कालेधन पर सरकार काली...




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- अरविन्द सीसौदिया,कोटा,राजस्थान ।
लोकसभा चुनावों में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणीजी ने यह पुरजोर मामला उठाया था। बाद में बाबा रामदेव ने भी इसे अपना अभियान बनाया।सबसे पहले विदेशों में काला धन झुपाने का मामला बोफोर्स तोप खरीद मामले में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी का आया  था , सोनिया जी के निकटस्थ क्वात्रोच्ची  के माध्यम से , तब से ही विदेशों में जमा काले धन को सरकार अस्वीकार करती रही हे.., अब तब दुनिया यह सच जन चुकी हे कि टेक्स चोरी कर धन झुपाने कि सुविधा  देने वाले  देशों में भारत का बहुत अधिक धन झुपा है |  मगर तब भी बेशर्मी से सरकार सब कुछ छुपाती रही, जैसे कि यह काला धन उसका खुद का हो !!!! अब सरकार के वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी नें स्वंय स्विकार किया है कि 700 लोगों के खाते विदेशों में हैं, उनके नाम सार्वजनिक नहीं किये जा सकते...!! समझ से परे बात है कि देश के गद्दारों के नाम उजागर नहीं किये जा सकते क्या मतलब ?
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दैनिक  भास्कर का संपादकीय.. काले धन पर श्वेत पत्र लाने का वादा ज्यादा भरोसा बंधाता, अगर सरकार लगे हाथ यह भी बता देती कि वह देश के सामने यह ब्योरा आखिर कब रखेगी। लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव पर बहस के दौरान विपक्ष द्वारा जो सवाल पूछे गए, वे दरअसल आम जनमानस के मन में भी घुमड़ रहे हैं। 
लोग जानना चाहते हैं कि देश का कितना धन विदेशों में जमा है, यह धन वहां कौन ले गया, काला धन कैसे पैदा होता है और इन सब पर नियंत्रण के लिए आखिर सरकार द्वारा क्या कदम उठाए जा रहे हैं? लोकसभा में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बयान से इनमें से किसी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं मिला। उलटे उनसे यह सुनकर निराशा हुई कि फिलहाल सरकार के पास काले धन की उत्पत्ति के बारे में कोई आधिकारिक विवरण नहीं हैं। 
यह वाजिब सवाल है कि अगर सरकार के पास पूरी जानकारी ही नहीं है, तो आखिर वह श्वेत पत्र में देश को क्या बताएगी? काले धन को सामने लाने के लिए सरकारी कोशिशों की बात वित्त मंत्री ने दोहराई। इस दिशा में कुछ सफलता मिलने का दावा भी किया। मगर ये प्रयास और कथित प्रगति अपर्याप्त है। 
सरकार को यह ख्याल जरूर रखना चाहिए कि अगर वह ठोस जानकारी नहीं देगी, तो इस संबंध में कयास लगाए जाएंगे, सरकार के इरादों पर शक गहराएगा और सत्ता पक्ष की छवि लगातार खराब होती रहेगी। पहले ही सुप्रीम कोर्ट तक इस मामले में सरकार की गंभीरता पर प्रश्न खड़े कर चुका है।
फिर यह भी गौरतलब है कि मसला सिर्फ विदेशों में जमा काले धन का नहीं है, बल्कि यह भी है कि अभी भी देश में काला धन कैसे और क्यों पैदा हो रहा है? क्या सरकार ने इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी उपाय किए हैं? अगर प्रस्तावित श्वेत पत्र इन बातों को साफ नहीं कर पाया, तो उससे सरकार अपनी कमीज सफेद होने की आशा नहीं कर सकती।

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