Government to bond a relationship with other countries, if this is claimed as the 9,00,000 years old Heritage all Scientific theory on Evolution, Africans arboginesis, etc would go for a toss. Our Government is a Cheat. Lord Rama Bless them all.

We read about the floating bridge accordint to Sri Tulsidasji is also true because in one day of Brahma there are 1000 mahayuga, 1 mahayuga contains 4 yugas (43,20,000 years) so in just 12 hours of Brahmaji Lord Rama incarnates 1000 times on planet earth & in every time he incarnates in different yuga (Satyuga, Treta, Dwapar & Kaliyuga) he can appear in any yuga not compalsary that Lord Rama came in Treta in this Yuga & so he can incarnate in Treta in next mahayuga, No!. He can even appear in Dwapar or Satyuga. So the floating bridge concept of
Tulsidasji is also true which was possible in another Manavantra we are now in Vivashwata Manavantra & already 6 manvantra passed away.

After 71 mahayugas = 1 Manvantra takes place, Manvantra is when Sri Manu maharaj, the first man appears for creation. Our Manu maharaj is Vivashwata Manu.



रविवार, 29 जनवरी 2012

गीता राष्‍ट्रीय धर्मशास्‍त्र घोषित हो : इलाहाबाद उच्च न्यायालय


गीता राष्‍ट्रीय धर्मशास्‍त्र घोषित हो - हाईकोर्ट
11 सितंबर 2007 वार्ता |
http://hindi.in.com/latest-news
इलाहाबाद। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 ए (बी) व (एफ) के तहत राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय पक्षी और राष्ट्रपुष्प की तरह भगवद्गीता को भी राष्ट्रीय धर्म शास्त्र घोषित किया जाए।
न्यायालय ने कहा है कि चूंकि देश की आजादी के आन्दोलन की प्रेरणा स्रोत रही गीता भारतीय जीवन पद्धति का आईना है, इसलिए देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह इसके आदर्शों पर अमल करके इस राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा करे।
न्यायालय ने कहा कि गीता के उपदेश मन के आंतरिक और बाह्य सत्य को उजागर करते हैं और यह किसी खास सम्प्रदाय की नहीं, बल्कि यह सभी सम्प्रदायों की गाइडिंग फोर्स है।
यह आदेश न्यायमूर्ति एस. एन. श्रीवास्तव ने वाराणसी के श्यामल राजन मुखर्जी की याचिका पर हाल में दिया है। न्यायालय ने भगवत गीता के श्लोकों और इसके बारे में विद्वानों के विचारों का उद्धरण देते हुए कहा है कि धर्म भगवद्गीता की आत्मा है, जिसे भक्ति योग, कर्मयोग व ज्ञान योग के जरिए प्राप्त किया जा सकता है।
न्यायालय ने कहा है कि भारत में जन्म लेने वाले सभी सम्प्रदायों के लोगों को इसका पालन करना चाहिए। गीता के उपदेश बिना परिणाम की परवाह किए धर्म के लिए सघंर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। यह भारत का धर्मशास्त्र है जिसे सम्प्रदायों के बीच जकड़ा नहीं जा सकता। न्यायालय ने कहा है कि संविधान के मूलकर्तव्यों के तहत राज्य का यह दायित्व है कि गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र की मान्यता दे। न्यायालय ने कहा है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत अन्य धर्मों के अनुयायियों की तरह हिन्दुओं को भी अपने सम्प्रदाय का संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार है। न्यायालय ने कहा है कि भगवद्गीता हमारे नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों की संवाहक है। यह हिन्दू धर्म के हर सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करती है इसलिए हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह इसके आदर्शों को अमल में लाए।

गीता भारतीय दर्शन : मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय


गीता धार्मिक पुस्तक नहीं – उच्च न्यायालय January 28, 2012
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि गीता कोई धार्मिक पुस्तक नहीं बल्कि भारतीय दर्शन पर आधारित ग्रंथ है। कोर्ट ने कहा कि इसलिए स्कूलों में इसको पढ़ाए जाने पर रोक नहीं लगाई जा सकती।  मध्य प्रदेश के स्कूली पाठ्यक्रम में गीता-सार को शामिल किए जाने के विरोध में दायर जनहित याचिका को जस्टिस अजित सिंह और जस्टिस संजय यादव की बेंच खारिज कर दिया। बेंच ने कहा कि ‘गीता’ में दर्शन है न कि धार्मिक सीख। कैथलिक बिशप काउंसिल के प्रवक्ता आनंद मुत्तंगल ने याचिका में कहा था कि यह फैसला अनुच्छेद 28 (1) का उल्लंघन है।
हाई कोर्ट ने कहा कि धार्मिक पुस्तक की जगह स्कूलों में सभी धर्मों का सारांश पढ़ाया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 28 (1) नैतिक शिक्षा, सांप्रदायिक सिद्धांतों और सामाजिक एकता बनाए रखने वाले किसी प्रशिक्षण पर पाबंदी नहीं लगाता, जो नागरिकता व राज्य के विकास का जरूरी हिस्सा हैं। हाईकोर्ट ने अरुणा रॉय विरूद्ध केन्द्र सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का भी उल्लेख किया।
उसमें कहा गया है कि ‘ संविधान के अनुच्छेद 28 (1) में धार्मिक शिक्षा का उपयोग एक सीमित अर्थ में किया गया है। इसका मतलब है कि शैक्षणिक संस्थाओं में पूजा, आराधना, धार्मिक अनुष्ठान की शिक्षा देने के लिए राज्य सरकार के धन का उपयोग नहीं किया जा सकता। ‘
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के उस आदेश की प्रति भी पेश नहीं की, जिसमें गीता-सार को स्कूलों में शामिल करने का निर्णय किया गया था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील राजेश चंद को गीता पढ़ने के लिए दो महीने की मोहलत दी थी, ताकि वे इस बात को समझ सकें कि गीता जीवन का दर्शन है न कि किसी धर्म से संबंधित। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि हालांकि उन्होंने गीता का अध्ययन किया लेकिन उन्हें यह पूरी तरह से समझ में नहीं आई। सुनवाई के बाद कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

शनिवार, 28 जनवरी 2012

वसंत पंचमी : विद्या की देवी सरस्वती की पूजा



**** " वसंत पंचमी एक भारतीय त्योहार : विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है " ****
-हेमा निरजेश वर्मा
वसंत पंचमी एक भारतीय त्योहार है, इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा पूर्वी भारत में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं।
प्राचीन भारत में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था।जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों मे सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।
बसन्त पंचमी कथा
सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों आ॓र मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है- प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु। अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है। पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा।
पर्व का महत्व
वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।
पौराणिक महत्व
इसके साथ ही यह पर्व हमें अतीत की अनेक प्रेरक घटनाओं की भी याद दिलाता है। सर्वप्रथम तो यह हमें त्रेता युग से जोड़ती है। रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दंडकारण्य भी था। यहीं शबरी नामक भीलनी रहती थी। जब राम उसकी कुटिया में पधारे, तो वह सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। प्रेम में पगे झूठे बेरों वाली इस घटना को रामकथा के सभी गायकों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया। दंडकारण्य का वह क्षेत्र इन दिनों गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला है। गुजरात के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था। वसंत पंचमी के दिन ही रामचंद्र जी वहां आये थे। उस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में उनकी श्रध्दा है कि श्रीराम आकर यहीं बैठे थे। वहां शबरी माता का मंदिर भी है।
ऐतिहासिक महत्व
वसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं।
इसके बाद की घटना तो जगप्रसिध्द ही है। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।
चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान॥
पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंद्रबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। (1192 ई) यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।
वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा संबंध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे, पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो दुर्गा मां की सौगंध दी। मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा? बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामत: उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।
कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना वसंत पंचमी (23.2.1734) को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, पर हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत लाहौर का निवासी था। अत: पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।
वसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे रणजीत सिंह की सेना में रहे, फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, पर आध्यात्मिक प्रवष्त्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिश्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो कूका पंथ कहलाया।
गुरू रामसिंह गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उध्दार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने भी सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिश्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था। 1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया। उन्होंने उसे पीटा और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये। उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया, पर दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी। अत: युध्द का पासा पलट गया।
इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को सत्रह जनवरी 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।
जन्म दिवस
वसंत पंचमी हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस (28.02.1899) भी है। निराला जी के मन में निर्धनों के प्रति अपार प्रेम और पीड़ा थी। वे अपने पैसे और वस्त्र खुले मन से निर्धनों को दे डालते थे। इस कारण लोग उन्हें 'महाप्राण' कहते थे। एक बार नेहरूजी ने शासन की ओर से कुछ सहयोग का प्रबंध किया, पर वह राशि उन्होंने महादेवी वर्मा को भिजवाई। उन्हें भय था कि यदि वह राशि निराला जी को मिली, तो वे उसे भी निर्धनों में बांट देंगे। जहां एक ओर वसंत ऋतु हमारे मन में उल्लास का संचार करती है, वहीं दूसरी ओर यह हमें उन वीरों का भी स्मरण कराती है, जिन्होंने देश और धर्म के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी। -हेमा निरजेश वर्मा —

हिंदुओं के कानून ही बदलती है सरकारः सुप्रीम कोर्ट




हिंदुओं के कानून ही बदलती है सरकारः सुप्रीम कोर्ट
10 Feb 2011
नई दिल्ली ।। सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यक समुदायों के पर्सनल लॉज में बदलाव न करने को लेकर सरकार की खिंचाई करते हुए कहा है कि सरकार सिर्फ हिंदुओं से जुड़े कानूनों में ही बदलाव करती है। इससे सरकार की धर्मनिरपेक्षता पर भी सवाल उठते हैं। 
अदालत ने मंगलवार को कहा कि पर्सनल लॉज में सुधार की सरकार की कोशिशें हिंदू समुदाय से आगे नहीं बढ़तीं। अदालत ने कहा कि हिंदू समुदाय परंपरागत कानूनों में सरकार की तरफ से होने वाली इन कोशिशों को लेकर सहिष्णु रहा है। लेकिन, इस मामले में धर्मनिरपेक्ष नजरिए की कमी दिखती है। ऐसा सुधार दूसरे धार्मिक समुदायों से जुड़े कानूनों में नहीं किया जा रहा।
जस्टिस दलवीर भंडारी और जस्टिस एक.के. गांगुली ने राष्ट्रीय महिला आयोग की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान ये बातें कहीं। याचिका में कहा गया था कि विवाह की उम्र को लेकर अलग-अलग कानूनों से काफी उलझन है। इसलिए याचिका में शादी की न्यूनतम उम्र पर एक समान कानून की जरूरत बताई गई थी। 
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Friday, February 11, 2011
सारे कानून सिर्फ हिन्दुओं के लिए ?
---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ में बदलाव न करने को लेकर एक बार फिर केंद्र सरकार की खिंचाई की है। अदालत ने यह सही सवाल उठाया है कि आखिर क्यों सरकार सिर्फ हिन्दुओं के कानून ही बदलती है? जस्टिस दलबीर भंडारी और जस्टिस ए.के. गांगुली ने राष्ट्रीय महिला आयोग की याचिका पर सुनवाई के दौरान बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘‘पर्सनल लॉ में सुधार की कोशिशें हिन्दू समुदाय से आगे नहीं बढ़तीं। ऐसा सुधार दूसरे धार्मिक समुदायों से जुड़े कानूनों में नहीं हो रहा।’’ सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से एक बार पुन: देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत महसूस हो रही है। इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने भी पिछले दो दशक से अधिक समय में अनेक बार जोर दिया है। खास बात यह है कि १९८५ में शाहबानो मामले में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जस्टिस वाय.वी. चंद्रचूढ़ तक ने राष्ट्रीय एकीकरण के लिए समान नागरिक संहिता को जरूरी बताया था। जस्टिस कुलदीप सिंह ने साफ शब्दों में कहा था, ‘‘संविधान के अनुच्छेद-४४ को कोल्ड स्टोरेज से बाहर निकाला जाना चाहिए।’’ इसी अनुच्छेद में जोर देकर कहा गया है कि धर्म, जाति और जनजाति से हटकर सभी के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। इस तर्क से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि सभ्य समाज में धार्मिक और पर्सनल लॉ के बीच किसी प्रकार का संबंध नहीं हो सकता है। अत: एक राष्ट्र में रहने वाले सभी लोगों, चाहे वे किसी भी धार्मिक समुदाय से संबंध रखते हों, एक ही या यह कहें कि समान कानून लागू किया जाना चाहिए। 
हमारे यहां अधिकांश परिवार कानून का निर्धारण धर्म के द्वारा किया जाता है। हिन्दू, सिख, जैन और बौद्धों को हिन्दू कानून के तहत रखा गया है। मुसलमानों और ईसाइयों के अपने कानून हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि एक ही देश में रहने वालों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू हैं। ऐसी स्थिति में सभी के साथ समान व्यवहार, उनके बीच भावनात्मक लगाव और राष्ट्रीय एकता की कल्पना किस हद तक की जा सकती है? इस देश में समान नागरिक संहिता को लेकर बहस आजादी के पूर्व से चली आ रही है। १९४९ में संविधान में अनुच्छेद-४४ के प्रावधानों का उद्देश्य भी एकरूपता लाना रहा है, लेकिन स्वतंत्रता के बाद से ही शुरू हो गई तुष्टिकरण की कांग्रेसी राजनीति इस सकारात्मक सुधार की राह में सबसे बड़ा अड़ंगा बन गई। कालान्तर में वामदल धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा लगाकर अप्रत्यक्ष रूप से मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चल पड़े। शाहबानो तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए राजीव गांधी की अगुआई वाले कांग्रेसी सरकार ने कानून में संशोधन कर तुष्टिकरण का निकृष्टतम उदाहरण पेश किया। 
न्यायपालिका की चिंता अपनी जगह वाजिब है। समस्या वोट बैंक की गंदी राजनीति के कारण जटिल हो रही स्थिति की है। पिछले दो दशकों में राजनीति में ऊग आई स्वयंभू सेकुलरिस्टों की खरपतवार एक नई मुसीबत है। यह धारणा बनाने की कोशिशें देखी और सुनी गईं कि समान नागरिक संहिता अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों के निजी और धार्मिक कानूनों में हस्तक्षेप जैसी बात है। देश की सियासत में सड़ांध मारती नकारात्मक और स्वार्थ पूर्ण सोच के चलते जो नुकसान हो रहा है उसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। विद्वान न्यायाधीश-जस्टिस भंडारी और जस्टिस गांगुली का यह सवाल उचित और गंभीरतापूर्वक विचार करने योग्य है कि ‘‘ पर्सनल लॉ में सुधार की कोशिश हिंदू समुदाय से आगे क्यों नहीं बढ़ती?’’ विचार करें यही बात अन्य क्षेत्रों में तक देखी जाती है। बात कड़वी है किन्तु परिवार नियोजन अभियान को ले लें। आंकड़े स्वयं ही गवाह हैं ऐसा लगता है कि मानो इस कार्यक्रम की सफलता की जिम्मेदारी सिर्फ हिन्दुओं पर थोप दी गई है। हर क्षेत्र में इतना भेदभाव राष्ट्र को गंभीर स्थिति की ओर निरंतर धकेल रहा है।
Posted by Anil Bihari Shrivastava 

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आयी


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गाना / Title: जब ज़ीरो दिया ... है प्रीत जहाँ की रीत सदा -
jab ziiro diyaa ... hai priit jahaa.N kii riit sadaa
चित्रपट / Film: Poorab Aur Paschim
संगीतकार / Music Director:  कल्याणजी - आनंदजी-(Kalyanji-Anandji)
गीतकार / Lyricist:  इन्दीवर-(Indeevar) गायक / Singer(s):  Mahendra Kapoor
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 जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने
भारत ने मेरे भारत ने
दुनिया को तब गिनती आयी
तारों की भाषा भारत ने
दुनिया को पहले सिखलायी

देता ना दशमलव भारत तो
यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था
धरती और चाँद की दूरी का
अंदाज़ लगाना मुश्किल था

सभ्यता जहाँ पहले आयी
पहले जनमी है जहाँ पे कला
अपना भारत जो भारत है
जिसके पीछे संसार चला
संसार चला और आगे बढ़ा
ज्यूँ आगे बढ़ा, बढ़ता ही गया
भगवान करे ये और बढ़े
बढ़ता ही रहे और फूले\-फले


मदनपुरी: चुप क्यों हो गये? और सुनाओ

है प्रीत जहाँ की रीत सदा
मैं गीत वहाँ के गाता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ
भारत की बात सुनाता हूँ

काले\-गोरे का भेद नहीं
हर दिल से हमारा नाता है
कुछ और न आता हो हमको
हमें प्यार निभाना आता है
जिसे मान चुकी सारी दुनिया
मैं बात वोही दोहराता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ
भारत की बात सुनाता हूँ

जीते हो किसीने देश तो क्या
हमने तो दिलों को जीता है
जहाँ राम अभी तक है नर में
नारी में अभी तक सीता है
इतने पावन हैं लोग जहाँ
मैं नित\-नित शीश झुकाता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ
भारत की बात सुनाता हूँ

इतनी ममता नदियों को भी
जहाँ माता कहके बुलाते है
इतना आदर इन्सान तो क्या
पत्थर भी पूजे जातें है
इस धरती पे मैंने जनम लिया
ये सोच के मैं इतराता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ
भारत की बात सुनाता हूँ



मेरे देश की धरती,सोना उगले उगले हीरे मोती ......


गाना / Title: मेरे देश की धरती, सोना उगले उगले हीरे मोती -
mere desh kii dharatii, sonaa ugale ugale hiire motii
चित्रपट / Film: Upkaarसंगीतकार / Music Director:  कल्याणजी - आनंदजी-(Kalyanji-Anandji)
गीतकार / Lyricist:  इन्दीवर-(Indeevar) गायक / Singer(s):  Mahendra Kapoor  ,   chorus
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मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती
मेरे देश की धरती ...

बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं
ग़म कोस दूर हो जाता है खुशियों के कंवल मुस्काते हैं
सुनके रहट की आवाज़ें यूँ लगे कहीं शहनाई बजे
आते ही मस्त बहारों के दुल्हन की तरह हर खेत सजे,
मेरे देश ...

जब चलते हैं इस धरती पे हल ममता अंगड़ाइयाँ लेती है
क्यूँ ना पूजे इस माटी को जो जीवन का सुख देती है
इस धरती पे जिसने जनम लिया, उसने ही पाया प्यार तेरा
यहाँ अपना पराया कोई नहीं है सब पे है माँ उपकार तेरा,
मेरे देश ...

ये बाग़ है गौतम नानक का खिलते हैं चमन के फूल यहाँ
गांधी, सुभाष, टैगोर, तिलक, ऐसे हैं अमन के फूल यहाँ
रंग हरा हरी सिंह नलवे से रंग लाल है लाल बहादुर से
रंग बना बसंती भगत सिंह रंग अमन का वीर जवाहर से,
मेरे देश ...
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mere desh kii dharatii sonaa ugale, ugale hiire motii
mere desh kii dharatii ...

bailo.n ke gale me.n jab ghu.ngharuu jiivan kaa raag sunaate hai.n
Gam kos duur ho jaataa hai khushiyo.n ke ka.nval muskaate hai.n
sunake rahaT kii aavaaze.n yuu.N lage kahii.n shahanaaI baje
aate hii mast bahaaro.n ke dulhan kii tarah har khet saje,
mere desh ...

jab chalate hai.n is dharatii pe hal mamataa a.nga.Daaiyaa.N letii hai
kyuu.N naa puuje is maaTii ko jo jiivan kaa sukh detii hai
is dharatii pe jisane janam liyaa, usane hii paayaa pyaar teraa
yahaa.N apanaa paraayaa koI nahii.n hai sab pe hai maa.N upakaar teraa,
mere desh ...

ye baaG hai gautam naanak kaa khilate hai.n chaman ke phuul yahaa.N
gaa.ndhii, subhaashh, Taigor, tilak, aise hai.n aman ke phuul yahaa.N
ra.ng haraa harii si.nh nalave se ra.ng laal hai laal bahaadur se
ra.ng banaa basa.ntii bhagat si.nh ra.ng aman kaa viir javaahar se,
mere desh ...

वह ख़ून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं - विमल सोनी




विमल सोनी
वह ख़ून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं
वह ख़ून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं
वह ख़ून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन न रवानी है
जो परवश में होकर बहता है, वह ख़ून नहीं है पानी है
उस दिन लोगों ने सही सही, खूँ की कीमत पहचानी थी
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में, मांगी उनसे कुर्बानी थी
बोले स्वतंत्रता की खातिर, बलिदान तुमहे करना होगा
बहुत जी चुके हो जग में, लेकिन आगे मरना होगा
आजादी के चरणों में जो, जयमाल चढाई जाएगी
वह सुनो तुम्हारे शीशों के, फूलों से गूंथी जाएगी
आज़ादी का संग्राम कहीं, पैसे पर खेला जाता है?
ये शीश कटाने का सौदा, नंगे सर झेला जाता है
आज़ादी का इतिहास कहीं, काली स्याही लिख पाती है?
इसको पाने को वीरों ने, खून की नदी बहाई जाती है
यह कहते कहते वक्ता की, आंखों में खून उतर आया
मुख रक्त वर्ण हो दमक उठा, चमकी उनकी रक्तिम काया
आजानु बाहु ऊंचा करके, वे बोले रक्त मुझे देना
इसके बदले में भारत की, आज़ादी तुम मुझसे लेना
हो गई सभा में उथल पुथल, सीने में दिल न समाते थे
स्वर इंकलाब के नारों के, कोसों तक झाए जाते थे
हम देंगे देंगे ख़ून, स्वर बस यही सुनाई देते थे
रण में जाने को युवक, खड़े तैयार दिखाई देते थे
बोले सुभाष इस तरह नहीं, बातों से मतलब सरता है
मैं कलम बढ़ता हूँ, आये, जो खूनी हस्ताक्षर करता है
इसको भरने वाले जन को, सर्वस्व समर्पण करना है
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन, माता को अर्पण करना है
पर यह साधारण पत्र नहीं, आज़ादी का परवाना है
इसपर तुमको अपने तन का, कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना है
वह आगे आए जिसकी रग में, खून भारतीय बहता है
वह आगे आए जो ख़ुद को, हिन्दुस्तानी कहता है
वह आगे आए जो इसपर, खूनी हस्ताक्षर देता है
मैं कफन बढाता हूँ आए, जो इसको हँसकर लेता है
सारी जनता हुंकार उठी, हम आते हैं, हम आते हैं
माता के चरणों में लो, हम अपना रक्त चढाते हैं
साहस से बढे युवक उस दिन, देखा बढते ही आते थे
चाकू छुरी कटारियों से, वे अपना रक्त गिराते थे
फिर उसी रक्त की स्याही में, वे अपना कलम डुबोते थे
आज़ादी के परवाने पर, हस्ताक्षर करते जाते थे
उस दिन तारों ने देखा था, हिन्दुस्तानी विश्वास नया
लिखा था जब रणवीरों ने, खूँ से अपना इतिहास नया 


राष्ट्रवाद के लिए; राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता करे



राष्ट्रवाद के लिए; राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता करे

अरविन्द सीसौदिया
हमारी स्वतंत्रता के लिये राष्ट्रपति पद का कितना महत्व है, यह समझने के लिए हमें 25 जून 1975 की रात्रि 11 बजकर 45 मिनिट पर, तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इन्दिरा गांधी के कहने पर, लगाये गये आपातकाल को समझना होगा। जिसमें राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत आंतरिक आपातकाल लगा दिया था। जेलों में डाले गये निर्दोषों को न्यायालय मुक्त न कर पाये, इसलिये कि ‘मीसा’ कानून को न्यायालय के क्षैत्राधिकार से बाहर कर दिया गया था। लोगों की जबरिया नसबंदी कर दी गई थी, जबरिया मकान तोड़ दिये गये थे। कोई भी अखबार सरकार के खिलाफ लिख नहीं सकता था, विपक्ष नाम की कोई चीज नहीं रहने दी गई थी। व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाप्त हो गई थी।
सोचने समझने वाली बात यह है कि ऐसा क्यों हुआ! राष्ट्रपति ने बिना जनता की परवाह किये आपातकाल क्यों लगा दिया! इसके दो कारण थे, पहला कारण तो राष्ट्रपति जनता के द्वारा चुना नहीं जाता जो वह जनता के प्रति जवाबदेह होता........, क्योंकि उसको चुनने वाला निर्वाचक मण्डल सांसद और विधायक होते हैं। जनता इस चुनाव की महज दर्शक होती है! दूसरा कारण राष्ट्रपति पुनर्निवाचन के लिए उन दलों पर निर्भर रहता है जिस पर निर्वाचक मण्डल के सदस्यों का संख्या बल हो, इसलिये वह उस दल को संतुष्ट रखता है। इसी कारण राष्ट्रपति पद महत्वपूर्ण होते हुए भी एक प्रकार से दलगत राजनीति का दास होता है । इन दो कारणों से राष्ट्रपति सबसे महत्वपूर्ण  पदाधिकारी होते हुए भी न तो जनता के प्रति जबाव देह हो पाता और न ही राष्ट्र के प्रति..!! वह मात्र दल के प्रति दासत्व में कैद रहता है। राष्ट्रपति को इस दासता से मुक्ति का एक ही उपाय है कि राष्ट्रपति का निर्वाचन सीधे ‘जनता’ करे, ताकि वह जनता और राष्ट्र के प्रति जबाव देह हो सके।
केशवानन्द भारती प्रकरण में न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने चेतावनी दी थी ( 24 अप्रैल 1973 ) कि ‘‘जर्मनी के संविधान के आपातकाल सम्बन्धी अधिकारों की धारा 48 का दुरूपयोग कर हिटलर ने नाजी तानाशाही स्थापित कर ली थी। भारतीय         संविधान की आपातकालीन धाराओं 352 व 357 का किसी प्रकार का संशोधन किये बिना इस प्रकार प्रयोग किया जा सकता है कि जनतंत्र दिखावा मात्र रह जाये। शक्ति के इस दुरूपयोग पर अंकुश जागृत व जन विद्रोह का भय ही हो सकता है।’’
19 जुलाई 1947 को संविधान सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रपति से संदर्भित प्रस्ताव रखे थे। संक्षिप्त में संघ का प्रधान राष्ट्रपति होगा, उसका निर्वाचन संघ की लोक प्रतिनिधि सभा पार्लियामेंट की दोनों सभाओं के सदस्य (संसद सदस्य) तथा सभी प्रदेशों की इकाईयों की व्यवस्थापिकाओं (विधानसभाओं) के सदस्य, जहां व्यवस्थापिका द्विसदनीय होंगी, उनमें नीचे वाली सभा के सदस्य (विधायक) करेंगें। तीसरी बात थी निवार्चन गुप्त मतपत्र द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के आधार पर एकाकी हस्तान्तरित मत पद्धति से होगा।
तब नेहरू जी ने संविधान सभा में राष्ट्रपति की शक्तियों के संदर्भ में कहा था कि ‘‘हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि वस्तुतः शक्ति मंत्रीमण्डल और व्यवस्थापिका में सन्निहित है न कि राष्ट्रपति में ! पर साथ ही हम यह भी नहीं चाहते थे कि अपना राष्ट्रपति केवल काठ की मूरत हो, यानी नाममात्र का प्रधान हो जैसा कि फ्रांस का होता है। हमने उसे कोई वास्तविक क्षमता तो नहीं दी है पर उसके पद को बड़ा ही मर्यादा और क्षमता सम्पन्न बनाया है। विधान के इस मसविदे में आप देखेंगे कि अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह यह समूची रक्षा सेना का प्रधान नायक है।’’
उन्होंने आम नागरिक को मताधिकार देने के पक्ष का   विरोध करते हुए कहा था ‘‘.....राष्ट्रपति के चुनाव में भारत का हर वयस्क नागरिक भाग लेगा तो यह बड़ा ही भारी बोझ हो जायेगा। आर्थिक दृष्टि से यह एक बड़ा ही कठिन काम होगा तथा इससे वर्ष भर के लिए सारे कार्य अव्यवस्थित हो जायेंगे। अमेरिका में राष्ट्रपति के निर्वाचन से वस्तुतः कई महीनों तक बहुत से काम बन्द हो जाते हैं।’’
‘‘.......इस देश में इस पद्धति (अमेरिका) को ही अपनाने की कोशिश करेंगे तो मंत्रीमण्डल मूलक शासन व्यवस्था को यहां विकसित होने से रोकेंगे तथा अपने समय और शक्ति की बड़ी बर्बादी करेंगे। कहा जाता है कि राष्ट्रपति के निर्वाचन में सम्पूर्ण अमेरिका की सारी शक्ति और सारा ध्यान निर्वाचन में केन्द्रित हो जाता है और इससे देश की एकता को हॉनि पहुंचती है। एक व्यक्ति समस्त राष्ट्र का प्रतीक बन जाता है। हमारे देश में भी राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतीक होगा, परन्तु मैं समझता हूं कि हमारे राष्ट्रपति का ऐसा निर्वाचन हमारे लिए बुरी बात होगी।’’
राष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी चर्चा में बहुत सी बातें उठीं। श्री टी. चनय्या (मैसूर राज्य) चाहते थे कि राष्ट्रपति एक बार उत्तर भारत का हो तो दूसरी बात दक्षित भारत का हो। तो राय बहादुर श्यामनन्दन सहाय (बिहार) ने यह आपत्ति दर्ज की थी कि जब संघीय पालिर्यामेंट में दोनों सभाओं के सदस्यों मताधिकार दिया जा रहा है तो राज्य के द्विसदनीय सदनों में विधान परिषद को बाहर क्यों रखा जा रहा है। एक सदस्य श्री एच. चन्द्रशेखरिया (मैसूर) चाहते थे कि एक बार राष्ट्रपति रियासतों का हो और एक बार गैर रियासतों का..!
मगर शिब्बन लाल सक्सेना ने अपने संशोधन में स्पष्ट कहा कि ‘‘जनता राष्ट्रपति का चुनाव सीधे बालिग मताधिकार से करे।’’ उन्होंने तर्क दिया था कि ‘‘.......सारे देश के वोटर (वयस्क मतदाता) जिस व्यक्ति को अपना राष्ट्रपति चुनेंगे, उसकी नैतिक शक्ति और प्रतिभा सारे देश में अद्वितीय होगी। वह सचमुच जनता का आदमी और उनका सच्चा प्रतिनिधि होगा।’’ उन्होंने संविधान सभा में अपना मत व्यक्त करते हुए कहा था ‘‘हमारे देश की एकता, जो आज टूट गई है और कुछ रियासतों के वर्तमान प्रयत्नों को देखते हुए जिस एकता के और भी अधिक टूटने का भय है, उस एकता को फिर से कायम करने के लिए हम प्रतिज्ञाबद्ध हैं। उसमें बालिग मताधिकार से राष्ट्रपति का चुनाव होगा, बहुत मदद करेगा। तब ट्रावनकोर से लेकर कश्मीर तक और कलकत्ता से लेकर बम्बई तक देश के कोने-कोने में गरीब से गरीब व्यक्ति भी यह महसूस करेगा कि वह भारत वर्ष के राष्ट्रपति को चुनने का अधिकारी है। अपने भारतीय होने के गौरव को तब वह पूरी तौर पर अनुभव करेगा और भारतीय एकता की जड़ इस प्रकार मजबूत हो जायेगी और आजकल (1946) हैदराबाद, कश्मीर, ट्रावनकोर इत्यादी में जो भारत से अलग होने की भावना है, उसकी जनता में भी फिर से भारत वर्ष में मिल जाने की इच्छा प्रबल होती जायेगी। इसलिये विशेषकर इस वर्तमान अवस्था में मैं राष्ट्रपति के बालिग मताधिकार से चुने जाने को अत्यंत आवश्यक व लाभदायक समझता हूं।’’
सैय्यद काजी करीमुद्दीन (मध्यप्रांत-बरार) भी चाहते थे कि राष्ट्रपति का चुनाव वयस्क मताधिकार पद्धति से हो, उन्होंने पं. नेहरू का प्रतिवाद करते हुए कहा था कि उन्होंने केवल एक तर्क पेश किया है कि ‘‘बहुत बड़ी व्यवस्था करनी पड़ेगी।’’ उन्होंने संविधान में अपने भाषण में कहा ‘‘अमरीका जैसे देश में राष्ट्रपति का निर्वाचन वयस्क मताधिकार से होता है और मेरा विचार है कि यदि राष्ट्रपति का चुनाव हर पांचवे या चौथे वर्ष वयस्क मताधिकार से हो तो उससे आम जनता को जागृत करने का अवसर मिल सकेगा।’’ उन्होंने आशंका व्यक्त की थी कि इससे तो राष्ट्रपति केवल बहुसंख्यक दल की कठपुतली बन जायेगा।’’ लगभग यही विचार मोहम्मद शरीफ (मैसूर) ने भी रखे थे।
असल में हमारे देश में जनता को बहुत से चुनावों में भाग लेने का अधिकार मिलता है जैसे ग्रामीण क्षैत्र की जनता पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, विधायक और सांसद का निर्वाचन करती है, शहरी क्षैत्र में पार्षद, मेयर,  विधायक और सांसद का चुनाव करती है। ये सारे चुनाव देश के एक अंश मात्र से जुड़े हैं। जैसे पंच वार्ड से, सरपंच पंचायत से, विधायक विधानसभा क्षैत्र से, सांसद लोकसभा क्षैत्र से, कोई भी एक चुनाव नहीं है जो देश के नागरिक को पूरे देश से जोड़ता हो! यानि कि हम जिस निर्वाचन पद्धति से चल रहे हैं उसमें ही हमने ‘‘राष्ट्र’’ और ‘‘राष्ट्रवाद’’ को छोटा किया है। भारत का सबसे महत्वपूर्ण पद राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पदों में से एक भी पद ऐसा नहीं है जिसे पूरा देश चुनता हो। जिससे  सीधे जनता जुडती हो।
गुणवत्ता और व्यक्तित्व के अनुबंधन भी होने चाहिए 
वर्तमान में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री आदी के लिए अनुभव सम्बन्धी, कार्य गुणवत्ता सम्बन्धी और विशिष्ट शैक्षणिक स्तर सम्बन्धी कोई भी बन्धन नहीं है जिनसे अनेकों बार इन पदों का अवमूल्यन हुआ, आलोचनायें हुई, समय-समय पर आरोप-प्रत्यारोप उछलते रहते हैं। इसका मुख्य कारण यही है कि जैसे-जैसे पद की उच्च स्तरता बढ़ती जाये, वैसे-वैसे उसकी विशिष्टता सम्बन्धी कुछ बन्धनों का भी होना आवश्यक है। देश में सरकारी कर्मचारी को चपरासी, क्लर्क या कण्डक्टर जैसे बहुत मामूली पदों पर भी योग्यता और स्तर के मापदण्डों पर खरा उतरना पड़ता है, मामूली सा आपराधिक प्रकरण दर्ज हो तो सरकारी नौकरी नहीं मिलती, मगर उपरोक्त पदों पर यह सब बड़ी आसानी से पदासीन हो सकते हैं। सामान्य सी सैद्धान्तिक बात है कि चालक के लिये वाहन चलाना आना जरूरी है, इसी तरह इन पदों पर पहुंचने वाले व्यक्तियों के लिए कार्यक्षमताओं के मामले में दक्ष होना अनिवार्य है। उनकी जरा सी अकुशलता से पूरे देश को दुख भोगना पड़ता है।
गणित कहता है कि वर्तमान पद्धति खराब है..
देश की जनता के बजाये दल को महत्वपूर्ण बनाया गया !
जब सीधे जनता के हाथ में निर्वाचन होता है तो जनता के प्रति बहुत अधिक जवाबदेह बनना पड़ता है। जरा सी जन उपेक्षा में जनता पद से बाहर कर सकती है, अर्थात जो चुनाव सीधे जनता से होता है वह अधिक लोकतंत्रीय होता है, जनता के प्रति जवाबदेह होता है।
इसलिये कम मेहनत व जोड़तोड़ से पद प्राप्ति की पद्धति हमने अपनाई। उदाहरण के तौर पर 100 वोटर हैं उनमें से मान लो 60 ने वोट डाले, बहुमत सिद्धांत 51 प्रतिशत के  आधार पर, 60 वोटों का बहूमत लगभग 31 हुआ! अर्थात 31 वोट पर तो हम सांसद या विधायक चुन लिये गये अब इनके 51 प्रतिशत पर सरकार बन गई! यानि कि लगभग 16 प्रतिशत मत शक्ति की सरकार बन गई और उस पर भी स्वतंत्रता यह कि हम किसी को भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बना दें। वह सदन का सदस्य हो न हो। वर्तमान में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक बार भी लोकसभा चुनाव नहीं जीते है। कुल मिला कर यह सब इसलिये हुआ कि देश की जनता के बजाये सारे निर्णय राजनैतिक दल के कार्यालय में होते रहें। जाने अनजाने जनता बाहर हो गई और लोकतंत्र पर दल तंत्र का कब्जा हो गया ।
दलगत हित की निर्वाचन पद्धति
वर्तमान निर्वाचन पद्धति मूलतः जनता के हित के बजाय राजनीतिक दलों के हित की रणनीति पर टिकी हुई है। इस पद्धति से जनता को पूरा लोकतंत्र नहीं मिला है बल्कि सारा मामला अर्द्ध लोकतंत्र पर अटक गया है। हम अपने देश में सामान्य तौर पर अपनी पसन्द के व्यक्ति को मुख्यमंत्री नहीं बना पाते। इसका दल के मुखिया की पसन्द होना जरूरी है और इस देश में लगभग पहले तीस वर्ष तक मुख्यमंत्री दल की पसन्द की आधार पर ही बनते और बदलते रहे। वर्तमान में सम्भवतः जनता ने दलों की मनमर्जी की इस प्रवृत्ति के कारण ही क्षैत्रीय दलों के व्यक्तियों को मुख्यमंत्री के रूप में चुनना प्रारम्भ कर दिया। इसी प्रकार राज्यों में राज्यपाल भी वही होते हैं जो किसी दल की पसन्द हों। राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पद पर उस प्रदेश की जनता की राय कोई मायने नहीं रखती है। कई बार तो जनता द्वारा लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में हराये गये व्यक्ति को  राज्यसभा सांसद निर्वाचित कर मंत्री बना दिया जाता है। वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री रहे शिवराज पाटिल  लोकसभा के सदस्य नहीं अर्थात्् जनता द्वारा निर्वाचित नहीं है किंतु फिर भी मंत्री परिषद में प्रथम और द्वितीय पायदान पर बैठे  । लोकतंत्र का इससे बड़ा मखौल और क्या हो सकता है।
कुल मिलाकर देश की निर्वाचन पद्धति में बदलाव और जनता को सीधे अपने शासक नियुक्त करने के अधिकार पर पुनर्विचार आवश्यक है। वहीं देश की राष्ट्रवादी सोच और समझ को बढ़ाने के लिए देश के राष्ट्रपति का निर्वाचन सीधे आम जनता से होना चाहिए ताकि जनता का जुड़ाव सीधा राष्ट्र से बने। आज ऐसी कोई मतपद्धति नहीं है, जिससे अरूणाचल प्रदेश के नागरिक, मणिपुर के नागरिक, नागालेण्ड के नागरिक, असम के नागरिक, जम्मू कश्मीर के नागरिक राष्ट्रीय स्तर के किसी पद के लिए मतदान करें।

-बेकरी के सामनें,राधाकृष्ण मंदिर रोड़, डडवाड़ा, कोटा जंक्शन

हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के



- अरविन्द सिसोदिया 
देश ने जो आजादी पाई है, वह बहुत बड़ी कीमत शहादतों के रूप में अदा करके पाई है ..विभाजन के दर्द के बीच पाई है ...अब इसे फिरसे गुलाम बनाने की कोशिशें हो रहीं हैं ...हमें  अपनी आजादी हर हाल में बचा कर रखनी है..इसके लिए चाहे जितनी बड़ी कुर्बानी ही क्यों न देनी पड़े...
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गाना / Title: हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के - 
ham laaye hai.n tuufaan se kashtii nikaal ke
चित्रपट / Film: Jaagriti/संगीतकार / Music Director:  हेमंत-(Hemant)
गीतकार / Lyricist:  प्रदीप-(Pradeep) / गायक / Singer(s):  Rafi 
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पासे सभी उलट गए दुश्मन की चाल के 
अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के 
मंज़िल पे आया मुल्क हर बला को टाल के 
सदियों के बाद फिर उड़े बादल गुलाल के 
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हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के 
इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के 
तुम ही भविष्य हो मेरे भारत विशाल के 
इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के 
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१) देखो कहीं बरबाद ना होए ये बगीचा 
इसको हृदय के खून से बापू ने है सींचा 
रक्खा है ये चिराग़ शहीदों ने बाल के, इस देश को...
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२) दुनिया के दांव पेंच से रखना ना वास्ता 
मंज़िल तुम्हारी दूर है लम्बा है रास्ता 
भटका ना दे कोई तुम्हें धोखे में डाल के, इस देश को...
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३) ऐटम बमों के जोर पे ऐंठी है ये दुनिया 
बारूद के इक ढेर पे बैठी है ये दुनिया 
तुम हर कदम उठाना ज़रा देख भाल के, इस देश को...
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४) आराम की तुम भूल भुलय्या में ना भूलो 
सपनों के हिंडोलों पे मगन होके ना झूलो 
अब वक़्त आ गया है मेरे हँसते हुए फूलों 
उठो छलाँग मार के आकाश को छू लो 
तुम गाड़ दो गगन पे तिरंगा उछाल के, इस देश को... 

दो तस्वीरें है हिंदुस्तान की.: ये देश है वीर जवानों का : Top 5 Corruption Scams in India.



दो तस्वीरें है हिंदुस्तान की......
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गाना / Title: ये देश है वीर जवानों का - ye desh hai viir javaano.n kaa
चित्रपट / Film: Naya Daur
संगीतकार / Music Director:  ओ. पी. नय्यर-(O P Nayyar) 
गीतकार / Lyricist:  साहिर-(Sahir) 
गायक / Singer(s):  Rafi 
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ये देश है वीर जवानों का,
अलबेलों का मस्तानों का
ओ ...
ओ ... अति वीरों की
ये देश है वीर जवानों का 
अलबेलों का मस्तानों का
इस देश का यारों ... होय!! 
इस देश का यारों क्या कहना 
ये देश है दुनिया का गहना
--
ओ... ओ...
यहाँ चौड़ी छाती वीरों की
यहाँ भोली शक्लें हीरों की
यहाँ गाते हैं राँझे ... होय!!
यहाँ गाते हैं राँझे मस्ती में
मस्ती में झूमें बस्ती में
--
ओ... ओ...
पेड़ों में बहारें झूलों की
राहों में कतारें फूलों की
यहाँ हँसता है सावन ... होय!!
यहाँ हँसता है सावन बालों में
खिलती हैं कलियाँ गालों में
--
ओ... ओ...
कहीं दंगल शोख जवानों के
कहीं कर्तब तीर कमानों के
यहाँ नित नित मेले ... होय!!
यहाँ नित नित मेले सजते हैं
नित ढोल और ताशे बजते हैं
--
ओ... ओ...
दिलबर के लिये दिलदार हैं हम
दुश्मन के लिये तलवार हैं हम
मैदां में अगर हम ... होय!! 
मैदां में अगर हम दट जाएं
मुश्किल है के पीछे हट जाएं
--
हुर्र हे !! हा!!
हुर्र हे !! हा!!
हुर्र हे !! हा!
अड़िपा! अड़िपा! अड़िपा!
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Top 5 Corruption Scams in India
TUESDAY, 23 AUGUST 2011/NAMRATA NONGPIUR / se..........
The word scam and corruption have become synonymous with the campaign that Anna Hazare, along with his supporters, has undertaken.
These two words are, almost entirely, responsible for the political and social state that our country is in today. The entire nation suffered economically and faced humiliation because of the greed of a few individuals.
Though Anna Hazare, has been able to wake the nation from its slumber to a great extent, the damage that has already been done by these scams cannot be erased.
Here is MensXP’s pick of India’s Top 10 corruption scams.
1. Indian Black Money Scam
Cost: Rs. 7,280,000 Crores
Face of the Scam: Hassan Ali Khan
This scam can be said to be the almost immediate cause of the anti-corruption movement being faced by the country. The revelation about the huge sums of money being stashed away in Swiss banks served as an impetus to rally against the government that had been ignoring it. The magnanimity of the situation came into focus when Indian businessman was arrested on money laundering charges which was to the tune of Rs. 39,120 crores.
2. CWG Scam
Cost: Rs. 70,000 crores
Face of the Scam: Suresh Kalmadi
The Commonwealth Games held in India was an even that was soaked in controversies and corruption to say the least. While the organizing committee drew flak for various allegations like child labour, sex slavery, environmental impact, racism and financial costs, the one that shocked the nation was the humungous amount of funds that had been mishandled by them. The chairman of the organizing committee was, resultantly, arrested on charges of 'criminal conspiracy and cheating.'
3. 2G Spectrum Scam
Cost: Rs 176,000 crore
Face of the Scam: A. Raja & M. K. Kanimozhi
The 2G scam is one of the latest scams that have hit our country driving it to incur huge losses. And caught at the centre of the embarrassing controversy was the Telecom Minister, A. Raja himself. The scam became bigger with new revelations of the involvement of politicians, bureaucrats, corporate personalities, media persons and lobbyists. The granting of licenses to various companies led to a massive loss to the exchequer. Also, daughter of political heavyweight, M. Karunanidhi, M. Kanimozhi was also arrested on charges of being a co-conspirator in the scandal.
4. Scorpene Submarine Scam
Cost: Rs 18,978 crores
Face of the Scam: Ravi Shankaran
The Scorpene submarines scam was one of the biggest corruption scandals faced by the country and including the navy. In the scandal, secret Navy documents were sold to the makers of the Scorpene submarine. The Indian government had approved the 19,000 crore submarine deal with the French company. The purchase of six Scorpene submarines cost the Indian government a lot more than its actual price.
5. Stamp Paper Scam
Cost: Rs 20,000 crores
Face of the Scam: Abdul Karim Telgi
The Stamp Paper scam was perhaps the most innovative scam in the list. Abdul Karim Telgi, a former fruits and vegetables seller, duped the nation of crores of rupees by printing fake stamp papers. He began his counterfeit career by making fake passports after which he started selling fake stamp papers to banks, insurance companies, share broking firms and bulk purchases. What was surprising, was the involvement of many police officers and other government employees. In fact, one police officer was said to have assets worth Rs. 100 crores despite earning only Rs. 9000 a month.