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बेरोजगारी की भयावह स्थिति

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- अरविन्द सीसोदिया           बेरोजगारी एक आर्थिक समस्या हे किन्तु इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी युवा मस्तिष्क पर पड़ता हे !अपने लिए  आजीविका ना जुटा पाने के कारण युवक निराश हो जातें हें ! बात-बात पर क्रोध करना उनकी प्रवृत्ति बन जाती हे जिससे समाज कि शांति ही नहीं भंग होती अपितु नैतिक चरित्र का भी पतन होने लगता है, क्यूंकि निराशा ओर आक्रोश से भरा युवक कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाता हे ! कहा भी  गया हे  -बुभुक्षितः नराः किं न करोति पापं '   अर्थात भूखा  व्यक्ति कौनसा पाप नहीं करता !  बेरोज़गारी कि समस्या का समाधान करके ही समाज में शांति एवं नेतिकता कायम कि जा सकती है !           स्वतंत्रता - प्राप्ति के पश्चात जन संख्या की भारी  वृद्धि के कारण भी बेरोजगारों की संख्या  बढ़ गयी है ! हस्तकला  एवं कुटीर उद्योगों द्वारा बन्ने वाली वस्तुओं का उत्पादन मशीनों से होने लगा जिससे काम काजी हाथ बेकार हो गए, उन हाथों को अन्य कार्य तालाशने के लिए बाध्य होना पढ़ा कम्...