स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्र-ध्यान – II swami vivekanand ji & hindutva
स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्र-ध्यान – II स्वामी विवेकानन्द ने सारे भारत को अत्यन्त निकट से देखा था। उन्होंने भारतीयता को अपने अन्दर जीया था। इस जीवन्त अनुभूति पर आधारित उनका चिन्तन था। सामान्यतः इतिहास को विदेशी दृष्टि से देखने के आदी आधुनिक विद्वान स्वामीजी की अन्तर्दृष्टि की गहराई को नहीं पकड़ पाते है। उन्हें स्वामीजी की राष्ट्रभक्ति व उनकी मानवता में विरोधाभास दिखाई पड़ता है। इसका कारण उनका स्वयं का राष्ट्रबोध आधुनिक पश्चिमी विचार से प्रभावित है। पश्चिम में प्रथमतः साम्राज्य की राजनैतिक दृष्टि से राष्ट्रबोध जगा और द्वितीय महायुद्ध के बाद जब साम्राज्यों का पतन हुआ तब अमेरिकी नेतृत्व में आर्थिक राष्ट्रवाद का उद्भव हुआ। इन दोनों ही दृष्टि से भारत को समझने का प्रयत्न असफल ही होगा। वास्तव में इन अधुरी धारणाओं से वे भी स्वयं को परिभाषित नहीं कर पा रहे हैं। आर्थिक आधार पर अपनी मुद्राको एक कर युरोप में एक संघीय रचना युरोजोन का निर्माण हुआ किन्तु ब्रिटन मुद्रा के स्तर पर आज भी उससे अलग है और जर्मनी ने मुद्रा भले ही अपना ली किन्तु अपनी राष्ट्रीय पहचान कायम रखी है। युरोप की वर्तमान उथलपुथ...