अटलजी ने पहले ही पाकिस्‍तान पर जीत का ऐलान कर दिया था

 It Was Atal Government Who Brought Each And Every Martyrs Body Back From  The Kargil Battlefield - कारगिल युद्ध के एक-एक शहीद का शव पहुंचाया था घर,  अटल के नेतृत्व में दी

दिलचस्प किस्सा:
जब 22 दिन पहले एक रैली में वाजपेयी ने कर दिया था कारगिल में भारत की जीत का ऐलान

कारगिल की जंग को दो दशक से ज्‍यादा का समय हो चुका है. हर किसी को वह पल याद है जब 26 जुलाई 1999 को जम्‍मू कश्‍मीर के कारगिल में भारत और पाकिस्‍तान के बीच तीन माह बाद संघर्ष के खत्‍म होने का ऐलान किया गया था.
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TV9 Hindi   Publish Date -  24 December 20Edited By: ऋचा बाजपेई
अटल बिहारी वाजपेयी ने पहले ही पाकिस्‍तान पर जीत का ऐलान कर दिया था
कारगिल की जंग को दो दशक से ज्‍यादा का समय हो चुका है. हर किसी को वह पल याद है जब 26 जुलाई 1999 को जम्‍मू कश्‍मीर के कारगिल में भारत और पाकिस्‍तान के बीच तीन माह बाद संघर्ष के खत्‍म होने का ऐलान किया गया था. इस संघर्ष में भारत को विजेता करार दिया गया और पाकिस्‍तान को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी थी. इसके बाद से हर साल 26 जुलाई को कारगिल की जीत का जश्‍न ‘विजय दिवस’ के तौर पर मनाया जाता है. लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चार जुलाई को ही पाकिस्‍तान पर जीत का ऐलान कर दिया था. भारत रत्‍न देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों की लिस्‍ट में शामिल वाजपेयी के जन्‍मदिवस के मौके पर जानिए क्‍या था वह पूरा किस्‍सा और क्‍यों उन्‍होंने ऐसा किया था.

हरियाणा की रैली में विजय का ऐलान

3 जुलाई 1999 की शाम को भारतीय सेना ने टाइगर हिल को दुश्‍मन से छुड़ाने के लिए ऑपरेशन शुरू कर दिया था. इसके अगले ही दिन यानी 4 जुलाई को हरियाणा में एक रैली थी जिसे वाजपेयी संबोधित करने वाले थे. इसी रैली में वाजपेयी ने सेना की सफलता के साथ भारत की विजय का ऐलान कर दिया. इंडियन आर्मी ऑफिसर ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) एमपीएस बाजवा उस समय सेना की 192वीं माउंटेन ब्रिगेड को कमांड कर रहे थे. इसी ब्रिगेड पर टाइगर हिल को दुश्‍मन से छुड़ाने की जिम्‍मेदारी थी.

उन्‍हें आज भी रैली में वाजपेयी का वह विजय घोष याद हैं. भारत को मिली जीत ब्रिगेडियर बाजवा ने बताया था, ‘अगर चीजें दूसरी तरह से होती तो शायद बड़ी शर्मिंदगी होती लेकिन हमें जीत हासिल हुई।’ उन्‍होंने आज भी याद है कि जिस दिन वाजपेयी ने जीत का ऐलान किया था उसी दिन पाकिस्‍तान के तत्‍कालीन पीएम नवाज शरीफ ने अमेरिका में उस समय के राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन से मुलाकात की थी. यहां से चीजें बदलीं और पाक ने अपनी सेनाओं को वापस बुलाने का फैसला किया.

भारत के 527 सैनिक शहीद

उस समय 200,000 भारतीय सैनिकों ने जंग में हिस्‍सा लिया था. करगिल की जंग में कुल 527 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे. वहीं पाकिस्‍तान के 700 सैनिक मारे गए थे. कारगिल में जंग की तैयारी पाकिस्‍तान ने फरवरी 1999 के बाद से ही शुरू कर दी थी. वाजपेयी, पंजाब के अमृतसर से लाहौर तक बस लेकर गए थे और पाक में उस समय के आर्मी चीफ परवेज मुशर्रफ किसी और साजिश को अंजाम देने में लगे हुए थे. मार्च 1999 में इस बात की जानकारी सेना को दी गई थी कि कश्‍मीर के कुछ हिस्‍सों में पाकिस्‍तान के आतंकी घुसपैठ कर रहे हैं. पाक ने अपने सैनिकों के साथ ही आतंकियों को भी घुसपैठ कराई थी.

60 दिनों तक चला यह संघर्ष मई 1999 में शुरू हुआ और 26 जुलाई को जाकर खत्‍म हो सका था. द्रास जहां पर युद्ध लड़ा जा रहा था वहां पर तापमान -10 डिग्री से भी नीचे चला जाता था. सेना को एक भेड़ चराने वाले व्‍यक्ति ताशी नामग्‍याल ने 3 मई 1999 पाकिस्‍तान की तरफ से होने वाली घुसपैठ की जानकारी दी थी. पाकिस्‍तान के आतंकी और सैनिक एलओसी के अंदर तक दाखिल हो गए थे. तत्‍कालीन पाक आर्मी चीफ जनरल परवेज मुर्शरफ द्रास की मश्‍कोह घाटी में तक आ पहुंचे थे. इन्‍हीं आतंकियों को हटाने के लिए ऑपरेशन विजय लॉन्च किया गया था.

 Kargil Vijay Diwas 2021:
कारगिल विजय दिवस पर PM मोदी ने शहीदों को किया याद, ट्वीट कर लिखा ये खास संदेश
Kargil Vijay Diwas 2021: पीएम मोदी ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से एक ट्वीट में लिखा कि, हम उनके बलिदानों को याद करते हैं। हम उनकी वीरता को याद करते हैं। आज, कारगिल विजय दिवस पर हम उन सभी को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने हमारे देश की रक्षा करते हुए कारगिल में अपनी जान गंवाई। उनकी बहादुरी हमें हर एक दिन प्रेरित करती है।नई दिल्ली। सोमवार को कारगिल विजय दिवस (Kargil Vijay Diwas 2021) की 22 वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने कारगिल की लड़ाई में शहीद होने वाले जवानों को याद किया। बता दें कि कारगिल विजय दिवस (26 जुलाई) के दिन कारगिल, द्रास और बटालिक सेक्टरों में 1999 में पाकिस्तानी सैन्य घुसपैठियों के खिलाफ भारतीय सेनाओं की शानदार जीत को याद किया जाता है। भारतीय सेना ने कारगिल की बर्फीली पहाड़ियों पर करीब 3 महीने चले युद्ध के बाद 26 जुलाई, 1999 को ‘ऑपरेशन विजय’ सफलतापूर्वक पूरा होने और जीत की घोषणा की थी।

Rajnath Singh
@rajnathsingh
कारगिल विजय दिवस के अवसर पर मैं भारतीय सेना के अदम्य शौर्य, पराक्रम और बलिदान को नमन करता हूँ।

Yogi Adityanath
@myogiadityanath
अपने बलिदान से माँ भारती का मस्तक ऊंचा रखने वाले भारतीय सेना के रणबांकुरों की असाधारण वीरता के प्रतिफल “कारगिल विजय दिवस” की 22वीं वर्षगांठ पर सभी हुतात्माओं को कोटिशः नमन।
जय हिंद

Amit Shah
@AmitShah
कारगिल विजय दिवस पर इस युद्ध के सभी वीर सेनानियों का स्मरण करता हूँ। आपके अदम्य साहस, वीरता और बलिदान से ही कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर तिरंगा पुनः गर्व से लहराया। देश की अखंडता को अक्षुण्ण रखने के आपके समर्पण को कृतज्ञ राष्ट्र नमन करता है।

कारगिल विजय दिवस की शुभकामनाएँ।


 कारगिल विजय दिवस

नई दिल्ली। पाकिस्तान, भारत का एकमात्र ऐसा पड़ोसी देश है जिसने तरक्की की राह से ज्यादा विध्वंस के रास्ते पर चलना अधिक पसंद किया। 1965, 1971 की जंग में करारी हार मिली थी। लेकिन 1971 की जंग को वो नहीं भूल पाता है जब उसके दो टुकड़े हो गए। उसकी टीस उसे कुछ इस तरह सालती रही कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में छद्म युद्ध शुरु किया जो आज भी जारी है। आज से करीब 20 साल पहले 1999 में वो महीना मई का था जब कारगिल की चोटियों पर पाकिस्तानी सेना ने नापाक कब्जा कर लिया। भारत के सामने सैन्य बल के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं था क्योंकि लाहौर बस यात्रा से बने सद्भाव के माहौल को पूरी तरह खराब कर दिया गया।

नवाज शरीफ की गलबहियां और परवेज मुशर्रफ का कुचक्र
एक तरफ से नवाज शरीफ भारत के साथ गलबहियां का नाटक कर रहे थे तो उसी समय उनका जनहरल परवेज मुशर्रफ की निगाह करगिल पर थी और उसके साथ ही साथ पाकिस्तान की कुर्सी पर थी। करगिल में तो उसे हार खानी पड़ी लेकिन तख्ता पलट के जरिए वो पाकिस्तान की गद्दी पर काबिद हो गया थामई में पहाड़ों की बर्फ पिघल रही थी। लेकिन सेना के तोपों ओर टैंकों ने गरजना शुरू कर दिया था। करीब 60 दिनों तक चली लड़ाई का अंत 26 जुलाई 1999 को हुआ जिसे भारत में कारगिल विजय दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

क्या भारतीय फौज पार कर सकती थी एलओसी
अब यहां सवाल उठता है कि क्या भारतीय फौज उस वक्त एलओसी पार कर सकती थी। इस सवाल के कई जवाब है, जिस समय कारगिल की लड़ाई लड़ाई जा रही थी वो भारत के लिए आसान नहीं था दुश्मन सेना कारगिल की सीधी खड़ी पहाड़ियों पर कब्जा कर चुकी थी। रणनीतिक तौर पर पाकिस्तानी फौज को लाभ ही लाभ था। लेकिन भारतीय सेना के अदम्य साहस की गवाह तो पूरी दुनिया है। भारत ने पाकिस्तानी सैनिकों के छक्के छुड़ा जाता है। एक आंकड़े के मुताबिक पाकिस्तान के 4 हजार सैनिक मारे गए थे और पाकिस्तान एक तरह से बेदम हो गया और सरेंडर की मुद्दा में आ गया। पाकिस्तानी सेना के कब्जे वाली पोस्ट फिर भारत के कब्जे में थीं।

वो बड़े कारण क्या था जिसके चलते हुई थी कारगिल की लड़ाई?
नीरज कुमार दुबे Jul 25, 2018

जम्मू-कश्मीर के कारगिल-द्रास सेक्टर में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध में मिली जीत की याद में हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है।

जम्मू-कश्मीर के कारगिल-द्रास सेक्टर में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध में मिली जीत की याद में हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। इस दिन ऑपरेशन विजय के तहत भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी घुसपैठियों द्वारा कब्जा की गई चौकियों को सफलतापूर्वक वापस ले लिया था। 60 दिन तक चले इस युद्ध में भारतीय सैन्य बलों के 500 से ज्यादा जवानों ने अपनी जान कुर्बान की थी।
आज की पीढ़ी ने 1965 और 1971 की भारत पाकिस्तान लड़ाई के बारे में सिर्फ पढ़ा और सुना ही है लेकिन 1999 में कारगिल युद्ध को होते हुए देखा है इसलिए लोगों के जेहन में इसके दृश्य आज भी ताजा हैं। युद्ध से पहले के हालात पर नजर डालें तो देखने को मिलता है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद जब परमाणु परीक्षण किया तो पाकिस्तान ने भी जवाबी परीक्षण किया जिससे दोनों देशों के संबंध काफी तनावपूर्ण हो गये थे। वाजपेयीजी ने पाकिस्तान से संबंध सुधारने का निर्णय लिया और बस से यात्रा कर पाकिस्तान पहुँचे जहां पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने उनका भव्य स्वागत भी किया। इसके बाद दोनों देशों ने लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किये और संबंध बेहतर बनाने का निर्णय किया। लेकिन पाकिस्तान के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ को यह रास नहीं आया कि भारत के साथ संबंध सुधारे जाएं इसीलिए उन्होंने बड़ी संख्या में अपने सैनिकों और अर्धसैनिक बलों को छिपाकर नियंत्रण रेखा के पार भेजा। पाक सेना ने यह घुसपैठ 'ऑपरेशन बद्र' के तहत करवाई थी और उसका मुख्य उद्देश्य कश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को तोड़ना और भारतीय सेना को सियाचिन ग्लेशियर से हटाना था। मुशर्रफ ने यह घुसपैठ इतने गुपचुप तरीके से करवाई थी कि पाक वायुसेना प्रमुख और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री तक को इसकी खबर बाद में पता चली थी।



ऑपरेशन विजय का ऐलान

कश्मीर में सीमापार से घुसपैठ कोई नयी बात नहीं थी लेकिन भारत को यह नहीं पता था कि इस बार आतंकवादी नहीं पाकिस्तानी सेना घुसपैठ कर रही है। भारतीय सेना को जैसे ही पाकिस्तान की सुनियोजित साजिश का पता चला 'ऑपरेशन विजय' का ऐलान कर दिया गया। भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान के कब्जे वाली जगहों पर हमला किया और पाकिस्तानी सेना को भारतीय चोटियों को छोड़ने पर मजबूर कर दिया। हालांकि इस दौरान भारतीय सेना के 500 से ज्यादा जवान शहीद हुए। आखिरकार 26 जुलाई को वह दिन आया जिस दिन सेना ने इस ऑपरेशन का पूरा कर लिया।

आइए डालते हैं एक नजर कारगिल युद्ध से जुड़ी कुछ बड़ी बातों पर

-कारगिल युद्ध की शुरुआत 8 मई 1999 से हुई थी। दरअसल उस दिन पाकिस्तानी फौजियों और कश्मीरी आतंकियों को कारगिल की चोटी पर देखे जाने की पुष्टि हुई थी।

-पाकिस्तानी सेना की ओर से 5000 से ज्यादा सैनिक कारगिल पर चढ़ाई के लिए भेजे गये थे।

-पाकिस्तानी घुसपैठियों ने मुख्यतः उन भारतीय चौकियों पर कब्जा जमा लिया था जिनको भारतीय सेना की ओर से सर्दियों के मौसम में खाली कर दिया जाता था।

-परवेज मुशर्रफ की सोच यह थी कि कारगिल पर कब्जे से सियाचिन की सप्लाई कट जायेगी और हिंदुस्तानी सेना को सियाचिन से बाहर निकलने पर मजबूर किया जा सकेगा।

-भारतीय सेना के लिए सबसे बड़ी मुश्किल बात यह थी कि दुश्मन ऊँची पहाड़ियों पर बैठा था और वहां से गोलियां बरसा रहा था। भारतीय जवानों को आड़ लेकर या रात में चढ़ाई कर ऊपर पहुँचना पड़ रहा था जोकि बहुत जोखिमपूर्ण था।

-अकसर राजनीति का शिकार बनती रहीं बोफोर्स तोपें कारगिल लड़ाई में सेना के खूब काम आयीं। बोफोर्स तोपें दुश्मनों पर कहर बनकर ढाई थीं।

-भारतीय जवान बड़ी संख्या में शहीद होते जा रहे थे जिससे सरकार को भी आलोचना झेलनी पड़ रही थी। तब 25 मई 1999 को दिल्ली में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की एक अहम बैठक हुई जिसमें तय किया गया कि पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ हवाई हमले किये जाएं।

-भारतीय वायुसेना की ओर से 30 वर्षों बाद 1999 में हवाई हमले किये गये थे। कारगिल युद्ध में वायुसेना के 300 विमानों को शामिल किया गया था।

-वायुसेना की मदद मिलने से भारतीय सेना की स्थिति काफी मजबूत हो गयी थी। भारतीय सेना ने जाँबाजी दिखाते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार गिराया और तोलोलिंग तथा टाइगर हिल जैसी महत्वपूर्ण चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया।

-यह आजादी के बाद से पहली ऐसी लड़ाई थी जिसकी तसवीरें टीवी के माध्यम से घर-घर तक पहुँच गयी थीं और भारतीयों में पाकिस्तान के विरोध में गुस्सा उबाल ले रहा था।

-कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना के 2700 से ज्यादा सैनिक मारे गये थे। इस लड़ाई में पाकिस्तान को 1965 और 1971 से भी ज्यादा नुकसान हुआ था।

कारगिल युद्ध के अमर शहीदों की सूची तो काफी बड़ी है लेकिन उक्त कुछ नाम मीडिया में काफी प्रमुखता से छाये रहे और कारगिल युद्ध पर आधारित फिल्मों में भी इन नामों का जिक्र रहा।

-कैप्टन विक्रम बत्रा
-लेफ्टिनेंट विजयंत थापर
-लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया
-कैप्टन अनुज नैय्यर
-ग्रे‍नेडियर योगेंद्र सिंह यादव

बहरहाल, यह अच्छी बात है कि पूरा देश एकजुट होकर कारगिल के शहीदों को श्रद्धांजलि देता है और उन्हें याद करता है लेकिन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब प्रत्येक भारतीय के मन में भारत माता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने का भाव पैदा होगा। इसी के साथ ही हमें शहीदों के परिवारों की भी सुध लेने की आवश्यकता है। यह अकसर देखने में आता है कि किसी जवान के शहीद होने के तत्काल बाद तो परिवार को खूब पूछा जाता है, मीडिया के आगे बड़ी-बड़ी बातें कही जाती हैं लेकिन सप्ताह भर बाद ही इन परिवारों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता। यह हालात बदलने की जरूरत है।
-नीरज कुमार दुबे

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 इस हीरो ने कारगिल की लड़ाई में 48 पाकिस्तानियों को मारकर फहराया था तिरंगा

कारगिल का हीरो – भारत के गौरवमयी इतिहास में कारगिल का युद्ध हर देशवासी का सिर गर्व से ऊंचा कर देता है।
इस जंग में भारत के सैनिकों और जवानों ने अपनी बहादुरी से पाकिस्‍तान को धूल चटा दी थी। कभी भी देश या दुनिया में कोई संकट आता है तो भारतीय सैनिक अपनी जांबाजी से उस खतरे को दूर करने में अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं। भारतीय सेना का तो लोहा पूरी दुनिया मानती है।
सन् 1999 में हुआ कारगिल का युद्ध भारतीयों के साथ-साथ पाकिस्‍तानियों को भी याद रहेगा। 26 जुलाई, 1999 को भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। इसी दिन भारत ने कारगिल युद्ध में पाकिस्‍तान को हराकर जीत हासिल की थी। आपको बता दें कि इस जंग में भारत के 500 सैनिक शहीद हुए थे और इनमें से कई जवान ऐसे भी थे जिनकी वीर गाथा को आज भी याद किया जाता है।
कारगिल युद्ध में अपनी जांबाजी दिखाने वाले जवानों में से एक रिटायर्ड फौजी कारगिल का हीरो दिगेंद्र सिंह भी थे। राजस्‍थान के सीकर के रहने वाले दिगेंद्र सिंह ने कारगिल जंग में पाकिस्‍तानी फौज की नाक में दम कर दिया था।

कारगिल का हीरो जिसने पांच गोलियां लगी थीं
जंग में दिगेंद्र को पांच गोलियां लगी थीं लेकिन फिर भी उन्‍होंने देश के प्रति अपनी जिम्‍मेदारी निभाई।
उरी हमले के बाद दिगेंद्र ने पहले ही कह दिया था कि अगर जंग होती है तो वो लड़ने जरूर जाएंगें और 100 दुश्‍मनों को तो मारकर ही आएंगें। जिस दिन जंग होगी उसी दिन वो बिस्‍तर से उठकर मैदान में आ जाएंगें, कुछ ऐसा कहना था भारत के इस वीर जवान का। अगर देश से उन्‍हें जंग में शामिल होने का आदेश नहीं मिलता है तो भी वो जंग में हिस्‍सा लेने की पूरी कोशिश करेंगें।
वह सेना की सबसे बेहतरीन बटालियन 2 राजपूताना रायफल्‍स में थे। आपको बता दें कि कारगिल युद्ध में दिगेंद्र ने 48 पाकिस्‍तानी सैनिकों को मार गिराया था।

कारगिल का हीरो जिसने मेजर का सिर काट दिया
कारगिल युद्ध में दिगेंद्र ने बहुत बहादुरी दिखाई। उन्‍होंने चाकू से पाक के मेजर अनवर का सिर काटकर उसमें तिरंगा फहराया था। दिगेंद्र का कहना था कि उनके पास युद्ध का अनुभव है। अगर वो खुद नहीं लड़ पाए तो अपने अनुभव से अपने साथियों की मदद करेंगें। जंग में जीत के बाद राष्‍ट्रपति डॉक्‍टर केआर नारायणन ने उन्‍हें महावीर चक्र से सम्‍मानित किया था। दिगेंद्र को इंडियन आर्मी के बेस्‍ट कोबरा कमांडो के रूप में जाना जाता था। साल 2005 में 47 साल की उम्र में दिगेंद्र रिटायर हो गए।
कारिगल का युद्ध भारत अपने ऐसे ही सैनिकों की बहादुरी और हौंसले से जीता था। देश के लिए जान देने में भारतीय सैनिक एक पल की भी देरी नहीं करते हैं और इस बात का प्रमाण खुद दिगेंद्र सिंह ही हैं जिन्‍होंने एक जंग के बाद कारगिल की लड़ाई में शामिल होने का पूरा मन बना लिया था।
ये था कारगिल का हीरो – उनके हौंसले इतने बुलंद थे कि उन्‍होंने अकेले ही 48 पाकिस्‍तानी सैनिकों को मार गिराया था। ये वाकई में भारत के लिए गर्व की बात है कि उसकी सुरक्षा में इतने जांबाज और बहादुर सिपाही लगे हैं। कारगिल का युद्ध भारतीयों के साथ-साथ पाकिस्‍तानियों को भी याद रहेगा।

 


कारगिल: जंग के बीच जब जवानों से मिलने पहुंचे नरेंद्र मोदी और प्रेम कुमार धूमल, पूरा किस्सा
Authored byहिमांशु तिवारी | नवभारतटाइम्स.कॉमUpdated: Jul 26, 2020,

कारगिल विजय दिवस 2020: कारगिल (Kargil Vijay Diwas) की जंग का हर किस्सा आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। नरेंद्र मोदी कारगिल की जंग के वक्त भारतीय सेना के

हाइलाइट्स
कारगिल युद्ध के दौरान नरेंद्र मोदी भारतीय सेना के जांबाज जवानों से मिलने पहुंचे थे
हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के साथ कारगिल गए थे मोदी
टाइगर हिल जीत लौटे जवान की बंदूक लेकर मोदी चेक करने लगे, धूमल ने बताया किस्सा
जंग में घायल भारतीय सैनिकों से भी मिलने पहुंचे थे प्रेम कुमार धूमल और नरेंद्र मोदी

लखनऊ/शिमला
कारगिल (Kargil War) की लंबी लड़ाई का हर किस्सा भारतीय सेना (Indian Army) के पराक्रम (Shauryaveer) से लबरेज है। कारगिल की जंग के दौरान नरेंद्र मोदी (Narendra Modi in Kargil) भी जवानों से मिलने पहुंचे थे। उस दौरान वह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के महामंत्री और हिमाचल प्रदेश के प्रभारी थे। कारगिल यात्रा के उस किस्से को हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल (Prem Kumar Dhumal) आज भी जब दोहराते हैं तो उनकी मुस्कान उस पल की गवाही देती है। नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से प्रेम कुमार धूमल ने यह किस्सा साझा किया है।

पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल कहते हैं, '2 जुलाई 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सारे सिक्यॉरिटी थ्रेट्स को नजरंदाज कर सीमा पर गए थे। उन्होंने उन सभी जवानों की पीठ थपथपाई जो देश के लिए लड़ रहे थे। उस दौरान नरेंद्र मोदी शिमला आए हुए थे। वह उस समय हिमाचल प्रदेश के प्रभारी थे। हमने जब अटल जी के बारे में सुना तो चर्चा की और हमने भी योजना बना ली। हम सैनिकों के लिए बहुत सारा सामान लेकर 4 जुलाई को हेलिकॉप्टर से श्रीनगर पहुंचे। 5 जुलाई को हमारा कारगिल जाने का कार्यक्रम था। डॉ. फारूक अब्दुल्ला इस बात से उत्साहित थे कि किसी अन्य राज्य का मुख्यमंत्री लड़ाई के बीच सरहद पर जाने को तैयार हुआ है। जब हम कारगिल पहुंचे तो वहां गोलाबारी हो रही थी।'


मैं एक परिवार से उस वक्त मिला था। वे तीन भाई थे। बीच वाला भाई शहीद हो गया था। मैं बड़े भाई से बात कर रहा था। उसने कहा कि बीच वाला भाई शहीद हो गया और सबसे छोटा वाला भाई भर्ती होने के लिए चला गया है। मैंने उसे 5 लाख रुपये दिया। उसने 2.5 लाख रुपये लौटा दिए। साथ ही कहा कि कई परिवारों को देना है, यह रकम रख लीजिए।
प्रेम कुमार धूमल, पूर्व मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश
'क्लिंटन ने अटल बिहारी से कही थी यह बात'
धूमल बताते हैं, 'हमें कंटेनमेंट मोर्चे पर ले जाया गया। हमने सारा सामान जो लेकर गए थे, वह सैनिकों को हवाले कर दिया। हमारी कोशिश थी कि जो सैनिक सरहद पर लड़ रहे हैं, उनको चीजें मिल जाएं। हमें फारूक साहब ने बताया था कि (तत्कालीन) अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन उनका फोन अटल बिहारी वाजपेयी को आया है। उन्होंने कहा है कि नवाज शरीफ तो हमारे पास आ गए, तुम भी हमारे पास आ जाओ। सीजफायर कर दो, फिर कोई रास्ता निकालते हैं। हमने पूछा कि अटल जी ने क्या जवाब दिया तो डॉक्टर साहब ने कहा कि इसका अभी पता नहीं चला।'

तब जवानों ने अटल जिंदाबाद के लगाए नारे
पूर्व मुख्यमंत्री कहते हैं, 'मैं जब मोर्चे के अंदर सैनिकों को संबोधित कर रहा था तो एक ऑफिसर बहुत उत्साहित होकर आया कि प्रधानमंत्री (तत्कालीन) ने जवाब दे दिया है। हम सब इस बात को जानने के लिए उत्सुक थे कि जवाब क्या है। उसने कहा कि प्रधानमंत्री ने कहा है कि जबतक एक भी घुसपैठिया कारगिल में है तबतक मैं देश छोड़कर नहीं जाऊंगा। युद्धविराम नहीं होगा। एक-एक को मारेंगे, सारा कारगिल खाली कराएंगे। इतना बोलते ही वहां मौजूद जवानों ने अटल बिहारी वाजपेयी जिंदाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिए।'

'...और मोदी जी बंदूक के बारे में पूछने लगे'
प्रेम कुमार धूमल बताते हैं, 'मैंने उनसे पूछा कि वर्दी में इस तरह से नारे लगाना तो मना है। इस पर उन्होंने कहा कि पहली बार 52 साल के बाद हमें ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो हमारी बात सुनता है। हम एटम बम चाहते थे, इन्होंने देश को परमाणु शक्ति बना दिया। हम चाहते थे कि 1948 की तरीके सीजफायर की गलती न हो, हम दुश्मन को इस बार ठीक से ठिकाने लगाना चाहते थे, जो बात प्रधानमंत्री ने कह दी है।' पूर्व सीएम का कहना है, 'डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने हमसे कहा था कि अगर हेलिकॉप्टर अमरनाथ के पास उतार लें तो बाबा के दर्शन भी हो जाएंगे। हम गुफा में गए तो वहां के कुछ सैनिक टाइगर हिल जीतकर आए थे। हम उनके पास बैठ गए।'
घायल सैनिकों का जाना था हाल

हमने उस सैनिक से पूछा कि इंजेक्शन, दवा वगैरह ली आपने। बहुत दर्द होता होगा। उन्होंने जवाब दिया कि सर, दर्द नहीं होता। सैनिक ने कहा कि कल शाम को टाइगर हिल वापस ले लिया। अब दर्द नहीं होता।
प्रेम कुमार धूमल, पूर्व मुख्यमंत्री

'सैनिक ने सामान नहीं लिया, हमने सोचा...'
पूर्व सीएम धूमल मुस्कुराते हुए कहते हैं, 'मोदी जी ने वहां एक जवान की बंदूक पकड़कर देखा कि कैसे चलाते हैं। काफी देर वह उसे देखते रहे। शाम को हम श्रीनगर आए। जहां-जहां भी घायल सैनिकों को भर्ती कराया गया था, उनसे हम मिले। वहां एक बहुत ही मार्मिक घटना हुई। हम सबको सामान दे रहे थे। सभी हाथों में उसे ले रहे थे। तभी हम एक बेड के पास पहुंचे जहां सैनिक ने सामान नहीं लिया। हमें लगा कि शायद वह किसी बात को लेकर नाराज है। हम आगे बढ़ गए। तभी एक अफसर दौड़ता हुआ आए, उन्होंने हमें बताया कि विस्फोट में इस सैनिक के हाथ और पैर नहीं हैं। हम वापस उसी सैनिक के पास लौटे।'

मैं दिल्ली गया था। अटल बिहारी वाजपेयी जी को किस्सा सुना रहा था। वह रोने लगे। मैंने उन्हें समझाया।
प्रेम कुमार धूमल, पूर्व सीएम, हिमाचल प्रदेश

जब एक बुजुर्ग बोले- मैं भी जंग में जाने को तैयार
धूमल बताते हैं, 'मैं सभी जांबाजों के घर गया। मेरे चुनाव क्षेत्र में आठ-नौ लोग शहीद हो गए थे। मैं एक के घर जब पहुंचा तो उनके पिता ने दौड़ते हुए मुझे गले लगा लिया। उन्होंने कहा कि बेटे तो इसीलिए पैदा किए जाते हैं कि बड़े होकर देश की रक्षा करें। फिर उन्होंने दो पोते बुलाए और कहा कि ये भी फौज में जाएंगे। यही नहीं, उन्होंने मुझसे कहा कि धूमल जी जब आप दिल्ली जाओ तो अटल जी से कहना है कि 82 साल का यह हवलदार खजान सिंह वहां जाकर लड़ने के लिए तैयार है।'


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